कुरुक्षेत्र: नोएडा के टेक कर्मी युवराज मेहता की मौत से करीब 20 साल पहले, जब लोग देखते रह गए थे, उसी तरह की एक और ‘गिरने’ की घटना ने देश को डर और उम्मीद दोनों से भर दिया था. यह घटना हरियाणा के हल्दरी गांव के रहने वाले प्रिंस कश्यप की थी.
प्रिंस की कहानी ने भारत में 24×7 टीवी न्यूज़ के तमाशे को जन्म दिया, जब भी चार साल का बच्चा 60 फीट गहरे बोरवेल में रहते हुए कॉकरोच मारता, बिस्किट खाता या थोड़ा दूध पीता, चैनल “ब्रेकिंग” चलाने लगते थे. “देश की सांसें थमीं” से लेकर “प्रिंस ने कुरुक्षेत्र की जंग जीत ली” तक, जुलाई 2006 में 50 घंटे तक चले उसके संघर्ष की कवरेज पूरे देश में फैली थी.
आज वही टीवी चैनल उसी तीव्रता के साथ टिकर चला रहे हैं. “हादसा नहीं, हत्या” से लेकर “युवराज का कातिल सिस्टम है” तक, पिछले हफ्ते 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत पर उनकी हेडलाइन वही गुस्सा दिखाती हैं — फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार बचाव नहीं हो पाया.
प्रिंस जानते हैं कि वे इसलिए नहीं बचे क्योंकि कोई रोकथाम वाला सिस्टम मौजूद था, बल्कि इसलिए क्योंकि पूरा देश उन्हें देख रहा था. यही संभावना युवराज को नहीं बचा सकी, जो नोएडा के सेक्टर-150 में अपनी डूबती कार की छत पर एक घंटे से ज्यादा समय तक खड़े रहे और टॉर्च जलाकर मदद के लिए इशारे करते रहे. न्यूज़ चैनल जिस ‘सिस्टम’ को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वह युवराज के मामले में मौजूद था, लेकिन सिर्फ कागज़ों पर. दो दशकों का डेवलपमेंट न तो गड्ढों को भर सका और न ही गांव के बोरवेल और शहर के निर्माण स्थल के गड्ढे के बीच की दूरी पाट सका—दोनों ही लापरवाही और उदासीनता की देन हैं. आखिरकार सेना के अधिकारियों ने प्रिंस को ज़िंदा बाहर निकाल लिया था. वहीं युवराज मदद की गुहार लगाते रहे और नोएडा पुलिस, फायर ब्रिगेड, एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की रेस्क्यू टीमें मौके पर खड़ी देखती रहीं.
जब प्रिंस को युवराज की मौत के बारे में पता चला, तो वह पूरे एक मिनट तक चुप रहे.
फिर उन्होंने धीरे-धीरे कहा, “20 साल में ज्यादा कुछ नहीं बदला है. हम अब भी तैयार नहीं हैं. अगर किसी ने उन्हें बचाने के लिए जल्दी कदम उठाया होता, तो युवराज बच सकते थे.”
23-साल के हो चुके ‘बोरवेल बॉय’ ने कहा, “मैं इसलिए ज़िंदा हूं क्योंकि इतने सारे लोगों ने लगातार मुझे बचाने की कोशिश की. काश, उनके लिए भी वही जल्दी दिखाई गई होती.”
अब उनके अपने संघर्ष की यादें भी धीरे-धीरे धुंधली हो रही हैं. आज उन्हें बस अंधेरे और दमघोंटू जगह में बिताए अंतहीन घंटे याद हैं — डर, बार-बार मदद की पुकार. ज़िंदगी आगे बढ़ चुकी है और वह भी. अब वे अंबाला में बतौर प्लंबर काम करते हैं और इस हादसे के बारे में बात करना उन्हें पसंद नहीं है.
प्रिंस ने कहा, “जब कोई मुझसे पूछता है कि 20 साल पहले क्या हुआ था, तो मैं बहुत तेज़ बोलने लगता हूं. मुझे घबराहट होने लगती है.” शब्द जैसे मुश्किल से उनके मुंह से निकलते हैं.
तब भी लापरवाही के लिए “दोषियों” या ठेकेदारों को सज़ा देने की मांग उठी थी, लेकिन हरियाणा में न तो कोई एफआईआर दर्ज हुई और न ही कोई कार्रवाई हुई. प्रिंस के बचाव ने मानो सब कुछ ढक दिया. युवराज के मामले में शुरुआती जांच के बाद रियल एस्टेट डेवलपर्स को गिरफ्तार किया गया, नोएडा के सीईओ को निलंबित किया गया और उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष जांच के आदेश दिए. वह गड्ढा, जो सालों से सैटेलाइट तस्वीरों में दिख रहा था, लेकिन बिना निशान और रोशनी के था, उसे अब घेर दिया गया है.
