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Tuesday, 18 June, 2024
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क्या किसी हाउस पार्टी में महिला जज नागिन डांस कर सकती है? नहीं, इंस्टाग्राम पर स्वैग दिखाने का हक तो सिर्फ पुरुष जजों को है!

यदि कोई पुरुष जज जिम में व्यायाम करता नजर आए तो किसी को कोई आपत्ति नहीं होती. लेकिन युवा महिला न्यायाधीशों से यही अपेक्षा की जाती है कि उनका व्यवहार सामाजिक मानदंडों पर ‘पूरी तरह स्वीकार्य’ होना चाहिए.

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इस साल के शुरू की बात है, जब मध्य प्रदेश के हरदा में रिटायर हो रहे जिला जज योगेश गुप्ता के सम्मान में एक फेयरवेल पार्टी का आयोजन किया गया. इस मौके पर सभी न्यायाधीश और अधिकारी फॉर्मल ड्रेस में पहुंचे थे. म्यूजिक के बीच थोड़ा-बहुत डांस भी हुआ. और नागिन डांस की शुरुआत तक सब कुछ ठीकठाक भी चला.

पार्टी में डांस के दौरान जब चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट पंजक जायसवाल नागिन स्टेप कर रहे थे, तभी 2018 बैच की दो महिला सिविल जज भी उसमें शामिल हो गईं. बाद में डांस का वीडियो वायरल हुआ तो इसे लेकर न केवल सार्वजनिक तौर पर आक्रोश जताया गया बल्कि न्यायपालिका की मर्यादा और छवि को लेकर सवाल भी खड़े किए गए.

अगले दिन, शहर में सुबह की शुरुआत ऐसी सुर्खियों से हुई, ‘महिला जज नागिन स्टेप पर थिरकीं’—’महिला जज ने लगाए ठुमके.’ प्रमुख अखबारों ने अपने पहले पन्नों पर इस वीडियो के स्क्रीन ग्रैब लगाए. यूट्यूब चैनलों पर वायरल वीडियो तेजी से सर्कुलेट होने लगा. यही नहीं, न्यूज एंकर्स के बीच तो शायद इसकी आलोचना करने की होड़ ही लग गई.

एसएस न्यूज चैनल पर एंकर नेहा कौर ने पूछा, ‘क्या सख्तमिजाज चीफ जस्टिस (मध्य प्रदेश के) रवि मलिमथ कोई कार्रवाई करेंगे?’ स्थानीय हिंदी दैनिक, दैनिक रिपोर्ट ने अपनी रिपोर्ट का शीर्षक बनाया, ‘नागिन डांस करना न्यायाधीशों को पड़ा महंगा.’

एक हफ्ते बाद ही, डांस करने वाले न्यायाधीशों को निलंबित कर दिया गया था और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मामले में जांच का आदेश दे दिया. निलंबन के कुछ महीनों बाद महिला न्यायाधीशों को दूसरी जिला अदालतों में ट्रांसफर कर दिया गया.

यह कोई एकमात्र घटना नहीं है. सोशल मीडिया पर सक्रियता जिला और हाई कोर्ट के युवा न्यायाधीशों के करियर पर कई बार भारी पड़ती नजर आती है. कुछ को दंडित किया गया है, तो कुछ को चेतावनी मिली है. बहरहाल, नए जमाने के मजिस्ट्रेट और पुराने जजों के बीच जारी इस तरह का टकराव लगातार उन पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहा है कि जजों को अपने सार्वजनिक जीवन में कैसा व्यवहार करना चाहिए.

महिलाओं को लेकर मॉरल पुलिसिंग ज्यादा

न्यायपालिका में पीढ़ीगत बदलाव केवल नई और पुरानी पीढ़ी के बीच अंतर वाली एक साधारण समस्या नहीं है. पिछले एक दशक में छोटे शहरों की जिला अदालतों में जजों की फौज में बड़ी संख्या में युवतियों के भी शामिल होने से इसने एक अलग ही रूप ले लिया है. कुछ लोग तो इसे महिलाओं की ‘मॉरल पुलिसिंग’ की संज्ञा’ भी दे रहे हैं.

