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Saturday, 25 April, 2026
होममत-विमतराइटिंग ऑन दि वॉल—नक्सलबाड़ी की क्रांति से ‘विनर्स’ तक: बंगाल की नई इबारत

राइटिंग ऑन दि वॉल—नक्सलबाड़ी की क्रांति से ‘विनर्स’ तक: बंगाल की नई इबारत

पश्चिम बंगाल चुनाव में वामपंथी दल और कांग्रेस खुरचन में हिस्सेदारी के लिए होड़ लगा रहे हैं. पूर्वी-मध्य भारत में माओवाद को कब्र में दफन कर दिया गया है, तो केरल में वे सरकार विरोधी दोहरी भावना से जूझ रहे हैं.

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चुनाव से गुजर रहे पश्चिम बंगाल में दीवारों पर लिखी इबारतों को आप कोलकाता में और उससे बाहर घूमे बिना कैसे पढ़ पाएंगे? आइए, मेरे साथ करीब उत्तर में 600 किमी दूर सिलीगुड़ी के 60 किमी चौड़े संकरे कॉरीडोर में चलिए या बंगाल की मुख्य भूमि को उत्तर तथा पूरब के हिमालयी एवं डूअर्स जिलों को जोड़ने वाली 90 किमी चौड़ी तक. चलिए, हम नक्सलबाड़ी की दीवारों से शुरू करते हैं.

किसी ने अगर इन बातों का ध्यान रखा होता तो हम ठीक यहां, 1967 के ठीक इसी सप्ताह शुरू हुए सशस्त्र माओवादी आंदोलन की 59वीं वर्षगांठ माना रहे होते. इसीलिए हमने सबसे पहले बेंगाईजोते गांव की दीवारों पर लिखी इबारतों को पढ़ने से शुरुआत की. यह गांव नक्सलबाड़ी का ही हिस्सा है, जहां माओवादी बगावत की पहली चिनगारी फूटी थी.

संयोग कहिए या एक रिपोर्टर की किस्मत, मैं यहां इसकी वर्षगांठ वाले सप्ताह में पहुंचा, और मुझे यहां उस भूली जा चुकी क्रांति के स्मारकों का झाड़ू-पोछा और रंग-रोगन करते दो कॉमरेड मिले. इस स्मारक पर मार्क्स, लेनिन, एंजेल्स (या एंगेल्स), स्टालिन, माओ, चारु मजूमदार और सरोज दत्ता की मूर्तियां स्थापित हैं. मैंने जानबूझकर एक कॉमरेड का नाम फिलहाल नहीं लिया है. पहले पांच नेता ऐसी महान विभूतियां थीं, जिनका नाम इस क्रांति की प्रार्थनाओं में लिया जाता है. बाकी दो, चारु मजूमदार और सरोज दत्ता उनके उत्तराधिकारी थे और क्रांति के स्थानीय संस्थापक थे. मैंने थोड़ी शरारत में उनका नाम नहीं लिया, लेकिन लीजिए उनका नाम ले ही लेता हूं.

माओ के साथ कंधे से कंधा सटाए मार्शल लिन प्याओ (बियाओ) खड़े हैं, जो चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ (पीएलए) के सबसे ताकतवर बॉस थे, और जिन्हें अक्सर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का दूसरा सबसे ताकतवर नेता बताया जाता है. लेकिन अचानक एक दिन, 13 सितंबर 1971 को वे गुजर जाते हैं. जिस विमान में वे सपरिवार सवार थे वह मंगोलिया में हादसे का शिकार हो जाता है. इस हादसे को इतिहास में लिन बियाओ हादसे के नाम से जाना जाता है. इस हादसे के बारे में चीनी सरकार ने यह सफाई दी कि वे तख्तापलट की कथित ‘प्रोजेक्ट 571’ की विफलता के बाद पलायन कर रहे थे.

