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Sunday, 18 January, 2026
होमफीचर'मॉडल चिड़ियाघर' में मौतों की कड़ी: क्या दिल्ली का ज़ू अपने मकसद से भटक गया है?

‘मॉडल चिड़ियाघर’ में मौतों की कड़ी: क्या दिल्ली का ज़ू अपने मकसद से भटक गया है?

दिप्रिंट ने चिड़ियाघर के जिन स्टाफ से बात की, उन्होंने बताया कि शायद स्टाफ आग जलाकर जानवर को छिपाने की जगह से बाहर निकालने की कोशिश कर रहा था. लेकिन धुएं से सियार का दम घुट गया.

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दिल्ली के नेशनल जूलॉजिकल पार्क में अपने पिंजरे से भागने के बाद गलती से एक काले भालू के बाड़े में घुसने वाले सियार को कथित तौर पर पार्क अधिकारियों ने जिंदा जला दिया. एक महीने पहले हुई इस कथित घटना ने भारत की राजधानी में एक ‘मॉडल चिड़ियाघर’ के कामकाज पर सबसे बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. नेशनल जू वर्कर्स यूनियन ने सोमवार, 12 जनवरी को एक चिट्ठी में दावा किया कि चिड़ियाघर के डायरेक्टर और बड़े अधिकारियों को इस क्रूर कृत्य की जानकारी थी.

यह चिट्ठी नेशनल जूलॉजिकल पार्क, दिल्ली के एकमात्र चिड़ियाघर और देश के एकमात्र पार्क, जिसे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा संचालित किया जाता है, के खिलाफ जानवरों के कुप्रबंधन और क्रूरता से जुड़े आरोपों और विवादों की श्रृंखला में ताजा कड़ी है. सिर्फ पिछले एक साल में, चिड़ियाघर ने वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ जूज़ एंड एक्वेरियम्स (WAZA) की सदस्यता खो दी है. उस पर अफ्रीकी हाथी शंकर और भारतीय गैंडे, पांच बाघ शावकों और चार सींग वाले हिरण जैसी संरक्षित प्रजातियों की देखभाल में लापरवाही के आरोप लगे हैं, जिनके चलते उनकी समय से पहले मौत हो गई. हालात इसलिए भी बिगड़े हैं क्योंकि पार्क के कर्मचारी भर्ती नीतियों और ट्रेनिंग प्रोटोकॉल को लेकर प्रबंधन से टकराव में हैं, जबकि चिड़ियाघर 50 प्रतिशत से थोड़ी अधिक क्षमता के साथ काम कर रहा है.

दिप्रिंट से बात करते हुए नेशनल जूलॉजिकल पार्क के डायरेक्टर संजीव कुमार ने कहा कि सियार की मौत की ऐसी किसी घटना की जानकारी उन्हें नहीं दी गई है और चिड़ियाघर में मौजूद सियारों की संख्या इन्वेंट्री रिकॉर्ड से मेल खाती है. उन्होंने कहा कि चिट्ठी मिलने के बाद जॉइंट डायरेक्टर के तहत इस मामले की जांच कराई जा रही है.

यह चिड़ियाघर, जो अपने वॉटरबर्ड एवियरी में एवियन इन्फ्लूएंजा पाए जाने के कारण दो महीने से अधिक समय तक बंद रहने के बाद नवंबर में फिर से खुला था, दिल्ली के स्कूलों की पहली पसंद माना जाता है, जो अक्सर छात्रों को यहां भ्रमण के लिए लाते हैं. सात नवंबर को दोबारा खुलने के दिन यहां 8,000 से अधिक लोग पहुंचे थे. भारत का ‘मॉडल चिड़ियाघर’ बनने के उद्देश्य से तैयार किया गया दिल्ली चिड़ियाघर, बीते कई वर्षों से उस छवि को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है.

