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Sunday, 25 October, 2026
होमफीचरगुरुग्राम के ग्रामीण इलाकों में कैसे छाया बॉक्स क्रिकेट, खेतों से फ्लडलाइट वाले मैदानों तक का सफर

गुरुग्राम के ग्रामीण इलाकों में कैसे छाया बॉक्स क्रिकेट, खेतों से फ्लडलाइट वाले मैदानों तक का सफर

बालियावास से लेकर बादशाहपुर तक, स्थानीय ग्रामीणों से लीज़ पर लिए गए फ्लडलाइट वाले टर्फ मैदान कॉर्पोरेट जगत के लोगों को अपनी ओर खींच रहे हैं—और देर रात की बुकिंग से लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं.

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गुरुग्राम: गुरुग्राम के ग्रामीण इलाकों में कारोबार का एक नया तरीका तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. यहां न तो मॉल बन रहे हैं, न कांच से ढके ऊंचे कॉर्पोरेट ऑफिस और न ही बड़े-बड़े महंगे स्कूल. इसके बजाय, यहां बॉक्स क्रिकेट टर्फ यानी चारों तरफ से घिरे छोटे क्रिकेट मैदान बन रहे हैं. ये खेल के ऐसे मैदान हैं, जो जेनरेशन Z की खेल, मनोरंजन और सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने की चाहत को पूरा करते हैं. साथ ही, अपनी जमीन किराए पर देने वाले किसानों को इससे अच्छी कमाई भी हो रही है. इन मैदानों की बुकिंग लगभग हर शाम होती है. लोग कुछ ओवर खेलने, दोस्तों के साथ मुकाबला करने और इंस्टाग्राम रील्स बनाने के लिए यहां पहुंचते हैं.

प्रीमियम आउटडोर मल्टी-स्पोर्ट्स सुविधा और कॉर्पोरेट कार्यक्रमों की जगह अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा के सह-संस्थापक तनुज शर्मा ने कहा, “गुरुग्राम में पैसा है. यहां के लोग हमेशा नई चीजें आजमाने, निवेश करने और नई संभावनाएं तलाशने के लिए उत्साहित रहते हैं.”

कई दशक पहले, गुरुग्राम में खेतों और खाली जमीनों को अक्सर क्रिकेट मैदानों में बदल दिया जाता था. ये मैदान सप्ताहांत और सर्दियों में लोगों के लिए खास आकर्षण होते थे. बच्चे दोपहर की धूप में खेलते थे, कॉर्पोरेट कर्मचारी पूरे हफ्ते के काम की थकान से राहत पाने के लिए यहां आते थे और परिवार भी कुछ समय आराम से बिताने के लिए इन मैदानों का रुख करते थे. लेकिन गुरुग्राम तेजी से बढ़ा और खाली जगहों की जगह कंक्रीट की इमारतों ने ले ली. इससे पारंपरिक क्रिकेट खेलने के लिए जगह बहुत कम रह गई.

इसी दौरान, लोगों की दिलचस्पी मनोरंजन के नए और ज्यादा रोमांचक तरीकों में बढ़ने लगी. वे कुछ ऐसा चाहते थे, जिसमें कम समय लगे, दोस्तों के साथ अच्छा समय बिताया जा सके और सबसे बढ़कर, मजा आए. बॉक्स क्रिकेट ने क्रिकेट के पारंपरिक खेल को छोटे मैदान में खेलने का मौका दिया. इसमें कम खिलाड़ी होते हैं, मैच छोटा होता है और ज्यादा दौड़ना भी नहीं पड़ता, लेकिन खेल में रोमांच भरपूर रहता है. आंकड़े बताते हैं कि इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.

इस प्लेटफॉर्म की ओर से साझा की गई रिपोर्ट के मुताबिक, Playo के नेटवर्क पर बॉक्स क्रिकेट की बुकिंग जनवरी से अगस्त 2024 के दौरान 4.62 लाख थी, जो 2026 में इसी अवधि के दौरान बढ़कर 8.66 लाख हो गई. यानी दो साल में बुकिंग में 87.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. अगस्त 2026 में ही बड़े शहरों और टियर-1 शहरों में बुकिंग पिछले साल के मुकाबले 16.1 प्रतिशत बढ़ी.

