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Monday, 2 November, 2026
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टैलेंट शिफ्ट: टॉप सरकारी संस्थानों से प्राइवेट यूनिवर्सिटी का रुख क्यों कर रहे हैं टीचर्स

सरकारी संस्थानों के कई शिक्षक टॉप निजी यूनिवर्सिटियों का रुख कर रहे हैं. यह उन कैंपस के लिए चिंता की बात है, जहां देशभर से लाखों छात्र पढ़ने आते हैं.

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नई दिल्ली: दशकों से भारत की टॉप केंद्रीय यूनिवर्सिटियां और आईआईटी शिक्षकों और अकादमिक लोगों के लिए पसंदीदा जगह रही हैं, लेकिन हाल के वर्षों में अच्छी निजी यूनिवर्सिटियां बढ़ने के साथ काफी संख्या में शिक्षक इन संस्थानों से बाहर चले गए हैं. इस बदलाव की वजह हर प्रोफेसर के लिए अलग है. इनमें ज्यादा अकादमिक आजादी, काम करने की ज्यादा सुविधाजनक व्यवस्था और कुछ मामलों में बेहतर वेतन शामिल है. कई लोगों के लिए निजी यूनिवर्सिटियां केंद्रीय यूनिवर्सिटियों की उस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता देती हैं, जहां शिक्षक कई साल तक अस्थायी व्यवस्था में काम करता रहता है और स्थायी नौकरी मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिखती.

यह केंद्रीय यूनिवर्सिटियों और प्रमुख सरकारी संस्थानों के लिए चिंता की बात है, खासकर उन संस्थानों के लिए जो पहले से ही शिक्षकों की बड़ी कमी से जूझ रहे हैं. इनमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) भी शामिल हैं.

इस बात का कोई एक साथ मौजूद डेटा नहीं है कि सरकारी पैसे से चलने वाले संस्थानों से कितने शिक्षक निजी यूनिवर्सिटियों में गए हैं या यह चलन कब शुरू हुआ, लेकिन दिप्रिंट ने छह प्रमुख निजी संस्थानों—शिव नादर यूनिवर्सिटी, ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, अशोका यूनिवर्सिटी, क्रिया यूनिवर्सिटी, बिट्स पिलानी और एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा—के शिक्षकों की प्रोफाइल का विश्लेषण किया. इसमें अलग-अलग स्तरों पर करीब 100 प्रोफेसर ऐसे मिले, जिनका पहले सरकारी यूनिवर्सिटियों से संबंध रहा था. ये सभी लोग पिछले एक दशक में इन निजी संस्थानों में गए.

इनमें मैनेजमेंट के शिक्षक और आईआईएम बेंगलुरु के पूर्व निदेशक ऋषिकेश टी. कृष्णन भी शामिल हैं. वह इस साल अगस्त में अशोका यूनिवर्सिटी के कुलपति बने. कंप्यूटर वैज्ञानिक सुभाषिस बनर्जी 2023 में आईआईटी दिल्ली छोड़ने के बाद अशोका यूनिवर्सिटी से जुड़े. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के शिक्षक और आईआईटी दिल्ली के पूर्व निदेशक वी. रामगोपाल राव मार्च 2023 में बिट्स पिलानी में ग्रुप वाइस चांसलर के तौर पर शामिल हुए.

अन्य उदाहरणों में मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम की विशेषज्ञ सुमेधा चौहान शामिल हैं, जो 2019 में आईआईएम रोहतक से ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी चली गईं. अर्थशास्त्री आनंद शर्मा 2021 तक जिंदल यूनिवर्सिटी से जुड़ चुके थे. इससे पहले वह आईआईएम रोहतक और आईआईएम सिरमौर में पढ़ा चुके थे. क्रिया यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट के शिक्षक कृष्ण कुमार बालारमन आईआईटी जोधपुर से आए. वहां वह स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड एंटरप्रेन्योरशिप के प्रमुख थे और कम से कम 2022-23 तक संस्थान के शिक्षक भी रहे.

ये उदाहरण दिखाते हैं कि शिक्षकों का यह बदलाव लगभग सभी प्रमुख अकादमिक क्षेत्रों में हो रहा है. इनमें मानविकी और सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, कानून, वित्त और अकाउंटिंग शामिल हैं.

