ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल की जंग में पिछले करीब एक महीने से रणनीतिक गतिरोध जैसी स्थिति बनी हुई है. इसमें एक-दूसरे को धमकियां देना, जबरन नाकाबंदी करना, और 11-12 अप्रैल को हुई अधूरी वार्ता शामिल हैं. 8 अप्रैल को ईरान के साथ औपचारिक युद्धविराम की जो घोषणा की गई थी उसे 22 अप्रैल को तड़के सुबह तब तक के लिए आगे बढ़ा दिया गया जब तक ईरान की ओर से ‘प्रस्ताव नहीं प्रस्तुत नहीं किया जाता, और बातचीत पूरी नहीं की जाती चाहे नतीजा किसी के पक्ष में जाए’. होर्मुज जलडमरूमध्य और ओमान की खाड़ी में नाकाबंदी के कारण फारस की खाड़ी से तेल और गैस की आवाजाही बंद किए जाने के कारण विश्व अर्थव्यवस्था बंधक बनी हुई है. दोनों पक्ष शानदार सौदा करना चाहते हैं और हर पक्ष यह मानता है कि उसका ही हाथ ऊपर है इसलिए वार्ता के दौरान वही अपना राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी बढ़त रखता है.
अमेरिका चाहता है कि ईरान की परमाण्विक महत्वाकांक्षाओं पर पूरी तरह रोक लगे, ईरान ‘प्रतिरोध की अपनी धुरी’ के जरिए छद्मयुद्ध बंद करे, और होर्मुज जलडमरूमध्य की नियंत्रणमुक्त अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग वाली स्थिति बहाल हो. ईरान चाहता है कि दीर्घकालिक शांति समझौता हो, परमाणु शक्ति के मामले में उसकी रणनीतिक स्वायत्तता कायम रहे, होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसकी संपभुता कायम रहे, आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं, ‘फ्रीज़’ वित्तीय एसेट्स मुक्त किए जाएं, और लेबनान में शांति बहाल हो.
अमेरिका-इजरायल को बढ़त उनकी ओर से इस धमकी के रूप में हासिल है कि वे बेकाबू हवाई हमले फिर शुरू कर सकते हैं, ऐसे हमले जो मिसाइल/ड्रोन की उसकी बची-खुची ताकत, तेल, ऊर्जा, पानी और संचार व्यवस्था को निशाना बनाएंगे. वे ओमान की खाड़ी की नाकेबंदी जारी रखकर ईरान की अर्थव्यवस्था को भी निशाना बना सकते हैं.
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य की निरंतर नाकेबंदी करके अपनी बढ़त बना रखी है, क्योंकि यह विश्व की तेल आधारित अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है. उसके पास मिसाइलों और ड्रोनों की इतनी पर्याप्त वजन बची है कि वह अमेरिका-इजरायल की तरह ‘जीसीसी’ देशों के खिलाफ हवाई हमलों की मुहिम चला सकता है और अमेरिका को ‘कभी न खत्म होने वाले युद्ध’ में उलझाने की खतरनाक नीति चला सकता है.
विरोधाभास स्पष्ट है. ईरान कहीं ज्यादा कमजोर देश है, जिसका रक्षा बजट अमेरिकी रक्षा बजट से 90 गुना छोटा है, उस पर 47 वर्षों के लिए आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए हैं, लेकिन विषम रणनीति के बूते वह पिछले आठ सप्ताहों से बराबरी वाली हैसियत से सौदेबाजी कर रहा है. उसने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के सबसे सघन हवाई हमलों की मुहिम को झेला है, उसके शीर्ष राजनीतिक तथा सैन्य नेतृत्व का सफाय किया जा चुका है, और उसकी सैन्य क्षमता और कौशल का पतन हुआ है.
इस युद्ध से भारत के लिए सबक क्या हैं?
