गुरुग्राम: एक नई सोच और बदलाव की शुरुआत करते हुए, एक सर्बियाई युवक ने गुरुग्राम की सड़कों की सफाई कर वह सवाल उठा दिया, जो आज के समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है.
लज़ार जानकोविच यह नहीं पूछ रहे कि गुरुग्राम की सड़कों पर कचरे के ढेर क्यों हैं. उनका सवाल इससे कहीं ज़्यादा गहरा है — ऐसा सवाल जो सीधा हमारे सोचने के तरीके को चुनौती देता है.
“लोग मुझसे ये पूछना बंद करें कि मैं सड़कों की सफाई क्यों कर रहा हूं और उसकी पोस्ट क्यों डाल रहा हूं. उन्हें अब खुद से ये पूछना चाहिए कि वे अपने आस-पास, जहां वे रहते हैं और हर दिन सफर करते हैं, उसकी सफाई क्यों नहीं कर रहे,” 32 वर्षीय सर्बियाई योग साधक लज़ार ने कहा, बारिश के पानी के लिए बने नाले में फंसी प्लास्टिक की थैलियों की ओर इशारा करते हुए जिनकी वजह से रास्ते पर जलभराव हो गया है.
यह सिर्फ सफाई नहीं, बल्कि एक आईना है जो वह समाज दिखा रहे हैं. गुरुग्राम में उनका साप्ताहिक स्वच्छता अभियान केवल यह नहीं पूछता कि भारतीय शहर गंदे क्यों हैं — यह तो भारतीय सामाजिक व्यवहार की बुनियादी परतों को कुरेद रहा है.
लज़ार ने कहा, “यह कभी कोई योजना नहीं थी. मैं जहां रहता हूं वहां सफाई करता हूं. मैं लोगों तक बस यह संदेश पहुंचाना चाहता हूं कि भारत कितना सुंदर देश है — और इसे कचरे में दबाया जाना बिल्कुल भी सही नहीं है.”
एक कदम जिसने कईयों को जोड़ा
जब एक समूह ने गुरु द्रोणाचार्य मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 1 के सामने सफाई शुरू की, तो वहां से गुजरने वाले रिक्शे रुकने लगे और गुजरने वाले पूछने लगे कि यहां क्या हो रहा है, कुछ ने तस्वीरें खींचीं, तो कुछ ने वीडियो रिकॉर्ड किए.
राकेश जैसे लोग, जो एक लंबे मेहनत भरे दिन के बाद घर लौट रहे थे, खुद को रोक नहीं पाए — और सफाई करने वाले इस समूह में शामिल हो गए.

पूरे समय लज़ार सबके आकर्षण का केंद्र बने रहे. सफेद टी-शर्ट, काले शॉर्ट्स, पीठ पर बैग और हाथों में चमकते लाल दस्ताने — इस अंदाज़ में जब वे टीम का नेतृत्व कर रहे थे, तो उनका ध्यान खींचना स्वाभाविक था.
कभी अपने हाथों से भारी पत्थर उठाते, तो कभी झाड़ू से ज़मीन साफ़ करते हुए वे हल्की मुस्कान के साथ फिल्म वीर ज़ारा का गीत “ऐसा देश है मेरा” अपनी लहज़ेदार हिंदी में गुनगुनाते हैं.
तीन घंटे से ज़्यादा की मेहनत के बाद, जब बारिश शुरू हुई — तो लज़ार खुशी से भीगते हुए नाचने लगे.
लज़ार को इस तरह देख समूह में से किसी ने मुस्कुराते हुए कहा, “क्या सही बंदा है यार ये!”
एक दिन, एक गली
लाल प्लास्टिक के दस्ताने, काले रबर के बूट, और एक हाथ में कचरा उठाने वाला पिकर — लज़ार की यह पहचान अब गुरुग्राम की सड़कों पर ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी जानी-पहचानी बन चुकी है.
जो शुरुआत में सिर्फ़ स्वतंत्रता दिवस तक चलने वाला सात दिनों का एक सफाई अभियान था — “एक दिन, एक गली” — अब एक लगातार चलने वाला मिशन बन चुका है.
