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Monday, 2 February, 2026
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अमेरिका-अफ़ग़ान शांति समझौता पुराने ढर्रे पर है जबकि 2020 का तालिबान बदल चुका है

अफ़ग़ान समझौते का मेन्यू पाकिस्तान का है, इसे पकाया अमेरिका ने है, जबकि खर्च उठाया है दोहा ने. तालिबान को सिर्फ स्टार्टर और अफ़ग़ान सरकार को डेज़र्ट मिलेंगे, जबकि मुख्य व्यंजन पाकिस्तान और ट्रंप के चुनाव अभियान के बीच बंटेगा.

सांप्रदायिक हिंसा हमेशा स्थानीय नहीं होती, सोशल मीडिया अब उसे राष्ट्रीय बना रहा है

अफवाहों की भरमार और नफरत भरी बातें स्थानीय तौर पर सांप्रदायिक हिंसा को जन्म देती है जो सोशल मीडिया के जरिए तुरंत ही पूरे देश में फैल जाती है.

‘आप’ से अपेक्षा न रखें : ये मोदी को सत्ता से हटाने में मददगार हो सकती है, देश की आत्मा बचाने में नहीं 

‘आप’ गैर-बीजेपी खेमे की पहली ऐसी पार्टी है जिसने नरेन्द्र मोदी वाले न्यू इंडिया के हिसाब से अपना कायाकल्प करने का काम कामयाबी के साथ कर लिया है.

क्या सांप्रदायिक दंगे भारत के लिए नई बात हैं, दिल्ली की घटना ने नई बहस खड़ी कर दी है

हाल के दिल्ली दंगों ने 200 साल पुरानी इस बहस को फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या ब्रितानी राज से पहले हिंदू और मुसलमान शांतिपूर्वक रहते थे या सांप्रदायिक हिंसा हमेशा से होती रही है?

क्या हिमंत बिस्वा सरमा भाजपा के अगले अमित शाह साबित हो पाएंगे लेकिन आरएसएस से न होना बड़ी चुनौती

हिमंत बिस्वा सरमा बिल्कुल अमित शाह की तरह ही हैं- राजनीति में जोड़-तोड़ करने वाले, कठोर, चतुर, मेहनती और सत्ता पाने के लिए ललक वाले. सरमा कुछ मोदी की तरह भी हैं- जो अपने क्षेत्र में लोकप्रियता को भी पसंद करते हैं.

क्या ‘हिन्दुत्व’ वास्तव में जीवन शैली है, शीर्ष अदालत को अपने निर्णय पर फिर से विचार करने की है जरूरत

अयोध्या मामले में भी इन न्यायाधीशों ने अपनी राय में कहा था कि समान्यतया, हिन्दुत्व को जीवन शैली या सोचने के तरीके के रूप में लिया जाता है और इसे धार्मिक हिन्दू कट्टरवाद के समकक्ष नहीं रखा जायेगा और न ही समझा जायेगा.

न्यूज़ीलैंड में दुनिया की नंबर-एक टेस्ट टीम की शर्मनाक हार का ‘विराट’ फ़ैक्टर

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में विराट कोहली ने जो कद हासिल किया था उसके बाद उनके बारे में कोई आलोचनात्मक नहीं होता था. लेकिन अब विराट कोहली की फॉर्म पर बात करनी होगी.

आरएसएस दिल्ली के दंगों के पीछे मानती है बड़ी साज़िश, जनसांख्यिकीय बदलाव एक बड़ा कारक

आरएसएस के एक अनौपचारिक आकलन के अनुसार दिल्ली के दंगे तुष्टिकरण की नीति नहीं अपनाने वाली मोदी सरकार के हाल के कुछ फैसलों की प्रतिक्रिया में हुए हैं.

अर्थव्यवस्था में सुधार के आसार तो बन रहे हैं मगर घरेलू चुनौतियों से निपटे बिना उद्धार नहीं हो सकता

आम राय यही है कि बदतर दौर खत्म हो चुका है और गिरावट थम गई है. लेकिन मुख्यतः घरेलू कारकों के अधकचरे विश्लेषण के प्रति सावधानी बरतने की जरूरत है.

दिल्ली दंगों के दौरान राजदीप से लेकर तवलीन सिंह तक की एक बड़ी दुविधा- सौहार्द की बात करें या नफ़रत की रिपोर्टिंग

गुजरात की 2002 की हिंसा हो, हाशिमपुरा नरसंहार हो या फिर दिल्ली के दंगे, घटनास्थल पर मौजूद पत्रकारों को समयाभाव, अफवाहों और पुलिस का सामना करना पड़ता है.

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चंबल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का समापन

कोटा, एक फरवरी (भाषा) चंबल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का नौंवां संस्करण रविवार को यहां संपन्न हुआ, जिसमें राजस्थान में फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने...

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सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.