नई दिल्ली: फ्रांस की एयर एंड स्पेस फोर्स चीन और रूस की मिसाइल प्रणालियों की बराबरी करने के लिए लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल बनाने पर जोर दे रही है. साथ ही वह ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना के अनुभव को भी समझ रही है. फ्रांसीसी वायुसेना के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल डोमिनिक टार्डिफ ने यह जानकारी दी.
टार्डिफ भारतीय वायुसेना के बहुराष्ट्रीय एयर कॉम्बैट एक्सरसाइज तरंग शक्ति के दूसरे एडिशन में हिस्सा लेने के लिए जोधपुर आए हुए हैं. उन्होंने सोमवार को चुनिंदा पत्रकारों के लिए हुई ब्रीफिंग के दौरान दिप्रिंट के सवालों के जवाब में यह बात कही. फ्रांस की तैनाती में राफेल लड़ाकू विमान भी शामिल हैं. ये विमान Mission Pégase 2026 का हिस्सा हैं. यह लंबी दूरी तक हवाई शक्ति दिखाने वाला एक मिशन है.
टार्डिफ ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य की छठी पीढ़ी की हवाई युद्ध प्रणालियों को लेकर भारत के साथ बातचीत की संभावना है. हालांकि, उन्होंने यह नहीं कहा कि दोनों देश Future Combat Air System (FCAS) पर साथ काम कर सकते हैं.
MBDA लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित करेगी
टार्डिफ ने कहा कि फ्रांस दूसरे देशों की लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलों के विकास पर करीब से नज़र रख रहा है. फ्रांस यूरोप की प्रमुख मिसाइल कंपनी MBDA के साथ मिलकर अपनी एयर-टू-एयर मिसाइलों की रेंज और क्षमता बढ़ाने पर पहले से काम कर रहा है. इसका मकसद चीनी और रूसी प्रणालियों, जैसे PL-15 और R-37, की बराबरी करना है.
टार्डिफ ने कहा, “हम अलग-अलग देशों में मिसाइलों के विकास पर नज़र रख रहे हैं. फ्रांस में हम इस पर करीब से नजर रख रहे हैं और MBDA के साथ इस पर चर्चा कर रहे हैं.” उन्होंने आगे कहा, “MBDA भी हमारी जरूरत के हिसाब से रेंज वाली मिसाइल विकसित करने पर काम कर रही है. इसमें कोई सवाल ही नहीं है.”
इन टिप्पणियों का महत्व इसलिए है क्योंकि यूरोप की Meteor मिसाइल, जिसका इस्तेमाल फिलहाल भारतीय वायुसेना, फ्रांस की एयर एंड स्पेस फोर्स और दूसरी यूरोपीय वायुसेनाएं करती हैं, दुनिया की सबसे सक्षम Beyond-Visual-Range यानी दिखाई देने वाली दूरी से बाहर मार करने वाली एयर-टू-एयर मिसाइलों में से एक मानी जाती है. हालांकि, इसकी प्रभावी रेंज करीब 150 किमी बताई जाती है. इसके मुकाबले कुछ चीनी, रूसी और अमेरिकी मिसाइलों की रेंज 300 किमी से ज्यादा है.
चीन द्वारा मिसाइलों के निर्यात के कारण पाकिस्तान के पास भी ऐसी एयर-टू-एयर मिसाइल है, जिसकी रेंज Meteor से ज्यादा है.
टार्डिफ ने नई मिसाइल की रेंज या उसे तैयार करने की समय-सीमा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी. उन्होंने कहा कि फ्रांस ने MBDA पर इसे तेजी से विकसित और तैयार करने के लिए “बहुत ज्यादा दबाव” डाला है.
उन्होंने कहा, “मैं इस समय आपकी रेंज से जुड़े सवाल का जवाब नहीं दे सकता. लेकिन हमने कंपनी MBDA पर इसे डिजाइन करने और बहुत तेजी से तैयार करने के लिए बहुत ज्यादा दबाव डाला है.”
उन्होंने संकेत दिया कि नई मिसाइल के लिए पूरी तरह से नई तकनीक या डिजाइन बनाने के बजाय मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है.
टार्डिफ ने कहा, “हमारे पास नई पीढ़ी की MICA जैसी डिजाइन हैं. हम इन तकनीकों को मिलाकर ज्यादा रेंज हासिल कर सकते हैं. भविष्य के डिजाइन के लिहाज से यह कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं है. मुझे इसकी कोई चिंता नहीं है.”
MICA फ्रांस की कम से मध्यम दूरी की, हर मौसम में इस्तेमाल की जा सकने वाली एयर-टू-एयर मिसाइल है. इसे MBDA बनाती है.
सिंदूर से मिली सीख
टार्डिफ ने कहा कि फ्रांस ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के अनुभव का अध्ययन कर रहा है. खास तौर पर इसलिए क्योंकि इस ऑपरेशन में हवाई अभियानों का स्तर और उनकी जटिलता काफी ज्यादा थी.