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के दो सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया, “अगर किसी राज्य में चिड़ियाघरों को लेकर कोई समस्या होती है, तो एक तय प्रोटोकॉल होता है. सेंट्रल जू अथॉरिटी उन्हें फटकार लगाती है और कमांड की एक स्पष्ट श्रृंखला राज्य के वन विभाग के शीर्ष तक जाती है.” उन्होंने कहा, “लेकिन दिल्ली चिड़ियाघर के मामले में कमांड की कोई स्थापित श्रृंखला नहीं है.” पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मौलेखी ने 2018 में जानवरों के रिकॉर्ड में हेरफेर और चिड़ियाघर के समग्र कुप्रबंधन को लेकर इसके खिलाफ मामला दायर किया था.

पीपल फॉर एनिमल्स की एनिमल एक्टिविस्ट और ट्रस्टी गौरी मौलेखी ने कहा, “दिल्ली चिड़ियाघर में एक बार जाने से ही यह साफ हो जाता है कि इसका कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं है. यहां संरक्षण का अभाव है क्योंकि सभी कैप्टिव ब्रीडिंग प्रोग्राम असफल रहे हैं. शिक्षा का भी कोई ठोस प्रयास नहीं है, क्योंकि जानवरों को अप्राकृतिक बाड़ों में रखा गया है, जिससे वे स्टीरियोटाइप व्यवहार दिखाते हैं.” उन्होंने कहा, “इन सबसे ऊपर, जानवरों के कल्याण से भी समझौता किया जा रहा है.”

जहां मौलेखी जैसे विशेषज्ञ चिड़ियाघरों में कैद के पूरे एजेंडे में बदलाव की बात कर रहे हैं, वहीं दिल्ली चिड़ियाघर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अमल में आने वाली दिक्कतें खासतौर पर इसके गवर्नेंस स्ट्रक्चर से जुड़ी हैं. हालांकि, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि राष्ट्रीय राजधानी में जानवरों की देखभाल के तरीके में बदलाव जरूरी है और यह बदलाव जल्द होना चाहिए.

वर्ल्ड एनिमल प्रोटेक्शन इंडिया के वाइल्डलाइफ प्रोजेक्ट्स मैनेजर शुभोब्रतो घोष ने कहा, “यह सवाल जरूर उठता है कि अगर राजनीतिक राजधानी के चिड़ियाघर में ऐसा हो रहा है, तो देश के बाकी चिड़ियाघरों के लिए इसका क्या मतलब है.”

नेशनल जू वर्कर्स यूनियन ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को लिखे पत्र में इस मामले की स्वतंत्र जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की है.

देश के सभी चिड़ियाघरों के लिए नियामक संस्था सेंट्रल जू अथॉरिटी के सदस्य सचिव क्लेमेंट वी बेन ने कहा, “हमें पत्र मिल गया है और हम इस मामले को देख रहे हैं.”

7 नवंबर को जब इसे फिर से खोला गया, तो 8,000 से ज़्यादा विज़िटर यहां आए. भारत का ‘मॉडल चिड़ियाघर’ बनने के लिए डिज़ाइन किया गया दिल्ली चिड़ियाघर, सालों से उस इमेज को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

एक मौत और एक जांच

22 नवंबर 2025 को तीन से चार सियार, जो शेड्यूल I में संरक्षित जानवर हैं, अपने बाड़ों से भाग गए और दिल्ली चिड़ियाघर परिसर के भीतर देखे गए. चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने 48 घंटे से भी कम समय में दो सियारों को दोबारा पकड़ लिया, जबकि बाकी दो को CCTV कैमरों और जाल वाले पिंजरों की मदद से ट्रैक किया जा रहा था.

लेकिन वर्कर्स यूनियन के पत्र के मुताबिक, भागे हुए सियारों में से एक गलती से हिमालयी काले भालू के बाड़े में घुस गया और जमीन के नीचे बने एक बिल में चला गया. कर्मचारियों का आरोप है कि सियार को सुरक्षित तरीके से बचाने के बजाय “रेंजर-इन-चार्ज मनोज कुमार ने एक योजना बनाई”, जिसके चलते जानवर की मौत हो गई. पत्र में कहा गया है कि यह घटना 14 से 20 दिसंबर के बीच किसी समय हुई, हालांकि सटीक तारीख स्पष्ट नहीं है.