Floodlights illuminate a box cricket turf in Gurugram, where players can book the enclosed ground for evening games | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
गुरुग्राम में बॉक्स क्रिकेट के एक मैदान पर फ्लडलाइट्स लगी हैं, जहां लोग शाम को खेलने के लिए मैदान बुक कर सकते हैं. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

गुरुग्राम के ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच का क्षेत्र जैसे-जैसे बदला, जमीन का किराया भी बढ़ता गया. अब जमीन के मालिक एक एकड़ जमीन किराए पर देने के लिए हर महीने एक लाख रुपये से ज्यादा मांग रहे हैं. इस बदलाव से एक ऐसा कारोबारी माहौल भी बना, जिसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी. अब नए उद्यमी शहर में तेजी से कम होती खुली जगहों के आसपास कारोबार खड़ा कर रहे हैं. वे शहरी लोगों की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, जो खेलने, मेलजोल बढ़ाने और आराम करने के नए तरीके तलाश रहे हैं.

इस कारोबार की तेजी के पीछे जमीन मालिकों की भूमिका भी अहम है, जो अपनी जमीन इन खेल सुविधाओं के लिए किराए पर दे रहे हैं. बालियावास गांव के धर्मवीर कहते हैं, “हमारी जमीन की वजह से ही यह सब संभव हो पाया है.”

बॉक्स क्रिकेट का मैदान बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के हिसाब से 15 लाख से 50 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है.

ब्लैक स्टैलियन स्पोर्ट्स एंड इंफ्रा के संस्थापक सौरभ भाटी ने 2020 से अब तक भारत में करीब 300 बॉक्स क्रिकेट मैदान बनाए हैं.

उन्होंने कहा, “गुरुग्राम बहुत तेजी से बदल रहा है. भविष्य में खुली जगहों की कमी हो जाएगी और लोगों ने इसी हिसाब से खेलों को नए रूप में ढाल लिया है. बड़े पारंपरिक मैदानों के बजाय लोग छोटे मैदानों में खेलना पसंद कर रहे हैं और जो जगह उपलब्ध है, उसका इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे शहर में खेलों से जुड़े बुनियादी ढांचे के लिए एक नया अवसर पैदा हुआ है.”

An indoor-lit box cricket turf at Fluxon Sports in Sector 58, Gurugram, where Kumar manages bookings and coaches players | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
गुरुग्राम के सेक्टर 58 में Fluxon Sports का एक इनडोर बॉक्स क्रिकेट मैदान, जहां कुमार बुकिंग संभालते हैं और खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते हैं. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

दो काम करने वाले उद्यमी

दिन में तनुज शर्मा फरीदाबाद के एक स्कूल में शिक्षक हैं. शाम होते ही वह 30 किलोमीटर गाड़ी चलाकर गुरुग्राम पहुंचते हैं, जहां वह चार खेल केंद्रों का प्रबंधन करते हैं. इन केंद्रों में शहर के वे लोग आते हैं, जो ऑफिस का काम खत्म करने के बाद खेलना चाहते हैं. खुद भी खेलों में दिलचस्पी रखने वाले शर्मा अपने शौक को कारोबार में बदलना चाहते थे. लेकिन उनका विचार कुछ अलग था. वह गुरुग्राम की चमकदार इमारतों में काम करने वाले कॉर्पोरेट मजदूरों की जिंदगी में थोड़ा मजा लाना चाहते थे.

शर्मा की दिनचर्या का एक हिस्सा अपने साझेदार विकास दबास के साथ चलाए जाने वाले चार केंद्रों का दौरा करना भी है. इनके नाम अर्बन अखाड़ा, अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा, अर्बन रेसर और अर्बन ऑफ-रोडिंग हैं. अपने कारोबार के लिए सही जगह तलाशते हुए दोनों करीब 10 साल पहले गुरुग्राम पहुंचे थे. उन्होंने फरीदाबाद और नोएडा में भी ऐसी जमीन तलाशने की कोशिश की, जहां कारोबार बढ़ने की संभावना हो. लेकिन दोनों को यकीन था कि दिल्ली-NCR में गुरुग्राम में सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं.

शर्मा ने कहा, “गुरुग्राम में हमें आसानी से जमीन मिल गई. इसके बाद हमारा कारोबार बढ़ने लगा. अब ‘अर्बन‘ गुरुग्राम में और जमीन तलाश रहा है, ताकि खेलों से जुड़ी और परियोजनाएं शुरू की जा सकें.”

