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Sunday, 25 October, 2026
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भारतीय विदेश नीति का सफर: गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक ताकत तक

भारत का लक्ष्य डिप्लोमैटिक रिश्तों, आर्थिक ताकत और राष्ट्रीय क्षमताओं को इंटरनेशनल नतीजों को आकार देने की ताकत में बदलना नहीं होना चाहिए.

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भारत की विदेश नीति में लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता एक अहम सिद्धांत रही है. इसकी वजह से भारत अपने फैसले खुद लेने की आजादी बनाए रख सका है, अलग-अलग ताकतवर देशों के साथ रिश्ते रख सका है और किसी भी भू-राजनीतिक गुट के अधीन हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा सका है. शीत युद्ध के दौरान, जब दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी, तब यह भारत की संप्रभुता और अपने फैसले खुद लेने की नीति का साफ संदेश था. आज की ज्यादा जटिल अंतरराष्ट्रीय स्थिति में भी यह भारत को कूटनीतिक रूप से लचीला रहने और अपने देश पर भरोसा बनाए रखने में मदद करती है.

लेकिन दुनिया बदल गई है और दुनिया में भारत की स्थिति भी बदली है. भारत अब सिर्फ ऐसा देश नहीं है जो अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी बचाने की कोशिश कर रहा है. भारत अब एक ऐसी महत्वपूर्ण ताकत बन रहा है, जिसके पास आर्थिक ताकत, कूटनीतिक पहुंच और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असर डालने की रणनीतिक महत्वाकांक्षा है. इसलिए, भारत के सामने अब चुनौती अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को रणनीतिक ताकत में बदलने की है.

रणनीतिक स्वायत्तता को रणनीतिक ताकत बनाना

आज भारतीय विदेश नीति के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के दम पर उभरते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों को ज्यादा प्रभावित कर सकता है. अमेरिका अपने सहयोगी देशों से चाहता है कि वे उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं का समर्थन करें. चीन अपने प्रभाव को बढ़ाना और क्षेत्रीय संतुलन को नए तरीके से बदलना चाहता है. यूरोप आर्थिक और सुरक्षा के मामलों में अपनी निर्भरता की दोबारा समीक्षा कर रहा है. वहीं, युद्धों और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नियम भी बदल रहे हैं.

दुनिया में ध्रुवीकरण बढ़ रहा है. ऐसे में कई देशों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे अपनी नीतियों को बड़ी ताकतों की रणनीतिक प्राथमिकताओं के हिसाब से बदलें. कई बार इसके लिए उन्हें अपने राष्ट्रीय हितों से भी समझौता करना पड़ता है.

भारत को बिना सोचे किसी एक पक्ष के साथ जुड़ने और कूटनीतिक अलगाव के बीच के गलत चुनाव से बचना होगा. रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब यह नहीं है कि भारत विरोधी ताकतों से जानबूझकर बराबर दूरी बनाए रखे, किनारे बैठा रहे या कड़ा रुख अपनाने से बचता रहे. इसका मतलब यह है कि भारत में यह फैसला करने का आत्मविश्वास हो कि कब उसके हित किसी दूसरे देश के हितों से मिलते हैं, कब अलग होते हैं और कब स्वतंत्र रुख अपनाना जरूरी है.

जो देश अपने सहयोगी की जवाबी कार्रवाई के डर से उससे असहमत नहीं हो सकता, वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर रहा है. वह किसी और के रणनीतिक ढांचे के हिसाब से काम कर रहा है.

भारत के मामले में इस सिद्धांत की ऐतिहासिक जड़ें काफी गहरी हैं. शीतयुद्ध के दौरान दुनिया दो खेमों में बंटी हुई थी और इसी दौर में गुटनिरपेक्षता की शुरुआत हुई थी. आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ज्यादा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, आर्थिक रूप से ज्यादा जटिल है और तकनीक से जुड़ी नई चुनौतियों का सामना कर रही है.

आज भारत की आर्थिक ताकत पहले से काफी ज्यादा है, उसकी कूटनीतिक पहुंच भी काफी बढ़ी है और उसकी साझेदारियां पहले से ज्यादा असरदार हैं. चुनौती सिर्फ बंटी हुई दुनिया में अपनी स्वतंत्रता बचाने की नहीं है. अब चुनौती इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल भारतीय हितों को आगे बढ़ाने और बातचीत में भारत की ताकत बढ़ाने की है.