पत्र में लिखा गया है, “आरोप है कि बिल के अंदर मिर्च पाउडर डाला गया और उसमें आग लगा दी गई, जिससे जानवर के साथ अत्यंत क्रूरता हुई और उसे गैर-कानूनी तरीके से मार दिया गया.” इसमें आगे कहा गया है, “सियार के अवशेष निकालने के लिए कर्मचारियों को बिल के भीतर भेजा गया और रेंजर के सीधे निर्देश पर जानवर को चुपचाप ठिकाने लगा दिया गया.”

चूंकि कोई पोस्टमार्टम नहीं किया गया, इसलिए अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि सियार की मौत किस कारण से हुई. हालांकि दिप्रिंट से बात करने वाले चिड़ियाघर के कर्मचारियों का कहना है कि संभव है कि कर्मचारी जानवर को बिल से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन आग और धुएं के कारण सियार का दम घुट गया.

यह पत्र केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEFCC) को संबोधित था, क्योंकि नेशनल जूलॉजिकल पार्क मंत्रालय के अधीन एक निकाय है. पत्र की एक प्रति सेंट्रल जू अथॉरिटी और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो को भी भेजी गई थी.

दिल्ली चिड़ियाघर के निदेशक संजीव कुमार ने दिप्रिंट को बताया, “इस घटना के बारे में पहले मुझे कोई जानकारी नहीं दी गई थी. अब हमने चिड़ियाघर के संयुक्त निदेशक की अध्यक्षता में एक जांच के आदेश दिए हैं.” उन्होंने कहा, “जांच पूरी होने से पहले मैं कुछ नहीं कह सकता.”

22 नवंबर 2025 को, अनुसूची I के संरक्षित पशुओं में से तीन से चार सियार अपने बाड़ों से भाग निकले और दिल्ली चिड़ियाघर के अधिकारियों ने उन्हें परिसर के भीतर ही देख लिया. कर्मचारियों ने 48 घंटे से भी कम समय में दो सियारों को वापस ले आए, जबकि अन्य दो की तलाश सीसीटीवी कैमरों और पिंजरों से लैस चिड़ियाघर के कर्मचारियों द्वारा जारी रही | आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

वर्कर्स यूनियन ने अपने पत्र में इस मामले के लिए एक स्वतंत्र जांच टीम गठित करने की मांग की है, जिसमें NZP के बाहर के अधिकारी शामिल हों. उन्होंने यह भी मांग की है कि इस मामले में शामिल अधिकारियों को तुरंत निलंबित किया जाए और उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जाए.

हालांकि चिड़ियाघर के एक पूर्व कर्मचारी के अनुसार, जिस संयुक्त निदेशक को जांच का प्रमुख बनाया गया है, वही चिड़ियाघर में जानवरों के सेक्शन के भी प्रभारी हैं. पूर्व कर्मचारी का कहना है कि इससे जांच की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है.

पिछले विवाद

कथित सियार की मौत पर वर्कर्स यूनियन के पत्र से करीब दो हफ्ते पहले, एक टॉक्सिकोलॉजी रिपोर्ट में 11 दिसंबर 2025 को चिड़ियाघर में मरे दो चार सींग वाले हिरणों के शरीर में रोडेंटिसाइड्स के अंश पाए गए थे. इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IVRI) की रिपोर्ट के अनुसार, ये शेड्यूल I में संरक्षित जानवर एल्यूमीनियम फॉस्फाइड या जिंक फॉस्फाइड के संपर्क में आए थे, जिनका इस्तेमाल आमतौर पर चूहों और कीड़ों को मारने के लिए किया जाता है.

रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद चिड़ियाघर अधिकारियों ने दिप्रिंट के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. सितंबर 2025 में पार्क में एक प्रसिद्ध हाथी शंकर की मौत हो गई थी. शंकर करीब तीन दशकों तक भारत-अफ्रीका संबंधों का प्रतीक माना जाता रहा. वह 1998 में जिम्बाब्वे के तत्कालीन राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे द्वारा राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को भेंट किया गया था.