Illustration: Shruti Naithani/ThePrint
श्रुति नैथानी/दिप्रिंट

साम्यवाद के लगभग पूरे इतिहास को लेकर संदेह और विवाद जिस तरह जुड़ा रहा है वह अभी भी कायम है लेकिन माना जाता है कि भागकर सोवियत संघ जा रहे थे. जैसा कि हम सब अच्छी तरह जानते हैं, इस समय तक पाकिस्तान की पहल से चीन और अमेरिका के रिश्ते में पड़ी बर्फ पिघलने लगी थी. बहरहाल, लिन को गद्दार घोषित कर दिया गया और उन पर आरोप लगाया गया कि वे माओ की पत्नी जियांग क्विंग के साथ मिलकर तख्ता पलटने की योजना बना रहे थे. इन दोनों को ‘प्रति-क्रांतिकारी’ घोषित करके चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने शर्मनाक की जमात में स्थापित कर दिया. लेकिन नक्सलबाड़ी ने ऐसा नहीं किया. पूरी दुनिया में बेंगाईजोते ही शायद ऐसी जगह है, जहां आप माओ और लिन को एक-दूसरे के बगल में खड़े देख सकते हैं. और, नक्सल आंदोलन की 59वीं वर्षगांठ और लेनिन की जयंती (22 अप्रैल) मनाने के लिए उनके स्मारक की साफ-सफाई कर रहे, एक अनुसूचित जाति के कॉमरेड पुण्य सिंह राजबोंग्सी को ‘इतिहास’ से कोई परेशानी नहीं है.

मैं उनसे पूछता हूं: “आप माओ और लिन बियाओ को एक साथ कैसे रख सकते हैं?”

राजबोंग्सी कहते हैं: “क्योंकि लिन बियाओ और चेयरमैन माओ, हमारे चेयरमैन महान कॉमरेड थे.“

मैं फिर सवाल करता हूं: “लेकिन, क्या लिन ने माओ को धोखा नहीं दिया, और माओ ने उनकी हत्या नहीं कारवाई?”

राजबोंग्सी ने ज़ोर देते हुए कहा: “नहीं, वह सब प्रोपगंडा है. उनके खिलाफ साजिश लिउ शाओक़ी ने की थी.” बहरहाल, मैंने उन्हें यह याद नहीं दिलाया कि लिउ दो साल पहले ही गुजर चुके थे. भक्तों से जिरह क्या करनी!

इस बीच, कुछ ज्या डा ही ‘आध्यात्मिक’ मूड में दूसरे बुजुर्ग कॉमरेड स्मारक की दीवार पर छपा हुआ वॉलपेपर चिपका रहे थे, जिस पर बांग्ला में जो लिखा था उसका अर्थ यह था: ’मुक्ति वोट से नहीं हासिल होगी. मुक्ति केवल नक्सलबाड़ी के रास्ते से होने वाली क्रांति से हासिल होगी’. इसके कुछ ही दिनों बाद नक्सलबाड़ी में 92 फीसदी मतदान दर्ज किया गया. आज लोग केवल वोट से होने वाली क्रांति पर ही विश्वास करने लगे हैं.

Illustration: Deepakshi Sharma/ThePrint
दीपाक्षी शर्मा/दिप्रिंट

क्रांति का जन्म अगर नक्सलबाड़ी में हुआ, तो वह दफन भी वहीं हुआ. 2021 में यह विधानसभा सीट भाजपा के उम्मीदवार आनंदमय बर्मन ने करीब 71,000 वोटों यानी 58 फीसदी वोटों से जीती. हाइवे से अलग करीब एक घंटे के ड्राइव के बाद हम उन्हें माटीगारा (इस चुनाव क्षेत्र को अब माटीगारा-नक्सलबाड़ी कहा जाता है) में घर-घर जाकर चुनाव प्रचार करते देखा. मृदुभाषी स्कूल शिक्षक और आरएसएस के पूर्णकालिक कार्यकर्ता आनंदमय बर्मन कहते हैं कि उस आंदोलन ने लोगों को गरीबी के सिवा कुछ नहीं दिया.

