अब तक राजनयिक संदेश भेजे जा चुके होंगे और दिल्ली में हो रहे SIR विरोध प्रदर्शनों को लेकर दूतावासों का अपने-अपने देशों के साथ विशिष्ट वीडियो कॉन्फ्रेंस करना आम बात बन गई होगी. अगर हम देखें कि SIR विवाद का भारत के विदेशी रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है, तो राजनयिकों की इस दिलचस्पी को समझा जा सकता है.
पहली बात, इस वक्त SIR को लेकर माहौल ऐसा है कि दूसरे देशों की ओर से भारत से चुनाव संबंधी मदद मांगने पर प्रभाव पड़ सकता है. हमारे चुनाव हमेशा से हमारे लिए गर्व का प्रतीक रहे हैं. जब दिल्ली में नए-नए आए राजनयिक भारत की 95 करोड़ मतदाताओं वाली चुनावी सूची के बारे में सुनते हैं, तो वे हैरान रह जाते हैं. इसीलिए जनवरी 2026 में चुनाव आयोग ने नए ECINet सॉफ्टवेयर को दिल्ली में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (IICDEM-2026) के दौरान लॉन्च किया था. इस सम्मेलन में 42 देशों के चुनाव निकायों और 27 दूतावासों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इसके बाद प्रशांत महासागर क्षेत्र के कम से कम एक देश ने अपनी चुनावी सूची के लिए ECINet को अपनाने के संबंध में बातचीत शुरू की है.
लेकिन अब चुनावी सूची के आंकड़ों को एक जगह केंद्रीकृत करने और सॉफ्टवेयर की ओर से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नामों में “तार्किक गड़बड़ियों” की पहचान किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं. अगर इन समस्याओं का जल्द समाधान नहीं किया गया, तो क्या कोई दूसरा देश अपनी चुनावी सूची के लिए ECINet का इस्तेमाल करने का जोखिम उठाएगा?
दूसरी बात यह है कि ECINet को लेकर ये आरोप ऐसे समय में सामने आए हैं, जब भारत दुनिया भर में अपने डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और एक बड़ी वैश्विक IT ताकत के रूप में अपनी क्षमता का प्रचार कर रहा है. अगर ECINet पर निगरानी और प्रणाली में राज्य-स्तरीय EROs के नियंत्रण जैसे सवालों का जल्द जवाब नहीं दिया गया, तो भारत की IT क्षमता पर भी सवाल उठ सकते हैं.
तीसरी बात यह है कि पिछले कुछ सालों में भारत की विदेश नीति से जुड़े लोग बड़ी चिंता के साथ देख रहे थे कि कैसे श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद एक के बाद एक तख्तापलट कही जा सकने वाली घटनाएं घटीं. वे इन घटनाओं के बीच समानताएं तलाशते रहे हैं. उन्हें डर है कि पड़ोसी देशों में हुई ये घटनाएं विदेशी ताकतों की ओर से किए गए शुरुआती प्रयोग थे, जिनका अंतिम मकसद भारतीय राज्य पर दबाव डालना और भारत की क्षेत्रीय अखंडता को खतरे में डालना हो सकता है.
लेकिन इन घटनाओं के बीच संबंध अभी तक साफ नहीं हुए हैं. इसके बावजूद यह डर अब एक ऐसी काल्पनिक आशंका बन गया है, जो अगर ठीक से नहीं संभाली गई, तो भारत के सबसे करीबी साझेदारों के साथ उसके रिश्तों को प्रभावित कर सकती है.
बिना आधार के अटकलों के गंभीर नतीजे हो सकते हैं
6 अक्टूबर को ऑर्गनाइजर पत्रिका में एक आरोप प्रकाशित हुआ. अब यह पत्रिका केंद्र सरकार के मंत्रालयों में भी पढ़ी जाती है. इस पत्रिका में दावा किया गया कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को मिलने वाली फंडिंग “अमेरिका से शुरू होती है, ISIS से होकर ISI, रियाद, मुंबई और दिल्ली के आपराधिक तत्वों तक पहुंचती है और आखिर में विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल होती है.”
इस अजीब और बेहद संदिग्ध तर्क वाली थ्योरी का स्रोत क्या था? सोशल मीडिया पर एक यूजर की ओर से पोस्ट किया गया एक वीडियो, जिसमें उसका चेहरा ढका हुआ था!
जब कोई प्रभावशाली पत्रिका बिना किसी ठोस सबूत के ऐसी थ्योरी को जगह देती है, तो इससे भारत के उन देशों के साथ रिश्तों पर असर पड़ने का खतरा पैदा होता है, जिन्हें भारत अपना रणनीतिक साझेदार मानता है.
