मोदी बजट को एक साधारण, नियमित किस्म के वार्षिक लेखेजोखे के रूप में देखना चाहते हैं. महाघोषणाएं उनकी राजनीतिक ज़रूरतों के अनुरूप पूरे साल कभी भी की जा सकती है.
कश्मीरी पंडितों की बात कहने में इतनी झिझक क्यों आखिर? और सबसे महत्वपूर्ण कि 'कश्मीर' और 'कश्मीरी पंडित' की बात कहते वक़्त समस्या के कारण और निवारण की बात करने से गुरेज क्यों?
लेकिन यह मान लेना गलत होगा कि मोदी सरकार अपने पक्ष में मिले भारी जनादेश के बाद कुछ गंभीर सुधारों की पहल करेगी. यह निश्चित है कि सरकार की प्राथमिकताएं अलग हैं.
भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने तो यहां तक दावा किया के शाहीन बाग में औरतें पांच पांच सौ रुपये लेकर बैठ रही हैं. इस बात के बाद इन औरतों को लेकर एक से बढ़कर एक सेक्सिस्ट मीम बने.
जिस रफ्तार से नौकरियां जा रही हैं, उन्हें देखकर मिडल क्लास डरा हुआ है. सरकार कितने भी आंकड़े दिखा दे अपने आस-पास ऐसे लोग दिखते ही रहते हैं जिन्हें दो साल से इन्क्रीमेंट नहीं मिला.
राजकोषीय विस्तार वैसे तो अर्थव्यवस्था में सुस्ती के दौरान ही किया जाना चाहिए, पर उन आंकड़ों के आधार पर चर्चा बेमतलब है जिन पर कि लोग यकीन नहीं करते हों.
सभी नागरिकों को जिसमें दिल्ली के शाहीन बाग में शामिल महिलाएं भी है, उन्हें राइट टू प्रोटेस्ट का अधिकार है जिसमें सरकार का विरोध भी शामिल है. पुलिस उन्हें बंद नहीं कर सकती है.