यह चलन राज्य की यूनिवर्सिटियों तक भी पहुंच सकता है, लेकिन इस विश्लेषण में सिर्फ केंद्रीय यूनिवर्सिटियों, आईआईटी और आईआईएम से निजी संस्थानों में जाने वाले शिक्षकों को शामिल किया गया है.

पहली पीढ़ी के आईआईटी में से एक के निदेशक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि यह बदलाव “बड़े पैमाने पर पलायन” के बजाय धीरे-धीरे हो रहा बदलाव है. इसके पीछे अलग-अलग लोगों की परिस्थितियां और कुछ निजी संस्थानों में मौजूद अवसर हैं.

उन्होंने कहा कि वरिष्ठ स्तर पर प्रमुख निजी यूनिवर्सिटियों में वेतन लगभग आईआईटी और टॉप केंद्रीय यूनिवर्सिटियों के बराबर है. उन्होंने कहा, “सभी निजी यूनिवर्सिटियां आईआईटी और केंद्रीय यूनिवर्सिटियों से टैलेंट को नहीं खींच रही हैं. ऐसी यूनिवर्सिटियां सिर्फ कुछ ही हैं. जो शिक्षक जा रहे हैं, वे टॉप सरकारी संस्थानों जैसा ही अकादमिक माहौल और लगभग उतनी ही सैलरी चाहते हैं, लेकिन साथ में ज्यादा लचीलापन भी चाहते हैं.”

शिक्षकों की जरूरत सिर्फ नई निजी यूनिवर्सिटियों तक सीमित नहीं है. भारत के प्रमुख निजी इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बिट्स) पिलानी, जिसकी स्थापना छह दशक से भी ज्यादा पहले हुई थी, को आईआईटी और दूसरे केंद्रीय फंड से चलने वाले संस्थानों के शिक्षकों से लगातार आवेदन मिलते रहते हैं, संस्थान के एक अधिकारी ने बताया.

अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “जब भी हम भर्ती के लिए विज्ञापन निकालते हैं, करीब 70-80 पदों के लिए हमें लगभग 10,000 आवेदन मिलते हैं. इतने सारे लोग जुड़ना चाहते हैं, वरिष्ठ और जूनियर दोनों शिक्षक…हमें समझ नहीं आता कि इतनी बड़ी संख्या को कैसे संभालें.”

आईआईटी के एक पूर्व निदेशक, जिन्होंने अपना नाम नहीं बताने को कहा, ने कहा कि पहले शिक्षक आमतौर पर रिटायरमेंट के बाद सरकारी संस्थानों से निजी संस्थानों में जाते थे, लेकिन अब बढ़ती संख्या में शिक्षक रिटायरमेंट से पहले ही यह बदलाव कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, “लोगों का 40 और 50 की उम्र में नौकरी छोड़कर जाना बिल्कुल नई बात है.”

ज्यादा आज़ादी, करिकुलम में फ्लेक्सिबिलिटी

कुछ एकेडेमिक्स के लिए, प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ का अट्रैक्शन इसलिए है क्योंकि वहां ज़्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है—कोर्स डिज़ाइन करने, इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च करने और कम इंस्टीट्यूशनल रुकावटों के साथ एकेडमिक इवेंट्स ऑर्गनाइज़ करने की आज़ादी.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर, जो अब आंध्र प्रदेश की क्रिया यूनिवर्सिटी में हैं, ने कहा कि उन्होंने यह बदलाव इसलिए किया क्योंकि इससे उन्हें कोर्स तैयार करने, रिसर्च करने और अकादमिक प्रोग्राम आयोजित करने की ज्यादा आजादी मिली.

प्रोफेसर ने कहा, “यहां बहुत ज्यादा बौद्धिक आजादी है, जिस तरह की आजादी को सरकारी यूनिवर्सिटियों में लगातार कम किया गया है.”

उदाहरण के लिए, प्रोफेसर ने कहा कि अब तक क्रिया यूनिवर्सिटी की पाठ्यक्रम समिति ने यूजीसी के दिशा-निर्देशों या राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुसार कोर्स की सामग्री में बदलाव करने के लिए कोई अनिवार्यता नहीं रखी है.