परस्पर निर्भरता एक नई चुनौती

आज रणनीतिक स्वायत्तता के लिए सबसे बड़ा खतरा निर्भरता है. व्यापार प्रतिबंध, शुल्क, आर्थिक प्रतिबंध, तकनीक पर नियंत्रण, ऊर्जा की आपूर्ति और ज़रूरी खनिजों तक पहुंच जैसी चीजों का इस्तेमाल अब हथियार की तरह किया जा रहा है. इन्हें रणनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.

यह सोच कमजोर साबित हुई है कि आर्थिक निर्भरता अपने आप देशों के बीच सहयोग बढ़ाएगी. लगातार ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती दुनिया में कोई देश क्या आयात करता है, उसे तकनीक कहां से मिलती है और उसकी आपूर्ति श्रृंखला पर किसका नियंत्रण है, इन सभी बातों से तय होता है कि वह अपनी विदेश नीति को कितनी स्वतंत्रता से चला सकता है.

अमेरिका और चीन के साथ भारत के संबंध इस जटिलता को दिखाते हैं. अमेरिका रक्षा, आधुनिक तकनीक, व्यापार और हिंद-प्रशांत के मामलों में भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है. लेकिन इस सहयोग का मतलब यह नहीं है कि अलग-अलग नीतियों और प्राथमिकताओं को लेकर मतभेद खत्म हो गए हैं. समझदार साझेदारी में मतभेदों के लिए जगह होनी चाहिए, लेकिन वे साझा हितों के मामलों पर हावी नहीं होने चाहिए.

इसी तरह, चीन के साथ भारत के संबंधों में सीमा विवाद, सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं और आर्थिक असमानताओं को लेकर भारत का रुख साफ होना चाहिए. बातचीत जरूरी है, लेकिन राष्ट्रीय हितों को कमजोर करने की कीमत पर कोई बातचीत नहीं हो सकती.

भारत का कई देशों और समूहों से जुड़ना उसे व्यावहारिक फैसले लेने की गुंजाइश देता है. ‘क्वाड’ के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग के साथ-साथ ‘ब्रिक्स’ में भागीदारी भी जारी रह सकती है. यूरोप के साथ गहरे संबंध खाड़ी देशों, अफ्रीका और दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी बढ़ाने में मदद कर सकते हैं.

इन रिश्तों को सिर्फ इसलिए एक-दूसरे से अलग मानने की जरूरत नहीं है क्योंकि इन देशों के बीच आपसी मतभेद हैं. लेकिन सिर्फ कई देशों के साथ संबंध बनाना अपने आप में कोई रणनीति नहीं है. अगर भारत के कई साझेदार हैं, फिर भी जरूरी क्षेत्रों में दबाव के कारण उसे कमजोर होना पड़ता है, तो स्वायत्तता का दिखावा उसकी कमी को वास्तव में छिपा देगा.

मेक इन इंडिया, सुरक्षित इंडिया, ताकतवर इंडिया

रणनीतिक स्वायत्तता केवल कूटनीतिक कौशल के दम पर कायम नहीं रह सकती. इसके लिए मजबूत राष्ट्रीय क्षमता जरूरी है. जिस देश में आर्थिक मुश्किलों से निकलने की क्षमता, तकनीक की ताकत, औद्योगिक क्षमता और भरोसेमंद सैन्य तैयारी की कमी होगी, वह आत्मविश्वास के साथ बातचीत नहीं कर सकता.

भारत जितना ज्यादा अपना घरेलू विकास करेगा, आपूर्ति के बाहरी स्रोतों में जितनी ज्यादा विविधता लाएगा और ज़रूरी संसाधनों तक अपनी पहुंच जितनी मजबूत करेगा, उतना ही वह बाहरी दबावों के सामने कम कमजोर होगा.

आत्मनिर्भरता का सही मतलब आर्थिक रूप से अलग-थलग होना नहीं है. इसका मतलब है कि किसी एक बाहरी सप्लायर या बाजार पर निर्भर हुए बिना दुनिया के मामलों में हिस्सा लेने की क्षमता होना.

यहीं भारत का आर्थिक बदलाव विदेश नीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है. विनिर्माण, अनुसंधान और विकास, आधुनिक डिजिटल क्षमता, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती सिर्फ घरेलू नीतियों की प्राथमिकताएं नहीं हैं. ये भारत के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को बढ़ाने के साधन भी हैं.

महत्वपूर्ण तकनीक में देश के भीतर क्षमता तैयार करना, औद्योगिक व्यवस्था को मजबूत करना और जरूरी खनिजों के लिए भरोसेमंद साझेदारियां बनाना भारत को अपने हितों के लिए फैसले लेने की ज्यादा गुंजाइश देगा.

