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Friday, 15 May, 2026
होमफीचर138 डिग्रियां और सफर जारी—मिलिए दुनिया के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे पूर्व सैनिक से

138 डिग्रियां और सफर जारी—मिलिए दुनिया के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे पूर्व सैनिक से

पिछले तीन दशकों में दशरथ सिंह शेखावत 2,500 से ज्यादा परीक्षाएं दे चुके हैं और तीन पीएचडी, सात ग्रेजुएशन डिग्रियां, 46 पोस्टग्रेजुएट डिग्रियां और 23 डिप्लोमा हासिल कर चुके हैं.

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जयपुर: डाकिए की दस्तक अब पुष्पा कंवर के लिए कोई हैरानी की बात नहीं रही. उन्हें लगभग कभी यह जानने की उत्सुकता नहीं होती कि पैकेट में क्या है. यह न तो मनी ऑर्डर होता है और न ही कोई चिट्ठी. अक्सर उनके पास डाक टिकट लगे बड़े भूरे लिफाफे आते हैं, जिनमें किताबें भरी होती हैं. यह इस बात का संकेत होता है कि उनके पति दशरथ सिंह शेखावत, जिन्हें “डिग्री मैन” कहा जाता है, ने एक और कोर्स में दाखिला ले लिया है.

राजस्थानी पारंपरिक कपड़ों में अपने जयपुर स्थित घर में शेखावत के पास बैठीं कंवर ने कहा, “जैसे ही डाकिया दरवाजा खटखटाता है, मुझे समझ आ जाता है कि मेरे पति फिर किसी क्लासरूम और नई डिग्री के पीछे लग गए हैं. डाकिया उस इंसान की नई खबरें लेकर आता है जिसने पढ़ाई करना कभी बंद नहीं किया.”

55 साल की उम्र में—भारतीय सेना से रिटायर होने के 22 साल बाद दशरथ सिंह की शिक्षा की तलाश अब एक अनोखे रिकॉर्ड में बदल चुकी है: 138 डिग्रियां, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट. उनकी सबसे नई डिग्री इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (IGNOU) से वैदिक स्टडीज में मास्टर्स है. युवावस्था में हाई एजुकेशन के सीमित मौके मिलने का असर आज तक उन पर है और यही वजह है कि वह लगातार एक के बाद एक डिग्री हासिल करते जा रहे हैं—फिलॉसफी, धर्म, पत्रकारिता, कानून, राजनीति, अर्थशास्त्र, डिजास्टर मैनेजमेंट, पीस स्टडीज, वास्तु शास्त्र, वैदिक स्टडीज से लेकर लेबर लॉ तक. उन्हें रोक पाना मुश्किल है. पिछले तीन दशकों में वह 2,500 से ज्यादा परीक्षाएं दे चुके हैं और तीन पीएचडी, सात ग्रेजुएशन डिग्रियां, 46 पोस्टग्रेजुएट डिग्रियां, 23 डिप्लोमा, सैन्य अध्ययन से जुड़ी सात डिग्रियां और 53 सर्टिफिकेट कोर्स हासिल कर चुके हैं. सिंह के लिए ये डिग्रियां सिर्फ उनके रिज्यूमे में जुड़ने वाली चीजें नहीं हैं. ये उनके ज्ञान की भूख और ज़िंदगी भर सीखते रहने के मिशन का हिस्सा हैं.

जयपुर स्थित अपने घर में दशरथ सिंह शेखावत | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
जयपुर स्थित अपने घर में दशरथ सिंह शेखावत | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

उनकी यात्रा लगातार पढ़ाई और समाज सेवा का अनोखा मेल दिखाती है. वह आज भी पढ़ाई कर रहे हैं, वकालत करते हैं और सैनिकों को मुफ्त कानूनी सहायता भी देते हैं.

शेखावत राजस्थान के झुंझुनूं जिले के ऐतिहासिक शहर नवलगढ़ के रहने वाले हैं और फिलहाल जयपुर में रहते हैं.