निजी यूनिवर्सिटियों में पाठ्यक्रम को लेकर ज्यादा आजादी की स्थिति कुछ पूर्व सरकारी यूनिवर्सिटी शिक्षकों की उन चिंताओं से अलग है, जो एनईपी 2020 के तहत पाठ्यक्रम में हुए बदलावों को लेकर हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर ने कहा कि एनईपी 2020 के तहत मुख्य विषयों से अलग ज्यादा कोर्स शामिल किए जाने से पाठ्यक्रम की गहराई कम हुई है. उनके अनुसार, पहले पाठ्यक्रम काफी सख्त और गहराई वाला था. प्रोफेसर ने कहा कि पाठ्यक्रम में किए गए बदलावों ने रिसर्च की गुंजाइश भी कम कर दी है.

प्रोफेसर ने कहा, “पहले सिलेबस का ढांचा शिक्षकों को अपनी पढ़ाई से जुड़े विषयों पर रिसर्च करने की अनुमति देता था. अब इसके लिए बहुत कम समय और गुंजाइश है. पाठ्यक्रम में गहराई की कमी भी निराश करने वाली है.”

सुभाषिस बनर्जी 2023 में अशोका यूनिवर्सिटी में स्थायी रूप से जाने से पहले तीन दशक से ज्यादा समय तक आईआईटी दिल्ली में रहे थे. उन्होंने कहा कि वह कंप्यूटर साइंस को पारंपरिक इंजीनियरिंग के इस्तेमाल से आगे ले जाना चाहते थे. वह कंप्यूटेशनल तरीकों का इस्तेमाल करके स्वास्थ्य, समाज, चुनाव, राजनीति और अर्थव्यवस्था का अध्ययन करना चाहते थे.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, “अशोका की मानविकी, सामाजिक विज्ञान और जीव विज्ञान में मजबूती मुझे पसंद आई. मैं यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर साइंस विभाग को बिल्कुल शुरुआत से बनाने के मौके से भी आकर्षित हुआ… जब मैं 2021 में यहां आया, तब विभाग में सिर्फ तीन लोग थे और उस समय की कुलपति मालविका सरकार ने मुझसे विभाग को विकसित करने और उसका पाठ्यक्रम तय करने को कहा. यह संस्थान बनाने से जुड़ी एक रोमांचक भूमिका थी.”

शिव नाडर यूनिवर्सिटी में काम कर रहे दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक पूर्व प्रोफेसर ने दिप्रिंट को बताया कि निजी संस्थानों में रिसर्च से जुड़े सफर के लिए भी कम सरकारी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है.

प्रोफेसर ने कहा, “रिसर्च के लिए यात्रा करने पर हमें जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसी जगहों पर जरूरी होने वाली तरह-तरह की सरकारी मंजूरियों से नहीं गुजरना पड़ता.”

दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिशा-निर्देशों के तहत शिक्षकों को किसी सम्मेलन में जाने के लिए यात्रा का आवेदन कम से कम दो महीने पहले देना होता है. यात्रा के लिए आर्थिक मदद के आवेदन में पूरा पेपर, सम्मेलन का कार्यक्रम या ब्रोशर और विस्तार से लिखा हुआ निमंत्रण पत्र शामिल करना जरूरी है.

कुछ प्रोफेसरों का यह भी कहना है कि निजी यूनिवर्सिटियां बेहतर रिसर्च फंडिंग देती हैं. हालांकि इस बात को लेकर राय अलग-अलग है, खासकर आईआईटी जैसे संस्थानों के मामले में.

एक पूर्व आईआईटी प्रोफेसर, जो अब एक निजी यूनिवर्सिटी में हैं, ने कहा कि कुछ शिक्षक सरकारी स्रोतों से “आगे भी रिसर्च फंड हासिल करने” की संभावना से आकर्षित हुए हैं.

प्रोफेसर ने कहा, “निजी संस्थान अब पूर्व छात्रों और दूसरे स्रोतों से तेजी से पैसा जुटा पा रहे हैं. इससे वे आंतरिक फंडिंग योजनाओं और शुरुआती रिसर्च ग्रांट के जरिए रिसर्च को समर्थन दे पा रहे हैं. इससे शिक्षकों को केवल सरकारी फंड पर निर्भर हुए बिना लैब और रिसर्च सुविधाएं बनाने का मौका मिलता है.”

हालांकि, पहले बताए गए पूर्व आईआईटी प्रोफेसर, जो एनसीआर की एक निजी यूनिवर्सिटी में चले गए थे, ने कहा कि आईआईटी में रिसर्च के लिए संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधा काफी ज्यादा है. प्रोफेसर ने कहा कि निजी यूनिवर्सिटियों का दान पर निर्भर रहना एक सीमा हो सकता है, क्योंकि दान देने वाले लोग अक्सर “रिसर्च की तुलना में शिक्षा के नतीजों को ज्यादा आसानी से समझ पाते हैं.”

