कमज़ोर अर्थव्यवस्था के बावजूद राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए. विश्वास के उस स्तर को फिर से हासिल करना जो भारत-चीन रिश्तों को स्थिर कर सके और सैन्य तनावों को रोक सके, असंभव तो नहीं लेकिन मुश्किल ज़रूर है.
जीवन में बाद के वर्षों में पासवान भले ही आरएसएस-भाजपा के साथ मिलकर सामाजिक न्याय विरोधी तमाम बड़े-बड़े कार्यों में सहभागी रहे हों लेकिन उनकी मूल रूप से छवि सामाजिक न्याय के योद्धा की ही रही.
मौलाना ताहिर अशरफी और मौलाना फजलुर्रहमान विवादास्पद हैं और आतंकी संगठनों से जुड़े रहने के आरोप हैं पर दोनो की पाकिस्तान की राजनीति में भूमिका अहम हो गई है.इस राजनीतिक घटनाक्रम से साफ पता चल रहा है कि सरकार और विपक्ष दोनों ही ने धार्मिक नेताओं की आड़ लेकर अपने पासे फेंक दिए हैं.
प्रवासी भारतीय सम्मेलन से लेकर कुंभ मेलों तक, भारत ने दिखाया है कि वह जटिल आयोजनों का प्रबंधन कर सकता है. इस क्षमता को बाद में उसके G20 शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक मंच पर भी मजबूती मिली.