2000 में मादा हाथी बंबई की मौत के बाद शंकर लंबे समय तक अकेला रहा. उस पर कई बार दुर्व्यवहार के आरोप लगे, जिनमें उसे एकांत में रखना और पैरों में जंजीरें बांधना शामिल था. यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक भी पहुंचा, जहां अदालत ने शंकर की रहने की परिस्थितियों का निरीक्षण करने के निर्देश दिए थे.

2024 में शंकर हाथी की एक फ़ाइल फ़ोटो, जिसमें वह अपने अकेले बाड़े में है और उसके पैरों में अभी भी ज़ंजीरें बंधी हुई हैं। | फ़ोटो: आकांक्षा मिश्रा | दिप्रिंट

शंकर की लगातार खराब हालत के चलते दिल्ली चिड़ियाघर ने 2024 के अंत में वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ जूज एंड एक्वेरियम (WAZA) की सदस्यता खो दी. संगठन को शंकर के इलाज में नैतिक मानकों के उल्लंघन की शिकायत मिली थी. WAZA के नोटिस के 11 महीने बाद, 17 सितंबर 2025 को शंकर की मौत हो गई.

चिड़ियाघर ने उसकी मौत के एक दिन बाद दिप्रिंट को बताया था कि मरने से दो दिन पहले उसने खाना ठीक से नहीं खाया था और मौत के कारणों की जांच की जा रही है. 15 जनवरी 2026 को निदेशक संजीव कुमार ने कहा कि रिपोर्ट केंद्रीय मंत्रालय को सौंप दी गई है, लेकिन मीडिया के साथ विवरण साझा नहीं किया गया.

अपनी मृत्यु तक शंकर के लिए कोई साथी नहीं खोजा जा सका. 2025 में दिल्ली चिड़ियाघर में कई अन्य जानवरों की भी मौत हुई, जिनमें असम से मेटिंग के लिए लाया गया एक सींग वाला गैंडा भी शामिल था. सितंबर 2024 में स्वस्थ अवस्था में दिल्ली लाए गए इस गैंडे की जनवरी 2025 में चार महीने के भीतर ‘अस्वाभाविक कारणों’ से मौत हो गई. पोस्टमार्टम में सामने आया कि वह एक्यूट हेमरेजिक एंटराइटिस से पीड़ित था, जो संभवतः दिल्ली आने के बाद हुए संक्रमण के कारण हुआ.

अगस्त 2025 में छह रॉयल बंगाल टाइगर शावकों के जन्म के साथ उम्मीद जगी थी. दशकों बाद दिल्ली चिड़ियाघर में बंगाल टाइगर के बच्चे पैदा हुए थे, लेकिन अगस्त के अंत तक छह में से केवल एक शावक ही जीवित बच पाया.

वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के सीनियर एडवाइज़र डॉ. एनवी अशरफ ने कहा, “चिड़ियाघर मरीजों का संग्रह या रेस्क्यू सेंटर नहीं होते. यहां स्वस्थ जानवर रखे जाते हैं, जिन्हें नियमित इलाज की नहीं, बल्कि निरंतर देखभाल की जरूरत होती है.” उन्होंने कहा, “यहीं पर ज्यादातर चिड़ियाघर और उनका प्रबंधन असफल हो जाता है, क्योंकि वे जानवरों को बुनियादी स्तर का भोजन, देखभाल और साफ-सफाई लगातार उपलब्ध नहीं करा पाते.”

2018 का एक कोर्ट केस

2017 में सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी द्वारा गठित एक जांच पैनल ने दिल्ली ज़ू के कई अधिकारियों पर लापरवाही के आरोप लगाए थे, जिनके चलते जानवरों की रहस्यमय मौतें हुईं. रिपोर्ट में कहा गया था कि कई मामलों में पोस्टमार्टम नहीं कराया गया, जानवरों को अवैध तरीके से पकड़ा गया और जानवरों के इन्वेंट्री रिकॉर्ड भी गलत पाए गए. यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई थी, लेकिन ThePrint ने उस समय इसे हासिल कर इस पर रिपोर्ट की थी.

इसके तुरंत बाद, मई 2018 में गौरी मौलेखी ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की, जिसमें ज़ू में कुप्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई और एक स्वतंत्र जांच पैनल के गठन की मांग की गई. इसके बाद एक उच्च-स्तरीय समिति बनाई गई, जिसमें केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के सदस्य शामिल थे. इस समिति ने ज़ू की स्थितियों में सुधार के लिए कई सिफारिशें दीं.