पश्चिम बंगाल के इस बार के चुनाव में वामपंथी दल और कांग्रेस के बीच होड़ चल रही है कि खुरचन में से किसे बड़ा हिस्सा मिलता है. यह स्थिति तब है जब पूर्वी-मध्य भारत में नक्सलों के नए अवतार को कब्र में दफन कर दिया गया है. दूर दक्षिण में, केरल में वाम दलों को सरकार विरोधी दोहरे उभार का सामना करना पड़ रहा है. 4 मई को वे अगर कोई चमत्कार नहीं करके दिखाते, तो हम यह घोषणा कर सकते हैं कि आजाद भारत के इतिहास में अब वामपंथ को निर्णायक रूप से हाशिये पर डाल दिया गया है. गौरतलब है कि एकजुट भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 1951 के चुनाव में लोकसभा की 16 सीटें जीती थी.

हथियारबंद कम्यूनिज़्म का खात्मा बस कुछ समय की बात थी. लेकिन मुख्यधारा वाले वामपंथ भी अगर हाशिये पर चला गया है तो इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार है. 2004 में वह 53 सीटों के साथ अपने शिखर पर पहुंच गया था तो इसके पीछे बस एक भावना के उभार का योगदान था: अमेरिका विरोधी भावना का. वे यूपीए सरकार से अलग हो गए थे, और अमेरिका के साथ परमाणु संधि के मुद्दे पर भाजपा से हाथ मिलाकर उस सरकार को गिराने की कोशिश भी उन्होंने की थी. पिनराई विजयन को अपवाद मान लें, तो इसके बाद से वे सब पतन की राह पर ही चल पड़े.

वामपंथियों से दशकों से असहमति रखते हुए और बहस करते हुए भी मैंने उन्हें हमेशा सभ्य, खुले सोच वाला और मज़ाकिया ही पाया है. लेकिन वे कभी बदले नहीं. 1988 में मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बीजिंग और मॉस्को में तो कम्युनिस्ट बदल रहे हैं, लेकिन कोलकाता में नहीं. इस उत्सुकता ने मुझे कोलकाता पहुंचा दिया. मैं लेनिन, स्टालिन, मार्क्स, आदि की तसवीरों के नीचे बैठे माकपा के प्रदेश सचिव सरोज मुखर्जी से वह मुलाक़ात आज भी नहीं भूल पाया हूं.

मैंने उनसे पूछा था: “देंग और गोर्बाचोव ने तो अपना साम्यवाद बदल दिया. भारत के कम्युनिस्ट क्यों नहीं सुधार कर रहे हैं?”

उन्होंने ऊपर देखते हुए, मानो वे उन तस्वीरों से प्रेरणा ले रहे हों, कहा: “क्योंकि मेरा कम्यूनिज़्म देंग और गोर्बाचोव के कम्यूनिज़्म से ज्यादा शुद्ध है.” आप वह लेख ‘इंडिया टुडे’ के पुराने अंक में पढ़ सकते हैं.

इसके लगभग बीस साल बाद उनके एक उत्तराधिकारी बुद्धदेब भट्टाचार्य ने बदलने की कोशिश की थी. उनके साथ मैंने अपने ‘वाक द टॉक’ कार्यक्रम में दो बार लंबी-लंबी बातचीत की और जाहिर है उनसे यह पूछा था कि वे जिस तरह से निजी और विदेशी पूंजी को आमंत्रित कर रहे हैं वह उनकी विचारधारा से कैसे मेल खाता है.

उन्होंने कहा था : “मेरा विश्वास ही मेरी विचारधारा है. लेकिन मैं कोई क्रांतिकारी सरकार नहीं चला रहा हूं. मुझे अपने संविधान के अनुसार काम करना है.” वह एक बदलाव तो था लेकिन वैसा नहीं जिसे दल का वैचारिक आधार कबूल कर सके.

उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम में जो औद्योगिक नगर बसाने की योजना बनाई थी उसके खिलाफ जन आंदोलन उनके राजनीतिक विरोधियों ने नहीं बल्कि उनके ही धुर वामपंथी कॉमरेडों ने किया, जिनमें से कई उनके खेमे की बुद्धिजीवी मंडली के थे.