शर्मा ने शारीरिक शिक्षा की पढ़ाई की है. बचपन से लेकर फरीदाबाद के मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट में मुख्य कोच के रूप में काम करने तक, उनकी दिलचस्पी हमेशा इस बात में रही कि खेलों को कारोबार के रूप में कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है, खासकर ऐसी दुनिया में जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ रहा है. उन्होंने कहा, “AI आपको फिट या मनोरंजन में व्यस्त नहीं रख सकता, लेकिन खेल ऐसा कर सकते हैं.”

अर्बन ब्रांड के तहत चलने वाले चार केंद्रों में अलग-अलग तरह की गतिविधियों की सुविधा है. अर्बन अखाड़ा में जिपलाइनिंग, साइकिलिंग, दीवार पर चढ़ने और दूसरे रोमांचक खेलों की सुविधा है. अर्बन रेसर में गो-कार्टिंग होती है, जबकि अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा में बॉक्स क्रिकेट, पैडल बॉल, पिकलबॉल, बास्केटबॉल और दूसरे खेलों की सुविधा है. अर्बन ऑफ-रोडिंग में अरावली की पहाड़ियों में ऑफ-रोड ड्राइविंग का रास्ता है. खाड़ा को छोड़कर बाकी तीन केंद्र 2025 में शुरू हुए थे.

A cricket stadium at night, with floodlights illuminating the playing field | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
रात में क्रिकेट स्टेडियम का नजारा, जहां फ्लडलाइट्स से मैदान रोशन है. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

दस साल पहले गुरुग्राम में खेलों से जुड़ा बुनियादी ढांचा एक क्रिकेट मैदान से शुरू हुआ था. अब यहां कई खेलों के लिए एक ही जगह पर सुविधाएं बनाने का चलन बढ़ रहा है.

शाम करीब छह बजे अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा के सभी कोर्ट खिलाड़ियों से भरे हुए थे. वहां जन्मदिन की पार्टी चल रही थी. पहले एक घंटे तक 20 से ज्यादा बच्चे बॉक्स क्रिकेट के मैदान में खेले. फिर ऊबने के बाद वे बास्केटबॉल कोर्ट में चले गए. इसके बाद वे पिकलबॉल खेलने पहुंचे. इस दौरान संगीत और खाने-पीने का इंतजाम भी था.

बच्चे जब खेलकूद में व्यस्त थे, तो बड़े लोग बॉक्स क्रिकेट के मैदान की ओर बढ़े. लेकिन शर्मा और उनके साझेदार ने पारंपरिक बॉक्स क्रिकेट मैदानों से अलग एक गोल मैदान बनाया है. इसका मकसद खेल का माहौल बेहतर बनाना और खिलाड़ियों को पारंपरिक क्रिकेट मैदान जैसा अनुभव देना है.

ब्लिंकिट, जोमैटो, अमेज़न और अमेरिकन एक्सप्रेस जैसी कंपनियां अर्बन के खेल केंद्रों में कॉर्पोरेट कार्यक्रम आयोजित कर चुकी हैं.

ये केंद्र कॉर्पोरेट दुनिया में लोगों के बीच मेलजोल बढ़ाने की जगह बन गए हैं. खासकर उन लोगों के लिए, जिन्हें अपने कामकाजी माहौल में अकेलापन महसूस होता है या जो अपने घर से दूर रहते हैं, अकेले रहते हैं या छोटे परिवारों में रहते हैं.

अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा शुरू होने के एक साल के भीतर 20 से ज्यादा कॉर्पोरेट कार्यक्रम आयोजित कर चुका है. शर्मा का कहना है कि नोएडा या फरीदाबाद में इतने कम समय में ऐसा करना मुश्किल होता.

उन्होंने कहा, “गुरुग्राम में लोग खेलों पर पैसा खर्च करने के लिए तैयार हैं, जबकि नोएडा में लोग इस मामले में ज्यादा सावधानी बरतते हैं. फरीदाबाद में बैडमिंटन लोकप्रिय है, लेकिन गुरुग्राम में असली बदलाव दिखाई देता है. यहां कई खेल और कई गतिविधियां एक ही मैदान में एक साथ उपलब्ध हैं.”

