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Saturday, 19 September, 2026
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नेपाल में सेना प्रमुख, अग्निपथ के तहत गोरखा भर्ती फिर शुरू करने की मांग फिर तेज़

नेपाल के पूर्व सैनिक और भर्ती के इच्छुक उम्मीदवार चाहते हैं कि काठमांडू भर्ती फिर से शुरू करने की अनुमति दे और उन पूर्व सैनिक संगठनों की मान्यता फिर से बहाल करे, जिनके नाम में ‘सैनिक’ शब्द शामिल है.

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नई दिल्ली: भारतीय सेना प्रमुख धीरज सेठ के चार दिन के दौरे पर नेपाल पहुंचने के साथ ही पूर्व गोरखा सैनिकों और सैन्य प्रशिक्षण ले रहे युवाओं की ओर से नेपाल के युवाओं की अग्निपथ योजना के जरिए भारतीय सेना में भर्ती फिर से शुरू करने की मांग तेज़ हो गई है.

उन्होंने औपचारिक रूप से बालेंद्र शाह सरकार से पिछली सरकार के उस फैसले को वापस लेने की मांग की है, जिसके तहत भारत द्वारा 2022 में अग्निपथ योजना शुरू किए जाने के बाद भर्ती रोक दी गई थी. काठमांडू का तर्क है कि इस योजना को उससे सलाह किए बिना शुरू किया गया था और यह भारत, ब्रिटेन और नेपाल के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन करती है.

यह समझौता 1 मई 1947 को हुआ था और उसी साल बाद में इसे मंजूरी दी गई थी. इसमें नेपाल के नागरिकों को मूल सेनाओं के सदस्यों के समान व्यवहार देने का भरोसा दिया गया था.

पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों की सभा को आयोजकों ने विरोध प्रदर्शन के बजाय एक “शांति रैली” बताया. इस रैली का आयोजन इंडियन एक्स-सर्विसमैन गोरखा ब्रिगेड, नेपाल-पोखरा ने किया था. पोखरा वह जगह है जहां सैनिकों की भर्ती के लिए ट्रेनिंग होती है. यहां देश का सबसे पुराना सैन्य प्रशिक्षण केंद्र भी है.

आयोजकों ने स्थानीय जिला प्रशासन के जरिए दो मांगों वाला ज्ञापन सौंपा. इसमें काठमांडू से भर्ती फिर शुरू करने की अनुमति देने और उन पूर्व सैनिक संगठनों की मान्यता फिर से बहाल करने की मांग की गई, जिनके नाम में “सैनिक” शब्द शामिल है.

पोखरा में पूर्व सेना संघ के प्रमुख टंका बहादुर घले ने दिप्रिंट से कहा, “नेपाल के ऐसे युवा अभी प्रशिक्षण ले रहे हैं जो भारतीय सेना में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन नेपाल सरकार उन्हें इसकी अनुमति नहीं देती. हम सिर्फ यह मांग कर रहे हैं कि भर्ती प्रक्रिया फिर से शुरू की जाए.”

नेपाली गोरखाओं ने दो शताब्दियों से ज्यादा समय से भारतीय सेना में सेवा की है. भर्ती एंग्लो-नेपाली युद्ध के बाद शुरू हुई और ब्रिटिश शासन के दौरान भी जारी रही. 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद, ब्रिटिश भारतीय सेना की छह गोरखा रेजिमेंट भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के तहत भारतीय सेना का हिस्सा बन गईं.

कई पीढ़ियों से भारत में सैन्य सेवा न केवल नेपाली परिवारों के लिए रोजगार का एक साधन बनी, बल्कि दोनों देशों के बीच सबसे मजबूत संस्थागत संबंधों में से एक भी रही.

1.22 लाख से ज्यादा नेपाल के नागरिकों को भारतीय सरकार से सेना में अपनी सेवा के लिए पेंशन मिलती है. ये पेंशन और वेतन नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं. कुछ अनुमानों के अनुसार, पेंशन पाने वालों को भेजी जाने वाली रकम देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 3 प्रतिशत है.

नेपाली युवाओं की भर्ती की प्रक्रिया 2020 के आसपास कमजोर पड़ने लगी, जब कोविड-19 महामारी ने इस प्रक्रिया को प्रभावित किया. इसके बाद 2022 में भारत ने अग्निपथ योजना शुरू की, जो सैनिकों की भर्ती का एक बिल्कुल अलग मॉडल था.

भारत ने सशस्त्र बलों में भर्ती में सुधार के लिए यह योजना शुरू की. इसमें साढ़े 17 से 21 साल की उम्र के युवाओं को चार साल के लिए भर्ती किया जाता है. इसका उद्देश्य योग्यता के आधार पर चयन के जरिए सेना की तैयारी को मजबूत करना है. भारत चाहता है कि उसकी सेनाएं ज्यादा तकनीक आधारित और युवा हों. हालांकि, इस योजना ने भारतीय सेना की मशहूर गोरखा रेजिमेंट में नेपाली युवाओं की सदियों पुरानी भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित किया है.