रणनीतिक स्तर पर
भारत, चीन और पाकिस्तान परमाणु हथियारों से लैस देश हैं और वे पूर्ण पैमाने वाले पारंपरिक युद्ध में निर्णायक हार या अपनी जमीन गंवाने के कारण अपने वजूद पर होने वाले खतरे से सुरक्षित हैं. इसलिए राष्ट्रहित का तकाजा यह होता है कि युद्ध को परमाणु युद्ध के नीचे के स्तर तक ही सीमित रखा जाए. पारंपरिक युद्ध के मामले में अपनी बढ़त रखने के कारण भारत पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक रुख के बूते उसे खौफ में रखता है. चीन की श्रेष्ठता के कारण भारत उसके मामले में रक्षात्मक रुख रखता है या हतोत्साहित करने की रणनीति अपनाता है. 1990 के बाद से पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर और भारत के बड़े शहरों में आतंकवादी हमले करने की विषम रणनीति अपनाता रहा है.
चीन की सैन्य क्षमता अमेरिकी सैन्य क्षमता से उन्नीस ही है. भारत और पाकिस्तान मझोले और उच्च स्तर की टेक्नोलॉजी के मिश्रण पर आधारित सेना रखते हैं, जिसमें भारत ने बढ़त बना रखी है. ईरान का अनुभव चीन को भारत के खिलाफ और भारत को पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिकी शैली के हवाई/मिसाइल/ड्रोन हमलों की मुहिम चलाने को प्रेरित कर सकता है ताकि वे अपने कमजोर प्रतिद्वंद्वी पर अपनी मनमानी चला सकें.
पाकिस्तान ऑपरेशनों की विषम रणनीति अपना सकता है ताकि हवाई हमले को पचा सके, जवाबी कार्रवाई करने के मकसद से बाकी बची पर्याप्त क्षमता को सुरक्षित रख सके; और आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाकर, समुद्री मार्गों को बंद करके और अंदरूनी इलाकों में ड्रोन हमलों के लिए भाड़े के साधनों का इस्तेमाल करके युद्ध को तेज कर सके. जमीनी ऑपरेशन भी सीमित स्तर पर किया जा सकता है. विषम रणनीति का लाभ यह होता है कि लड़ाई को लंबा खींचकर परमाणु युद्ध के कगार के नीचे तक लाया जा सकता है. चीन के साथ सैन्य शक्ति में अंतर के मद्देनजर भारत को विषम रणनीति अपनानी चाहिए.
एक ज्यादा ताकतवर देश का पहले से ही वर्चस्व, और इसके साथ एक कमजोर देश द्वारा विषम प्रतिरोध—यह दोहरापन ही भविष्य में इस उपमहादेश में भावी युद्धों का स्वरूप रहेगा. भारत के लिए सैन्य चुनौती प्रतिद्वंद्वी में खौफ पैदा करने के लिए उसकी ऑपरेशन संबंधी पारंपरिक/विषम रणनीति को परास्त करने की होगी. भारत को शिकार करने वाले और शिकार बनने वाले, दोनों से सबक लेना होगा. यह कैसे किया जा सकता है, यह अपने आप में एक विषय है जिस पर मैं अगले लेख में चर्चा करूंगा.
उच्च स्तरीय और विषम टेक्नोलॉजी का मेल
अत्याधुनिक वेपन सिस्टम के साथ समस्या यह है कि हर पहलू को समेटने की कोशिश में उनका न केवल मुख्य वेपन सिस्टम बल्कि नष्ट होने वाली मिसाइल आदि भी बेहद महंगी हो जाती हैं. भारत की काफी असरदार ‘ब्रह्मोस’ मिसाइल की लागत अमेरिकी ‘टॉमहाक’ मिसाइलों की लागत से लगभग दोगुनी ज्यादा है. लगभग ट्रिलियन डॉलर वाले रक्षा बजट के बावजूद मिसाइलों की संख्या महत्वपूर्ण हो जाती है.
जरूरत थोड़ी सस्ती, कम आधुनिक मिसाइलों की है जिन्हें एक साथ बड़ी संख्या में दाग कर दुश्मन के एअर डिफेंस को परास्त किया जा सके. ईरान की 90 फीसदी मिसाइलों को तो भारी कीमत देकर नष्ट किया गया लेकिन जो 10 फीसदी मिसाइलें कारगर रहीं उन्होंने बेहद महंगे एयर डिफेंस संचारतंत्र और कमांड-व-कंट्रोल सिस्टम को भारी नुकसान पहुंचाया.
