आसिफ अली ज़रदारी के पूर्व प्रवक्ता फरहतुल्लाह बाबर ने अपनी किताब ‘द ज़रदारी प्रेसिडेंसी (2008-2013)’ में उस दौर के घटनाक्रम उजागर किए हैं, जब पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की आशंका गहराई हुई थी.
अगर राहुल गांधी इतने ही बेकार हैं कि वे इस सरकार के लिए एक 'एसेट' और विपक्ष के लिए एक 'लायबिलिटी' की तरह काम करते हैं, तो फिर सरकार उन्हें ख़बरों में बनाए रखने के लिए इतनी ज़ोर-शोर से कोशिश क्यों कर रही है?