अपने ड्रॉइंग रूम में बैठे शेखावत ने कहा, जहां उनके पीछे सेना के दिनों में मिले मेडल लगे हुए थे, “मैं डिग्री के लिए नहीं, ज्ञान के लिए पढ़ाई करता हूं. यही ज्ञान मुझे समाज की सेवा करने में मदद करता है. जब किसी इंसान के पास पर्याप्त ज्ञान नहीं होता, तभी वह गलतियां करता है. इसलिए मैं हर विषय के बारे में सीखना चाहता हूं और यह केवल पढ़ाई से ही संभव है.”

उनके घर की दीवारें पिछले तीन दशकों की उपलब्धियों से भरी हुई हैं. ये उपलब्धियां उनके नाम ज़रूर हैं, लेकिन पूरा परिवार भी इन्हें अपनी उपलब्धि मानता है.

कंवर ने कहा, “हम उनकी उपलब्धियों और इस पूरे सफर के गवाह हैं. हमने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वह अपनी पढ़ाई की वजह से पहचाने जाएंगे, लेकिन अब उनकी दशकों की मेहनत रंग ला रही है और देशभर में हज़ारों लोग उन्हें जानते हैं.” उन्होंने कहा कि जब भी वह अखबार में उनका नाम देखती हैं, तो उन्हें गर्व महसूस होता है.

स्थानीय सेलिब्रिटी बन चुके हैं

कई सालों से शेखावत को इतनी डिग्रियां हासिल करने की वजह से पहचान और लोकप्रियता मिल रही है, लेकिन हाल ही में अपने पिता की पुण्यतिथि पर झुंझुनूं के अपने गांव खीरोड़ जाने का अनुभव कुछ अलग था.

15 अप्रैल को जब वह गांव जाते समय पिलानी टोल प्लाजा पार कर रहे थे, तब उनके साथ एक सेलिब्रिटी जैसा पल हुआ. टोल प्लाजा पर काम करने वाले लोग उन्हें पहचान गए. उन्होंने कहा, “आप को तो हम जानते हैं. आपके पास ही सबसे ज्यादा डिग्री है ना.” यह अनुभव खुद शेखावत के लिए भी नया था. कर्मचारियों ने उन्हें बिना टोल दिए जाने का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. कर्मचारियों ने फीस तो ली, लेकिन उससे पहले उनके साथ सेल्फी ज़रूर खिंचवाई.

उन्होंने चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ कहा, “ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई सेलिब्रिटी हूं.”

स्थानीय अखबार अक्सर शेखावत को सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे सैनिक के रूप में बताते हैं. “डिग्री मैन” ने इन अखबारों की कटिंग्स अपने फोन में संभालकर रखी हुई हैं.

एक हेडलाइन में लिखा था—“भारत का सबसे पढ़ा-लिखा इंसान, डिग्रियां इतनी कि गिन नहीं पाएंगे.” दूसरी हेडलाइन थी—“खीरोड़ का दशरथ बना देश का सर्वाधिक डिग्रीधारी सैनिक, पेड़ के नीचे पढ़कर शुरू की कामयाबी की कहानी.”

अब उनके नाम 11 वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज हैं. इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, दुनिया का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा व्यक्ति और एक इंसान द्वारा सबसे ज्यादा यूनिवर्सिटी डिग्रियां हासिल करने जैसे रिकॉर्ड. इन सभी सर्टिफिकेट्स में शेखावत की तस्वीर है—या तो सेना की यूनिफॉर्म में या फिर वकील की ड्रेस में.

उनका दावा है कि उन्हें अनगिनत मौकों पर सम्मानित किया जा चुका है, लेकिन उनकी सबसे खास याद 2018 की है, जब जयपुर स्थित उनके घर पर सम्मानित करने के बाद पूरे शहर में रैली निकालकर उन्हें घुमाया गया था. उसी समय वह दुनिया के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे व्यक्ति बने थे. वह एक खुली जीप में खड़े होकर शहर घूम रहे थे, लोग उन्हें फूल-मालाएं पहना रहे थे और सैकड़ों बाइक उनकी रैली के पीछे चल रही थीं.

बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार के साथ दशरथ सिंह शेखावत की एक फाइल फोटो
बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार के साथ दशरथ सिंह शेखावत की एक फाइल फोटो

शेखावत ने अपने फोन में उस रैली का वीडियो दिखाते हुए कहा, “मैं वह दिन कभी नहीं भूलूंगा. वह मेरी ज़िंदगी का सबसे अच्छा दिन था, जब हज़ारों लोग मेरी उपलब्धियों का जश्न मनाने सड़कों पर उतरे थे.”

डिग्री मैन की लाइफ में एक और खास दिन भी आया था. उन्हें एक सुपरहीरो का फोन आया था.

दस साल पहले, मई 2016 में, शेखावत को एक अनजान नंबर से कॉल आया. दूसरी तरफ बॉलीवुड अभिनेता मुकेश खन्ना थे. उन्होंने कहा, “मैं मुकेश खन्ना बोल रहा हूं, शक्तिमान वाला.” शेखावत को लगा कि यह फर्जी कॉल है और उन्होंने फोन काट दिया, लेकिन खन्ना ने दोबारा फोन किया और फिर जयपुर स्थित उनके घर भी पहुंचे.

घर पहुंचकर खन्ना ने शेखावत से कहा, “मैं यह देखने आया हूं कि सेना का एक व्यक्ति इतनी सारी डिग्रियां कैसे हासिल कर सकता है.”

2016 में जब शेखावत का नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ, तब सचिन तेंदुलकर ने उन्हें बधाई दी थी. वहीं 2018 में अक्षय कुमार ने उन्हें फोन करके जैसलमेर के सूर्यगढ़ पैलेस में मिलने के लिए बुलाया था.

शेखावत का दावा है कि उस समय राजस्थान बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी ने उन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भी दिया था. हालांकि, बाद में बात आगे नहीं बढ़ सकी.

एक दूर का सपना

सिंह के सीखने के जुनून के पीछे संघर्ष और अभावों से भरी लंबी कहानी है. उस समय उनके गांव खीरोड़ में शिक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था. उन्होंने मैट्रिक पास की और 1988 में भारतीय सेना में भर्ती हो गए. सिंह शेखावाटी क्षेत्र से आते हैं, जहां से बड़ी संख्या में युवा सेना में जाते हैं.

उन्होंने कहा, “आर्थिक तंगी की वजह से कॉलेज की पढ़ाई मेरे लिए बहुत दूर का सपना थी. मेरे पास पैसे नहीं थे, लेकिन पढ़ाई करने की इच्छा थी.” शेखावत ने सेना में रहते हुए असम से 12वीं पूरी की थी. उनकी पहली डिग्री बैचलर ऑफ कॉमर्स (बीकॉम) थी.

पत्नी कंवर ने बताया कि नौकरी के दौरान सिंह अपनी दो महीने की सालाना छुट्टी किताबों में डूबकर बिताते थे और परिवार से ज्यादा पढ़ाई को प्राथमिकता देते थे.

शेखावत ने कहा, “मेरे पास पढ़ाई और परीक्षा के लिए वही समय होता था. मुझे पता है कि वह समय मुझे परिवार को देना चाहिए था, लेकिन मेरा ध्यान ज्ञान हासिल करने के अपने जुनून पर था.” उन्होंने 16 साल सेना में सेवा देने के बाद 2004 में रिटायरमेंट लिया था.

