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Thursday, 8 October, 2026
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Prahaar बनाने से पहले नाना पाटेकर ने सैनिक का किरदार निभाने के लिए सैन्य ट्रेनिंग ली थी

नाना पाटेकर की इकलौती निर्देशित फिल्म Prahaar: The Final Attack सैनिक की जानी-पहचानी छवि से आगे जाती है. यह सवाल उठाती है कि जब सैनिक के पीछे युद्ध का मैदान छूट जाता है, तब उसके साथ क्या होता है.

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नई दिल्ली: जब बॉलीवुड में ‘एंग्री यंग मैन’ का दौर था, तब नाना पाटेकर बॉलीवुड के गुस्से वाले सैनिक थे. उनकी इकलौती निर्देशित फिल्म Prahaar: The Final Attack में पाटेकर ने मेजर वी.एस. चव्हाण का किरदार निभाया था. यह एक ऐसे सैनिक की कहानी है जिसका गुस्सा अनुशासन, ड्यूटी और सैन्य जीवन की मुश्किलों से आता है, लेकिन यह किरदार सिर्फ एक स्क्रिप्ट से नहीं बनाया गया था. 1991 की यह फिल्म बनाने से पहले नाना पाटेकर प्रादेशिक सेना में शामिल हुए थे और सैनिक की तरह जीवन जीने का मतलब समझने के लिए बेलगावी में मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ ट्रेनिंग ली थी.

करीब एक दशक बाद, कारगिल लड़ाई के दौरान, वह फिर से वर्दी में लौटे. इस बार वह देश की सेवा करने के लिए फ्रंटलाइन पर गए.

फिल्म में जब मेजर चव्हाण को पहली बार दिखाया जाता है, तब वह ट्रेनिंग ग्राउंड में होते हैं. वह कैडेट्स को रस्सी पर चढ़ना, बाधाएं पार करना और आग के ऊपर से कूदना सिखा रहे होते हैं. उनके तरीके बहुत सख्त हैं क्योंकि उनके लिए सैन्य ट्रेनिंग का मतलब सैनिक के सीमा तक पहुंचने से पहले उसके अंदर के डर को खत्म करना है.

मराठा लाइट इन्फैंट्री रेजिमेंट में नए प्रशिक्षु पीटर डिसूजा का किरदार गौतम जोगलेकर ने निभाया है. पीटर, चव्हाण के सख्त नियमों से परेशान होता है और आखिर में कैंप छोड़ने का फैसला करता है. Chavan उसे रोकते हैं और फिल्म का एक मशहूर सिंगल-टेक मोनोलॉग बोलते हैं. वह पीटर से कहते हैं कि भागने से समाज, उसके परिवार और जिस महिला से वह प्यार करता है, उनकी नजर में वह कायर बन जाएगा.

लेकिन प्रहार सैनिक की उस जानी-पहचानी छवि से आगे जाती है, जिसमें वह देश के लिए खुद को कुर्बान कर देता है. यह सवाल उठाती है कि जब सैनिक के पीछे युद्ध का मैदान छूट जाता है, तब उसके साथ क्या होता है.

नाना पाटेकर और कारगिल युद्ध

एक ऑपरेशन के दौरान पीटर अपना पैर खो देता है और उसे ड्यूटी से हटा दिया जाता है. बाद में अपनी शादी के दिन स्थानीय Goans उसे मार देते हैं. उसकी मौत से चव्हाण बुरी तरह टूट जाते हैं, खासकर तब जब कोई भी आगे आकर गवाही देने के लिए तैयार नहीं होता. चव्हाण खुद मामले को अपने हाथ में लेते हैं और जिम्मेदार लोगों के पीछे जाते हैं. आखिर में उन पर अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगता है.

