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Tuesday, 28 April, 2026
होमफीचरअगर मोदी सरकार ने नक्सलियों को खत्म कर दिया है तो कोलकाता में CPI (ML) लिबरेशन क्या कर रहा है?

अगर मोदी सरकार ने नक्सलियों को खत्म कर दिया है तो कोलकाता में CPI (ML) लिबरेशन क्या कर रहा है?

लेफ़्ट फ़्रंट, जिसने बंगाल पर 34 सालों तक राज किया था, 2019 के लोकसभा चुनावों, 2021 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट न मिलने के बाद अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है.

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कोलकाता: गर्मी की ढलती शाम की हल्की धूप में, रशबेहारी एवेन्यू के व्यस्त लेक मॉल के ऊपर लगे एक बड़े ज्वेलरी ब्रांड के होर्डिंग के नीचे, CPI (ML) लिबरेशन के कुछ कार्यकर्ता एक अस्थायी मंच के आसपास इकट्ठा हुए हैं. भीड़ में कहीं मानस घोष खड़े हैं, जिन्हें आसानी से पहचाना नहीं जा सकता.

सफेद कुर्ता और काली पैंट में, एक हाथ में सिगरेट और दूसरे में चाय लिए, 55 साल के घोष, जो साउथ कोलकाता की पॉश रशबेहारी सीट से पार्टी के उम्मीदवार हैं, भीड़ में घुल-मिल गए हैं. यह भीड़ पश्चिम बंगाल के मतदाताओं से पार्टी के वादे सुनने आई है.

घोष ने दिप्रिंट से कहा, “रशबेहारी सिर्फ बड़े-बड़े बिल्डिंग और उनमें रहने वाले ऊपरी-मध्यवर्ग के लोगों का इलाका नहीं है. यहां झुग्गियां भी हैं जो नजरों से छिपी हुई हैं, जहां लोग रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हम दोनों वर्गों को एक साझा मुद्दे पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. मोदी और दीदी दोनों ने उन्हें धोखा दिया है. राज्य में और देश में भारी बेरोजगारी है.” उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र और राज्य दोनों ने अस्थायी मजदूरों की एक ऐसी श्रेणी बना दी है जिनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है.

घोष ने कहा, “CPI (ML) लिबरेशन उनके जीने के सवाल को उठाना चाहती है.”

द्वंद्व की लड़ाई में बाहर?

2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में, CPI (ML) लिबरेशन, जो “मई 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से पैदा हुई” और “22 अप्रैल 1969 को व्लादिमीर लेनिन के जन्मदिन पर स्थापित हुई”, ने 10 उम्मीदवार उतारे हैं. यह पहली बार है जब यह पार्टी बंगाल विधानसभा चुनाव में लेफ्ट फ्रंट के साथ तालमेल कर रही है.

पिछले महीने CPI(M) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने CPI (ML) लिबरेशन और इंडियन सेक्युलर फ्रंट के साथ गठबंधन की घोषणा करते हुए कहा, “सभी समान विचार वाले वामपंथी दल तृणमूल कांग्रेस और फासीवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ेंगे.”

Manas Ghosh is the CPI (ML) candidate from the Rashbehari constituency which will go to polls on 29 April Source: Facebook
मानस घोष रासबिहारी निर्वाचन क्षेत्र से CPI (ML) के उम्मीदवार हैं, जहां 29 अप्रैल को मतदान होगा | स्रोत: फेसबुक

घोष ने कहा कि उनकी पार्टी लेफ्ट फ्रंट का हिस्सा नहीं है, जो 1977 से 2011 तक 34 साल तक पश्चिम बंगाल में शासन करने वाला वामपंथी गठबंधन था.

उन्होंने कहा, “हम वाम एकता के पक्ष में हैं. हम एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर काम कर सकते हैं.”

CPI(M) और CPI (ML) के बीच पुराना मतभेद रहा है. मूल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया दो हिस्सों में बंटी—CPI और CPI(M). 1969 में दूसरी बार विभाजन हुआ और CPI (ML) बनी.

चारु मजूमदार के नेतृत्व में CPI (ML) के कट्टरपंथियों, जिन्हें नक्सल कहा गया, ने CPI(M) पर “वर्ग सहयोग” का आरोप लगाया. 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद उन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए चुनाव की जगह हथियार का रास्ता अपनाया.

1972 में मजूमदार की मृत्यु के बाद CPI (ML) कई समूहों में बंट गई. CPI (ML) लिबरेशन ने सशस्त्र संघर्ष से हटकर वर्ग संघर्ष के ऐसे मॉडल को अपनाया जो दलितों और महिलाओं जैसे उत्पीड़ित वर्गों के सम्मान और बराबरी की बात करता है.

घोष “अर्बन नक्सल” जैसे टैग से परेशान नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “अगर आज हमें अर्बन नक्सल कहा जाता है, तो वे भगत सिंह को पगड़ी नक्सल और गांधी को डरबन नक्सल भी कह सकते हैं, क्योंकि गांधी ने अपना सत्याग्रह दक्षिण अफ्रीका के उस शहर में विकसित किया था.” उन्होंने कहा कि BJP-RSS दूसरों को लेबल करके असल मुद्दों से ध्यान हटाती है.

घोष ने गृह मंत्री अमित शाह के उस दावे को भी खास महत्व नहीं दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत अब नक्सल मुक्त हो गया है.