दिल्ली चिड़ियाघर में आने वाले लोगों की एक फ़ाइल फ़ोटो। | सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

इन सिफारिशों में ज़ू में क्वारंटाइन सुविधा और रेस्क्यू सेंटर की स्थापना, जानवरों की वार्षिक गणना के लिए ज़ू इन्वेंट्री समिति का गठन और ज़ू परिसर के भीतर खुले घूमने वाले जानवरों से जुड़ी नीतियां शामिल थीं. समिति ने उस समय ज़ू प्रबंधन से जुड़े लगभग सभी प्रमुख मुद्दों को कवर किया था.

हालांकि, एक अहम सिफारिश, जो ज़ू के प्रशासनिक नियंत्रण में बदलाव से संबंधित थी, अब तक लागू नहीं की गई है.

सिफारिश में कहा गया था, “MoEF&CC एक तरफ नेशनल जूलॉजिकल पार्क का संचालन करता है और दूसरी तरफ सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी के लिए एक नियामक प्राधिकरण के रूप में काम करता है, जो देश के सभी चिड़ियाघरों को नियंत्रित करती है. भूमिकाओं का यह दोहराव NZP के प्रबंधन पर अधिकार क्षेत्र को लेकर अस्पष्टता पैदा करता है. इसलिए MoEF&CC को NZP के प्रशासनिक नियंत्रण को स्थानांतरित करने पर विचार करना चाहिए.”

प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़ी समस्याएं

पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, ज़ू के प्रशासनिक नियंत्रण को स्थानांतरित करने की समिति की सिफारिश “बिल्कुल सही” थी. वर्षों से मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी दिल्ली ज़ू के स्वामित्व और नियंत्रण को लेकर उलझन में रहे हैं.

देश के अन्य सभी चिड़ियाघरों से अलग, सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी और दिल्ली ज़ू, दोनों का प्रशासन केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पास है. समिति की सिफारिशों के अनुरूप “नियंत्रण की एक स्पष्ट रेखा” स्थापित करने के लिए, MoEF&CC को या तो दिल्ली ज़ू को CZA के अधीन करना होगा या फिर ज़ू के संचालन के लिए एक स्वतंत्र सोसायटी का गठन करना होगा.

दिप्रिंट ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया के लिए MoEF&CC के वाइल्डलाइफ डिवीजन में एडिशनल डिप्टी डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेस्ट, रमेश कुमार पांडे से फोन और ईमेल के जरिए संपर्क किया है. जैसे ही उनका जवाब मिलेगा, कॉपी को अपडेट किया जाएगा.

अशरफ ने कहा, “देश के कुछ चिड़ियाघर अपने-अपने राज्यों के लिए गर्व की बात हैं, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता. मुझे लगता है कि किसी को आगे आकर इस पूरे सिस्टम को हमेशा के लिए साफ करने की जरूरत है.”

हालांकि, मौलेखी और घोष का नजरिया इससे अलग है.

मौलेखी ने कहा, “सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी की यह बड़ी नाकामी है कि वह एक पुराने कॉन्सेप्ट, यानी चिड़ियाघरों को, आज के दौर में भी प्रासंगिक बनाने की कोशिश कर रही है.” उन्होंने कहा, “भारत में कोई भी चिड़ियाघर आदर्श नहीं है, लेकिन दिल्ली का तथाकथित ‘मॉडल चिड़ियाघर’ इस कॉन्सेप्ट की विफलता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है.”

सियार की कथित मौत और अन्य आरोपों को लेकर उठे विवाद के बाद, घोष ने भी चिड़ियाघरों की अवधारणा पर दोबारा विचार करने की जरूरत बताई.

उन्होंने कहा, “मौतों का यह सिलसिला और प्रबंधन की खामियां आपको यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि जानवरों को कैद में रखना कितना सही है. क्या हम उस दौर से आगे नहीं बढ़ चुके हैं, जब जानवरों को केवल मनोरंजन का साधन माना जाता था.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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