10 अक्टूबर 2026 को सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह “विदेशी ताकतों की ओर से काम कर रहा है”. इसके बाद सवाल उठता है कि आखिर ये विदेशी ताकतें कौन-से देश हैं?
अगर इस आरोप के पीछे कोई ठोस आधार है, तो भारत को सभी जरूरी कदम उठाने का अधिकार है. इसमें उन विदेशी ताकतों के राजनयिकों को देश से निकालना, उनके देशों के कारोबार पर भारत में पाबंदियां लगाना या जरूरत के हिसाब से दूसरे सुरक्षा कदम उठाना शामिल हो सकता है.
लेकिन अगर यह आरोप सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है, तो क्या ऐसे समय में इस तरह की बातें करना जिम्मेदाराना है, जब भारत दुनिया की सभी बड़ी ताकतों के साथ अपने रिश्तों में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है?
क्या हम अपनी कूटनीतिक पूंजी को नुकसान पहुंचा रहे हैं?
SIR के विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में भारत के सोशल मीडिया पर “सत्ता परिवर्तन” की आशंका को लेकर कई तरह की थ्योरी सामने आई हैं. इनमें भारत के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले पश्चिमी देशों पर कहीं ज्यादा उंगलियां उठाई जाती हैं.
इसमें कोई शक नहीं है कि भारत के मन में आज भी विदेशी शासन और शीत युद्ध के दौर में दूसरे देशों के दखल की कड़वी यादें हैं. लेकिन पिछले कुछ दशकों में हमने पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से बनाया है.
भारत ने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ के साथ बड़े व्यापार समझौते किए हैं या उन्हें लागू करने की प्रक्रिया में है. अगले साल होने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चुनावों में भारत अपनी दावेदारी के लिए इन देशों के वोटों की उम्मीद भी कर रहा है.
कुछ मुद्दों पर, जैसे जलवायु के मामले में, भारत पश्चिमी देशों के नजरिए से सहमत नहीं है. लेकिन दूसरे मुद्दों पर, जैसे नियमों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखने और समुद्री रास्तों पर आवाजाही की स्वतंत्रता के मामले में, भारत और पश्चिमी देशों के बीच सहमति रही है.
ऐसे में बिना सबूत दिए दूसरे देशों पर उंगली उठाना क्या भारत के हितों को नुकसान नहीं पहुंचाता? खासकर ऐसे समय में, जब भारत के बढ़ते प्रभाव के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा मित्र देशों की जरूरत है.
अगर विदेशी दखल के ठोस सबूत मौजूद हैं, तो अच्छी कूटनीति की मांग है कि इससे जुड़ी चिंताओं को बंद कमरे में होने वाली द्विपक्षीय बातचीत के दौरान मजबूती से उठाया जाए. इन्हें सार्वजनिक अटकलों का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, कम से कम तब तक, जब तक भारत और संबंधित विदेशी देश के बीच बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं.
चौथी बात, हमें भारतीय मीडिया में डर फैलाने की प्रवृत्ति पर भी बात करनी चाहिए. भारतीय मीडिया का एक वर्ग SIR विरोध प्रदर्शनों को लेकर विदेशी मीडिया की खबरों को दखलअंदाजी करार देता है, लेकिन साथ ही फ्रांस में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर बिना सबूत वाली थ्योरी टीवी पर दिखाता है. या फिर जर्मनी जैसे देशों को लेकर बेबुनियाद शक पैदा करता है, जबकि जर्मनी भारत को संवेदनशील तकनीक बेच रहा है.
क्या यह अच्छी पत्रकारिता है? क्या हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि ऐसी टिप्पणियों का भारत और इन देशों के आपसी रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा?
सबसे बड़ी बात यह है कि SIR और देश की चुनावी सूची के संदर्भ में “विदेशी” ताकतों को लेकर लगाए जाने वाले ऐसे आरोप भारत के लोकतंत्र से जुड़ी असंतुष्टियों को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना सकते हैं. इससे इस बात पर भी दुनिया सवाल उठा सकती है कि “लोकतंत्र की जननी” कहा जाने वाला भारत अपने देश के भीतर शांतिपूर्ण विरोध को किस तरह संभालता है.
कुल मिलाकर, “विदेशी हाथ” को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और तरह-तरह की थ्योरी के कारण हमारी उस कूटनीतिक पूंजी को खतरे में नहीं डालना चाहिए, जिसे हमने बड़ी मेहनत से बनाया है. भारत को हर समय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए, लेकिन वह असंतुलित डर की राजनीति का जोखिम नहीं उठा सकता.
राजा कार्तिकेय एक इंटरनेशनल अफेयर्स रिसर्चर हैं. विचार निजी हैं.
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