होशियारपुर: पंजाब के होशियारपुर की गलियों में 77 साल के द्वारका भारती रहते हैं, एक बागी मोची जो खुद को कारीगर कहना पसंद करते हैं. हर दिन वे अपनी दुकान पर बैठते हैं, जहां उनकी दो दुनिया एक साथ दिखती हैं. एक हिस्सा चमड़े और औज़ारों से भरा होता है, तो दूसरा हिस्सा दलित साहित्य, बौद्ध ग्रंथ, बी.आर. आंबेडकर की रचनाएं और उनकी अपनी लिखी किताबों से भरा होता है.
उन्होंने कहा, “इस देश में लोग मेरे काम को जाति के नज़रिये से देखते हैं. अगर मैं कहीं और होता, तो मुझे सिर्फ मोची नहीं बल्कि कारीगर के रूप में पहचाना जाता.” फिर भी वे खुद को पीड़ित नहीं मानते.
भारती की रचनाएं IGNOU के सिलेबस में शामिल हैं—उनकी कविता “आज का एकलव्य” एमए हिंदी दलित साहित्य के कोर्स का हिस्सा है. पंजाब यूनिवर्सिटी में पीएचडी करने वाले शोधार्थी भी दलित साहित्य पर अपने शोध में उनकी रचनाओं का अक्सर उल्लेख करते हैं.
आज उनका नाम पंजाब के प्रमुख दलित लेखकों—प्रेम गोरखी, लाल सिंह दिल, एल.आर. बाली और बलवीर माधोपुरी के साथ लिया जाता है. कई सालों से वे स्थानीय पंजाबी न्यूज चैनलों पर दलित साहित्य के बारे में खुलकर बोलते रहे हैं.
फिर भी वे प्रसिद्धि से दूर रहना पसंद करते हैं. नाम और पहचान उनके लिए ज्यादा मायने नहीं रखते.
उनके लिए लिखना एक तरह का विद्रोह है—जो जाति व्यवस्था को चुनौती देता है, राष्ट्रवाद पर सवाल उठाता है और एक ज्यादा समान दुनिया की कल्पना करता है. जूते बनाना भी उतना ही राजनीतिक काम है. यह काम और जाति के पुराने रिश्ते को तोड़ने का तरीका है.
उनका मकसद उस सोच को बदलना है, जिसने लंबे समय से उनके जैसे कारीगरों का जीवन मुश्किल बनाया है और वे यह सब अपने जन्म के उपनाम से नहीं करते. उन्होंने अपना जाति सूचक उपनाम छोड़कर एक सामान्य नाम “भारती” अपना लिया है, जिसका मतलब है भारत का निवासी.
उन्होंने कहा, “भारती नाम से पहचान स्पष्ट नहीं होती. कोई नहीं बता सकता कि मैं किस जाति से हूं. मैं सिर्फ एक भारतीय हूं.”
जब ग्राहक उनकी दुकान में किताबें देखते हैं, तो पूछते हैं क्या वे पढ़ते हैं, लेकिन वे शायद ही बताते हैं कि वे लेखक भी हैं. ज्यादातर लोगों के लिए वे होशियारपुर के एक साधारण बुजुर्ग हैं, जो जूते बनाते हैं.
उन्हें दलित साहित्य की पहचान कम होती जाने की चिंता है. कई दलित लेखक देश के ज्यादातर लोगों के लिए अनजान हैं, उनकी रचनाएं कम पढ़ी या पढ़ाई जाती हैं. दलित साहित्य के शुरुआती लेखक—जैसे 11वीं सदी के मोची संत मदारा चेनैया और 12वीं सदी के वचन कवि और समाज सुधारक दोहरा कक्कैया—धीरे-धीरे लोगों की यादों से मिटते जा रहे हैं.
वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, “जब लोग मेरी दुकान में किताबें देखते हैं, तो पूछते हैं क्या मैं कबाड़ कागज भी बेचता हूं. मैंने अपने परिवार से यह भी कह दिया है कि मेरे जाने के बाद ये किताबें जला देना—इन्हें पढ़ने वाला कोई नहीं बचेगा.” और वे हंसते हैं.

किताबों और जूतों के बीच
जैसे ही एक ग्राहक दुकान में आया और पहले पसंद किए गए जूते का बड़ा साइज मांगा, भारती का व्यवहार बदल गया.