लज़ार 2018 में एक मॉडलिंग असाइनमेंट के लिए भारत आए थे और बेंगलुरु में पाँच साल से अधिक समय तक योग शिक्षक बनने की ट्रेनिंग ली. इस दौरान वे देश के कई हिस्सों में घूमे भी.
2024 में वे गुरुग्राम आए. लेकिन यह पहली बार नहीं था जब उन्होंने सड़कों की सफाई शुरू की हो — वे जहां भी रहे, वहां कचरा उठाना और सफाई करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहा.

बेंगलुरु से इसकी शुरुआत हुई, फिर तमिलनाडु तक पहुंची, और यहां तक कि ऋषिकेश की एक यात्रा के दौरान भी उन्होंने रास्ते में पड़ा कचरा इकट्ठा किया.
हालांकि लोगों का ध्यान सोशल मीडिया पर तब गया जब लज़ार ने पुरानी दिल्ली, इंडिया गेट और अब गुरुग्राम की गलियों में रोज़ाना चल रहे सफाई अभियानों के वीडियो साझा करने शुरू किए.
इन वीडियो को देखकर न सिर्फ़ लोगों ने उनकी सराहना की, बल्कि कई लोग अगली गली की सफाई मुहिम में उनके साथ जुड़ने भी लगे.
जहां भी लज़ार सफाई के लिए कदम रखते हैं, वहां नए-नए स्वयंसेवक उनके साथ जुड़ जाते हैं, जिससे यह एक अकेले की पहल से एक बढ़ती हुई सामुदायिक मुहिम में बदल गई हैं.
उन्होंने कहा, “मैंने शुरुआत एक ऐसे जगह से की थी जहां सिर्फ़ कचरे का ढेर था और मेरे साथ कुछ गायें खड़ी थीं. अब जब भी मैं सफाई करता हूं, मेरे साथ एक पूरी नई टीम होती है.”
गुरुग्राम और कूड़ा
‘गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकालो’ — यह लोकप्रिय जिंगल, जो मोहल्लों में कचरा उठाने के काम से पहचाना जाता है, वही अब लज़ार के सफाई अभियान का एक तरह से अनसुना गीत बन गया है. झाड़ू हाथ में लिए, यह धुन गुनगुनाते हुए वे गलियों और सड़कों से गुजरते हैं, फेंके गए रैपर, प्लास्टिक की बोतलें और अन्य कूड़े को इकट्ठा करते हुए, जिन्हें काले रंग के कचरा बैगों में भरते हैं. वे अक्सर हिंदी बॉलीवुड के देशभक्ति गीत भी गुनगुनाते हैं, जिनमें 1967 की फ़िल्म उपकार का मशहूर गीत “मेरे देश की धरती” भी शामिल है.
उन्होंने कहा, “यह कोई मिशन नहीं, यह एक कर्तव्य है.”
एक योग साधक होने के नाते, लज़ार पूरे भारत में काम और अपनी यात्रा की चाह के लिए अक्सर सफर करते हैं. लेकिन अधिकांश यात्रियों से अलग, उनके सफर का मकसद स्पष्ट है. जहां भी वे जाते हैं — चाहे शहर की सड़कों पर हो, पहाड़ी रास्तों पर या जंगलों में — अपने साथ झाड़ू, दस्ताने और कचरा बैग लेकर चलते हैं और रास्ते की सफाई करते हैं.
इस वर्ष फरवरी में, तमिलनाडु के लोकप्रिय तीर्थस्थल वेलियांगिरी पहाड़ियों की ट्रेकिंग के दौरान भी लज़ार ने उस रास्ते और आसपास के इलाके की सफाई की. उनके लिए यात्रा सिर्फ नए स्थानों की खोज नहीं, बल्कि उन्हें सम्मान और संरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है.
उन्होंने कहा, “कल्पना कीजिए अगर आप जिस भी सड़क से गुजरते, वह साफ-सुथरी और कचरा मुक्त हो, लेकिन सिर्फ कल्पना से कुछ नहीं होगा, यह तभी संभव है जब हम इसे अमल में लाएं.”
