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Tuesday, 17 March, 2026
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गाज़ीपुर के कूड़े के पहाड़ पर इंसानियत: 400 डॉग्स को रोज़ खाना खिलाता दिल्ली का दंपति

वसुंधरा आनंद और कुणाल बोस गंदगी और मीथेन गैस के बीच जाकर गाजीपुर लैंडफिल पर रहने वाले सैकड़ों आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं. अगला कदम है नसबंदी.

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नई दिल्ली: हैंडसम, ज़ेप्टो और सौतन जैसे ही वसुंधरा आनंद और कुणाल बोस को गाजीपुर के कूड़े के पहाड़ पर चढ़ते देखते हैं, दौड़कर उनके पास आ जाते हैं. उनकी आंखें चमकने लगती हैं और पूंछ तेज़ी से हिलने लगती है. उन्हें पता है कि बड़े प्लास्टिक के डिब्बों का मतलब क्या है.

हर दूसरे दिन सुबह, यह कपल साउथ दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित अपने घर से इस 70 एकड़ के लैंडफिल तक आता है. वे अपने साथ चावल, चिकन और सूप (ब्रॉथ) लेकर आते हैं, ताकि यहां रहने वाले 400 से ज्यादा कुत्तों को खिला सकें. जब तक वे ऊपर पहुंचते हैं, उनके जूते पूरी तरह गंदगी से भर जाते हैं, लेकिन उन्हें इसकी परवाह नहीं होती. उनका कहना है कि उनका काम सिर्फ कुत्तों को खाना खिलाना नहीं, बल्कि उन्हें वैक्सीनेट करना और नसबंदी भी कराना है.

भारत में इस समय आवारा कुत्तों को लेकर बड़ी बहस चल रही है. कई इलाकों में लोगों के बीच इस मुद्दे पर मतभेद हैं. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में कहा था कि सभी कुत्तों को सड़कों से हटाने का आदेश नहीं दिया गया है, लेकिन यह भी कहा कि अगर कुत्ते काटते हैं तो जिम्मेदारी फीडर्स की भी होगी.

इस बहस के बीच आनंद और बोस एक अलग बात कहते हैं—उनका मानना है कि कुत्तों को खाना खिलाना समस्या नहीं, बल्कि समाधान की शुरुआत है, जैसा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों में भी कहा गया है.

आनंद ने कहा, “खाना खिलाना पहला कदम है. अगर आप खाना नहीं खिलाएंगे तो आप वैक्सीनेशन नहीं कर सकते, नसबंदी नहीं कर सकते और यह भी नहीं जान पाएंगे कि कुत्ते कहां हैं.”

वे पिछले 10 साल से दिल्ली में कुत्तों को खाना खिला रही हैं.

बोस और आनंद खतरनाक रास्तों से गुजरकर कुत्तों तक उनका खाना पहुंचाते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
बोस और आनंद खतरनाक रास्तों से गुजरकर कुत्तों तक उनका खाना पहुंचाते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

फरवरी 2025 से गाजीपुर आना शुरू करने के बाद, उनका कहना है कि वे अब तक यहां करीब 100 कुत्तों की नसबंदी करा चुके हैं. फिलहाल यहां वे अकेले ही यह काम कर रहे हैं.

35 साल की आनंद, जो बोस के साथ एक एडवरटाइजिंग एजेंसी और Kvaab Welfare Foundation नाम की संस्था चलाती हैं, बताती हैं, “गाजीपुर के कुत्ते कुपोषित हैं. उन्हें खाना ढूंढना मुश्किल होता है.” कूड़े के पहाड़ होने के बावजूद, खाने लायक चीज़ें बहुत कम होती हैं और कुत्ते सड़े-गले खाने या मरे हुए जानवरों पर निर्भर रहते हैं.

ह्यूमेन वर्ल्ड फॉर एनिमल्स की सीनियर डायरेक्टर केरेन नाज़रेथ ने कहा, “रिहायशी इलाकों के कुत्तों का ख्याल रखने वाला कोई न कोई होता है, लेकिन लैंडफिल जैसी जगहें इंसानों और जानवरों दोनों के लिए खतरनाक होती हैं. जो लोग यहां के कुत्तों तक पहुंच सकते हैं, उन्हें उनकी नसबंदी और वैक्सीनेशन भी सुनिश्चित करना चाहिए.”