उन्होंने अपने अंदर के लेखक को एक तरफ रखा.
हाथ में पकड़ी किताब को रखकर उन्होंने एक सादा कागज, पेन और नापने की फीता उठाई. बैठकर उन्होंने ग्राहक का पैर कागज़ पर रखा और उसकी रूपरेखा बना दी.
ग्राहक ने कहा, “मैं पहले सिर्फ एक-दो बार यहां आया हूं, लेकिन मैंने सुना है कि आप लिखते भी हैं और काफी मशहूर हैं.” भारती चुप रहे और अपनी नोटबुक में नाप लिखने में लगे रहे.
ग्राहक ने उनसे मुलाकात के आधार पर उनकी तीन खूबियों की तारीफ की—“काम में पूरी सटीकता, अच्छा व्यवहार और रचनात्मकता.”
भारती को यह दुकान उनके पिता से मिली, जिन्होंने यह हुनर लाहौर में सीखा था. इससे पहले उनके दादा भी मोची थे.
उन्होंने कहा, “मेरे पिता ने लाहौर में जूते बनाना सीखा. उन्होंने कई साल एक उस्ताद मोची के साथ काम किया और उनसे जो कहा जाता था, वह सब करना पड़ता था—चाय बनाना से लेकर पैर दबाना तक.”
उन्होंने बताया कि एक समय जूते बनाना एक गंभीर कला मानी जाती थी, जिसमें मेहनत, धैर्य और डिजाइन व कौशल को निखारने में सालों लगते थे.
उनका जीवन उन्हें मोची की दुकान से बहुत दूर तक भी ले गया.
1980 में वे इराक में रहे, जहां ईरान-इराक युद्ध के दौरान बारूद की गंध और अफरा-तफरी का माहौल था. वहां उन्होंने इलेक्ट्रीशियन के रूप में काम किया. उन्होंने बगदाद में एक बार सद्दाम हुसैन को देखा और शहरों की तबाही को करीब से देखा.
सद्दाम हुसैन हर महीने कम से कम एक बार निरीक्षण के लिए आते थे. उनके साथ पूरा स्टाफ होता था और उनके जैसे कामगार दूर से ही उन्हें देख सकते थे.
भारती ने कहा, “वे लंबे, गोरे, हल्के लाल रंग के चेहरे वाले और सख्त, लगभग शाही भाव वाले दिखते थे. उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली था, और लोग उनकी मौजूदगी को ध्यान से देखते थे.”

इन सबके बीच भारती ने किताबों के प्रति अपना प्रेम कभी नहीं छोड़ा. उन्हें जब भी समय मिलता, वे पढ़ते और खाली समय में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी कामगारों से बातचीत करते थे.
उन्होंने कहा, “जब मैं 7वीं कक्षा में था, तब मुझे जो भी मिलता था, मैं पढ़ता था—प्रेमचंद, दत्त भारती, कृष्ण चंदर और मंटो जैसे बड़े लेखकों को. जो भी मिला, अच्छा या बुरा, सब पढ़ा, यहां तक कि पुराने अखबार भी.”
1982 में उन्होंने अपने पिता की दुकान पर काम शुरू किया. उनके एक भाई अमेरिका में एक दवा कंपनी में काम करने चले गए थे, इसलिए उन्होंने और दूसरे भाई ने दुकान संभाली.
लेखन और प्रेरणा
भारती की लेखन यात्रा 1980 के आसपास शुरू हुई और इसकी शुरुआत उनके बहुत निजी और सामाजिक अनुभवों से हुई. उन्होंने हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर में बिताए समय को याद किया, जहां वे ब्यास-सतलुज लिंक परियोजना में काम करते थे. वहां उन्होंने जाति के आधार पर भेदभाव देखा और खुद महसूस भी किया. इसका उन पर गहरा असर पड़ा.
इसी समय उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी. उस समय के सामाजिक और राजनीतिक माहौल, खासकर कांशीराम के आंदोलन, का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा.
उन्होंने बताया कि उनकी पहली कविता प्रवासी मजदूरों पर थी, खासकर उत्तर प्रदेश से आने वाले मजदूरों पर—वे कैसे रेलवे प्लेटफॉर्म पर अस्थायी और अनिश्चित जीवन जीते थे.
