विजय की इस घड़ी में भी भारतीयों को ये बात स्वीकार करनी चाहिए कि पश्चिम बंगाल और केरल में बीजेपी की अपमानजनक हार की कथा लोकतंत्र पर दावेदारी के लिए जारी संघर्ष की कथा का विस्तार नहीं करती.
हाल में कुछ कामयाबियों के कारण एक नयी कहानी लिखी जाने लगी. खास तौर से कुछ देशभक्त आंखों को भारत ‘तीसरी दुनिया’ से निकलकर ‘उभरते बाज़ार’, यहां तक कि उभरते ‘सुपर पावर’ के रूप में नज़र आने लगा.
किसी ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि भारत के पास पर्याप्त वैक्सीन, ऑक्सीजन, रेमडिसिविर दवा है या नहीं. अब देश ऐसे संकट में फंस गया है कि चार दशक बाद हम विदेशी मदद के मोहताज हो गए.
चुनाव आयुक्तों को पश्चिम बंगाल में उतावलेपन पर काबू पाना चाहिए था, लेकिन उनके पक्षपातपूर्ण रवैये ने सिविल सेवाओं के बारे में नकारात्मक छवि को मजबूत ही किया है.
लंबे अरसे तक बंगाल में दलगत प्रतिद्वन्द्विता अनूठी बनी रही. चुनाव अभियानों में तब राजनीतिक कार्यकर्ता विचारधारा की भाषा बोला करते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा.
इस कानून की संवैधानिकता को न्यायालय में चुनौती दी जायेगी और आम आदमी पार्टी तथा दिल्ली की निर्वाचित केजरीवाल सरकार अपने अधिकारों में कटौती के इन प्रयासों के खिलाफ हर तरह की मोर्चांबंदी करेगी.
सिस्टम के बहुत से हिस्सों को दोषी ठहराया जाएगा. केंद्र राज्यों पर दोष मढ़ेगा और तमाम सरकारें निजी क्षेत्र और लोगों की अनुशासनहीनता को ज़िम्मेदार ठहराएंगी.
पंच का अपने प्लश टॉय से लगाव उसके देश से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले आराम से है. इसी तरह, ग्राहक जियोपॉलिटिकल लेबल से ज्यादा भरोसे और डिजाइन को प्राथमिकता देते हैं.