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Thursday, 3 September, 2026
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हरियाणा में 29 प्राइवेट यूनिवर्सिटी लेकिन DU-JNU में जगह न मिलने वाले छात्रों का बन रही हैं ठिकाना

प्राइवेट यूनिवर्सिटी की संख्या, राज्य की आबादी और इन संस्थानों की जगह को साथ रखकर देखें तो साफ पता चलता है कि हरियाणा की उच्च शिक्षा व्यवस्था असल में किन लोगों की जरूरत पूरी कर रही है.

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गुरुग्राम: हरियाणा विधानसभा ने मंगलवार को राज्य की सूची में दो और प्राइवेट यूनिवर्सिटी जोड़ने वाला बिल पास कर दिया. इसके साथ राज्य में प्राइवेट यूनिवर्सिटी की संख्या बढ़कर 29 हो जाएगी. राज्य की आबादी और इन संस्थानों की जगह को साथ रखकर देखें तो इससे साफ पता चलता है कि हरियाणा की उच्च शिक्षा व्यवस्था असल में किन लोगों की ज़रूरत पूरी कर रही है.

हरियाणा निजी विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 में हरियाणा निजी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2006 की अनुसूची में बदलाव किया गया है. इसमें कुसुम इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, रेवाड़ी और मास्टर्स यूनियन यूनिवर्सिटी, गुरुग्राम को क्रमशः 28 और 29 नंबर पर शामिल किया गया है.

बिल के उद्देश्य और कारणों में उच्च शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के 50 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात के लक्ष्य को पार करने के लिए राज्य को “2030 तक सभी स्तरों पर संस्थानों की संख्या को लगभग दोगुना करने” की जरूरत है. उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए सिर्फ सरकार की कोशिश “पर्याप्त नहीं होगी” और निजी क्षेत्र की भागीदारी “बड़े स्तर पर” ज़रूरी है.

इन दो नई यूनिवर्सिटी के जुड़ने के बाद 2011 की जनगणना के मुताबिक 2.53 करोड़ आबादी वाले हरियाणा में अब 12 राष्ट्रीय महत्व के संस्थान, 27 सरकारी यूनिवर्सिटी होंगी, जिनमें 24 राज्य और तीन केंद्रीय यूनिवर्सिटी हैं, और 29 प्राइवेट यूनिवर्सिटी होंगी.

कुछ दूसरे राज्यों से तुलना करें तो आबादी को ध्यान में रखने पर हरियाणा की 29 प्राइवेट यूनिवर्सिटी की संख्या काफी ज्यादा दिखाई देती है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, हरियाणा से थोड़ी ज्यादा 2.77 करोड़ आबादी वाले पंजाब में 16 प्राइवेट यूनिवर्सिटी हैं. भारत के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में करीब 20 करोड़ लोग हैं और वहां करीब 48 प्राइवेट यूनिवर्सिटी हैं—इनमें से करीब आठ दिल्ली के पास नोएडा में हैं.

दिल्ली का असर

दिप्रिंट ने हरियाणा निजी विश्वविद्यालय अधिनियम की अनुसूची की जांच की. इससे वही पैटर्न सामने आता है, जिसकी ओर जानकार लंबे समय से इशारा करते रहे हैं. अब सूची में शामिल 29 प्राइवेट यूनिवर्सिटी में से 12 गुरुग्राम जिले में, पांच सोनीपत में, तीन झज्जर में और दो फरीदाबाद में हैं. ये चारों हरियाणा के ऐसे जिले हैं, जिनकी सीमा दिल्ली से लगती है.

मंगलवार को जोड़ी गई दोनों नई यूनिवर्सिटी भी इसी एनसीआर इलाके में हैं. कुल मिलाकर अब 29 में से 25 यूनिवर्सिटी दिल्ली के पास वाले जिलों के बड़े इलाके में हैं. इनमें पानीपत, रेवाड़ी और रोहतक भी शामिल हैं.

अकेले गुरुग्राम जिले की सूची में 12 नाम हैं. इनमें एमिटी यूनिवर्सिटी, एस.जी.टी. यूनिवर्सिटी, एपीजे सत्य यूनिवर्सिटी, सुशांत यूनिवर्सिटी, बी.एम.एल. मुंजाल यूनिवर्सिटी, जी.डी. गोयनका यूनिवर्सिटी, के.आर. मंगलम यूनिवर्सिटी और अब मास्टर्स यूनियन यूनिवर्सिटी शामिल हैं.

ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, अशोका यूनिवर्सिटी, एसआरएम यूनिवर्सिटी और ऋषिहुड यूनिवर्सिटी सोनीपत के इस समूह की प्रमुख यूनिवर्सिटी हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी के मोती लाल नेहरू कॉलेज के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुए डॉ. सूरज भान भारद्वाज के मुताबिक, इन यूनिवर्सिटी का इस तरह एक जगह पर ज्यादा होना कोई संयोग नहीं है.

उन्होंने कहा कि जो छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय या दिल्ली के दूसरे कॉलेजों में दाखिला नहीं ले पाते, वे इसके बजाय हरियाणा के प्राइवेट संस्थानों का रुख करते हैं.

उन्होंने बताया कि सोनीपत, फरीदाबाद, गुरुग्राम, झज्जर, रोहतक, पलवल, नूंह, पानीपत और रेवाड़ी जैसे NCR के जिलों में उद्योग और IT के बढ़ने से इन इलाकों के परिवारों की प्राइवेट यूनिवर्सिटी की महंगी फीस देने की क्षमता बढ़ी है. उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ संस्थानों, जैसे अशोका और ओ.पी. जिंदल ग्लोबल, ने मजबूत शिक्षक और अच्छी पहचान बनाई है.

‘राज्य की यूनिवर्सिटी उस कमी को पूरा नहीं कर पाईं’

कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. महाबीर जगलान ने इससे भी ज्यादा साफ आकलन दिया.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि दिल्ली से नजदीकी सबसे बड़ा कारण है. देशभर से छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में दाखिला पाने के लिए राजधानी आते हैं. ये सभी केंद्रीय संस्थान हैं. इसके चलते हरियाणा के स्थानीय छात्रों की बड़ी संख्या को इन संस्थानों में जगह नहीं मिल पाती. उन्होंने कहा कि दिल्ली की दो राज्य यूनिवर्सिटी—अंबेडकर विश्वविद्यालय और इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय भी इन अतिरिक्त छात्रों को जगह नहीं दे पाई हैं.

उन्होंने कहा कि हरियाणा के पास अपनी मजबूत राज्य यूनिवर्सिटी तैयार करके इस कमी को पूरा करने का मौका था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.

उन्होंने कहा, “हरियाणा एक छोटा राज्य है और दिल्ली में दाखिला नहीं पाने वाले छात्रों के लिए यह एक बेहतर विकल्प बन सकता था. लेकिन शिक्षकों की कमी और राजनीतिक दखल के कारण हरियाणा की राज्य यूनिवर्सिटी में सीटें खाली रहती हैं, जबकि प्राइवेट यूनिवर्सिटी तेजी से बढ़ती जा रही हैं.”

उन्होंने कहा कि कई प्राइवेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई का स्तर अब भी खराब है. इनमें से कुछ बिना नियमित क्लास किए डिग्री दे रही हैं और ऐसे छात्रों को पास कर रही हैं जो बहुत कम पढ़ाई या कोर्सवर्क करते हैं.

जगलान ने इस चलन को सरकार की फंडिंग नीति से भी जोड़ा. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार सरकारी यूनिवर्सिटी को मिलने वाले अनुदान कम करती जा रही है. हाल के वर्षों में इनकी जगह अनुदान-सहायता दी जा रही है, जिन्हें संस्थानों को बाद में वापस करना पड़ता है. उन्होंने इसे उच्च शिक्षा को प्राइवेट सेक्टर के हाथों में देने की एक सोची-समझी कोशिश बताया.

उन्होंने कहा कि इसका सबसे ज्यादा असर शिक्षकों के पदों पर पड़ा है.

जगलान ने कहा कि राज्य की यूनिवर्सिटी में खाली शिक्षक पद चार साल से नहीं भरे गए हैं और अब सरकार इन पदों को ही खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. उन्होंने कहा कि सरकार की अपनी नीति के कारण ही ये पद पहले खाली रखे गए थे. उन्होंने यह भी बताया कि हरियाणा विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संगठन महासंघ फिलहाल इस कदम के खिलाफ आंदोलन कर रहा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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