उन्होंने कहा, “कुछ आते थे, कुछ चले जाते थे, कुछ पीछे छूट जाते थे या नज़रअंदाज़ कर दिए जाते थे और कुछ वहीं ज़मीन पर पड़े रहते थे, संघर्ष के चक्र में फंसे हुए.”
उन्होंने इस कविता का नाम रखा, “हम अभी थके नहीं” और बाद में यह एक पंजाबी अखबार में प्रकाशित हुई.
लेकिन उन्होंने कभी अपने पुश्तैनी काम, मोची का काम, नहीं छोड़ा और न ही उन्हें ऐसा करने की ज़रूरत महसूस हुई.
उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह सिर्फ एक काम है, किसी भी दूसरे काम से अलग नहीं. मेरा लेखन कभी पैसे के लिए नहीं था; मैंने इसे बेचने की कोशिश नहीं की.” उनके लिए यह एक ऐसी जगह है जहां विचार खुलकर जी सकते हैं.
चालीस साल बाद, वे पंजाबी दलित लेखकों की रचनाओं को इकट्ठा करने और व्यवस्थित करने के अपने महत्वपूर्ण काम के लिए पहचाने जाते हैं. यह काम उनकी किताब Yuddharat Aam Aadmi: Punjabi Sahitya Mein Dalit-Kalam (“संघर्ष करता आम आदमी: पंजाबी साहित्य में दलित लेखन”) में दिखाई देता है.
कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने 1984 में होशियारपुर में अपनी दुकान से कुछ ही दूरी पर डॉ. आंबेडकर मेमोरियल लाइब्रेरी की स्थापना की. आज इस लाइब्रेरी को उनके दोस्त प्रीतम राम गोमर चलाते हैं और इसमें 600 से ज्यादा किताबें हैं, जो वर्षों में दान और खरीद के जरिए जुटाई गई हैं.
गोमर ने कहा, “इस संग्रह में पंजाबी, हिंदी और अंग्रेज़ी की किताबें हैं और एक पूरा हिस्सा केवल दलित साहित्य को समर्पित है. लाइब्रेरी का उद्देश्य दलित लेखकों के लिए एक अलग जगह बनाना था. उस समय होशियारपुर में यह अपने तरह की पहली लाइब्रेरी थी.”
हर दिन करीब 18–20 छात्र लाइब्रेरी में ट्यूशन के लिए आते हैं और वीकेंड पर यहां कंप्यूटर क्लास भी होती है.

करीब 1987 में भारती ने अपने दो दोस्तों के साथ मिलकर बोद्ध धर्म प्रचारक नाम की एक मासिक पत्रिका शुरू की. उनके एक दोस्त रमेश सिद्धू इसके संपादक बने. दूसरे दोस्त कृष्ण कुमार बोधी ने इस पूरे प्रोजेक्ट का विचार दिया था.
पत्रिका के हर अंक में उनके द्वारा लिखे गए कम से कम दो लेख और एक संपादकीय शामिल होता है.
उन्होंने कहा, “देशभर के लेखक अपने लेख मुझे डाक या मेल से भेजते हैं ताकि उन्हें प्रकाशित किया जा सके. 1987 से अब तक पत्रिका का एक भी अंक छूटा नहीं है.”
एक बागी मोची
भारती ने अपनी दुकान की अलमारी खोली और सावधानी से वह फाइल निकाली जिसमें वे अपने सभी ज़रूरी कागज़ रखते हैं. जब वे एक खास कागज ढूंढते हुए उसे पलट रहे थे, तो वे पुराने पत्र पढ़ने के लिए रुक गए—ऐसे संदेश, जिनमें कभी संस्थानों ने उनके काम को पहचाना था या उनसे मार्गदर्शन मांगा था.
हर पत्र पुरानी यादों को वापस ले आता है, जैसे अतीत के छोटे-छोटे खजाने.
इनमें IGNOU के पत्र भी हैं, जिनमें उन्हें एम.ए. के दलित साहित्य पाठ्यक्रम के विकास में योगदान देने के लिए बुलाया गया था. 26 मार्च 2002 के एक पत्र में दूसरे वर्ष के छात्रों के लिए “भारतीय दलित साहित्य” पर मॉड्यूल बनाने की योजना का ज़िक्र है, जिसमें कई भाषाओं की रचनाओं को एक साथ लाने वाले कोर्स को तैयार करने में उनकी भूमिका बताई गई है. 18 अगस्त 2003 के एक अन्य पत्र में फिर उनकी विशेषज्ञता मांगी गई और उन्हें लेखकों की समिति की बैठक में बुलाया गया, ताकि पाठ्यक्रम की सामग्री और ढांचे को अंतिम रूप दिया जा सके.