लज़ार का इंस्टाग्राम हैंडल, जिसका बायो है ‘सर्बियाई जो भारत की सफाई के सफर पर’, पर में सिर्फ 36 पोस्ट हैं. लेकिन जैसे ही उनके सफाई अभियान वायरल हुए, उन्हें सैकड़ों फ्रेंड रिक्वेस्ट और डायरेक्ट मैसेज मिलने लगे. इन संदेशों में ज्यादातर उनके प्रेरणादायक काम की तारीफ हैं, और कई लोग उत्सुक थे यह जानने के लिए कि अगली सफाई मुहिम कहाँ होगी ताकि वे भी इस मिशन में उनके साथ जुड़ सकें.
जैसे ही ये वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वायरल होने लगे, कई लोगों ने अपने आस-पास की सफाई का संकल्प लिया, तो कुछ ने शर्मिंदगी जताई और सवाल किया कि ऐसा बदलाव लाने के लिए हमें एक विदेशी की ज़रूरत क्यों पड़ी.
26 वर्षीय संक्रिति गर्ग, जिन्होंने गुरु द्रोणाचार्य मेट्रो स्टेशन के पास लजा़र के सफाई अभियान में हिस्सा लिया, ने कहा कि “यह गर्व की बात नहीं, बल्कि शर्म की बात है कि कोई बाहर से आकर हमें साफ़-सफाई सिखा रहा है और हमारे आसपास की जगहों को साफ़ कर रहा है.”

गुरुग्राम की चमकदार और आधुनिक स्काईलाइन के पीछे शहर की सड़कों पर फैला कचरा और ऊंची-ऊंची इमारतों के सामने पड़ा कूड़ा, इस समस्या की पुरानी कहानी बयान करता है.
वित्त और तकनीक का बड़ा केंद्र होने के बावजूद, और गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, विप्रो, डेलॉइट, टीसीएस, एचसीएल जैसी बड़ी कंपनियों का ठिकाना होने के बाद भी, गुरुग्राम कचरे के निस्तारण और प्रबंधन की समस्याओं से परेशान है.
जब जिम्मेदार अधिकारियों की तरफ से प्रभावी कदम नहीं उठाए जा सके, तो चिंता जताने वाले नागरिक और विदेशी जैसे लाज़र खुद शहर की सफाई के लिए आगे आए हैं.
गुरुग्राम के निवासी अशिष अरोड़ा ने कहा, “अगर हम नागरिक अपने आसपास और शहर की सफाई कर भी लें, तो कचरा कहां फेंकेंगे? किसी न किसी समय अधिकारियों को आगे आकर अपना काम करना होगा.”
अब यह अकेले का मिशन नहीं रहा
लगभग दस लोगों का एक समूह, जो कभी व्यक्तिगत रूप से नहीं मिले थे लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े थे, ठीक चार बजे गुरु द्रोणाचार्य मेट्रो स्टेशन के पास इकट्ठा हुए. उनका मिशन था: स्टेशन के आस-पास 100 मीटर की दूरी की सफाई करना. अभियान के अंत तक, उन्होंने लगभग 15 कचरा बैग भर लिए, जिन्हें बाद में नगरपालिका निगम द्वारा संचालित निकटतम कचरा डंपिंग साइट पर ले जाया गया.
गुरुग्राम निवासियों और जानकोविच के साथ, पिछले दो वर्षों से गुरुग्राम में रह रही फ्रांसीसी नागरिक मटिल्डा भी रविवार के स्वच्छता अभियान में शामिल हुईं. उन्होंने सफाई बनाए रखने में व्यक्तिगत जिम्मेदारी के महत्व पर जोर दिया और लोगों से केवल कूड़ा न फेंकने की ही नहीं, बल्कि दूसरों को भी ऐसा करने से रोकने की अपील की.
मटिल्डा ने कहा,“मेरे कचरे की ज़िम्मेदारी मेरी है—वाला नजरिया सच में भारत में बदलाव ला सकता है.” उन्होंने पास के एक चाय वाले से विनम्रता से कहा कि वह कूड़ेदान का इस्तेमाल करें और अपने ग्राहकों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें. उन्होंने स्थानीय फूड कार्ट वालों से भी अपील की कि वे कचरा न फैलाएं और दूसरों को भी सफाई की कोशिशों को नुकसान पहुंचाने से रोकें.