Basketball and other sports facilities at Urban Sports Adda in Gurugram, part of a growing network of multi-sport arenas catering to the city’s demand for recreation | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
गुरुग्राम के अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा में बास्केटबॉल और दूसरे खेलों की सुविधाएं. यहां कई खेलों के लिए एक ही जगह पर मैदान बनाए गए हैं, ताकि शहर में मनोरंजन की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

शर्मा और दबास ने जितनी भी खेल सुविधाएं शुरू की हैं, उनमें बॉक्स क्रिकेट सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा है. इसकी बुकिंग सिर्फ बैडमिंटन से कम है. बादशाहपुर, बालियावास और न्यू गुरुग्राम खेलों से जुड़े बुनियादी ढांचे के तीन प्रमुख केंद्र बन गए हैं. अब इन इलाकों में बॉक्स क्रिकेट के मैदानों पर लगी जालियां और तेज रोशनी वाली लाइटें आसानी से दिखाई देती हैं.

गुरुग्राम में इस मॉडल की सफलता से कॉर्पोरेट कर्मचारी और दि बॉक्स केज के संस्थापक अरोड़ा को भी प्रेरणा मिली. उन्होंने शहर में एक नया खेल केंद्र शुरू किया. करीब एक महीने पहले उन्होंने बालियावास में जमीन किराए पर ली. अब वह हर शाम ऑफिस का काम खत्म करने के बाद वहां पहुंचते हैं और कारोबार का प्रबंधन देखते हैं. वहीं, उनके साझेदार नोएडा में उनके पुराने केंद्र को संभालते हैं.

बॉक्स क्रिकेट ही क्यों?

दि बॉक्स केज और अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा, दोनों के लिए बॉक्स क्रिकेट सबसे ज्यादा लोकप्रिय खेल बनकर उभरा है. बॉक्स क्रिकेट को गली क्रिकेट का नया रूप कहा जा सकता है, जिसे ऐसी पीढ़ी के लिए तैयार किया गया है, जिसके पास खेलने के लिए कम जगह है और जो स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताती है.

इस खेल को समझना आसान है, इसे खेलना आसान है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह गुरुग्राम की बढ़ती भीड़भाड़ वाली शहरी जिंदगी में आसानी से फिट हो जाता है. अब खिलाड़ियों को क्रिकेट खेलने के लिए बड़े मैदान, दोस्तों की बड़ी टोली या पूरी शाम खाली रखने की जरूरत नहीं है. एक छोटा मैदान, फ्लडलाइट्स और कुछ खिलाड़ी ही काफी हैं.

क्रिकेट के शौकीन और खिलाड़ी अरोड़ा ने कहा, “अगर आप क्रिकेट की बात करते हैं, तो आमतौर पर आपको इसे मैदान पर करीब चार घंटे तक खेलना पड़ता है. किसी ऐसे कॉर्पोरेट कर्मचारी के लिए, जो नियमित रूप से खेल नहीं खेलता और जिसकी शारीरिक क्षमता भी ज्यादा नहीं है, यह मुश्किल हो सकता है.”

गुरुग्राम में दि बॉक्स केज के मैदान पर फ्लडलाइट्स जल रही हैं और वहां का कर्मचारी रात आठ बजे की बुकिंग के लिए मैदान तैयार कर रहा है. इसी दौरान अरोड़ा का फोन लगातार बज रहा है. एक और व्यक्ति शाम सात बजे के लिए मैदान बुक करना चाहता है. यहां एक घंटे का किराया 1,200 रुपये है और मैदान आसानी से बुक हो रहा है. यहां सिर्फ क्रिकेट ही नहीं खेला जाता. जब स्टंप हटा दिए जाते हैं, तो यही मैदान फुटबॉल खेलने की जगह बन जाता है. अरोड़ा जल्दी से ऐप खोलकर दिखाते हैं कि मैदान की बुकिंग रात तीन बजे तक है.

नोएडा में अरोड़ा शाम के समय एक स्कूल की जगह किराए पर लेते हैं. वहां दि बॉक्स केज ने एक साल के भीतर अपनी लागत निकाल ली थी. दोनों साझेदारों ने 2024 में करीब 50 लाख रुपये निवेश किए थे और लगभग 10 लाख रुपये का मुनाफा दर्ज किया था.

