नरेंद्र मोदी ने पुराने वामपंथियों और दक्षिणपंथियों को एक साथ ला दिया है. कभी कट्टर वैचारिक विरोधी रहे लोग हाथ मिला चुके हैं और भारत के अपने दृष्टिकोण को बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.
आगे का रास्ता मसले की गंभीरता के एहसास, सार्थक सुधारों को लागू करने और सभी भेदभाव से उठकर सबको सम्मान और न्याय देने की संस्कृति को बढ़ावा देकर ही निकल सकता है.
यह राहुल गांधी के अहंकार और अपने देशवासियों के प्रति उनकी अवमानना को दिखाता है कि वे मानते हैं कि भारत जैसे विविधतापूर्ण और विशाल देश को उनके परिवार की सोच के अधीन किया जा सकता है.
मणिपुर मसला उत्तर-पूर्वी क्षेत्र को लेकर भाजपा की ‘जिउ-जित्सु’ मार्का राजनीति का इस्तेमाल करते हुए शासन चलाने की एक अनूठी मिसाल है. वहां वह जो काम कर रही है उससे हालात सुधरे नहीं बल्कि और बिगड़े ही हैं लेकिन यह पार्टी यह काम जारी रखने पर आमादा है
गठबंधन सरकार के अस्तित्व में आने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की लोकप्रियता रेटिंग के बीच अंतर कम होने के साथ, कांग्रेस को जल्दबाज़ी में नीतिगत घोषणाएं न करने के बारे में विलियम हेग की बात सुननी चाहिए.
छोटा-सा सबक यह है कि आप इंदिरा गांधी के मुंह में तो कोई भी शब्द डाल करके बच सकते हैं, लेकिन भिंडरावाले की मौत के 40 साल बाद भी आपने उसके साथ ऐसा कुछ किया तो मुश्किल में पड़ जाएंगे.