नेतृत्व, शिक्षकों की नियुक्ति और प्रशासनिक काम को लेकर चिंताएं

संस्थानों के नेतृत्व से असंतोष, विभागों की स्वायत्तता को लेकर चिंताएं और शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता पर सवाल भी ऐसे कारणों के रूप में सामने आए, जिन्होंने सरकारी संस्थानों में शिक्षकों के अनुभव को प्रभावित किया.

आईआईटी के एक पूर्व प्रोफेसर ने कहा कि नेतृत्व से असंतोष भी एक कारण था, जिसकी वजह से कुछ शिक्षक निजी संस्थानों में जाने के बारे में सोचने लगे.

प्रोफेसर ने कहा, “लगभग सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों और केंद्र से पैसा पाने वाले संस्थानों का नेतृत्व अब ऐसे लोग कर रहे हैं, जो यूजीसी और मंत्रालय की ओर से आने वाले सभी आदेशों और नियमों को बिना किसी सवाल या तर्क के मान लेते हैं, भले ही वे संस्थान के लिए सही न हों. यह एक और समस्या बन गई है, जिससे कई प्रोफेसर अपने नेतृत्व और संस्थानों के चलाए जाने के तरीके से असंतुष्ट हैं.”

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर, जो अब शिव नादर यूनिवर्सिटी में हैं, ने कहा कि सरकारी विश्वविद्यालयों के विभागों का संस्थान के फैसले लेने में धीरे-धीरे अधिकार कम होता गया है. इसमें शिक्षकों की नियुक्ति भी शामिल है.

प्रोफेसर ने कहा, “ऐसे मामले सामने आए हैं, जब कुलपतियों ने शिक्षकों की नियुक्ति समितियों के लिए बाहरी विशेषज्ञों के चयन को लेकर विभागों की सिफारिशों को खारिज कर दिया. नियुक्तियों का कोई सिर-पैर नहीं है. यह तय करने का कोई तर्क नहीं है कि किसी की नियुक्ति कैसे होती है.”

सरकारी विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को प्रशासन से जुड़े ऐसे काम भी करने पड़ते हैं, जिनमें उनका काफी समय चला जाता है और शोध के लिए समय कम बचता है. क्रिया यूनिवर्सिटी के एक शिक्षक ने कहा कि राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद यानी नैक की मान्यता और राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग ढांचा यानी एनआईआरएफ रैंकिंग से जुड़ा काम सरकारी विश्वविद्यालयों में शिक्षकों को दिया जाता है, जबकि निजी विश्वविद्यालयों में इन कामों के लिए अलग टीमें होती हैं.

शिक्षक ने कहा, “नैक की मान्यता और एनआईआरएफ के लिए शिक्षकों को बहुत सारा डेटा से जुड़ा काम दिया जाता है, लेकिन इसके लिए उन्हें कोई औपचारिक श्रेय नहीं मिलता. इसमें शिक्षकों का वह समय चला जाता है, जिसका इस्तेमाल उन्हें शोध के लिए करना चाहिए.”

‘एड-हॉक व्यवस्था’ से परेशान: निजी विश्वविद्यालय ‘पहली पसंद नहीं’

कुछ ऐसे शिक्षकों के लिए, जिन्होंने निजी विश्वविद्यालयों का रुख किया, वहां जाना उनकी पसंद नहीं थी. उन्होंने कहा कि उनका फैसला इस वजह से हुआ क्योंकि उनके एड-हॉक पदों को स्थायी करने में बहुत ज्यादा देरी हो रही थी. उनका कहना है कि कई शिक्षक करीब एक दशक तक एड-हॉक पदों पर काम करते रहते हैं.