कुणाल बोस ने कहा, “यह प्रक्रिया धीमी है, लेकिन असर दिखता है, जहां पहले बहुत पिल्ले होते थे, वहां अब कम होने लगते हैं. धीरे-धीरे कुत्तों के समूह स्थिर हो जाते हैं और लोग उन्हें पहचानने लगते हैं.”

कुछ लोग मानते हैं कि कुत्तों को खाना खिलाने से उनकी संख्या बढ़ती है, लेकिन पशु कल्याण संगठन कहते हैं कि अगर नसबंदी के साथ किया जाए तो इसका उल्टा असर होता है. नाज़रेथ कहती हैं, “ABC प्रोग्राम में फीडर्स की बहुत अहम भूमिका होती है—हम सैकड़ों कुत्तों तक इन्हीं की मदद से पहुंचते हैं.”

दिल्ली में अभी यह सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है. अक्टूबर 2025 से दिल्ली सरकार ने करीब 290 फीडिंग पॉइंट बनाए हैं, लेकिन अभी भी शहर के लगभग 10 लाख आवारा कुत्तों की नसबंदी के लिए यह पर्याप्त नहीं है.

PETA इंडिया के शौर्य अग्रवाल ने कहा, “दिल्ली को नसबंदी के प्रयास तेज़ करने होंगे. लखनऊ, देहरादून, जयपुर, गोवा और चेन्नई जैसे शहरों ने इस दिशा में काफी काम किया है. दिल्ली के पास इंफ्रास्ट्रक्चर है, लेकिन काम की गति बढ़ानी होगी.”

दिप्रिंट ने एमसीडी मेयर राजा इकबाल सिंह से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

सुबह की रोशनी में कुत्ते, जैसे उन्हें पता हो खाना आने वाला है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
सुबह की रोशनी में कुत्ते, जैसे उन्हें पता हो खाना आने वाला है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

चलता-फिरता खाना

अब गाजीपुर के गेट पर कोई आनंद और बोस से सवाल नहीं करता. लोग उन्हें जानवरों से प्यार करने वाले के रूप में पहचानते हैं. वे कार से उतरते हैं और ज्यादातर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के काम करते हैं.

बोस कहते हैं, “हम यहां कुत्तों और लोगों से जुड़ना चाहते हैं. मास्क और ग्लव्स दूरी बना देते हैं.” यहां तक भरोसा बनाने में उन्हें महीनों लगे हैं.

वसुंधरा कार की डिक्की में चिकन, चावल और सूप मिलाती हुईं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
वसुंधरा कार की डिक्की में चिकन, चावल और सूप मिलाती हुईं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

बोस कार की डिक्की खोलते हैं और आवाज़ लगाते हैं—“आआआ…”. आनंद पहले से ही डिब्बों के पास खड़ी होती हैं और बड़े लाल बाल्टी में चिकन और चावल मिलाती हैं. हैंडसम थोड़ी देर प्यार करवाता है, जबकि बाकी कुत्ते थोड़ी दूरी बनाकर इंतज़ार करते हैं. वे भौंकते नहीं, बस खाना चाहते हैं.

यह फीडिंग सुबह 3:30 बजे से शुरू होती है. वे कनॉट प्लेस और ओखला जैसे इलाकों से होते हुए गाजीपुर पहुंचते हैं, आमतौर पर सुबह 7 बजे तक. उससे पहले अंधेरा होता है और बाद में वहां इंसानों की गतिविधि बढ़ जाती है.

आनंद कहती हैं, “अगर आप लगातार काम करते रहेंगे, तो लोग बदलाव देखना शुरू कर देंगे.”

आज के खाने में 150 किलो चावल और चिकन, 40 किलो ड्राई फूड, 40 लीटर सूप, 20 लीटर पानी, 10 किलो कैट फूड और 10 किलो दही शामिल है. वे चार साल से Paw Eats नाम की किचन से खाना ले रहे हैं.

आनंद और बोस सुबह 3 बजे से कुत्तों को खाना खिलाना शुरू कर देते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
आनंद और बोस सुबह 3 बजे से कुत्तों को खाना खिलाना शुरू कर देते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
देर रात का खाना या सुबह का नाश्ता? | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
देर रात का खाना या सुबह का नाश्ता? | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

एक साल पहले जब उन्होंने यहां खाना खिलाना शुरू किया, तब वे सिर्फ गेट तक जाते थे. अब वे पहाड़ के ऊपर तक पहुंचते हैं. बोस धीरे-धीरे कार चलाते हैं और कुत्ते साथ-साथ दौड़ते हैं.

