अभी जो कुछ हो रहा है वह एक मायने में 1984 के दंगे से भी बदतर है. पुलिस दोषियों के लिए सिर्फ ढाल बनकर नहीं खड़ी बल्कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोधियों के पीछे जी-जान से लगी हुई है.
अंग्रेजी इंटलेक्चुअल्स भारतीय भाषाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं, यहां सोचना होगा कि क्या अंग्रेजी बौद्धिक नेतृत्व प्रदान करने में सक्षम है, खासकर बदलते राजनीतिक परिदृश्य के अनुरूप भारत के लिए अपेक्षित धर्मनिरपेक्षता की परिकल्पना गढ़ने में.
सपा इन दिनों बीजेपी से विचारधारा के स्तर पर टकराने से बच रही है. ऐसा करते हुए कई निर्णायक और बड़े मुद्दों पर सपा या तो बीजेपी के साथ खड़ी हो जाती है या खामोश और निष्पक्ष रह जाती है.
परीक्षा टलने के खिलाफ मुखर होने की मुख्य वजह यह है कि जेईई के आयोजन में किसी भी तरह की देरी अब आईआईटी की परेशानी बढ़ाएगी क्योंकि छात्रों की संख्या दोगुनी हो जाएगी.
मैं अपेक्षा कर रही थी कि इंफेक्शन हल्का होगा और थोड़े समय तक रहेगा. कोविड-19 का मेरा अनुभव इन अपेक्षाओं पर पूरा उतरा है और मुझे उम्मीद है कि इससे वायरस का डर कम होगा.
नागालैंड की सबसे बड़ी समस्या आज यह नहीं है कि शांति समझौते का प्रारूप नहीं तय हो पाया है बल्कि यह है कि वहां राज्यतंत्र का धीरे-धीरे लोप होता जा रहा है.
भारत ने अपना अंतिम पारंपरिक युद्ध 1999 में लड़ा था, तब से इसका रणनीतिक वातावरण काफी बदला है. तब से सामने आई भारत की अपरिपक्व प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि उसका सैन्य सिद्धांत और सैन्य संरचना अभी भी अनुकूलित नहीं हुई है.
विरोध करने वाले छात्र भारतीय युवाओं के एक व्यापक दायरे– लिंग, जाति और वर्ग का एक मिश्रित समूह– से आते हैं और जेएनयू या जामिया के छात्रों के विपरीत, वे भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हैं.
प्रणब मुखर्जी 1984 और 2004 में प्रधानमंत्री बन सकते थे लेकिन नहीं बन पाए. उसकी बजाए वो यूपीए के लिए राहुल द्रविड़ की तरह 'दीवार' बन गए, जिसके बाद उन्हें राष्ट्रपति बनाया गया.
सीएए विरोधी आंदोलन ने भाजपा के लिए कोई राजनीतिक चुनौती नहीं पेश की थी. लेकिन उससे उत्पन्न ये उम्मीद खतरनाक थी कि जनसाधारण बेहतर भारत में यकीन कर सकता है.
जब वामपंथी दल आक्रामक तरीके से हिंदू वोटों में सेंध लगा रहे हैं, तो बीजेपी के लिए तुरंत फायदा अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने में हो सकता है, उससे पहले कि वह अपना दायरा और फैलाए.