उन सबके लिए यह एक विश्वासघात था. उन्होंने भट्टाचार्य के सपने तोड़ दिए, उनकी पार्टी को खत्म कर दिया, और ममता बनर्जी उसे दफन करने के लिए खड़ी हो गईं. भाजपा उस कब्र के ऊपर अपना नया महल बनाने में जुट गई है. केरल में पिनरई विजयन की असंभव वापसी भी हो जाए तब भी यह चुनाव एक सशक्त राजनीतिक शक्ति के नाटकीय पतन का वाहक बनेऔर अगर आपने भारत में वामपंथ के लिए कोई कब्रगाह या स्मारक बना भी लिया तो उस पर कुछ इस तरह का स्मृति-लेख ही लिखा होगा : ‘चूंकि मैंने सिद्धांत को अपनी कट्टरता, और विचारधारा को रोड़ा बनने दिया !’ यह भी दीवार पर लिखी इबारत जैसा ही होगा, भले ही वह दीवार काल्पनिक क्यों न हो.

 पुनश्च: : नक्सलबाड़ी को तो लगभग भुला दिया गया है, लेकिन सिलीगुड़ी सोच में सबसे ऊपर है. भाजपा ने इसे एक कमजोर नस के रूप में अपना अहम चुनावी मुद्दा बना लिया है, और इसे ‘जनसंख्या के स्वरूप में परिवर्तन’ से जोड़ दिया है. और इसके साथ ध्रुवीकरण का जो पहलू है उसे बड़ी सफाई से जोड़ दिया है.

भाजपा के इस मुद्दे को पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान राज्यसभा सांसद हर्ष शृंगला ज्यादा बारीकी से प्रस्तुत करते हैं: “यह क्षेत्र इतना संवेदनशील है कि इसकी जनसंख्या के स्वरूप में और ज्यादा परिवर्तन एक समस्या बन सकती है.” वे कहते हैं कि घुसपैठ जारी है, क्योंकि संवेदनशील इलाकों में अधिकांश सीमा  पर अभी बाड़ नहीं लगाई जा सकी है.

यह मुख्यतः उत्तरी दिनाजपुर की बात है, जहां कॉरीडोर और संकरा हो जाता है. बांग्लादेश के साथ पश्चिम बंगाल की जो 2,216 किमी लंबी सीमा है उसमें से 569 किमी पर अभी बाड़ नहीं लगाई जा सकी है और वह खुली है. इसमें से 456 किमी पर बाड़ लगाई जा सकती है, बाकी नदी क्षेत्र है. शृंगला कहते हैं कि यह सीमा इसलिए खुली है क्योंकि राज्य सरकार ने जमीन नहीं दी है.

Illustration: Shruti Naithani/ThePrint

यह कमजोर नस ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान का केंद्रीय मुद्दा है. वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी भी इसी को लेकर चिंता जताते हैं. एक आला कमांडर ने कहा, “बांग्लादेश या नेपाल हमारे ऊपर हमला नहीं करेंगे. चीनी अगर हिमालय से उतरकर नीचे आते हैं तो उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा”, लेकिन, “हम देख चुके हैं कि किसानों ने या शाहीन बाग के आंदोलनकारियों ने देश की राजधानी को किस तरह बंधक बना लिया था”.

‘सीएए’ विरोधी एक्टिविस्ट शर्जील इमाम के इस भाषण ने एक दाग छोड़ दिया है जिसमें उन्होंने यह कहा था कि “मुसलमानों का यह फर्ज बनता है” कि वे सिलीगुड़ी की गरदन दबाकर असम को भारत से अलग कर दें, खासकर इसलिए कि “सिलीगुड़ी में मुसलमान अक्सरियत हैं”.

इसके बावजूद उन्हें लंबे समय से जेल में बंद रखने को उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि आप युवाओं को उनकी मूर्खता के लिए और आइआइटी की अपनी शिक्षा को बदनाम करने के लिए अनिश्चित काल तक कैद करके नहीं रख सकते. लेकिन इसने भाजपा को पश्चिम बंगाल में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने का मुद्दा दे दिया है. घुसपैठ- जनसंख्या स्वरूप परिवर्तन-राष्ट्रीय सुरक्षा-ध्रुवीकरण ही भाजपा के पूरे अभियान का प्रमुख आधार है. विकास का नंबर तो इन सबके बाद आता है.

