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शिव कुमारा स्वामी की फाइल फोटो | खास व्यवस्था से प्राप्त.
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बेंगलुरू: शिवकुमारा स्वामी, टुम्कुरु स्थित मशहूर सिद्दगंगा मठ के मठाधीश की वृद्धावस्था के कारण मृत्यु हो गई है. वे 111 साल के थे. सोमवार सुबह उन्होंने आखिरी सांस ली. उन्हें जिगर के इंफेक्शन के चलते दिसम्बर 2018 में चेन्नई ले जाया गया था, जहां उनका लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था.

जैसे ही धर्मगुरू की नाज़ुक हालत की खबरों ने ज़ोर पकड़ा, भाजपा नेता बीएस येदुरप्पा और पार्टी नेता वी सोमन्ना तुरंत टुमकुरु उनकी स्वास्थ्य की जानकारी लेने पहुंचे. जनता दल (सेक्युलर) के प्रमुख एचडी देवगौड़ा और कांग्रेस के उप मुख्यमंत्री जी परमेश्वरा जो टुम्कुरु के ही रहने वाले हैं, भी उनसे मिलने पहुंचे थे.

उन्हें नादेदादुवा देवराज नाम से पुकारा जाता था, यानि जीता जागता भगवान. ये नाम उनके मानव सेवा के लिए मिला था. वे एक ऐसी धार्मिक हस्ती थे, जिन्होंने कर्नाटक की राजनीति में भी अहम भूमिका निभाई थी.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से नरेन्द्र मोदी तक, हर पार्टी के वरिष्ठ नेता जब भी बेंगलुरू में होते तो उनसे मिलने ज़रूर जाते.

बड़े काम के लिए जीये

अप्रेल 1, 1907 में पैदा हुए शिवकुमारा लिंगायत के समर्थक थे. वे 23 साल की उम्र में साधु बने. जब वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तब उनको शिक्षा के लिए अच्छे इंस्टीट्यूट के महत्व का अंदाज़ा हुआ, जो कि सभी समुदायों और वर्गों के छात्रों के लिए हो.

उन्होंने कम कमाई वालों के लिए एक मुफ्त बोर्डिंग स्कूल चलाया. ये स्कूल 60 सालों से चल रहा है और इसमें आज करीब 5-15 साल के 10,000 बच्चे पढ़ते हैं. मठ में दानदाताओं के पैसे से ये स्कूल चलता है. मठ कई इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज भी चलाता है.

अपने अंतिम दिनों में जब उनकी सेहत बिगड़ गई थी, तब भी वे सुबह 3 बजे उठ जाते थे. उनकी नज़र अब भी इतनी अच्छी थी कि वो मठ के बही खाते बिना चश्मे के देख लेते थे.

उन्हें 2015 में पद्म भूषण और कर्नाटक राज्य के सर्वोच्च पुरुस्कार- कर्नाटक रत्न से उन्हें उनके 100वें जन्मदिन पर नवाज़ा गया था. स्थानीय कांग्रेस और भाजपा नेता उनके लिए भारत रत्न की मांग करते रहे हैं.


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