Wednesday, 1 February, 2023
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अगर पाठ्यक्रम ‘राष्ट्रीय हित’ में नहीं है, तो पढ़ा नहीं सकते- UGC के विदेशी यूनिवर्सिटी के नियम से परेशान हुए शिक्षाविद

भारत में आने वाले विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए यूजीसी के मसौदे नियमों में लिखा है कि वे 'राष्ट्रीय हित' को खतरे में डालने वाले पाठ्यक्रम नहीं पढ़ा सकते हैं. लेकिन इसका अर्थ क्या है, इसे लेकर कुछ भी साफ-साफ नहीं कहा गया है.

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नई दिल्ली: भारत में कदम रखने वाली विदेशी यूनिवर्सिटीज ऐसे किसी भी पाठ्यक्रम की पेशकश नहीं कर सकती हैं जो ‘राष्ट्रीय हित को खतरे में डालते हों’. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भारत में परिसरों की स्थापना करने वाली विदेशी यूनिवर्सिटीज के लिए गुरुवार को मसौदा दिशानिर्देशों जारी किए थे. इन नियमों में एक खंड यह भी है.

हालांकि गाइडलाइन साफतौर पर नहीं बताती है कि इसका क्या मतलब है. दिप्रिंट ने जिन शिक्षाविदों से बात की, उन्होंने कहा कि इस विषय पर चर्चा होनी चाहिए और साथ ही इस बात पर भी स्पष्टता होनी चाहिए कि ‘राष्ट्रीय हित’ क्या है और विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए इसका क्या मायने हैं.

मसौदा दिशानिर्देशों में कहा गया है कि विदेशी उच्च शिक्षण संस्थान ‘अध्ययन के ऐसे किसी भी कार्यक्रम की पेशकश नहीं करेंगे जो भारत के राष्ट्रीय हित या भारत में उच्च शिक्षा के मानकों को खतरे में डालता हो’.

इसमें यह भी कहा गया है कि ऐसे विदेशी संस्थानों का संचालन ‘भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के विपरीत नहीं होगा’.

क्लॉज के बारे में पूछे जाने पर यूजीसी के अध्यक्ष एम. जगदीश कुमार ने गुरुवार को एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा था कि ‘इसकी ज्यादा गहराई में जाने की जरूरत नहीं है.’, लेकिन शिक्षाविदों का मानना है कि इसके बारे में और अधिक जानकारी दी जानी चाहिए.

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दिल्ली यूनिवर्सिटी में फैकल्टी मेंबर आभा देव हबीब ने कहा, ‘इस प्वाइंट को शिक्षाविदों को समझाया जाना चाहिए. मान लीजिए कि कल ‘जाति’ पर कोई कोर्स पढ़ाया जाने लगे या फिर मुगल शासक अकबर का महिमामंडन किया जाए, तो क्या इसे राष्ट्रीय हित के खिलाफ माना जाएगा?’


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‘अनसुना नहीं, लेकिन चर्चा की जरूरत’

जबकि कुछ शिक्षाविद मानते हैं कि ‘राष्ट्रीय हित’ खंड अभूतपूर्व नहीं है. लेकिन इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि यूजीसी के लिए इस क्लॉज का क्या अर्थ है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के प्रोफेसर श्रीकांत कोंडापल्ली ने कहा, ‘राष्ट्रीय हित क्लॉज जोड़ने की बात अनसुनी नहीं है … विकसित देशों में भी इसका चलन है. इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है.’

उन्होंने समझाते हुए कहा, ‘ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि देश की प्रतिष्ठा को किसी भी तरह से कोई नुकसान न पहुंचे. विश्व व्यापार संगठन (WTO) के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में शामिल देशों के लिए भी एक ऐसा ही एक क्लॉज है. जी-7 देश भी अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अपनी नीतियों में इस तरह के क्लॉज का इस्तेमाल करते हैं.’

कोंडापल्ली ने आगे कहा, ‘इस पर चर्चा होनी चाहिए कि इसमें क्या शामिल है और मुझे यकीन है कि इसे लेकर चर्चा की जाएगी. विदेशी यूनिवर्सिटीज इस पर स्पष्टता चाहते हैं कि उनके लिए इसका क्या अर्थ है. हालांकि, कहा जा रहा है कि इस क्लॉज को किसी चीज पर प्रतिबंध लगाने के लिए जोड़ा गया है. लेकिन मुझे लगता है कि यह सुरक्षा के लिहाज से किया गया है.

नाम न छापने की शर्त पर एक इंटरनेशनल युनिवर्सिटी से जुड़े एक प्रोफेसर ने कहा कि भारत में कैंपस खोलने के इच्छुक विश्वविद्यालयों को इस सहित सभी खंडों की गहन जांच करनी चाहिए.

उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘सिर्फ इसलिए कि मसौदा इस खंड पर ज्यादा कुछ नहीं कहता है या फिर इसे लेकर साफतौर पर कुछ नहीं कहा गया है, इसका मतलब यह नहीं है कि संस्थानों को इसे हल्के में लेना चाहिए. विश्वविद्यालयों द्वारा पेश किए जाने वाले पाठ्यक्रमों पर इसका संभावित प्रभाव पड़ सकता है.’

शिक्षाविदों ने मसौदे के साथ जुड़े अन्य मुद्दों की तरफ भी इशारा किया है.

आभा देव हबीब ने विदेशी यूनिवर्सिटीज को भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति देने के पूरे विचार पर ही सवाल उठाया है.

उन्होंने कहा, ‘सरकार को सोचना चाहिए कि इन विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र कौन हैं? जाहिर तौर पर वे इसे उन गिने-चुने लोगों के लिए ला रहे हैं जो महंगी शिक्षा का खर्च उठा सकते हैं. इसके अलावा, छात्र दूसरे देशों में बसने के लिए और सिर्फ यूनिवर्सिटी के नाम के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों में जाते हैं. अगर आप परिसर को भारत में लाते हैं, तो कितने लोग इसमें शामिल होंगे?’

विदेशी विश्वविद्यालयों पर नियमों के मसौदे को यूजीसी की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है. आयोग ने 18 जनवरी तक फीडबैक मांगा है.

(संपादनः शिव पाण्डेय । अनुवादः संघप्रिया)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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