एक महीना बीतने के बाद भी अरोड़ा के नए मैदान से अभी मुनाफा नहीं हो रहा है. हालांकि, इससे इतनी कमाई होने लगी है कि हर महीने के खर्च पूरे हो जाते हैं.

बालियावास में बॉक्स क्रिकेट का मैदान. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट
The Box Cage’s Noida turf, where Arora and his partner invested around Rs 50 lakh in 2024 and said the business broke even within a year | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
नोएडा में दि बॉक्स केज का मैदान, जहां अरोड़ा और उनके साझेदार ने 2024 में करीब 50 लाख रुपये निवेश किए थे. उनका कहना है कि एक साल के भीतर कारोबार अपनी लागत निकालने की स्थिति में पहुंच गया था. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा में बॉक्स क्रिकेट खेलने के एक घंटे का किराया 2,000 रुपये है. यह दि बॉक्स केज से 800 रुपये ज्यादा है. इस केंद्र ने एक साल के भीतर 30 प्रतिशत मुनाफा कमाया. यहां मुनाफा कमाने वाली गतिविधियों में बॉक्स क्रिकेट तीसरे स्थान पर है.

अरोड़ा ने कहा, “यह मनोरंजन के सबसे सस्ते तरीकों में से एक है. अगर टीम में खिलाड़ियों की संख्या बढ़ जाती है, तो हर व्यक्ति पर आने वाला खर्च अपने आप कम हो जाता है.”

अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा में Infra 360 ने काम के एक थकाऊ दिन के बाद अपने कर्मचारियों के लिए दो घंटे के लिए बॉक्स क्रिकेट का मैदान बुक किया. इससे कर्मचारियों को काम की समय-सीमा की चिंता छोड़कर छक्के लगाने का मौका मिला.

खेल की शुरुआत किसी भी दूसरे क्रिकेट मैच की तरह जोश और आक्रामकता के साथ होती है. “ये गया छक्का! पांचवां ओवर चल रहा है. बहुत बढ़िया, खिलाड़ियों… और आउट!” वहां मौजूद 16 कर्मचारियों में से एक किनारे खड़े होकर कमेंट्री कर रहा है, जबकि बाकी लोग पूरे जोश के साथ खेल रहे हैं.

इन 16 कर्मचारियों में 25 साल के कुशाग्र चौधरी भी शामिल थे. उन्हें क्रिकेट खेलने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी और उन्हें इस खेल की “बहुत कम जानकारी” थी.

उन्होंने पहली बार सूरत में काम करते समय बॉक्स क्रिकेट खेला था. वहां वह सप्ताहांत में अपने ऑफिस के साथियों के साथ खेलते थे. गुरुग्राम आने के बाद यह ऑफिस के बाद उनका पसंदीदा शौक बन गया.

उन्होंने कहा, “मुझे यह खेल इसलिए पसंद आया, क्योंकि हम बहुत पेशेवर खिलाड़ी नहीं हैं और बड़े मैदान पर खेलना भी मेरे लिए उतना आसान नहीं है. यहां खेलना अच्छा लगता है और इसमें सहज महसूस होता है.”

अपनी टीम के कई दूसरे लोगों की तरह कुशाग्र भी बचपन में गली क्रिकेट खेलते हुए बड़े हुए थे. लेकिन इस मैदान पर मिट्टी नहीं है, घास की जगह कृत्रिम घास है और बाउंड्री भी पास हैं. इससे खेल आसान और तेज हो जाता है और शायद इसमें गलती होने पर उतना नुकसान भी नहीं होता.

यहां खिलाड़ी अपने नियम खुद तय करते हैं. गली क्रिकेट में अगर गेंद सातवीं मंजिल की खिड़की से टकरा जाए, तो उसे छक्का माना जा सकता है. वहीं, बॉक्स क्रिकेट में सामने वाले विकेट की ओर सीधा शॉट मारने पर भी छह रन मिल सकते हैं. खेल के नियम भी मैदान की तरह छोटे और सुविधाजनक होते हैं.

उन्होंने कहा, “हमारे बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनी रहती है. कुछ लोग बहुत अच्छे खिलाड़ी हैं. वे पहले भी क्रिकेट खेलते थे. इसी तरह उनके बीच मेलजोल भी बढ़ा. मुझे लगता है कि इससे आपसी जुड़ाव मजबूत होता है.”