“एक दिन, एक गली” के तहत, लज़ार का लक्ष्य था कि वे गुरुग्राम की कम से कम एक सड़क, पार्क या सार्वजनिक जगह रोज़ साफ़ करें. उनके काम से प्रेरित होकर, स्थानीय निवासियों ने मेट्रो स्टेशनों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर हर रविवार इसी तरह की सफाई मुहिमें शुरू कर दी हैं.
33 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर पवनप्रीत कौर ने कहा, “कोई और देश भारत की तरह अपनी धरती की पूजा नहीं करता. हम इसे मां और भगवान कहते हैं, फिर भी हमारी अपनी मातृभूमि की सफाई में मदद कर रहे हैं लोग दूसरे देशों से. यह अधिकारियों और नागरिकों दोनों के लिए एक सीख होनी चाहिए.”
लज़ार के इंस्टाग्राम पेज पर एक वीडियो में वे एक बिल्डिंग के बाहर कचरे के ढेर को साफ करते दिख रहे हैं. वे एक घर की ओर इशारा करते हुए लोगों की अपने आस-पास की सफाई न करने पर निराशा जताते हैं.
उन्होंने कहा, “अगर कचरा घर के बाहर हो तो लोग परवाह नहीं करते.”
“दूसरों पर उंगली उठाना बंद करें, खुद कदम बढ़ाएं, और फर्क देखें,” उन्होंने यह कहते हुए सड़क से पानी की बोतलें और प्लास्टिक का कचरा उठाया.
सड़कों से पहाड़ों तक
लज़ार एक सरल और निजी जीवन जीते हैं. उनके दिन ध्यान और व्यायाम से शुरू होते हैं, जिसके बाद वे योग सत्र में भाग लेते हैं. सफाई, हालांकि, भारत में शुरू नहीं हुई; यह उनके जीवन का हिस्सा है जब से वे सर्बिया में थे. हर साल जब वे अपने देश जाते हैं, तब भी वे समय निकालकर अपने मोहल्ले की सड़कों की सफाई करते हैं और पौधों को पानी देते हैं.
लज़ार स्पष्ट करते हैं कि वे किसी भी एनजीओ से जुड़े नहीं हैं और न ही किसी सरकारी संस्था के अधीन काम करते हैं. उनके लिए सफाई एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी है, अपने घर की देखभाल का तरीका है, चाहे वे कहीं भी रहें. वे लोगों से अपने साथ जुड़ने की अपील नहीं करते, बल्कि हर किसी से आग्रह करते हैं कि वे खुद पहल करें और अपने आसपास की सफाई शुरू करें.
उन्होंने कहा, “भारत के पास सब कुछ है और लोग संकट के समय एकजुट भी होते हैं. लेकिन जब बात आती है सफाई जैसी मूलभूत चीज़ की, तो अगर वह उनके घर के बाहर हो, तो वे अक्सर सोचते हैं कि यह उनका मुद्दा नहीं है. इस सोच को बदलने की ज़रूरत है.”
जब उनसे पूछा गया कि साफ़ किए गए इलाक़े फिर से गंदे क्यों हो जाते हैं, तो लज़ार ने जवाब दिया, “यह सोचकर कि फिर से गंदगी होगी, हमें सफाई बंद नहीं करनी चाहिए. ये छोटे-छोटे प्रयास, बार-बार दोहराए जाएं तो बड़ा बदलाव लाते हैं.”
उनका अगला सफर सिर्फ किसी सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि हिमालय तक भी है. लज़ार ने कहा कि वे जल्द ही हिमालय की यात्रा पर जाएंगे, और यदि रास्ते में कहीं कचरा या गंदगी मिलेगी तो उसे साफ़ करने में भी हिचकिचाएंगे नहीं.
उनके सबसे अक्सर पूछे जाने वाले सवाल का जवाब देते हुए लज़ार ने अपनी बात दोहराई, “मुझसे मत पूछो क्यों — अपने आप से पूछो, क्यों नहीं?” और फिर उन्होंने जोड़ा, “अगर हम नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?”
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