scorecardresearch
Tuesday, 11 August, 2026
होमसमाज-संस्कृतिजलवायु परिवर्तन अब स्थायी है, ग्रह नहीं इंसानों को बचाने की ज़रूरत: पीपल बाबा

जलवायु परिवर्तन अब स्थायी है, ग्रह नहीं इंसानों को बचाने की ज़रूरत: पीपल बाबा

ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र गर्म और अम्लीय हो रहे हैं, जंगल जल रहे हैं—जलवायु संकट को पलटना शायद अब संभव नहीं, लेकिन अपने जीवन और आसपास के पर्यावरण को बचाने की कोशिश ज़रूर की जा सकती है.

Text Size:

जलवायु परिवर्तन अब स्थायी है

हम एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां हम जो हो चुका है उसे शायद बदल नहीं सकते, भले ही हम सच में ऐसा करना चाहें. ग्लेशियरों को चेतावनी मिल चुकी है, महासागर नाराज़ हो चुके हैं और वातावरण ने बातचीत बंद करने का फैसला कर लिया है. हम, जो इस मामले में सबसे देर से आने वाली प्रजाति हैं, अभी भी जलवायु सम्मेलन कर रहे हैं मानो पावरपॉइंट स्लाइड बादलों को मना लेंगी.

अब सबसे ज़रूरी है शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना. यही सक्रियता का नया रूप है. अपनी फेफड़ों को मज़बूत बनाओ, सहनशक्ति बढ़ाओ और मानसिक संतुलन बनाए रखो. क्योंकि जब भीषण गर्मी से सड़कें तपकर पिघल जाएँगी, तब आपको शारीरिक और दार्शनिक, दोनों तरह की तंदुरुस्ती की ज़रूरत होगी. जब अक्टूबर में तीन दिन बारिश हो और बर्फ़बारी गलत गोलार्ध में हो, तब आपको योग की ज़रूरत होगी, घबराहट की नहीं. शरीर ही आपका एकमात्र घर है जहाँ मौसम अनुकूल है, इसे स्वस्थ रखें.

अगर आप बाहर की घटनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते, तो भीतर से तैयारी करें. और फिर, अपने दायरे में रहकर जो कर सकते हैं, वह करें. अपने घर, बालकनी, छत, गली, दफ्तर के कोने, कारखाने के प्रांगण, स्कूल-कॉलेज, सड़कों को हरा-भरा बनाएं.

‘ग्रह को बचाओ’ जैसे नारों से विचलित न हों. ग्रह को आपके बचाव की ज़रूरत नहीं है. यह 45 करोड़ वर्षों से अस्तित्व में है. हिमयुग, ज्वालामुखी विस्फोट और उल्कापिंडों के हमले जैसी आपदाओं से बच चुका है. बचाने की ज़रूरत तो इंसानों को है.

कभी-कभी, पीपल के नीचे बैठे हुए, मुझे ऐसा लगता है कि प्रकृति ने अपना मन बना लिया है. उसने कुछ जीवों को छांटने का फैसला कर लिया है.

नानी कहा करती थीं, ‘प्रकृति के अपने नियम होते हैं.’ वे जलवायु रिपोर्ट या आईपीसीसी की रिपोर्ट नहीं पढ़ती थीं, फिर भी अधिकांश विशेषज्ञों से कहीं अधिक जानती थीं. वे नदी में बाढ़ या सूखे को लंबे समय तक बने रहने पर कहतीं, ‘अब प्रकृति अपना हिसाब कर रही है.’ यहाँ तक कि मेरे माता-पिता भी, जब भी मैं पुणे में उनसे मिलने जाता हूँ, यही बात कहते हैं : ‘बेटा, प्रकृति का अपना विवेक होता है. वह वही करेगी जो सभी जीवों के लिए अच्छा होगा.’

हम साढ़े बारह मिलियन अन्य प्रजातियों में से केवल एक प्रजाति हैं. प्रकृति हमेशा हमारे प्रति पक्षपातपूर्ण नहीं रह सकती. हमारे पारिस्थितिक खाते में अत्यधिक निकासी हो चुकी है, और अब व्यवस्था हमें चेतावनी दे रही है—समुद्र का बढ़ता स्तर, जलते जंगल, लुप्त होते पक्षी. खाता अब निष्क्रिय होने की कगार पर है.