Property advertisements in Baliawas reflect the growing demand for farmland, farmhouses and other land in Gurugram’s rapidly changing rural-urban fringe | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
बालियावास में जमीन, फार्महाउस और दूसरी संपत्तियों की बढ़ती मांग को दिखाते संपत्ति के विज्ञापन. गुरुग्राम के ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच तेजी से बदलते क्षेत्र में जमीन की मांग बढ़ रही है. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

इस इलाके में बढ़ते अवसरों को देखते हुए अंकित कुमार ने बालियावास में बॉक्स क्रिकेट का एक मैदान किराए पर लिया. कुमार इस मैदान और गुरुग्राम के कई दूसरे खेल केंद्रों में कोच हैं. शाम के समय वह Fluxon Sports का प्रबंधन संभालते हैं. दिन में वह मैदान पर खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते हैं और शाम होते ही बुकिंग की लगातार आती कॉल में व्यस्त हो जाते हैं.

कुमार ने कहा, “हर कार्यक्रम से 15 से 20 लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है. हम बड़ी कंपनियों को निशाना बनाते हैं. कॉर्पोरेट कंपनियां आती हैं और उनके पास पांच या छह घंटे का समय होता है. वे अच्छा खाना परोसती हैं, मनोरंजन का इंतजाम होता है, लोग डीजे पर नाचते हैं और शारीरिक गतिविधियों से जुड़ी चुनौतियां आयोजित की जाती हैं. इस तरह प्रति व्यक्ति 2,000 रुपये का पैकेज बन जाता है.”

करीब 15,000 रुपये किराए पर खर्च करने के बाद कुमार बॉक्स क्रिकेट के मैदान से 50,000 रुपये कमाने में सफल रहे.

सड़कें नहीं, महंगा बुनियादी ढांचा और हुक्का

फ्लक्सॉन, अर्बन स्पोर्ट्स अड्डा और दि बॉक्स केज ने खुले मैदानों में अपने खेल केंद्र बनाए हैं. ये जमीनें कभी जाटों और गुर्जरों के बड़े-बड़े खेत हुआ करती थीं. यहां गेहूं, चावल और सब्जियां उगाई जाती थीं, लेकिन जल्द ही इन खेतों की जगह कंक्रीट की इमारतों ने ले ली.

अब यहां उन उद्यमियों के सपने दिखाई देते हैं, जिन्होंने गुरुग्राम के कॉर्पोरेट कर्मचारियों में बढ़ते अकेलेपन की समस्या का हल खेलों में तलाशा.

करीब दस साल पहले, जब तनुज शर्मा इस इलाके में जमीन तलाश रहे थे, तब एक एकड़ जमीन कुछ हजार रुपये महीने में किराए पर मिल जाती थी. आज उसी जमीन का किराया एक से डेढ़ लाख रुपये महीने तक पहुंच गया है. जब अरोड़ा ने अपना कारोबार बढ़ाने का फैसला किया, तो उन्होंने सेक्टर 99 में जमीन तलाश की. लेकिन आखिर में उन्होंने बालियावास की मुख्य सड़क के पास जमीन ली. अब वह वहां करीब तीन एकड़ जमीन किराए पर लेते हैं. बालियावास रोड से एक मोड़ अंदर जाने पर एक एकड़ जमीन का किराया तीन लाख रुपये तक पहुंच जाता है.

शर्मा ने कहा, “इस इलाके में जमीन की कीमतें पिछले कुछ सालों में दोगुनी हो गई हैं. गुरुग्राम का यह हिस्सा जैसे-जैसे विकसित होगा, कीमतें आगे भी बढ़ती रहेंगी.”

पिछले कुछ वर्षों में बालियावास में खेल केंद्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है. गांव के लोग इस बदलाव की शुरुआत Pathways School के आने से जोड़ते हैं. कुछ लोगों का मानना है कि इसकी वजह क्रिकेट के मैदान थे, जिनमें से कई अब खेल केंद्रों में बदल चुके हैं.