इस पर एक नजर डालिए कि राजस्थान में हुई एक अन्य फेयरवेल पार्टी में क्या हुआ था.

2021 में, जब जोधपुर न्यायिक अकादमी ने ट्रेनी जजों के लिए फेयरवेल पार्टी आयोजित की, तो उनमें से एक ने सपना चौधरी के हिट गानों जैसे ‘52 गज का दामन’ और ‘चटक मटक’ पर डांस किया.

उसकी रूममेट ने एक वीडियो रिकॉर्ड किया और इसे एक व्हाट्सएप ग्रुप पर शेयर किया. कुछ ही दिनों में यह वीडियो को राजस्थान हाई कोर्ट के शीर्ष पदासीनों तक पहुंच गया. हालांकि, इस बार महिला ट्रेनी जज को सस्पेंड नहीं किया गया.

राजस्थान हाई कोर्ट ने न तो खुद अपनी तरफ से तो कोई औपचारिक कार्रवाई की और न ही कोचिंग संस्थानों के लिए कोई सर्कुलर जारी किया. लेकिन हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड पुरुष न्यायाधीश ने जरूर न्यायिक कोचिंग सेंटरों को कड़ा संदेश भेजा.

जयपुर में एक कोचिंग संस्थान चलाने वाले एम.के. सिंह ने बताया, ‘हमसे कहा गया कि कोचिंग के दौरान ही अभ्यर्थियों में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दें और उन्हें सोशल मीडिया से दूर रहने के लिए कहें.’

लगभग सभी न्यायिक कोचिंग सेंटर उम्मीदवारों के साथ मॉक इंटरव्यू के लिए हाई कोर्ट के रिटायर जजों के साथ कोलैबरेशन करते हैं. मौखिक तौर पर यह संदेश कुछ ही समय में एक से दूसरे केंद्र तक पहुंच गया.

एम.के. सिंह सोशल मीडिया के कारण होने वाली परेशानियों के खुद गवाह भी रहे हैं. उन्होंने राजस्थान न्यायिक सेवा 2022 के सफल उम्मीदवारों के मॉक इंटरव्यू के वीडियो पिछले महीने अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड किए थे.

वह बताते हैं, ‘एक युवती के 13 मिनट लंबे वीडियो को लगभग एक मिलियन बार देखा गया. लेकिन एक अन्य सफल उम्मीदवार के इंटरव्यू के वीडियो को केवल 4.5के बार ही देखा गया. और कुछ ही समय बाद उस युवती का मेरे पास फोन आया और उसने मुझसे कहा कि या तो वीडियो को हटा दूं या फिर कमेंट सेक्शन को डिसेबल कर दूं.’

कुछ ने उनकी प्रशंसा की थी तो कई लोग भद्दे कमेंट करने से भी बाज नहीं आए. टिप्पणी करने वालों में कई ऐसे पुरुष थे जिनका कहना था कि वे गिरफ्तार होकर उनकी ही अदालत में पेशी की कल्पना करते हैं. एम.के. सिंह ने ऐसी ही एक टिप्पणी के बारे में बताया जिसमें लिखा गया था, ‘ब्यूटी विद ब्रेन, मुझे मुझे नहीं पता था कि जज इतने खूबसूरत भी होते हैं.’ वीडियो के कमेंट सेक्शन को इसके बाद से बंद कर दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मदन बी. लोकुर का कहना है, ‘सोशल मीडिया कानूनी मुद्दों और कानूनी सोच-समझ के ट्रेंड पर चर्चा के लिए तो ठीक है. लेकिन इसे किसी जज की आलोचना या उपहास का मंच नहीं बनाना चाहिए. हमें याद रखना होगा कि जज भी इंसान ही होते हैं और सबकी तरह वह भी संवेदनशील होते हैं. समय आ गया कि हम जजों, वकीलों और लोगों के बीच पितृसत्तात्मक या हेय दृष्टिकोण वाली मानसिकता से बाहर आएं.’


