अगर मोदी 2024 के चुनाव में बहुमत जीतते हैं, तो आरएसएस की पितामह बने रहने की राहें मुश्किल हो जाएंगी, लेकिन अगर वे विफल रहे, तो वो आरएसएस की संघ परिवार मे प्राथमिकता को सिद्ध करेगी.
भारत में जो सियासी हवा चल रही है, उससे सैन्य नेतृत्व को सजग हो जाना चाहिए कि सेना के बुनियादी मूल्यों को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
तीसरे चरण की तरह, इस बार भी एनडीए को अपनी जमीन गंवानी पड़ सकती है, क्योंकि पिछली बार उसे 49 में से 39 सीटें मिली थीं, जिनमें से अकेले भाजपा ने 32 सीटें जीती थीं.
चुनाव नतीजे पर चर्चा में प्रायः हर कोई केवल भाजपा के ‘आंकड़े’ की बात कर रहा है, लेकिन क्या हो अगर हम समीकरण को उलट दें और यह सवाल करें कि हारने वाले का प्रदर्शन कैसा रहा?
बीएमसी के अनुसार, शहर में अभी 1,025 आधिकारिक तौर पर स्वीकृत होर्डिंग्स हैं. हालांकि, मुंबई में रहने वाला कोई भी व्यक्ति आपको बता सकता है कि यह संख्या हास्यास्पद रूप से कम आंकी गई है.
भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा विरोध दर्ज करने से ज्यादा-से-ज्यादा यह मकसद सध सकता है कि भारत अपना दावा बनाए रख सकता है. कोई और मकसद सधेगा, इसकी उम्मीद रखना बेमानी है.
राजनीतिक दृष्टि से नरेंद्र मोदी अकेले हैं. वह निर्णय लेते हैं कि वह क्या करना चाहते हैं और किसे उच्च पद पर नियुक्त करना चाहते हैं. और वो कब क्या बोलेंगे इसका अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता.
रणनीतिक स्वायत्तता और डाटा की गोपनीयता जैसे कई मसलों पर भारत और ‘फाइव आइज़’ नामक गठबंधन के बीच असहमति हो सकती है, लेकिन सहमति के मुद्दों पर ज़ोर देकर वे साझा चुनौतियों से निबट सकते हैं.
प्रमुख दलों से कम से कम इतनी तो अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक दृष्टिकोण, एक रणनीति का खाका पेश करेंगे और सेना को बदलने की एक रक्षा नीति प्रस्तुत करेंगे.
जिन छोटे लड़कों को स्कूल के काम की चिंता करनी चाहिए, वे महिलाओं को परेशान करना सीख रहे हैं. क्या अब हमें उन लोगों की लिस्ट में बच्चों को भी शामिल करना होगा जिनसे हमें खुद को बचाना है?