Muddy, uneven roads in Baliawas contrast with the sports arenas and other businesses drawing an increasingly affluent clientele to the village | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
बालियावास की कीचड़ भरी और ऊबड़-खाबड़ सड़कें उन खेल केंद्रों और कारोबारों से बिल्कुल अलग नजर आती हैं, जो गांव में ज्यादा पैसे खर्च करने वाले ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट
An Ayurvedic and Panchakarma treatment centre in Baliawas. The village’s growing sports infrastructure sits alongside gaps in basic civic amenities, including limited healthcare facilities | Photo: Manisha Mondal | ThePrint
बालियावास में आयुर्वेदिक और पंचकर्म उपचार केंद्र. गांव में खेलों से जुड़ी सुविधाएं बढ़ रही हैं, लेकिन बुनियादी नागरिक सुविधाओं की कमी अब भी है. यहां स्वास्थ्य सेवाएं भी सीमित हैं. | फोटो: मनीषा मोंडल | दिप्रिंट

धर्मवीर ने कहा, “बालियावास का इतना विकास खेल सुविधाओं की वजह से हुआ है. दूसरे गांवों में भी खेलों की सुविधाएं हैं, लेकिन यहां मैदान और खेलों से जुड़ा बुनियादी ढांचा ज्यादा है.” धर्मवीर पहले अपनी जमीन पर गेहूं और दूसरी फसलें उगाते थे, लेकिन अब वह इस जगह को एक उभरते हुए शहर के रूप में देखते हैं.

दूर से देखने पर यह विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार की कहानी लगती है. लेकिन ज़मीन पर हालात कुछ और ही हैं. यहां आज भी संकरी और कीचड़ भरी सड़कों से कारें मुश्किल से निकल पाती हैं. रात में रास्ता दिखाने के लिए स्ट्रीट लाइटें नहीं हैं. गांव में एक डिस्पेंसरी तो है, लेकिन अस्पताल नहीं है. वहीं, मवेशी सड़कों पर घूमते रहते हैं.

इस तेजी से बढ़ते कारोबार ने छोटे दुकानदारों को भी बदलते और ज्यादा पैसे खर्च करने वाले इलाके के हिसाब से खुद को ढालने के लिए प्रेरित किया है. बालियावास में जन्मे और पले-बढ़े विक्रम हरसाना पहले मुख्य सड़क के किनारे एक छोटी-सी आमलेट की दुकान चलाते थे. अब वह अपनी जगह को नए माहौल के हिसाब से बदल रहे हैं. इसके लिए वह वहां जिम, एक शानदार रेस्टोरेंट और लोगों के बैठने तथा समय बिताने की जगह बना रहे हैं. हरसाना मानते हैं कि गांव की ज्यादातर जमीन खेल केंद्रों के लिए इस्तेमाल होने लगी है. लेकिन उनका कहना है कि इससे “गांव और गांव वालों के पास पैसा आ रहा है.”

बालियावास में दो अलग-अलग दुनियाएं एक-दूसरे से टकरा रही हैं. कुछ ऐसा ही गुरुग्राम के दूसरे हिस्सों में भी दिखाई देता है. युवा उद्यमी खेलों के बढ़ते कारोबार से पैसा कमा रहे हैं, जबकि जमीन के मालिक अपने लॉन में बैठकर हुक्का पीते हैं और ताश खेलते हैं.

सात साल पहले बालियावास में शाम का मतलब था कि किसान अपने मवेशियों के साथ घर लौट रहे हैं. आज शाम को लोग लॉन में हुक्का पीते हैं, ताश खेलते हैं या झपकी लेते हैं. वहीं, महंगी SUV गाड़ियां गांव के खेल केंद्रों में पहुंचती रहती हैं.

धर्मवीर ने कहा, “इस विकास से हमें उतना फायदा नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था.” हालांकि, उन्होंने तुरंत यह भी जोड़ा कि खेती करना अब वैसे भी मुश्किल हो गया था, क्योंकि आवारा मवेशी फसलों को नष्ट कर देते थे. उनके मुताबिक, जमीन किराए पर देने से उन्हें 21वीं सदी में अपना जीवन चलाने में मदद मिली है.

हालांकि, जमीन की कीमतों में भारी उछाल आया है. जिस एक एकड़ जमीन की कीमत दस साल पहले दो करोड़ रुपये थी, अब वह करीब 35 करोड़ रुपये में बिक रही है.

धर्मवीर जब अपने दोस्तों के साथ ताश का खेल खत्म कर रहे थे, तभी पास के एक खेल केंद्र के बाहर Fortuner और BMW जैसी गाड़ियां आकर रुकने लगीं.

उन्होंने कहा, “हमारा गांव स्टार से सुपरस्टार बन गया है.”

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