उन्होंने कहा, “ये सभी कागज लंबे समय तक इधर-उधर बिखरे पड़े थे. अब मैंने इन्हें संभालकर रखना शुरू किया है.”
2019 में उनकी आत्मकथा Mochi: Ek Mochi Ka Adbi-Jindaginama जालंधर के बूट मंडी स्थित नवचेतना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुई. बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद A Rebellious Cobbler (2024) नाम से हुआ.
यह किताब उनके लगभग छह दशक के जीवन की कहानी बताती है, जिसे जाति, मेहनत और लगातार पढ़ते रहने की आदत ने आकार दिया. यह दिखाती है कि मोची के रूप में उनके अनुभवों ने उनकी पहचान और विचारों को कैसे बनाया.
यूट्यूब पर एक समीक्षक ने इस आत्मकथा को “एक खुलासा” बताया, जबकि पीएचडी शोधार्थी लवली भाटिया और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर दीपाली धौल जैसे शिक्षाविदों ने “Reclaiming Voice and Identity Through Translation: An Analysis of Dwarka Bharti’s A Rebellious Cobbler” शीर्षक से शोध पत्र लिखा है, जिसमें उनकी जीवन कहानी को दलित लेखन और अनुवाद पर बड़े विमर्श से जोड़ा गया है.

अपनी रचनाओं के अलावा भारती ने अनुवादक के रूप में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उन्होंने ओमप्रकाश वाल्मीकि के प्रसिद्ध आत्मकथात्मक उपन्यास Joothan: An Untouchable’s Life को पंजाबी भाषा के पाठकों तक पहुंचाया.
इस अनुवाद के साथ-साथ उनकी अपनी किताबें—Dalit Darshan, Hindutva ke Durg, और Mashaalchi—उन्हें एक निडर आवाज के रूप में स्थापित करती हैं.
भारती ज्यादातर निबंध लिखते हैं, जिन्हें वे गहराई से पढ़ाई करके खुद तैयार करते हैं. उनकी एक किताब Rashtra, Rashtravad aur Ambedkarvaad में कई सोचने पर मजबूर करने वाले निबंध शामिल हैं—जैसे “Is RSS Necessary?”, “Dalits in the Constitution,” “Ambedkar and Politics,” “Seven Years of Hindutva Violence,” और “Buddhism” आदि.
पढ़ने, लिखने और जूते बनाने के अलावा उन्हें फिल्में देखना भी पसंद है. हाल ही में उन्होंने धुरंधर फिल्म देखी और कहा कि यह ऐसी फिल्म है जिस पर दर्शकों को गहराई से सोचना चाहिए, खासकर इसकी राजनीति पर. उन्होंने बताया कि फिल्म काफी लंबी है—इतनी कि उन्हें इसे तीन बार में देखना पड़ा.
उन्हें आमतौर पर दक्षिण भारतीय सिनेमा पसंद है. उनके पसंदीदा अभिनेताओं में से एक विजय सेतुपति हैं, जिनकी एक्टिंग उन्हें बहुत पसंद है.
अपमान
भारती को वह दिन साफ-साफ याद है. परीक्षा के बाद उनके गणित के शिक्षक ने उन्हें पूरी कक्षा के सामने बुलाया. शिक्षक ने उनकी उत्तर पुस्तिका मेज पर फेंकी और उनके पिता के पेशे के बारे में पूछा, लेकिन वे एक शब्द भी नहीं बोल पाए. उनकी जगह एक सहपाठी ने जवाब दिया, “सर, ये जूते बनाते हैं. ये मोची हैं.”
इसके बाद जो हुआ, वह अपमानजनक था.
शिक्षक ने भारती के बाल पकड़कर जोर से खींचा, लेकिन उस दिन उनके बालों में तेल लगा था, इसलिए शिक्षक की पकड़ फिसल गई. गुस्से में उन्होंने अपने तैलीय हाथ भारती की सफेद शर्ट पर पोंछ दिए. “कितना तेल लगाया है…भागो यहां से! अपने पिता के साथ जूते बनाओ. पढ़कर क्या करोगे?” उन्होंने जातिसूचक गाली का इस्तेमाल करते हुए कहा.