फिल्म का गुस्सा इसी विरोधाभास से आता है. सैनिकों से उम्मीद की जाती है कि वे अपनी जान देकर देश की रक्षा करें, लेकिन जब वे आम ज़िंदगी में वापस लौटते हैं, तो उनकी चोटें, आर्थिक परेशानियां, परिवार का दबाव और निजी लड़ाइयां अक्सर नज़र नहीं आतीं.

प्रहार के करीब आठ साल बाद कारगिल की लड़ाई के दौरान पाटेकर ने एक बार फिर सेना के साथ अपने जुड़ाव को महसूस किया. उस समय उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल वी.के. सिंह समेत सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया. वी.के. सिंह ने प्रहार में एक छोटा किरदार भी निभाया है. पाटेकर ने युद्ध में सेवा करने की अनुमति मांगी.

बाद में एक इंटरव्यू में पाटेकर ने याद किया कि वह युद्ध के दौरान सेना में शामिल होने के लिए बहुत इच्छुक थे. उन्होंने कहा, “मैं अच्छा शूटर था. मैंने 300 मीटर राइफल शूटिंग में राष्ट्रीय स्तर पर हिस्सा लिया था. मैंने वहां अच्छा प्रदर्शन किया था और Mavlankar (shooting championship) में कांस्य पदक जीता था.”

जब उन्हें बताया गया कि आम नागरिकों को सेना में नहीं लिया जा सकता, तो उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने उस समय के केंद्रीय रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस को फोन किया और उन्हें मनाने की कोशिश की.

पाटेकर ने याद करते हुए कहा कि उन्होंने उनसे कहा था, “एक नागरिक को छह महीने में कमीशन मिलता है, जबकि मैं पहले ही तीन साल की ट्रेनिंग ले चुका हूं.”

आखिरकार वह इंडियन आर्मी की एक खास यूनिट त्वरित प्रतिक्रिया टीम का हिस्सा बन गए. उन्होंने बताया कि उन्होंने दो महीने में 20 किलो वजन कम किया था. उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ हड्डी और चमड़ी रह गया था.”

कारगिल की लड़ाई के दौरान पाटेकर ने 60 दिन तक सेना में सेवा की. प्रहार बनाते समय उन्होंने जो अनुभव हासिल किए थे, वे अब उनकी अपनी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे.

पाटेकर का मेजर वी.एस. चव्हाण एक आम बॉलीवुड एक्शन हीरो की तरह नहीं बनाया गया था. हिंदी सिनेमा में सैनिकों को अक्सर बड़े और असाधारण किरदारों के रूप में दिखाया गया है, जो नामुमकिन काम कर देते हैं और देश के लिए सबसे बड़ा बलिदान देते हैं. इसके बजाय पाटेकर ने वर्दी के अंदर मौजूद इंसान पर ध्यान दिया. उसके अनुशासन, गर्व, गुस्से, रिश्तों, आर्थिक परेशानियों और उसके काम की वजह से उसके परिवार पर पड़ने वाले असर पर ध्यान दिया.

यह पाटेकर के एक्टिंग करियर का भी सबसे अच्छा दौर था. उन्होंने 1978 में फारूक शेख और स्मिता पाटिल के साथ गमन से शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने 1980 और 1990 के दशक के दौरान सलाम बॉम्बे!, गुलाम-ए-मुस्तफा, क्रांति वीर और तिरंगा जैसी क्रिटिक्स द्वारा पसंद की गई और प्रोफेशनल रूप से सफल फिल्मों में काम किया.

सेना के साथ उनका रिश्ता उनकी स्टारडम से अलग रहा. कई साल बाद भी पाटेकर सेना के लोगों के साथ अपने रिश्ते के बारे में बात करते रहे. इनमें अजित डोभाल भी शामिल हैं, जिन्हें उन्होंने अपना भाई बताया था.

उन्होंने कहा, “अजित डोभाल साहिब मेरे बड़े भाई जैसे हैं. इसे सिर्फ दोस्ती कहना गलत होगा. हमारा रिश्ता अलग तरह का है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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