बोस ने कहा, “लैंडफिल पर गाड़ी चलाना आसान नहीं है. मैंने एक बार बुलडोजर को नीचे गिरते देखा है.” रास्ते में वे तय करते हैं कि कहां रुकना है और कहां नए कुत्ते ढूंढने हैं.

वे हंसते हुए कहते हैं, “तुम अपना दही बचाकर रखो, हमारी अलग-अलग प्राथमिकताएं हैं.”

जैसे-जैसे कार ऊपर जाती है, बदबू तेज़ होती जाती है, लेकिन वे खिड़की खोलकर कुत्तों को आवाज़ देते रहते हैं.

गेट के पास कुत्ते धैर्य से इंतज़ार करते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
गेट के पास कुत्ते धैर्य से इंतज़ार करते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

उन्होंने जगहों के नाम भी कुत्तों के नाम पर रख दिए हैं—हैंडसम पॉइंट, शर्मीली पॉइंट, मैटरनिटी वार्ड, लेकिन कूड़ा लगातार बदलता रहता है.

बोस ने कहा, “कूड़ा हटाने से नए रास्ते बन जाते हैं.”

गर्मी से राहत के लिए दही | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
गर्मी से राहत के लिए दही | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

यह लैंडफिल 1984 में बना था और 2002 में भर चुका था, लेकिन आज भी यहां कूड़ा डाला जा रहा है. 2019 में इसकी ऊंचाई करीब 65 मीटर बताई गई थी. यहां जहरीली गैस, आग और लैंडस्लाइड जैसे खतरे रहते हैं.

यहां चढ़ाई करना काफी खतरनाक है. कुछ महीने पहले उनकी गाड़ी कीचड़ में फंस गई थी और कचरा बीनने वालों ने उसे बाहर निकाला था.

आनंद ने कहा, “जब कूड़ा हटाया जाता है तो मीथेन गैस निकलती दिखती है.” लेकिन इन सबके बीच भी वह यहां बार-बार आती हैं.

दिल्ली का डरावना नज़ारा, लेकिन कुत्तों के लिए नाश्ते में चिकन-चावल ज़रूर है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
दिल्ली का डरावना नज़ारा, लेकिन कुत्तों के लिए नाश्ते में चिकन-चावल ज़रूर है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

पहले खाना, फिर ABC

लैंडफिल में फैले हुए कुत्ते ऐसा लगते हैं जैसे उन्हें कार के आने का पहले ही पता चल जाता है, जैसे खबर घाटी से पहाड़ की चोटी तक पहुंच गई हो. दिल्ली की धुंध से ढकी सुबह में उनकी परछाइयां दिखती हैं और वे उसी एक भरोसेमंद देखभाल के इंतज़ार में खड़े रहते हैं जिसे वे जानते हैं.

‘चोटी’ के पास, बोस ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर एक प्लास्टिक शीट बिछाते हैं, जबकि आनंद खाना निकालती हैं. कुछ ही पलों में, छह से दस कुत्ते इकट्ठा हो जाते हैं और उत्साह से उनके चारों तरफ घूमने लगते हैं. खाना कुछ ही सेकंड में खत्म हो जाता है. फिर भी कुत्ते वहीं रुकते हैं, उनकी नज़रें डिब्बों पर टिकी रहती हैं, शायद और खाने की उम्मीद में.

कई लोग सोचते हैं कि इतने बड़े कूड़े के ढेर में रहने वाले कुत्तों को खाने की कमी नहीं होगी, लेकिन सच इससे बिल्कुल अलग है. गाज़ीपुर तक जो चीज़ें पहुंचती हैं, उनमें ज़्यादातर प्लास्टिक, कपड़ा, मेडिकल कचरा और स्क्रैप होता है—खाना नहीं.

बोस ने कहा, “लैंडफिल की चोटी पर रहने वाले कुत्तों के पास लगभग कोई खाना नहीं होता. वहां सिर्फ कचरा है. इसलिए वहां खाना खिलाना बहुत ज़रूरी हो जाता है.” वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि सभी कुत्तों को पानी और दही मिले ताकि शरीर में पानी की कमी न हो.