अपनी उपलब्धियों के लिए कई बार सम्मानित हो चुके शेखावत. यहां राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ
अपनी उपलब्धियों के लिए कई बार सम्मानित हो चुके शेखावत. यहां राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ

घर लौटने के बाद उन्होंने जयपुर के एक स्कूल में चार साल तक फिजिकल एजुकेशन टीचर के तौर पर पढ़ाया. 2009 में उन्होंने एलएलबी और एलएलएम किया और राजस्थान हाई कोर्ट में वकालत शुरू की. उन्होंने पुलिस एसआई, स्कूल टीचर और 2013 में राजस्थान एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (आरएएस) जैसी सरकारी परीक्षाएं भी पास कीं, लेकिन कभी नौकरी जॉइन नहीं की. वह सिस्टम के बाहर रहकर लोगों की मदद करना चाहते हैं.

138 डिग्रियां

धर्म, राजनीति, अर्थशास्त्र, डिजास्टर मैनेजमेंट से लेकर वैदिक अध्ययन तक, शेखावत की रुचि बहुत अलग-अलग विषयों में है. उन्होंने जैन विश्व भारती संस्थान से जैन धर्म में तीन डिग्रियां हासिल की हैं. उन्होंने इग्नू से हिंदू स्टडीज में मास्टर्स भी किया, जहां उन्होंने वेदों के बारे में पढ़ाई की.

शेखावत, जो अब जामिय मिल्लिया इस्लामिया से इस्लामिक स्टडीज में एम.ए. कर रहे हैं, उन्होंने कहा, “मैंने जो सीखा है, वह यह कि कोई भी धर्म हिंसा और बुरी चीज़ों की बात नहीं करता. सभी धर्म शांति और भाईचारे की बात करते हैं.”

अपने पास रखी बुद्ध की छोटी मूर्ति, जिसे वह शांति का प्रतीक मानते हैं, के साथ बैठे शेखावत ने कहा कि अब वह खुद को ईसाई धर्म और बौद्ध धर्म को समझने में लगाना चाहते हैं.

शेखावत ने कहा कि उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों के लगभग सभी पारंपरिक कोर्स किए हैं और एचआईवी, वास्तु शास्त्र, ज्योतिष, भगवद गीता और ह्यूमन वैल्यूज जैसे अलग विषयों में भी पढ़ाई की है. अब उनका अगला लक्ष्य एआई से जुड़े कोर्स करना है.

उन्होंने कहा, “अलग-अलग विषयों का ज्ञान हासिल करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि इच्छा, पद और प्रतिष्ठा का असली मतलब नहीं है. सबसे जरूरी है इंसान को समझना.” उन्होंने यह बात अरविंदो के उस दर्शन का ज़िक्र करते हुए कही, जिसमें आत्मा को जानने पर जोर दिया गया है.

“डिग्री मैन” ने डॉ. बी. आर. आंबेडकर के बारे में बात करते हुए कहा कि हाल के समय में समाज ने बाबा साहेब को सिर्फ आरक्षण तक सीमित कर दिया है.

उन्होंने कहा, “लेकिन उनकी सोच अपने समय से बहुत आगे थी. उन्होंने अर्थव्यवस्था, महिलाओं के मुद्दों, राजनीति में उनकी भूमिका और तय कामकाजी घंटों की बात की थी.”

हालांकि, राजस्थान यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह पिछले एक दशक से जयपुर में वकालत कर रहे हैं.

व्यस्त दिनचर्या के बावजूद वह आज भी पढ़ाई के लिए 3-4 घंटे निकाल लेते हैं. उनका दिन सुबह 4 बजे शुरू होता है.

उन्होंने कहा, “मैं उस समय का इस्तेमाल पढ़ाई और परीक्षा के लिए नोट्स बनाने में करता हूं.” शेखावत डॉ. आंबेडकर की इस बात को मानते हैं—“शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा.”

जयपुर स्थित शेखावत के घर में रखी उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों की शेल्फ | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
जयपुर स्थित शेखावत के घर में रखी उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों की शेल्फ | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

वह खुद को सनातनी और हिंदू मानते हैं, लेकिन साथ ही सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु भी हैं. उन्होंने कहा, “मुझे चिंता है कि सभी धर्मों में लोग असहिष्णु होते जा रहे हैं और दूसरे विचारों को जगह नहीं दे रहे हैं.” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इसके बावजूद हिंदू धर्म इस्लाम से ज्यादा सहिष्णु है.