नेपाल के लिए इस बदलाव से यह सवाल खड़ा हुआ कि क्या गोरखा भर्ती को लेकर 1816 की सुगौली संधि के तहत बनी पुरानी व्यवस्था को एक अलग प्रणाली में भी जारी रखा जा सकता है. इसलिए नेपाल ने 2022 में भारत से भर्ती को तब तक रोकने को कहा, जब तक नेपाली युवाओं की भर्ती के भविष्य को लेकर ज्यादा स्पष्टता नहीं हो जाती. इसके बाद से कोई भी नेपाल में रहने वाला गोरखा नई व्यवस्था के तहत भारतीय सेना में शामिल नहीं हुआ है.

पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने इसी महीने की शुरुआत में दिप्रिंट से कहा था कि भारतीय सेना में गोरखाओं की भर्ती अग्निपथ योजना के आधार पर होगी और इस पर फैसला नेपाल सरकार को लेना है.

उन्होंने कहा था कि भारतीय और नेपाली दोनों भर्तियों के लिए सेवा की शर्तें एक जैसी होंगी. जनरल चौहान ने सवाल किया था, “हम भारतीयों की भर्ती अग्निपथ के तहत कैसे कर सकते हैं और नेपालियों के लिए अलग योजना कैसे रख सकते हैं?”

पूर्व सैनिक भर्ती फिर से शुरू क्यों कराना चाहते हैं

पोखरा में अभियान चला रहे सैनिकों के लिए चार साल की सेवा की अवधि इस मौके को ठुकराने की ज़रूरी वजह नहीं है.

रिटायर्ड गोरखा अधिकारी कर्नल डी. बी. थापा ने दिप्रिंट से कहा कि नेपाल के युवा पहले से ही अस्थायी रोजगार के लिए विदेश जाते हैं. उनके मुताबिक, भारत में सेना की नौकरी उन्हें इससे कहीं बेहतर सुविधाएं और समाज में ज्यादा सम्मान देती है.

उन्होंने कहा, “भारतीय सेना में सैनिक के तौर पर नौकरी सबसे अच्छी है और यह सबसे सम्मान वाली नौकरी है.”

रैली का समय भी महत्वपूर्ण है. नेपाल में अब बालेंद्र शाह की नई सरकार है. पूर्व सैनिकों को लगता है कि काठमांडू में सरकार बदलने से भर्ती के मुद्दे पर फिर से बात करने का रास्ता खुल सकता है.

थापा ने कहा कि आयोजकों ने पहले ही प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सुदन गुरंग को पत्र लिखकर भर्ती फिर से शुरू करने की मांग की है.

कर्नल थापा ने बताया कि पोखरा में हुई सभा का मुख्य उद्देश्य बड़े स्तर पर टकराव पैदा करना नहीं, बल्कि “सरकार को याद दिलाना” था. थापा के मुताबिक, करीब 500 से 600 पूर्व भारतीय सेना के जवान इसमें शामिल हुए.

इत्तेफाक से, जनरल सेठ की उच्चस्तरीय बैठकों में गोरखाओं की भर्ती भी चर्चा के मुद्दों में शामिल होगी, हालांकि, काठमांडू का अंतिम रुख अभी साफ नहीं है.

काठमांडू के लिए समस्या

हालांकि, नेपाल सरकार के लिए यह सवाल सिर्फ रोज़गार का नहीं है, बल्कि मामला इससे ज्यादा जटिल है. पुरानी भर्ती व्यवस्था में नेपाली सैनिकों को करीब 15 साल या उससे ज्यादा समय तक सेना में करियर मिलता था और इसके बाद पेंशन मिलती थी. अग्निपथ के तहत ज्यादातर भर्ती युवाओं को सिर्फ चार साल बाद घर लौटना होगा.

इसका असर सिर्फ सैनिक पर ही नहीं, बल्कि नेपाल के बड़ी संख्या में सैन्य पेंशन पाने वाले लोगों के समुदाय पर भी पड़ेगा.

इसलिए नेपाल को अग्निपथ से मिलने वाले तुरंत रोज़गार के अवसरों और नई व्यवस्था के तहत सेवा देने वाले अपने नागरिकों की लंबे समय की सुरक्षा और स्थिति को लेकर चिंताओं के बीच संतुलन बनाना होगा. वहीं, भारत का कहना है कि वह भारतीय नागरिकों के लिए एक और नेपाली नागरिकों के लिए दूसरी भर्ती व्यवस्था नहीं चला सकता.

जनरल चौहान की नियुक्ति 11वीं गोरखा राइफल्स में हुई थी. इसी तरह भारत के पहले सीडीएस जनरल बिपिन रावत भी गोरखा राइफल्स में थे.

पोखरा के रिटायर्ड सैन्यकर्मियों के लिए भर्ती को रोककर रखना इस रिश्ते के लिए खतरा है.

कर्नल थापा ने कहा, “काठमांडू को सिर्फ इसलिए इस मौके को नहीं ठुकराना चाहिए क्योंकि अग्निपथ चार साल की व्यवस्था है. अगर सरकार को कोई चिंता है तो उसे नई दिल्ली से बातचीत करके बदलाव की मांग करनी चाहिए, न कि भर्ती का रास्ता पूरी तरह बंद कर देना चाहिए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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