स्थायी शिक्षकों के मुकाबले एड-हॉक शिक्षकों की नियुक्ति अस्थायी आधार पर होती है. उन्हें अक्सर नौकरी की कम सुरक्षा, कम या तय न होने वाली तनख्वाह, कम वेतन वाली छुट्टियां और मातृत्व और मेडिकल सुविधाएं मिलने को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है. उनकी नियुक्ति को समय-समय पर फिर से बढ़ाना भी पड़ता है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक पूर्व प्रोफेसर ने कहा कि उन्होंने छह साल तक एड-हॉक आधार पर पढ़ाया. प्रोफेसर ने कहा, “2000 के शुरुआती वर्षों में एड-हॉक व्यवस्था बहुत ज्यादा थी. मैंने करीब 20 इंटरव्यू दिए, लेकिन राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा यानी नेट पास करने के बावजूद मुझे स्थायी नौकरी नहीं मिली. उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में अगर आप एड-हॉक शिक्षक थे तो शोध के लिए कोई मदद नहीं थी. पढ़ाने के घंटे भी काफी ज्यादा थे और शोध के लिए पर्याप्त समय नहीं बचता था. इसलिए मैंने विदेश जाने और पीएचडी करने का फैसला किया.”

प्रोफेसर ने कहा कि पीएचडी पूरी करने के बाद भारत लौटने से भी स्थायी नौकरी हासिल करना आसान नहीं हुआ. कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों की भर्ती के विज्ञापनों में तय उम्र सीमा बड़ी परेशानी बन गई. प्रोफेसर ने कहा कि निजी विश्वविद्यालय जाने का उनका फैसला “डिफॉल्ट” यानी मजबूरी में लिया गया फैसला था.

उन्होंने इसे “दोहरी मुश्किल” बताया. इसमें अस्थायी नौकरी में कई साल बिताने के बाद शिक्षक स्थायी नौकरी हासिल नहीं कर पाते और बाद में उम्र की सीमा के कारण कुछ पदों के लिए आवेदन करने के योग्य भी नहीं रहते.

स्थायी भर्ती में लंबे समय तक देरी के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय में एड-हॉक व्यवस्था बढ़ती गई. 2022 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में 4,200 से ज्यादा एड-हॉक शिक्षक थे. यह उसके कुल शिक्षकों का करीब 40 प्रतिशत था. अक्टूबर 2023 में विश्वविद्यालय ने कॉलेजों को एड-हॉक नियुक्तियां बंद करने और नियमित भर्ती को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर आभा देव हबीब ने कहा कि 2013-14 के आसपास कई प्रोफेसर परेशान हो गए थे, क्योंकि उन्हें प्रमोशन नहीं मिल रहा था.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “कई सालों तक स्थायी नियुक्तियां भी मुश्किल हो गई थीं, जिससे कई शिक्षक अनिश्चितता में काम कर रहे थे. जो लोग अकादमिक क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे थे, वे एक तरह की स्थिरता और मानसिक शांति चाहते थे. जब उन्हें कहीं और मौके मिले, तो वे चले गए.”

पूर्व यूजीसी अध्यक्ष सुखदेव थोराट ने कहा कि अनुभवी शिक्षकों का सरकारी से निजी विश्वविद्यालयों में जाना सरकारी पैसे से चलने वाले संस्थानों को और कमजोर कर सकता है. ये संस्थान पहले से ही खाली पदों और करियर में आगे बढ़ने में देरी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. उन्होंने कहा कि भर्ती की कमी और प्रमोशन रुके होने से शिक्षकों के लिए माहौल लगातार निराशाजनक होता जा रहा है.

उन्होंने कहा, “सरकार ने शिक्षकों की भर्ती न करके राज्य और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए पहले ही समस्याएं पैदा कर दी हैं. स्वीकृत पदों के मुकाबले बहुत ज्यादा पद खाली हैं. केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ऐसे भी सैकड़ों शिक्षक हैं, जिन्होंने असिस्टेंट प्रोफेसर से एसोसिएट प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर से प्रोफेसर बनने के लिए जरूरी योग्यता हासिल कर ली है, लेकिन विश्वविद्यालय उन्हें प्रमोशन देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं. कई लोग पांच, छह, सात या यहां तक कि आठ साल से इंतज़ार कर रहे हैं. यह भी एक कारण है कि लोग बाहर जा रहे हैं. शिक्षकों के लिए कुल मिलाकर स्थिति बहुत निराशाजनक हो गई है. अगर आपको अच्छे शिक्षक नहीं मिलेंगे, तो जाहिर है कि पढ़ाई की गुणवत्ता नीचे जाएगी.”