इस बंजर जगह में खाने के विकल्प बहुत कम हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
इस बंजर जगह में खाने के विकल्प बहुत कम हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

आनंद ने चिंता जताई, “यहां के कुत्तों के लिए गर्मियां बहुत मुश्किल होने वाली हैं.”

यह दंपति, जो कहता है कि जानवरों के प्रति प्यार के कारण वे करीब आए और “पपी लव” में पड़ गए, ने 2016 में बीमार और घायल कुत्तों को बचाने से शुरुआत की थी, लेकिन कोविड लॉकडाउन के दौरान उन्होंने ज्यादा ध्यान खाना खिलाने पर दिया, जब कई आवारा कुत्तों को दुकानदारों और लोगों से मिलने वाला बचा-खुचा खाना भी मिलना बंद हो गया था. पूरे शहर में फीडर्स मदद के लिए आगे आए, ऑफिस कॉम्प्लेक्स, निर्माण स्थलों और खाली जगहों पर गुलाबी बर्तन रखकर कुत्तों को खाना देने लगे, लेकिन आनंद और बोस के इस काम को शुरू करने से पहले कोई भी बार-बार गाज़ीपुर जैसे सुनसान इलाके में जाने की हिम्मत नहीं करता था.

सरकार ऐसी तकनीक ला सकती है जिससे फीडर्स का मैप तैयार हो, सुरक्षित जगहों को फीडिंग स्पॉट के रूप में चिन्हित किया जा सके और फीडर्स को साफ दिशा-निर्देश दिए जा सकें. साथ ही, इसी नेटवर्क की मदद से बिना नसबंदी वाले कुत्तों या मदद की ज़रूरत वाले कुत्तों की पहचान की जा सकती है.

-केरेन नाज़रेथ, सीनियर डायरेक्टर, Humane World for Animals

पिछले एक साल में, आवारा कुत्ते इस जोड़े की मौजूदगी के साथ थोड़ा सहज हो गए हैं. अच्छी तरह खाना खाने वाला कुत्ता शांत और स्वस्थ रहता है, जिससे झगड़े कम होते हैं, बीमारियां कम होती हैं और इंसानों के साथ टकराव भी कम होता है. अगला कदम है टीकाकरण और नसबंदी.

गाज़ीपुर लैंडफिल बहुत बड़ा है, इसलिए नसबंदी के लिए कुत्तों को पकड़ना आसान नहीं है. कभी-कभी एंबुलेंस देखकर कुत्ते डरकर भाग जाते हैं, क्योंकि अचानक शोर और हलचल से वे घबरा जाते हैं. कई कुत्ते पहले से ही हादसों या लोगों के साथ बुरे अनुभव के कारण सतर्क रहते हैं, इसलिए रेस्क्यू टीम कभी-कभी जाल का इस्तेमाल करती है ताकि उन्हें सुरक्षित तरीके से पकड़ा जा सके. कभी-कभी, अगर भरोसा बन जाता है, तो यह जोड़ा कुत्तों को सीधे अपनी कार में भी ले जाता है.

पहाड़ियों और घाटियों के बीच बोस कुत्तों को पानी देते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
पहाड़ियों और घाटियों के बीच बोस कुत्तों को पानी देते हुए | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

कुत्तों को एक अधिकृत ABC सेंटर ले जाया जाता है. सर्जरी और रिकवरी के बाद, आमतौर पर चार दिन के भीतर, उन्हें फिर से गाज़ीपुर में छोड़ दिया जाता है.

नियमित खाना खिलाने और नसबंदी के साथ, जिन इलाकों में यह जोड़ा काम करता है वहां कुत्तों की संख्या कम हो रही है.

बोस ने कहा, “यह प्रक्रिया धीमी है लेकिन साफ दिखाई देती है. जहां पहले बार-बार पिल्ले होते थे, वहां अब नसबंदी बढ़ने के साथ उनकी संख्या कम हो रही है. समूह स्थिर हो जाते हैं. जो लोग पहले इन जानवरों को नज़रअंदाज करते थे, अब वे अलग-अलग कुत्तों को पहचानने लगे हैं.”