शिक्षा की तलाश के इस पूरे सफर में शेखावत को लोगों के ताने भी सुनने पड़े.

उन्होंने याद करते हुए कहा, “इतनी सारी डिग्रियां लेकर क्या फायदा होगा? इससे अच्छा तो कोई सरकारी नौकरी कर लेते.”

अपने आलोचकों के लिए शेखावत के पास सिर्फ एक जवाब है—“जो मेरे पास है, वह किसी और के पास नहीं है.”

एक फिल्म, एक प्रेरणा

2026 में सेना प्रमुख उपेंद्र द्विवेदी ने जयपुर में 78वें सेना दिवस पर रिटायरमेंट के बाद बेहतरीन सेवा देने वाले छह पूर्व सैनिकों को अनुभवी उपलब्धि पुरस्कार से सम्मानित किया. शेखावत भी उनमें शामिल थे.

भारतीय सेना की पोस्ट में लिखा था, “नाइक दशरथ सिंह शेखावत (रिटायर्ड) एक योग्य वकील हैं, जो रिटायर्ड सैनिकों को कोर्ट मामलों में मुफ्त कानूनी सहायता देते हैं. अब तक वह लगभग 2,500 मामलों का सफल समाधान कर चुके हैं.”

शेखावत अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं जिन्होंने सेना में सेवा दी. उनके दादा ने 1948 का युद्ध लड़ा था और उनके पिता ने 1962 में चीन के खिलाफ तथा 1965 और 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ा था. शेखावत 1988 में राजपूत रेजिमेंट की 9वीं बटालियन में भर्ती हुए और ट्रेनिंग के बाद 1990 में पंजाब भेजे गए, जब राज्य आतंकवाद से लड़ रहा था.

लेकिन बंदूकें भी उनका ध्यान कलम से नहीं हटा सकीं.

जिस फिल्म का शेखावत पर सबसे ज्यादा असर पड़ा, वह थी दामिनी. वे मानते हैं कि फिल्म में सनी देओल के किरदार से प्रेरित होकर ही उन्होंने वकील बनने और ताकतवर लोगों के खिलाफ लड़ने का फैसला किया.

वकालत के अपने एक दशक से ज्यादा लंबे करियर में शेखावत ने सैकड़ों लोगों की बिना फीस लिए मदद की है. वह फिलहाल भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड के सीनियर लीगल एडवाइजर हैं.

शेखावत ने कहा कि उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों के लगभग सभी पारंपरिक कोर्स किए हैं और एचआईवी, वास्तु शास्त्र, ज्योतिष, भगवद गीता और ह्यूमन वैल्यूज जैसे अलग विषयों में भी पढ़ाई की है. अब उनका अगला लक्ष्य एआई से जुड़े कोर्स करना है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
शेखावत ने कहा कि उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों के लगभग सभी पारंपरिक कोर्स किए हैं और एचआईवी, वास्तु शास्त्र, ज्योतिष, भगवद गीता और ह्यूमन वैल्यूज जैसे अलग विषयों में भी पढ़ाई की है. अब उनका अगला लक्ष्य एआई से जुड़े कोर्स करना है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

राजस्थान हाई कोर्ट में शेखावत के सहयोगी अशोक खेतड़ी ने कहा, “वह सेना के परिवारों की कानूनी मामलों में मदद कर रहे हैं और उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जागरूक बना रहे हैं.”

उन्होंने कहा कि शेखावत ने अपना जीवन जनसेवा को समर्पित कर दिया है और उनके पास 1000 से ज्यादा केस हैं, जिनमें से लगभग 600 का निपटारा हो चुका है जबकि 400 केस अभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे हैं.