लेकिन ऐसा होने के बावजूद, निजी संस्थानों में जाना अपनी तरह की चुनौतियों के साथ आता है. कुछ शिक्षकों ने कहा कि निजी विश्वविद्यालय जाने का मतलब सरकारी विश्वविद्यालय के अनुभव के कुछ हिस्सों को छोड़ना भी है. निजी संस्थानों में गए कुछ प्रोफेसरों ने कहा कि उन्हें सरकारी विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में मिलने वाली विविधता की कमी महसूस होती है.

ऊपर जिन आईआईटी प्रोफेसरों का जिक्र किया गया है, उनमें से एक ने कहा, “आईआईटी में कक्षा के अंदर सामाजिक वर्ग, जाति और धर्म की जो विविधता है, उसकी मुझे निश्चित रूप से कमी महसूस होती है. निजी विश्वविद्यालयों में आमतौर पर एक जैसे सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि वाले छात्र ज्यादा आते हैं, जो बड़े स्तर पर अंग्रेज़ी बोलने वाले होते हैं. जब छात्र अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं, तो वे कक्षा में अलग-अलग नजरिए लेकर आते हैं और इससे पढ़ाई का अनुभव बेहतर होता है. यह शिक्षा का बहुत बड़ा हिस्सा है.”

क्या सैलरी इस बदलाव की वजह है?

आम तौर पर माना जाता है कि निजी विश्वविद्यालय केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों के मुकाबले ज्यादा सैलरी देते हैं. हालांकि, अलग-अलग संस्थानों और अलग-अलग नियुक्तियों में सैलरी अलग होता है. सरकारी विश्वविद्यालय आम तौर पर शिक्षकों के पद के हिसाब से तय वेतनमान का पालन करते हैं, जबकि निजी विश्वविद्यालयों में सैलरी की सार्वजनिक और एक जैसी व्यवस्था हमेशा उपलब्ध नहीं होती. इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना मुश्किल है.

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक पूर्व प्रोफेसर, जो अब एक निजी विश्वविद्यालय में हैं, ने कहा कि वेतन काफी हद तक व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर तय होता है. इससे वेतन में अंतर की गुंजाइश रहती है.

प्रोफेसर ने कहा, “वेतन के लिए कोई साफ ग्रेड तय नहीं है. लोग सिर्फ इस आधार पर वेतन तय कर रहे हैं कि वे कितनी अच्छी तरह बातचीत कर सकते हैं.” उन्होंने कहा कि उन्होंने पाया कि उनसे दो साल बाद नौकरी में आए एक सहकर्मी को उनसे ज्यादा वेतन मिल रहा था.

इन चिंताओं के बावजूद, कई शिक्षकों ने कहा कि निजी विश्वविद्यालयों में उन्हें ज्यादा वेतन मिलता है या ऐसी सुविधाएं मिलती हैं, जो वेतन के अंतर को पूरा करने में मदद करती हैं.

केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात के एक पूर्व शिक्षक, जो अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक निजी विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं, ने कहा, “अगर ज्यादा वेतन नहीं भी है, तो रहने की सुविधा और कैंपस में घर की सफाई जैसी दूसरी मुफ्त सेवाएं उस अंतर को पूरा कर देती हैं. इसके अलावा, केंद्र सरकार अब पेंशन नहीं दे रही है, इसलिए वह आकर्षण भी अब नहीं रहा.”

केंद्र ने 2004 में नए केंद्रीय विश्वविद्यालय शिक्षकों के लिए पुरानी पेंशन योजना की जगह अंशदायी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली यानी एनपीएस लागू कर दी थी. अब नए शिक्षकों को वह गारंटीड पेंशन नहीं मिलती, जो पहले भर्ती हुए शिक्षकों को मिलती थी.

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में रहने के लिए सीमित आवास हैं, इसलिए सभी शिक्षकों को कैंपस में विश्वविद्यालय का घर नहीं मिल पाता. हालांकि, इसके बदले उन्हें मकान किराया भत्ता यानी एचआरए मिलता है. एचआरए शहर की श्रेणी के आधार पर उनके मूल वेतन का 10 से 30 प्रतिशत तक होता है.

हबीब ने चेतावनी दी कि अनुभवी शिक्षकों का निजी संस्थानों की ओर जाना सरकारी पैसे से चलने वाले विश्वविद्यालयों के भविष्य के नेतृत्व को प्रभावित कर सकता है.

उन्होंने कहा, “अगर यह जारी रहा, तो भविष्य का अकादमिक नेतृत्व सरकारी पैसे से चलने वाले विश्वविद्यालयों के पास नहीं रहेगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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