वैज्ञानिकों ने अत्यंत धैर्य के साथ इसकी व्याख्या की है. कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 420 पार्ट्स प्रति मिलियन से ऊपर है, जो पिछले 40 लाख वर्षों में सबसे अधिक है. महासागर किसी भी ज्ञात युग की तुलना में अधिक तेज़ी से अम्लीय हो रहे हैं. ग्रीनलैंड की बर्फ़ की चादर प्रति वर्ष 250 गीगाटन पिघल रही है. ये मात्र संख्याएँ नहीं हैं; ये प्रकृति के त्यागपत्र हैं.

चारों ओर देखिए. लोग घबरा नहीं रहे हैं, बल्कि यात्राओं की योजना बना रहे हैं. जलवायु परिवर्तन ने यात्रा के नए-नए तरीके पैदा कर दिए हैं. आइसलैंड में हिमनद पर्यटन. ग्रेट बैरियर रीफ में प्रवाल-विरंजन की फोटोग्राफी. यहां तक ​​कि अफ्रीका में ‘अंतिम मौका सफारी’ भी, ताकि प्रजातियों को विलुप्त होने से पहले देखा जा सके. एक अजीब विडंबना : हम जलवायु परिवर्तन को उलट नहीं रहे हैं; बल्कि उसे रोमांटिक बना रहे हैं. सर्वनाश पर्यटन फल-फूल रहा है. मनुष्य ही एकमात्र ऐसी प्रजाति है जो अपने पर्यावास को नष्ट कर सकती है और फिर खंडहरों को निहारने के लिए गाइडेड टूर बुक कर सकती है.

हम सच्चाई को नकारने में माहिर हैं. हम उन एयर कंडीशनरों से भी बड़े एयर कंडीशनर बनाते हैं जिन्हें बनाने में उन्होंने ख़ुद ही मदद की है. हम रेगिस्तानों में घास लगाते हैं, उपजाऊ ज़मीन पर कंक्रीट डालते हैं और फिर सोचते हैं कि भूजल क्यों गायब हो गया. हम बोतलबंद पानी ख़रीदते हैं और प्लास्टिक कचरे की शिकायत करते हैं. हम ‘गो ग्रीन’ अभियान चलाते हैं जिनके बैनर पीवीसी फ्लेक्स शीट से बने होते हैं.

मुझे लगता है कि प्रकृति ने रीसेट बटन दबा दिया है. उसने तापमान को इतना बढ़ने देने का फैसला किया है कि हम डाल से गिर जाएं. हम कभी इस ग्रह के स्वामी नहीं थे; हम तो किराएदार थे, जिन्होंने किराया नहीं चुकाया था. जिन जंगलों को हमने जलाया, जिन नदियों को प्रदूषित किया, जिस मिट्टी को उजाड़ दिया, वे अब अपनी जगह वापस ले रहे हैं. कोविड तो बस एक झलक थी, एक छोटा-सा संकेत कि एक वायरस पूरी प्रजाति को रोक सकता है. पूरी फिल्म अभी बन रही है.

जो संभव हो, वह करें. एक पेड़ लगाएं. अपने कचरे का खाद बनाएं. साइकिल चलाएं. किसी पक्षी को दाना खिलाएं. बागवानी करें. इसे इसलिए करें क्योंकि यह आपके द्वारा यहां बिताए गए समय के लिए धन्यवाद कहने का तरीका है. आपके छोटे-छोटे पर्यावरण-अनुकूल कार्य शायद दुनिया को न बचाएँ, लेकिन वे आपकी आत्मा को जरूर बचाएँगे.

और जब आप अपना काम पूरा कर लें, तो किसी पेड़ के नीचे बैठ जाइए, हो सके तो किसी पीपल के नीचे, क्योंकि वह कभी किसी का न्याय नहीं करता, और इस अद्भुत सुंदरता का आनंद लीजिए. बारिश के बाद चींटियों को फिर से इकट्ठा होते हुए देखिए. फुटपाथ की दरारों से खरपतवारों को उगते हुए देखिए. ये प्रकृति की शांत हंसी है.

यह ग्रह हमारे साथ या हमारे बिना भी ठीक हो जाएगा.

(‘पीपल की छांव में’ पीपल बाबा की किताब है, जिसे पेंगुइन स्वदेश ने छापा है और इसका अंश प्रकाशन की अनुमति से छापा जा रहा है.)

share & View comments