सड़क के कुत्तों के लिए गुलाबी बर्तन | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
सड़क के कुत्तों के लिए गुलाबी बर्तन | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

दिल्ली में इस बात को लेकर काफी मतभेद हैं कि आवारा कुत्तों को खाना खिलाना चाहिए या नहीं, लेकिन पुणे ने खाना खिलाने और नसबंदी के बीच अच्छे संबंध दिखाए हैं. डॉग फीडर्स ने वर्षों तक पुणे नगर निगम के Animal Birth Control प्रोग्राम का समर्थन किया है, कुत्तों के साथ भरोसा बनाकर और उन्हें पकड़ना आसान बनाकर. 2018 से 2023 के बीच शहर में आवारा कुत्तों की संख्या 42.87 प्रतिशत कम हुई. सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देशों के बाद, निगम ने फीडर्स से आवेदन भी मांगे, जिसमें फीडिंग लोकेशन, समय और कुत्तों की संख्या बताने को कहा गया, ताकि तय जगहों पर फीडिंग की जा सके.

नाज़रेथ ने कहा कि सरकार का सहयोग जरूरी है ताकि खाना खिलाने का काम इंसानों और जानवरों दोनों के लिए सुरक्षित तरीके से हो सके.

उन्होंने कहा, “सरकार तकनीक ला सकती है जिससे फीडर्स का मैप बने, सुरक्षित फीडिंग स्पॉट तय हों और फीडर्स को साफ दिशा-निर्देश मिलें. साथ ही, इसी नेटवर्क का इस्तेमाल करके बिना नसबंदी वाले या मदद की जरूरत वाले कुत्तों की पहचान की जा सकती है.”

पूरे शहर में कुत्तों को खाना खिलाना एक बेहद मेहनत वाला काम है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
पूरे शहर में कुत्तों को खाना खिलाना एक बेहद मेहनत वाला काम है | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

‘हमदर्दी फैलती है’

जब यह जोड़ा उस सुबह दूसरी बार फेंके गए प्लास्टिक से बने अस्थायी बर्तन में पानी डालता है, तो कुत्तों का एक झुंड जल्दी से इकट्ठा हो जाता है अपनी प्यास बुझाने के लिए. पहले यहां एक बर्तन छोड़ देना बेकार होता था. या तो वह कचरे में दब जाता था या कोई उठा ले जाता था, और उसे भरने वाला कोई नहीं होता था. लेकिन अब उनके पास एक अनौपचारिक टीम है जो इस पर नजर रखती है.

पास का एक कचरा बीनने वाला उनसे कहता है कि चिंता मत करो— “हम कुत्तों के लिए कुछ व्यवस्था कर देंगे, आप लोग चिंता मत कीजिए.” इस बंजर जगह में अब एक दयालु समुदाय बन चुका है.

खाने के बाद, टिगरी एक पुलिसकर्मी के साथ बैठी है. अब इलाके में कई लोग कुत्तों का ध्यान रखते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
खाने के बाद, टिगरी एक पुलिसकर्मी के साथ बैठी है. अब इलाके में कई लोग कुत्तों का ध्यान रखते हैं | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

आनंद ने कहा, “हमदर्दी फैलती है. अगर आप बार-बार आकर काम करते रहेंगे, तो लोग फर्क देखने लगते हैं.”

उन्होंने दिल्ली से फाइन आर्ट्स में ग्रेजुएशन और पोस्ट-ग्रेजुएशन किया है, लेकिन वह झारखंड के एक गांव से आती हैं, जहां जानवरों की देखभाल रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा था. उनकी मां रोज गायों और आवारा जानवरों को खाना खिलाती थीं.

समय के साथ, यह जोड़ा कहता है कि उनके काम ने आसपास के लोगों को भी बदल दिया है. गाज़ीपुर इसका उदाहरण बन गया है. जो मजदूर पहले इनके आने से परेशान हो जाते थे, अब मुस्कुराते हुए लैंडफिल का गेट खोलते हैं.

सबसे ज़रूरी बात, उन्होंने कुत्तों के लिए अपना दिल खोल दिया है. एंट्रेंस पर एक गार्ड दौड़कर आया और घायल कुत्ते ‘मॉर्टी’ के लिए दवा मांगी. जब आनंद और बोस एक झुंड को खाना खिला रहे थे, एक भूरे-पीले रंग का कुत्ता थोड़ी दूरी पर खड़ा था. एक मजदूर ने बताया कि वह पास में अपने पिल्लों की रखवाली कर रहा है. अब तक दो बार, लैंडफिल के मजदूरों ने उन्हें पिल्लों को बचाने में मदद की है.