जब भारती ने शिक्षक की आंखों में देखा, तो उन्हें ‘नफरत का लावा’ दिखाई दिया—सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि उस समुदाय के लिए जिससे वे आते थे. जब उन्होंने पूरी कक्षा की ओर देखा, तो हर छात्र उन्हें ही देख रहा था.
उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा, “उसने सदियों पुरानी नफरत एक ही बार में मेरे मासूम अस्तित्व पर उड़ेल दी. पूरी कक्षा मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं कोई घुसपैठिया हूं—पहली बार.”
77 साल की उम्र में वे नास्तिक और नारीवादी हैं और आंबेडकरवादी विचारधारा के अनुसार जीवन जीते हैं. वे ऐसे विचारक हैं जो मानते हैं कि शादी एक ऐसी संस्था है जो अक्सर महिलाओं की आजादी को सीमित कर देती है.
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि एक महिला को हर चीज पर सवाल करना चाहिए—या फिर नास्तिक होना चाहिए—बजाय किसी धर्म को आंख बंद करके मानने के.”
उन्होंने एक बेटी को गोद लिया था, जो अब 25 साल की है और दुबई में काम करती है. जब उसने उनसे कहा कि वह शादी नहीं करना चाहती, तो उन्होंने कभी विरोध नहीं किया.
फिर भी भारती अपनी कमियों के बारे में भी ईमानदार हैं. उन्होंने माना, “पहले मैंने अपनी पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया; मैंने उन्हें बहुत परेशानी दी, लेकिन नारीवादी लेखकों को पढ़ने से मेरा नजरिया बदल गया. इसका मतलब यह नहीं कि मुझे अब गुस्सा नहीं आता—आता है, लेकिन मैंने उसे नियंत्रित करना सीख लिया है, उसे बाहर नहीं आने देता.”
उन्हें एक घटना याद है जब वे बस में सफर कर रहे थे और किसी ने उनसे पूछा कि वे क्या काम करते हैं.
उन्होंने कहा, “मैंने कहा कि मेरी एक दुकान है. फिर उन्होंने पूछा कैसी दुकान, तो मैंने कहा कि मैं जूते बेचता हूं. यह मानना अभी भी थोड़ा मुश्किल लगता है कि मैं मोची हूं, क्योंकि लोग इस पेशे को तुरंत छोटा समझने लगते हैं.”
व्यक्तित्व के प्रति उनका सम्मान इस बात में भी दिखता है कि वे देश और उसकी राजनीति को कैसे देखते हैं. वे खुद को भारतीय कहते हैं, अपने देश से प्यार करते हैं, लेकिन खुद को राष्ट्रवादी नहीं मानते.
भारती के लिए राष्ट्रवाद एक सीमित करने वाला लेबल है, जो एकरूपता थोपता है और नए विचारों या अलग-अलग सोच के लिए बहुत कम जगह छोड़ता है. यह विचार रवींद्रनाथ टैगोर के विचार से मिलता-जुलता है, जिन्होंने अपनी 1917 की किताब Nationalism में इसे ऐसी शक्ति बताया था जो व्यक्तित्व और सांस्कृतिक विविधता को दबा देती है और मानवीय रचनात्मकता से ऊपर राज्य की एकरूपता को रखती है.
वे जीवन के अंतिम पड़ाव में हैं, फिर भी जब वे बोलते हैं, तो उनके शब्दों में बीस साल के क्रांतिकारी जैसी आग होती है. उनकी उम्र तब साफ दिखाई देती है जब वे रोटी चबाते हैं—उनकी आंखें झुक जाती हैं, मुंह सिकुड़ जाता है, और हर कौर के साथ चेहरा छोटा सा लगता है.
उन्होंने कहा, “मैं जीवन के अंत तक लिखूंगा. शब्दों में चुभन होनी चाहिए, सवाल खड़े होने चाहिए, क्योंकि जब तक वे चुभेंगे नहीं, तब तक कोई जाति-रहित दुनिया के बारे में नहीं सोचेगा, जहां समानता, लिंग या सामाजिक भेदभाव से ज्यादा महत्वपूर्ण हो.”
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