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अनाम हैंडल से ऑपरेट कर रहे

प्रतियोगी परीक्षाओं की गला-काट प्रतिस्पर्द्धा के बीच अधिकांश छात्र सोशल मीडिया से दूरी बनाकर रहते हैं. लेकिन न्यायिक सेवा उम्मीदवारों पर यह कुछ ज्यादा ही असर डालता है. आईएएस और आईपीएस जैसी अन्य प्रमुख सेवाओं के चुने जाने वाले उम्मीदवार तो तुरंत ही सोशल मीडिया सेलिब्रिटी बन जाते हैं.

लेकिन जजों, खासकर न्यायपालिका में प्रवेश करने वाली महिलाओं के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम या ट्विटर का उस तरह इस्तेमाल करना आसान नहीं है. अक्सर इस्तेमाल होने वाली लाइन ‘व्यक्त विचार निजी हैं’ अन्य सेवाओं में भले ही आपको कुछ छूट दे सकती हों लेकिन न्यायपालिका से जुड़े होने पर यह काम नहीं आती.

उत्तर प्रदेश की एक युवा जज ने बताया कि वह लिंक्डइन को प्राथमिकता देती हैं, जहां वह खुद का ‘अधिक स्वीकार्य’ वर्जन सामने रख सकती है, जैसी किसी न्यायाधीश से अपेक्षा की जाती है. साथ ही कहती हैं कि उनकी तुलना में उनके पुरुषों साथियों को इतना नहीं सोचना पड़ता क्योंकि उन पर इस तरह किसी की नजर नहीं रहती है.

उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘मेरे समकालीन पुरुष जजों की पब्लिक प्रोफाइल देखें. इसे देखकर कई बार ऐसा लगता है कि जैसे उन्होंने सबसे उपयुक्त रिश्ते की तलाश में अपनी शादी का बायोडाटा बनाया है.’

यदि कोई पुरुष जज अपनी बाइसेप्स दिखाए या फिर जिम में वजन उठाता नजर आए तो लोगों को कुछ नहीं अखरता है. लेकिन लेकिन किसी महिला जज को सोशल मीडिया पर अपनी निजी जिंदगी से जुड़ी कोई तस्वीर या पोस्ट शेयर करने से पहले दो बार जरूर सोचना पड़ता है.

ये दोहरे मानदंड सिस्टम में शुरुआती चरण से ही समाए हुए हैं. बिहार की एक सिविल जज याद करती हैं कि जब वह अभ्यर्थी ही थीं तो कैसे एक कोचिंग सेंटर में मॉक इंटरव्यू के दौरान उनसे ‘अजीबो-गरीब’ सवाल पूछा गया था.

उन्होंने बताया, ‘वे जानना चाहते थे कि यदि पैनल मुझसे पूछे कि मैं समुद्र तट पर किस तरह के कपड़े पहनना पसंद करूंगी तो मेरा जवाब क्या होगा. क्या मैं स्विमसूट पहनूंगी?’ मॉक इंटरव्यू में पूछा गया यह सवाल उन्हें काफी समय तक परेशान करता रहा कि क्या जजशिप परीक्षा के लिए ऐसे प्रश्न आवश्यक हैं.

इंस्टाग्राम पर सक्रियता

कुछ लोग खुद को दायरे में बांध लेते हैं तो कुछ लोग इन सबसे बेपरवाह हैं. युवा पुरुष जज काफी आसानी से सोशल मीडिया पर अपनी स्टाइल फ्लॉन्ट करते रहते हैं.

