इस साल केंद्र सरकार ने ‘स्कीमों’ और परियोजनाओं पर दो साल पहले किए गए खर्च से 48 प्रतिशत ज्यादा खर्च करना तय किया है. सवाल यह है कि इसके लिए पैसा उपलब्ध हो तो भी क्या सरकार के तमाम विभाग इतने बड़े पैमाने पर खर्च कर पाएंगे?
पहचानवादी राजनीति और आर्थिक गिरावट ने मिलकर ब्रांड इंडिया और इसके साथ ही ब्रांड मोदी की छवि तो कमजोर की है मगर अभी वह हालत नहीं बनी है कि दुनिया हमें खारिज कर दे.
‘ज़िंदगी तमाशा’ के निर्माता सरमद खूसट को फिल्म की रिलीज टालने की सलाह देकर इमरान ख़ान सरकार ने एक तरह से तहरीके लब्बैक पाकिस्तान के आगे घुटने टेक दिए हैं.
भारतीय गणतंत्र को बचाने की लड़ाई अब अदालत और संसद के किले या फिर ऐसी ही किसी प्रतिष्ठानी जगह से नहीं लड़ी जा सकेगी. लोकतांत्रिक और अहिंसात्मक तरीका अपनाते हुए लड़ाई को अब सड़कों तक खींच लाना होगा.
कन्हैया कुमार की आवाज उन लोगों के बीच ही गूंज रही है, जो पहले से मोदी और बीजेपी के विरोधी हैं, जबकि चंद्रशेखर आजाद नागरिकता कानून को दलित-आदिवासी विरोधी बताकर बीजेपी के हिंदू-मुसलमान खेल को तोड़ते हैं.