प्रिंस ने कहा, “अक्सर हमारे गांव के आसपास की सड़कें टूटी रहती हैं और कई हादसे होते हैं. चुनाव के समय नेता वोट मांगने आते हैं. सड़कें ठीक कराने के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन कुछ नहीं होता. उन्हें सिर्फ वोटों की परवाह होती है.” थोड़ी देर सोचने के बाद उन्होंने कहा, “मेरे साथ जो हुआ, वह लापरवाही थी, लेकिन कई दूसरे मामलों में यह बेपरवाही और पूरी तरह से नाकामी भी है.”
उम्मीदें जो टूट गईं
हल्दरी में हर कोई जानता है कि प्रिंस कश्यप का घर कहां है और हर कोई याद करता है कि करीब 20 साल पहले वहां क्या हुआ था.
गांव के लिए बोरवेल रेस्क्यू एक ऐतिहासिक घटना थी. तीन दिनों तक राष्ट्रीय टीवी चैनलों की टीमें गांव में डटी रहीं. ज़मीन के अंदर फंसे बच्चे को बचाने के लिए सेना के अधिकारियों ने अलग-अलग तरीके आजमाए. नेता और अधिकारी एक के बाद एक गांव आते रहे.
गांव के सरपंच यादविंदर सिंह (35) ने कहा, “तत्कालीन हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा हमारे गांव आए थे और रेस्क्यू के दौरान प्रिंस के घर में रुके थे. सांसद और विधायक आते-जाते रहे.”
इस ध्यान के चलते गांव में शुरुआत में कुछ विकास हुआ—पानी की सुविधाएं, पक्की गलियां, ढके हुए नाले और ज्यादा बिजली के वादे. प्रिंस के परिवार को भी 6 लाख रुपये नकद मिले और कई आश्वासन दिए गए. सबसे अहम वादा यह था कि जब प्रिंस 18 साल का होगा, तो उसे भारतीय सेना में शामिल होने का मौका दिया जाएगा. इस आश्वासन का एक आधिकारिक प्रमाण-पत्र भी दिया गया था, जिसमें परिवार को सलाह दी गई थी कि प्रिंस को अच्छी एजुकेशन दिलाई जाए, ताकि वह योग्य होने पर भर्ती के लिए विचार किया जा सके.
प्रिंस इसी भरोसे के साथ बड़ा हुआ. 17-साल की उम्र में उन्होंने गंभीर तैयारी शुरू की—सुबह जल्दी उठना, रोज़ाना पास के गांव के स्टेडियम जाना, एक्सरसाइज करना और कबड्डी खेलना. ट्रेनिंग उनकी दिनचर्या और उनका मकसद बन गई.
प्रिंस ने कहा, “फिर कोविड आ गया और भर्ती में देरी हो गई, जब आखिरकार 2022 में प्रक्रिया शुरू हुई, तो मुझे बताया गया कि मेरी लंबाई कम है, इसलिए मैं भर्ती नहीं हो सकता.”
वे कई दिनों तक रोते रहे. वे उस सपने के टूटने का गम मना रहे थे, जिसके इर्द-गिर्द उन्होंने अपनी ज़िंदगी को सजाया था.
थोड़ी देर बाद जब प्रिंस ने खुद को संभाला, तो उनका कज़िन उन्हें अपने साथ काम पर ले जाने लगा. प्रिंस ने काम करते-करते प्लंबिंग सीखी. बाद में, जब उन्हें किसी स्थायी योग्यता की ज़रूरत लगी, तो उन्होंने आईटीआई कोर्स में दाखिला लिया. एक साल की पढ़ाई के बाद, वे अब अंबाला के कल्पना चावला गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक फॉर विमेन में इंटर्नशिप कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “कॉलेज में जो भी प्लंबिंग का काम आता है, हम वही करते हैं. इससे मुझे एक्सपीरियंस मिलता है और अगले साल मैं परमानेंट नौकरी के लिए अप्लाई कर पाऊंगा.”
गांव वालों का कहना है कि अब मीडिया का फोकस खत्म हो चुका है और उसके साथ ही बदलाव की उम्मीद भी. प्रिंस के पिता रामचंद्र कश्यप अब एसी के पार्ट्स बनाने वाली एक फैक्ट्री में काम करते हैं. उनका छोटा भाई नाई है और बड़ी बहन की शादी हो चुकी है.
परिवार की स्थिति के चलते प्रिंस को जल्दी कमाई शुरू करनी पड़ी. वे फिलहाल महीने के 7,000 रुपये कमाते हैं और उम्मीद करते हैं कि परमानेंट नौकरी मिलने पर वह 25,000 रुपये कमा सकेंगे.
उन्होंने कहा, “मुझे पढ़ाई में कभी ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. मुझे खेलना पसंद थे.” वह लंच ब्रेक के दौरान अपने काम की जगह के पास एक पार्क में बैठे थे, उन्होंने कहा, “लेकिन परिवार की मदद करने और कमाने के लिए मुझे अपने सारे शौक छोड़ने पड़े.”
एक कहानी, जो प्रिंस नहीं बताते
प्रिंस अपने दोस्त के साथ बैठे थे और सेना की तैयारी के समय की पुरानी तस्वीरें देख रहे थे.