Illustration: Deepakshi Sharma/ThePrint
दीपाक्षी शर्मा/दिप्रिंट

एक मुद्दा ऐसा है जिसमें भाजपा के पास तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेतृत्व को जवाब देने के लिए कुछ भी नहीं है. ममता बनर्जी तो बंगाली दिग्गज हैं ही, देश में वे शायद सबसे कुशल चुनाव प्रचारक भी हैं. सो, भाजपा ने भी किसी नेता का चेहरा सामने न रखकर कुशलता का ही परिचय दिया है. वैसे, उसके पास कोई चेहरा है भी नहीं. वह मोदी के लिए नहीं बल्कि ममता के खिलाफ वोट मांग रही है.

इसके अलावा, नेतृत्व के सवाल पर ममता भाजपा को एक-दो झटका तो देती ही रहती हैं क्योंकि उनके पास अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के रूप में अपना उत्तराधिकारी भी मौजूद है. अभिषेक से हमारी मुलाक़ात कोलकाता से 150 किमी दूर कांथी (पहले कोंटई) में होती है जो नंदीग्राम का सक्रिय औद्योगिक क्षेत्र बन सकता था. आज, इसकी प्राकृतिक हरियाली का असीम विस्तार कहीं-कहीं मछली पालन के लिए बनाए गए पोखरों के ऊपर ताने गए प्लास्टिक के जाल से टूटता दिखता है.

अभिषेक भी अपनी बुआ वाली शैली और आत्मविश्वास से भरे हैं, और मंच से कोई 25 मीटर पहले बने प्लेटफॉर्म पर बड़े शान से चढ़ते हैं, भीड़ का झुककर अभिवादन करते हैं और अमित शाह से लेकर मोदी, और भाजपा पर क्रमवार 25 मिनट तक हमला बोलते हैं. उनकी सभाओं में यह नारा अक्सर सुनाई देता है : ‘जे लोड़छे साबोर डाके, सेई जितबे बांग्ला माँ के’.

टीएमसी ने इस चुनाव को बंगाल बनाम भाजपा, और बंगला बनाम हिंदी की लड़ाई बना दिया है.

कांथी में जनसभा से लौट रहे लोगों के बीच से होते हुए जब हम आगे बढ़ते हैं, नीली वर्दी में दो युवा महिला पुलिसकर्मी भीड़ में सबसे अलग दिखती हैं. मैं उचककर उनके कंधों पर नजर डालता हूं कि वे किस राज्य की पुलिस की हैं. उनके कंधों पर लिखा है : ‘विनर्स’ (विजेता).

यह कौन-सी पुलिस है? अगर वे किसी निजी सिक्यूरिटी एजेंसी की हैं तो वे उस लिहाज से कहीं ज्यादा चुस्त नजर आईं और वे किसी सिक्यूरिटी गार्ड से ज्यादा सतर्क और आत्मविश्वास से भारी दिखीं.

उनके साथ पांच मिनट की बातचीत से कहानी सामने आ गई. भाजपा ममता बनर्जी की सरकार को महिला सुरक्षा के मुद्दे पर बुरी तरह घेरती रही है. इसलिए ममता ने राज्य की पुलिस में एक विशेष महिला काडर का गठन किया है, जिसे राज्य में महिलाओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. वर्दीधारी युवा महिलाओं के इस काडर का नाम ममता ने ही रखा है : ‘विनर्स’. यानी जिन इबारतों को आप पढ़ना चाहते हैं वे जरूरी नहीं कि केवल दीवारों पर ही नहीं नजर आएं, आप उन्हें वर्दीधारी युवा महिलाओं के कंधों पर भी पढ़ सकते हैं.

(राइटिंग ऑन दि वॉल को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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