खेतड़ी ने कहा, “सरकार को उनके ज्ञान का सही तरीके से उपयोग करना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को फायदा मिल सके.”

शेखावत लोगों के अधिकारों के लिए कोर्ट के अंदर और बाहर दोनों जगह लड़ते हैं. उनके गांव खीरोड़ के पड़ोसी चुन्नी लाल ने एक घटना याद करते हुए बताया कि जब गांव वाले जमीन अधिग्रहण को लेकर सीमेंट फैक्ट्री के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, तब डिग्री मैन उनकी मदद के लिए आगे आए. करीब 2010 में नवलगढ़ में एक सीमेंट फैक्ट्री ने किसानों की जमीन अधिग्रहित की थी.

लाल ने कहा, “जिला कलेक्टर, सांसद और विधायकों को भेजे जाने वाले ज्ञापन तैयार करने में दशरथ ने हमारी मदद की और हमारे धरने में भी शामिल हुए.”

कीमत और बदलाव

शेखावत की 138 डिग्रियां एक बड़ी कीमत पर हासिल हुईं. वर्षों में जहां सर्टिफिकेट बढ़ते गए, वहीं कर्ज भी बढ़ता गया. हर नया कोर्स पिछले ईएमआई के सहारे चलता रहा.

शेखावत ने कहा, “मैंने अपनी गाड़ी, घर, खेती की ज़मीन और फसलों पर 13 अलग-अलग लोन लिए. पढ़ाई जारी रखने के लिए मैंने एलआईसी और मॉर्गेज लोन भी लिया.”

उन पर अभी भी 15 लाख रुपये का कर्ज बाकी है.

उन्होंने दावा किया, “अब मेरे बच्चे आर्थिक मदद कर रहे हैं क्योंकि वे वकील और सरकारी शिक्षक हैं, लेकिन अब तक मैं अपनी पढ़ाई पर करीब एक करोड़ रुपये खर्च कर चुका हूं.”

शेखावत ने अपने घर में जो पढ़ाई का माहौल बनाया, उसका असर उनके बच्चों पर भी पड़ा और उन्होंने शिक्षा की अहमियत समझी. बचपन से उन्होंने घर में किताबों के ढेर देखे और नेहरू, आंबेडकर से लेकर गांधी तक को पढ़ा.

डिग्री मैन के बड़े बेटे संदीप शेखावत ने कहा, “घर का शैक्षणिक माहौल हमें बेहतर इंसान बनाने में मददगार रहा. बचपन से ही हमारे घर में अलग-अलग विषयों पर चर्चा करने की परंपरा रही है.” उन्होंने बताया कि इतिहास में पिता की गहरी रुचि की वजह से उनका ध्यान खास तौर पर राजपूत इतिहास की तरफ गया.

संदीप ने अपने पिता को हर नई डिग्री के साथ बदलते हुए देखा है.

उन्होंने कहा, “समय के साथ और ज्यादा पढ़ाई करने के बाद उनके अंदर की सख्ती—जो सेना की पृष्ठभूमि से आई थी, धीरे-धीरे कम होती गई.”

शेखावत की बेटी अभिलाषा शेखावत ने 2023 की एक घटना याद की, जब पिता और बेटी ने “वाजपेयी मोमेंट” साझा किया. दोनों साथ बैठकर परीक्षा लिख रहे थे. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके पिता 1950 के शुरुआती दौर में कानपुर के डीएवी कॉलेज में साथ पढ़ते थे.

अभिलाषा ने कहा, “मैं एमए पॉलिटिकल साइंस की परीक्षा दे रही थी और वह एमए फिलॉसफी की परीक्षा लिख रहे थे. वह दिन मेरे लिए कभी न भूलने वाला है.” उन्होंने कहा कि आजकल लोग मोटिवेशनल स्पीकर्स को देखते और सुनते हैं.

उन्होंने कहा, “हमें इसकी ज़रूरत नहीं है. मेरे पिता ही सबसे बड़ी प्रेरणा हैं.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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