उन्होंने कहा, “ये देखो—कितना पतला था मैं.” और उनका दोस्त चुपचाप सिर हिलाता रहा.

उनके दोस्त गुरजीत ने कहा कि उन्हें प्रिंस के अतीत के बारे में कभी पता ही नहीं था और न ही यह समझ आता था कि कोई उनका इंटरव्यू क्यों लेना चाहता है. स्वभाव से प्रिंस शांत हैं और ज़रूरत होने पर ही बोलते हैं.
उन्होंने कहा, “मैं ज्यादा लोगों को नहीं बताता, मुझे चीज़ें अपने तक ही रखना पसंद है.”
दो साल पहले, खाटूश्याम की यात्रा के दौरान, उनके कुछ दोस्तों ने मज़ाक में बोरवेल रेस्क्यू के समय रोते हुए उनके पुराने न्यूज़ वीडियो चला दिए थे.
उन्होंने कंधे उचकाते हुए कहा, “वे बस मज़ाक कर रहे थे, मुझे दुखी करने के लिए नहीं.”
प्रिंस बहुत कम ही अपनी कहानी इंटरनेट पर सर्च करते हैं, वे उन दिनों को दोबारा जीना नहीं चाहते.
उन्हें जो बातें याद हैं, वे बस कुछ टुकड़ों में हैं—ज़मीन के नीचे फंसे होने के दौरान उन्हें चॉकलेट और पारले-जी बिस्किट दिए जाना और वह पल जब बचावकर्मियों ने एक रस्सी से उन्हें बाहर खींचने की कोशिश की, जिसके सिरे पर एक बल्ब बंधा हुआ था.
उस उंगली को दिखाते हुए जिस पर आज भी निशान है, उन्होंने कहा, “मैंने रस्सी पकड़ ली थी और बल्ब इतना गर्म था कि मेरी एक उंगली जल गई.”
50 साल के एक पड़ोसी ने याद किया कि आसपास के गांवों से लोग सिर्फ उस बच्चे की एक झलक देखने आते थे, जो बोरवेल में गिरा था और बच गया था.
पड़ोसी ने कहा, “अब हम बस यही चाहते हैं—अगर मुमकिन हो, तो उसे एक ठीक-ठाक नौकरी मिल जाए. बहुत चिंता रहती है.”

सितारों से मुलाकात, थोड़ी देर की शोहरत
लेकिन अब लोग धीरे-धीरे उस घटना को भूलने लगे हैं, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था, वह असाधारण पल अब यादों से धुंधला पड़ता जा रहा है.
प्रिंस के बाहर निकाले जाने के बाद बोरवेल को बंद कर दिया गया था. उनके बाद से कोई और बच्चा उसमें नहीं गिरा.
कुछ समय के लिए पूरा देश एक साथ देख रहा था और उम्मीद और बेचैनी के साथ दुआ कर रहा था. प्रिंस एक राष्ट्रीय पहचान बन गया था. नकद इनाम मिले, नेताओं ने मुलाकात की, सलीम खान की तरफ से एक बच्चे की साइकिल मिली और टीवी की टीमें हर कदम पर उनका पीछा करती रहीं, लेकिन यह शोहरत ज्यादा देर टिक नहीं पाई.
प्रिंस जल्दी ही साधारण ज़िंदगी में लौट आए—माता-पिता के अलग होने, पिता की दूसरी शादी और स्कूल में औसत प्रदर्शन के साथ. उन दिनों का असाधारण ध्यान एक शांत और सामान्य जीवन की बस एक याद बनकर रह गया.
प्रिंस समझते हैं कि उनका रेस्क्यू इतनी बड़ी खबर क्यों बना.
उन्होंने कहा, “तब पूरे देश ने साथ दिया था, क्योंकि सरकार पर, सिस्टम पर दबाव बनाना ज़रूरी था.”
दो साल पहले उनके गांव में एक सड़क पर लगातार हादसे हो रहे थे, क्योंकि उसकी हालत बहुत खराब हो चुकी थी. जब स्थानीय विधायक वोट मांगने आए, तो लोगों ने सवाल किया कि ऐसी सड़कों के साथ वे वोट क्यों दें और फिर, तय समय की तरह, कार्रवाई शुरू हो गई.
प्रिंस ने कहा, “सिर्फ दो दिन बाद ही सड़क की मरम्मत का काम शुरू हो गया. काश वोट की लालच के बिना भी ऐसी ही जल्दी दिखाई जाती. तब हालात बहुत बेहतर होते.”
उन्हें याद है कि रेस्क्यू के बाद अजनबी लोग आते थे, उनके साथ फोटो खिंचवाते थे और चले जाते थे. कुछ समय के लिए वह अपने गांव की शांति से बहुत दूर चले गए थे.
प्रिंस ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बाहर आने के बाद मुझे मुंबई भी ले गए थे. कुछ एक्टर्स—जैसे कैटरीना कैफ, सनी देओल ने उनके साथ फोटो ली और फिर मैं वापस आ गया.”
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