रात 8 बजे के बाद लैंडफिल में इंसानी गतिविधियां तेज़ हो जाती हैं. कुणाल कहा कि उन्होंने एक बार बुलडोजर को नीचे गिरते देखा था | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
रात 8 बजे के बाद लैंडफिल में इंसानी गतिविधियां तेज़ हो जाती हैं. कुणाल कहा कि उन्होंने एक बार बुलडोजर को नीचे गिरते देखा था | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

जब इस जोड़े ने दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में कुत्तों को खाना खिलाना शुरू किया था, तो कई लोगों ने विरोध किया, लेकिन सालों में लोगों का नज़रिया बदल गया. अब लोग उन्हें घायल कुत्तों के बारे में फोन करते हैं या टीकाकरण के बारे में जानकारी देते हैं.

आनंद ने कहा, “जो लोग पहले हमें कुत्तों को खाना खिलाने से मना करते थे, वही अब फोन करके कहते हैं, ‘इस कुत्ते को चोट लगी है, क्या आप आकर देख सकते हैं?’ यह सबसे बड़ा असर है जिसकी आप उम्मीद कर सकते हैं.”

Kvaab Welfare Foundation के इंस्टाग्राम हैंडल पर वे गाज़ीपुर के कुत्तों के अपडेट डालते हैं. दो पिल्ले, ज़ौमेटो और स्विगी, जो गिद्धों के बीच खुशी से खेलते नजर आते हैं, लोगों से खूब प्यार पाते हैं. एक कमेंट में लिखा था— “कीचड़ में कमल के फूल खिल गए ये तो.” कुछ लोग सलाह भी देते हैं: कागज पर खाना मत दो, वे कार्बन खा लेंगे; उन्हें इस जहरीली जगह से कहीं और क्यों नहीं ले जाते?

यह जोड़ा खाने और इलाज के खर्च का कुछ हिस्सा क्राउडफंडिंग से जुटाता है. उनका कहना है कि लोग मदद करने वाले हैं.

आनंद और बोस कूड़े के ढेर में मिले दो पिल्लों के साथ. इंस्टाग्राम पर लोग कहते हैं, ‘कीचड़ में कमल के फूल खिल गए’ | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट
आनंद और बोस कूड़े के ढेर में मिले दो पिल्लों के साथ. इंस्टाग्राम पर लोग कहते हैं, ‘कीचड़ में कमल के फूल खिल गए’ | फोटो: मनीषा मोंडल/दिप्रिंट

लेकिन उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ती है, कमेंट्स में और फोन कॉल्स पर. उनके विरोधी दो तरह के होते हैं—कुछ लोग जो जानवरों को पसंद नहीं करते और कुछ जो इस बात से नाराज होते हैं कि वे हर रेस्क्यू कॉल का तुरंत जवाब नहीं दे पाते. उनके फोन लगातार रेस्क्यू की रिक्वेस्ट से बजते रहते हैं.

बोस ने कहा, “बढ़ता हुआ नेटवर्क हमें परेशान जानवरों तक जल्दी पहुंचने में मदद करता है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि हमें हमारी क्षमता से ज्यादा रिक्वेस्ट मिलती हैं.” कई बार सबसे प्यारे वीडियो पर भी ताने भरे कमेंट आते हैं, जैसे—“अगर इतना प्यार है तो कुत्ते को घर ले जाओ.”

आनंद ने कहा कि पिछले कुछ सालों में जानवरों को लेकर बहस और सख्त हो गई है. उन्हें डर है कि कानूनी लड़ाइयां और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर चल रही बहस उन लोगों के लिए “हथियार” बन जाती हैं जो पहले से ही जानवरों को पसंद नहीं करते.

उनके मुताबिक, जानवरों के प्रति क्रूरता को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है.

उन्होंने कहा, “आप पहले छोटी-छोटी चीजों में हिंसा को सामान्य बनाते हैं. फिर वह धीरे-धीरे समाज के दूसरे हिस्सों में भी फैल जाती है.”

सुबह 8 बजे तक बाल्टियां खाली हो जाती हैं. प्लास्टिक के डिब्बे वापस कार में रख दिए जाते हैं, जबकि कुछ कुत्ते उन्हें देखते रहते हैं, पूंछ हिलाते हुए. जल्द ही, आनंद और बोस फिर से खाना भरकर लौटेंगे.

बोस ने कहा, “कुछ लोग समझेंगे, कुछ नहीं समझेंगे, लेकिन कुत्तों को तो खाना चाहिए ही.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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