2020 राजस्थान न्यायिक सेवा (आरजेएस) के अधिकारी और अलवर जिला अदालत में राजगढ़ के अतिरिक्त सिविल जज हर्षित शर्मा की एक अच्छी-खासी ऑनलाइन फॉलोइंग है. उनकी तरह ही कई बैचमेट्स के प्रोफाइल, हैशटैग और पोस्ट भी एक जैसे होते हैं.

कुछ काफी लोकप्रिय हैशटैग हैं ‘कॉल ऑफ ड्यूटी’ ‘नेशन फर्स्ट’, ‘सत्यमेव जयते’ आदि. उनके प्रोफाइल से उनके फॉलोअर्स को उनके निजी क्षणों की झलक भी मिलती है, जैसे न्यायिक प्रशिक्षण का सेलिब्रेशन, अधिकारियों के साथ रात्रिभोज, किसी इलाके का दौरा, नौकरशाहों के साथ बैठकें, पहली पोस्टिंग, और उनके चैंबर की झलक और बैचमेट्स के साथ सेल्फी.

आरजेएस अफसर मयंक प्रताप सिंह 14 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स वाले अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर इसी तरह के पोस्ट शेयर करते हैं, वो भी पूरे स्वैग के साथ.

शर्मा के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 11,000 से अधिक फॉलोअर्स हैं, और उन्हें समय-समय पर उनके जिम में वर्कआउट करने, मैराथन दौड़ने, जज की कुर्सी पर बैठकर काम करने, या फिर सूट-बूट पहनकर बाहर कहीं घूमने जाने आदि की झलक मिलती रहती है. कई लोग तो उन्हीं के जैसा जीवन जीने की ख्वाहिश रखते हैं. इंस्टाग्राम पर किसी महिला जज के उलट युवा पुरुष जज एक रोल मॉडल बन जाते हैं.

शर्मा की पोस्ट के नीचे एक कमेंट में लिखा है, ‘आप मेरे आदर्श हैं, सर.’ वहीं दूसरे किसी ने कमेंट किया है, ‘आप हमेशा प्रेरित करते रहे हैं. एक दिन मैं भी ऐसे ही किसी चैंबर में बैठूंगा.’

छोटे शहरों में तो बाहर निकलना भी आसान नहीं

ज्यादा वक्त नहीं बीता, जब किसी ग्रामीण जिला अदालत में तैनात होने का मतलब था कि युवा न्यायाधीशों के लिए बाहर घूमने-फिरने और लोगों से मिलने-जुलने का कोई मौका न होना. लेकिन अब स्थिति बदल रही है. छोटे शहर में आर्थिक गतिविधियां बढ़ीं हैं और रेस्तरां, मॉल जैसी जगहों से वहां रौनक हो गई है. ऐसे में युवा जजों के पास चिल करने के लिए तमाम जगहें उपलब्ध हैं.

लेकिन लैंगिक भेदभाव यहां भी कम नहीं है. महिला न्यायाधीशों के लिए छोटे शहरों में बाहर निकलना या घूमना-फिरना अब भी आसान नहीं है.

एक युवा महिला जज ने बताया, ‘यहां एक कैफे और एक रेस्तरां है. मैंने एक दोस्त को मिलने के लिए बुलाया और जब हम वहां डिनर कर रहे थे, तो मुझे कुछ जाने-पहचाने चेहरे नजर आए.’ उस मेज से आ रही बातचीत और हंसी की आवाजों ने उन्हें असहज कर दिया.

एक अन्य युवा महिला न्यायाधीश ने बताया, ‘बाद में, मुझे एहसास हुआ कि ये वही वकील हैं जो रोजाना मेरी अदालत में पेश होते थे.’

उसके बाद वह फिर कभी उस रेस्टोरेंट में नहीं गईं.

(अनुवाद: रावी द्विवेदी)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(यह रिपोर्ट भारत में निचले स्तर की न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों पर एक सीरिज का हिस्सा है. बाकी के सभी आर्टिकल यहां पढ़ें. )


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