उन्होंने कहा, “पहली बात, जिन हालातों ने सशस्त्र संघर्ष को जन्म दिया था, वे आज भी मौजूद हैं. और शाह ने कहा था कि भारत को कांग्रेस मुक्त बना देंगे. उसका क्या हुआ? राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद लोगों का जुड़ाव साफ दिखा, भले ही कांग्रेस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही थी.”

उन्होंने कहा कि समाज पर हमला हो रहा है, भारत का लोकतंत्र RSS और BJP की “फासीवादी ताकतों” से खतरे में है, और लोगों के मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए मोदी सरकार पूरे कम्युनिस्ट आंदोलन को बदनाम कर रही है.

घोष ने कहा, “BJP और तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में हिंदू-मुस्लिम का जो विभाजन पैदा किया है, उससे मतदाता बंटे रहते हैं और दोनों पार्टियों को चुनावी फायदा मिलता है. जबकि नौकरी, स्वास्थ्य, मजदूरों और किसानों के अधिकार और कॉरपोरेट जमीन कब्जा जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं.”

उन्होंने कहा कि SIR के नाम पर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार कुचले गए हैं और लगभग 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं.

पत्रकार और कार्यकर्ता सूमो मंडल, जो घोष का भाषण सुनने आए थे, ने कहा कि बंगाल में वामपंथ लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमले और सेक्युलरिज्म पर हमले दोनों से लड़ रहा है. मंडल ने BJP नेता सुवेंदु अधिकारी की उम्मीदवारी रद्द करने के लिए PIL दायर की है, क्योंकि उन्होंने कहा था कि “सेक्युलरिज्म खत्म होना चाहिए, यह हिंदुस्तान है और यहां सेक्युलरिज्म और नास्तिकता नहीं चलेगी.”

मंडल ने कहा, “सेक्युलरिज्म भारतीय संविधान का एक स्तंभ है. जो लोग इसका खुलकर विरोध करते हैं, वे देश विरोधी सोच का हिस्सा हैं. फिर भी मानस घोष जैसे उम्मीदवारों को आंदोलनजीवी और देशद्रोही कहा जाता है.”

CPI (ML) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने एक संपादकीय में लिखा कि यह वैचारिक हमला अब सिर्फ RSS के कम्युनिस्ट विरोध तक सीमित नहीं है.

उन्होंने लिखा, “अर्बन नक्सल, आंदोलनजीवी, देशद्रोही जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके सरकार हर तरह की असहमति को निशाना बना रही है, ताकि देश के संसाधन कुछ कॉरपोरेट घरानों को सौंपे जा सकें.”

घोष का मानना है कि यह चुनाव पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट के लिए वापसी का मौका होगा.

उन्होंने कहा, “हम जहां भी प्रचार के लिए जा रहे हैं, वहां लोगों की उत्साहित भीड़ मिल रही है.”

पश्चिम बंगाल में, जहां लेफ्ट फ्रंट ने 34 साल तक शासन किया, अब वह संकट में है. उसे 2019 लोकसभा चुनाव, 2021 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली.

सिनेमा पढ़ाना, राजनीति की बात करना

घोष जादवपुर यूनिवर्सिटी में फिल्म स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर हैं. वह 20 साल से ज्यादा समय से सिनेमा पढ़ा रहे हैं और 30 साल से ज्यादा समय से पार्टी राजनीति में हैं. उन्होंने कहा कि उन्होंने समाज को बदलते देखा है और उसके साथ सिनेमा की भाषा भी बदली है.

घोष ने कहा, “धुरंधर जैसी फिल्म को देखिए जिसका एजेंडा बहुत ज्यादा दक्षिणपंथी है और वह व्यावसायिक रूप से सफल रही. मुझे खुशी है कि कोलकाता में, धुरंधर के समय में भी, आदम्य जैसी फिल्म, जो प्रतिरोध और पहचान के मुद्दों को दिखाती है और जिसमें एक क्रांतिकारी वामपंथी नायक समाज को बदलना चाहता है, वह भी अच्छी चली. मैं फिल्म के निर्देशक रंजन घोष से तब से बात कर रहा हूं जब उन्होंने इसकी स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की थी. आदम्य मुझे उम्मीद देती है.”

इस चुनाव में उस क्षेत्र के कैफे में भी चर्चा हो रही है जहां से मानस घोष चुनाव लड़ रहे हैं. घोष के प्रतिद्वंदी, रशबेहारी से बीजेपी उम्मीदवार स्वपन दासगुप्ता ने एक योजना घोषित की है कि अगर वे सत्ता में आए तो एक बंगाल कैफे और कल्चर डिस्ट्रिक्ट बनाएंगे और उसे टूरिस्ट मैप पर लाएंगे.

घोष ने कहा, “लेकिन उन कैफे में होगा क्या. पेरिस के कैफे में दर्शन की बात करने और बौद्धिक चर्चा करने का इतिहास है. 1940 के दशक में पेरिस के सेंट जर्मेन दे प्रे के कैफे में कामू, सार्त्र और सिमोन द बोउवार नियमित रूप से आते थे. लेकिन स्वपन की पार्टी बौद्धिकता के खिलाफ है और आलोचनात्मक सोच के खिलाफ है. इसलिए मुझे लगता है कि लोग बस कॉफी पीकर चले जाएंगे.”

रशबेहारी सीट पर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में 29 अप्रैल को मतदान होगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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