BSP की घटती हुई राजनीतिक शक्ति का मतलब ये नहीं है, कि बहुजन आंदोलन के लिए सब कुछ ख़त्म हो गया है. कांशीराम जयंती याद दिलाती है, कि जाति-विरोधी आंदोलन आम लोगों के बीच अभी भी जीवित है.
लेकिन हमेशा से जो जाना-पहचाना भारत है वह हर कदम पर सामने आकर खड़ा हो जाता है और ‘इंडिया के नये आइडिया’ को ठोस रूप देने की महत्वाकांक्षा के लिए एक समस्या बन जाता है.
दुनिया को भारत से बड़ी अपेक्षाएं हैं, जो पूरी नहीं होतीं तो वह शिकायत करने लगती है; मोदी सरकार को दुनिया से अपनी वाहवाही तो बहुत अच्छी लगती है मगर आलोचना से वह नाराज क्यों होती है और उसे खारिज करने पर क्यों आमादा हो जाती है.
1971 की लड़ाई के जब 50 वर्ष पूरे होने जा रहे थे तब अपेक्षा तो यही थी कि कमांडरों की बैठक वेलिंगटन के डिफेंस कॉलेज में होती, जहां फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ चिर-निद्रा में सो रहे हैं.
अपनी सरकार की चौथी वर्षगांठ मनाने की तैयारियों में व्यस्त उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत को भान भी नहीं रहा होगा कि उन्हें अचानक इस तरह दिल्ली बुलाया और इस्तीफे के लिए मजबूर कर दिया जायेगा.
प्रधानमंत्री ने जो शानदार वादा किया था कि 'एमएसपी था, है और रहेगा' उसकी सच्चाई को परखने के लिए बेल्लारी की सरकारी कृषि मंडी एक बेहतर जगह साबित हो सकती है. केंद्र की तरफ खड़े होकर राज्य पर दोषारोपण करने या फिर राज्य की तरफ खड़े होकर केंद्र पर दोष मढ़ने का जो सदाबहार खेल चलता है.
स्वच्छ भारत या उज्जवल भारत जैसे अभियानों की सापेक्षिक सफलता में, प्रभावी मैसेजिंग, अक्सर स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा, का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. लेकिन ये मैसेजिंग आमतौर पर एकतरफा प्रक्रिया है. इसमें नागरिकों की प्रतिक्रिया पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है
भारत और पाकिस्तान के बीच नेपथ्य में चलने वाली गुफ्तगू के लिए अगले कुछ महीने में और मौके मिलने वाले हैं और इस बीच अमेरिका को अफगानिस्तान के लिए अपनी नयी रणनीति तय करने का भी मौका मिल जाएगा
भारत के लिए एक ताकत सीमा पर पहाड़ों के पार ही पड़ोसी के रूप में मौजूद है, तो दूसरी हमारे समुद्र में जमी हुई है. जाहिर है, भारत की अपनी रणनीति और जटिल ही होती जाएगी.