टार्डिफ ने कहा, “मुझे लगता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शायद हमने इस तरह की चीज़ नहीं देखी है. इसलिए भारतीय वायुसेना के पास कुछ बहुत दिलचस्प है.” उन्होंने ऑपरेशन के दौरान एक ही युद्ध क्षेत्र में काम कर रहे विमानों की संख्या का ज़िक्र करते हुए यह बात कही.
उन्होंने कहा कि फ्रांस की एयर एंड स्पेस फोर्स ऑपरेशन से मिली सीख को लेकर भारतीय वायुसेना के साथ चर्चा कर रही है. हालांकि, ऑपरेशन से जुड़ी संवेदनशील जानकारी के कारण दोनों पक्षों के बीच साझा की जा सकने वाली जानकारी की एक सीमा है.
उन्होंने कहा, “हम यह भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या किया गया. इसमें काफी समय लगेगा, क्योंकि अलग-अलग प्रणालियों के सभी रिकॉर्ड आपके पास होने चाहिए. फिर उनका विश्लेषण करना और समझना होगा. आप तुरंत कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते. विश्लेषण में समय लगता है.”
टार्डिफ ने आगे कहा, “तो हां, हमने भारतीय वायुसेना के साथ कुछ चर्चा की है, ताकि वे जो जानकारी साझा कर सकते हैं, उसे साझा कर सकें. क्योंकि कुछ सवाल बहुत संवेदनशील हैं. यह भारतीय वायुसेना का फैसला है. लेकिन निश्चित तौर पर यह सभी अलग-अलग वायुसेनाओं के लिए बहुत दिलचस्प चीज है.”
छठी पीढ़ी की एयर कॉम्बैट सिस्टम पर भारत-फ्रांस में चर्चा
टार्डिफ ने यह भी कहा कि भारत और फ्रांस भविष्य की छठी पीढ़ी की एयर कॉम्बैट तकनीक को लेकर चर्चा कर सकते हैं. उन्होंने इसे सिर्फ एक नए लड़ाकू विमान के बजाय एक बड़े कॉम्बैट सिस्टम के रूप में बताया.
उन्होंने कहा, “जब हम छठी पीढ़ी की बात करते हैं, तो यह सिर्फ छठी पीढ़ी के प्लेटफॉर्म की बात नहीं है. यह छठी पीढ़ी का एयर कॉम्बैट सिस्टम है.”
उन्होंने कहा कि ऐसी प्रणाली में इंसान द्वारा उड़ाए जाने वाले लड़ाकू विमान, बिना इंसान वाले प्लेटफॉर्म और दूसरे सेंसर एक साथ काम करेंगे. इससे वे एक ऐसे बेहद जुड़े हुए युद्ध सिस्टम का हिस्सा बन सकेंगे, जिसमें सभी के बीच जानकारी साझा की जा सकेगी.
उन्होंने कहा, “एक नया प्लेटफॉर्म, जिसमें पायलट मौजूद हो. लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं. हमें ड्रोन की भी जरूरत है.”
उन्होंने कहा कि चुनौती यह होगी कि लड़ाकू विमान, ड्रोन, सैटेलाइट और दूसरे सेंसर आपस में जानकारी साझा कर सकें और एक साथ काम कर सकें. यह काम ऐसे माहौल में भी हो, जहां इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्तर पर बहुत ज्यादा रुकावट और चुनौती हो.
टार्डिफ ने कहा कि भविष्य के हवाई युद्ध को लेकर भारत और फ्रांस का नजरिया काफी हद तक एक जैसा है.
उन्होंने कहा, “मैं समझता हूं कि भारतीय वायुसेना भी भविष्य को लेकर काफी रुचि ले रही है. और मुझे यकीन है कि हम दोनों बहुत समर्पित वायुसेनाएं हैं… इसलिए जब भविष्य के बारे में सोचने की बात आती है तो हमारी सोच एक जैसी है.”
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह छठी पीढ़ी के किसी कार्यक्रम में दोनों देशों के बीच सहयोग में बदल सकता है, तो टार्डिफ ने कहा कि किसी खास परियोजना पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी. हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि दोनों देश इस मुद्दे पर बातचीत जारी रख सकते हैं.
उन्होंने कहा, “यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन मैं आपसे इतना कह सकता हूं कि जब भविष्य के बारे में सोचने की बात आती है तो हमारी सोच एक जैसी है.”
उनकी यह टिप्पणी यूरोप के छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण समय पर आई है. फ्रांस और जर्मनी ने इस साल जून में Future Combat Air System (FCAS) पर साथ काम करने की अपनी योजना खत्म कर दी थी. दोनों देशों के बीच औद्योगिक नेतृत्व और काम के बंटवारे को लेकर कई साल से मतभेद थे.
भारत ने अलग से यह संकेत दिया है कि उसने फ्रांस की अगुवाई वाले FCAS प्रयास में शामिल होने के लिए कोशिश शुरू कर दी है. इस साल फरवरी में ThePrint ने सबसे पहले खबर दी थी कि भारत और फ्रांस FCAS परियोजना में संभावित सहयोग को लेकर बातचीत कर रहे हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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