यह व्यापार बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों से ज्यादा मजबूती से जोड़ने से भी संभव होगा. मुख्य रूप से कूटनीतिक भरोसे पर निर्भर रहने के बजाय खुद उत्पादन, आविष्कार और प्रतिस्पर्धा करने वाला भारत अपने लिए ज्यादा विकल्प तैयार कर सकता है.

यही बात ऊर्जा और रक्षा के मामलों में भी लागू होती है. ऊर्जा के लिए अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी बाहरी रुकावटों के खतरे को कम कर सकती है. ज्यादा मजबूत घरेलू क्षमता से लचीलापन बढ़ता है. भरोसेमंद सैन्य क्षमता कूटनीति को मजबूती देती है.

इसलिए भारत को अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को इन ठोस नतीजों के आधार पर देखना चाहिए : आधुनिक तकनीक तक पहुंच, निवेश, निर्यात बाजार, सैन्य क्षमता और भरोसेमंद आपूर्ति. क्या ये साझेदारियां मतभेद होने के बावजूद भारत की स्वतंत्र रूप से कदम उठाने की क्षमता बढ़ाती हैं? जब दबाव बढ़ता है, तो क्या ये भारत के लिए नए विकल्प तैयार करती हैं?

रणनीतिक स्वायत्तता तभी मायने रखेगी जब भारत किसी चीज से इनकार करने की कीमत को सहन करने की स्थिति में होगा.

काम करने की आज़ादी से नतीजों को प्रभावित करने तक

भारत की महत्वाकांक्षा सिर्फ अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. अगला चरण रणनीतिक ताकत बनाने का है. यानी कूटनीतिक संबंधों, आर्थिक ताकत और राष्ट्रीय क्षमताओं को अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को प्रभावित करने की ताकत में बदलना.

इसका मतलब यह है कि भारत ऐसा देश न हो जिस पर दूसरे देश दबाव डालें, बल्कि ऐसा देश बने जिसकी भागीदारी से नतीजे तय हों. इसका मतलब व्यापार, तकनीक, जलवायु पर कार्रवाई और वैश्विक व्यवस्था के नियमों को प्रभावित करना भी है. साथ ही, उन संस्थाओं में सुधार की मांग करना भी है जो आज की दुनिया की वास्तविक स्थिति को पर्याप्त रूप से नहीं दिखाती हैं.

इस तरह का प्रभाव सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों से पैदा नहीं किया जा सकता. संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाओं में बड़ी भूमिका निभाने की भारत की इच्छा को पूरा करने के लिए लगातार कूटनीतिक प्रयास करने होंगे. अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में भरोसेमंद योगदान देना होगा और सिर्फ सुविधाजनक राजनीतिक गुटबंदी से आगे बढ़कर साझेदारियां करनी होंगी.

भारत को यह भी साबित करना होगा कि उसका स्वतंत्र रुख सिर्फ उसकी अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की बात नहीं है, बल्कि वह साझा चुनौतियों से निपटने में भी योगदान दे सकता है. भारत का नेतृत्व तभी मजबूत होगा जब दूसरे देश उसकी भागीदारी को महत्वपूर्ण मानेंगे, भले ही वे भारत के रुख से सहमत न हों.

रणनीतिक स्वायत्तता की असली कसौटी यह नहीं है कि भारत तमाम दबावों के बावजूद किसी बड़ी ताकत के साथ जुड़े बिना कितनी बार स्वतंत्र रुख अपनाता है. असली सवाल यह है कि इन सवालों के क्या जवाब मिलते हैं : क्या भारत अपने सिद्धांतों को कमजोर किए बिना अलग-अलग पक्षों के बीच की दूरी कम कर सकता है? क्या वह सिर्फ बनाए गए नियमों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उन नियमों को तय करने में भी भूमिका निभा सकता है? ये कसौटियां महत्वपूर्ण हैं.

भारत ने खुद को अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक स्वतंत्र और निर्णायक आवाज के रूप में स्थापित कर लिया है. अब उसे यह सुनिश्चित करना है कि उसकी कूटनीतिक स्वायत्तता आर्थिक ताकत, तकनीकी क्षमता और रणनीतिक लचीलेपन से मजबूत हो.

गुटनिरपेक्षता से रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षीय संबंधों और आखिरकार रणनीतिक ताकत तक का सफर भारत की पारंपरिक विदेश नीति को छोड़ने का सफर नहीं है. यह उसी परंपरा का स्वाभाविक विकास है, जो भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय भूमिका को दिखाता है.

शिशिर प्रियदर्शी, चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के प्रेसिडेंट हैं. उनका एक्स हैंडल @priyadarshi_crf हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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