यही हाल मानव रहित एरियल सिस्टम की सबसे उपलब्ध विषम टेक्नोलॉजी का है. यह अपनी लागत की तुलना में भारी नुकसान पहुंचाती है. यह यूक्रेन और ईरान ने कर दिखाया है, जिनके पास कोई प्रभावशाली वायुसेना नहीं है. यूक्रेन के ड्रोनों ने रूसी नौसेना के बेड़े को ब्लैक सी से खदेड़ दिया. ईरान के 20-50 हजार डॉलर वाले ‘शहीद’ ड्रोनों न केवल लक्ष्यों को नष्ट किया बल्कि लागत में भारी अंतर के बूते इंटरसेप्टर मिसाइल का संकट पैदा कर दिया. ये ड्रोन 2,000 किमी तक जाकर मार कर सकते हैं और जल्दी ही इंटरकंटिनेंटल हो सकते हैं.
खाड़ी देशों के तेल, पानी एवं दूसरे आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाने के लिए ईरान की मिसाइलें और ड्रोन उपग्रह आधारित खुफियागीरी, निगरानी एवं टोही व्यवस्था (आइएसआर) से जुड़ी हैं. युद्ध के आठ सप्ताह के बाद ईरान की कम लागत वाली यह मिसाइल तथा ड्रोन क्षमता ही उसको लेकर अमेरिका में वैसा खौफ पैदा कर रही है, जो खौफ अमेरिका ईरान में अपने अत्याधुनिक विमानों, मिसाइलों और ड्रोनों से पैदा करता है. ईरान बेशक एक आधुनिक वायुसेना की कमी के कारण पिछड़ जाता है. इसके अलावा, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तथा साइबर युद्ध के क्षेत्र में कई ऐसे अत्याधुनिक वेपन और सहायक सिस्टम हैं जो विषम टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं, जिनका लाभ उठाया जा सकता है.
भारत को उच्च स्तर की टेक्नोलॉजी आधारित ऐसी वेपन सिस्टम चाहिए जिससे कम समय में ‘सदमा और दहशत’ फैलाकर सैन्य लक्ष्य हासिल किया जा सके, और विषम टेक्नोलॉजी आधारित कम लागत वाली ऐसी सिस्टम चाहिए जिसकी मदद से वह ज्यादा ताकतवर दुश्मन को लंबे युद्ध में हरा सके. यानी, इस सबका जवाब यह है कि सभी सिस्टम्स के बेहतर तालमेल का इस्तेमाल हो, और यह सब देसी ही हो.
अप्रत्यक्ष युद्ध
अनुभव जनित ज्ञान और ईरान, गज़ा तथा कुछ हद तक यूक्रेन से पिछले पांच वर्षों में मिले अनुभव यही बताते हैं कि हवाई, मिसाइल तथा ड्रोन से हमले करने वाले ज्यादा ताकतवर दुश्मन से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका ‘अप्रत्यक्ष युद्ध’ ही हो सकता है. कमांड एवं कंट्रोल, रक्षा व्यवस्था, और साजोसामान सबको भूमिगत कर दिया जाए. ‘टनेल डिफेंस’ (सुरंग) सबसे व्यावहारिक समाधान है. यहां तक कि महत्वपूर्ण सिस्टम्स का उत्पादन करने वाले रक्षा उद्योगों को भी भूमिगत किया जाए. ईरान के पास आज बची हुई मिसाइलों और ड्रोनों के कारण खौफ पैदा करने की जो ताकत है वह बीते वर्षों में ‘टनेल डिफेंस’ के विकास की वजह से ही है.
भारतीय सेना की भौतिक सुरक्षा बीते जमाने की बात हुई, आज के पारदर्शी युद्धक्षेत्र और सटीक निशाने लगाने वाले गोला-बारूद के इस युग के लिए यह नहीं प्रासंगिक नहीं है. यहां तक कि विमानों के बेहद मजबूत शेल्टर और बंकर भी जमीन के ऊपर बने हुए हैं. हमारे डिफेंस और सैन्य साजोसामान के ठिकाने भी चोटिल अंगूठों की तरह खड़े दिखाई देते हैं, जो बड़े हवाई, मिसाइल या ड्रोन हमलों में टिक नहीं सकते. यहां यह बताना उचित होगा कि अमेरिकी सेना को भी ईरान के मिसाइल एवं ड्रोन हमलों के मद्देनजर अपने असुरक्षित अड्डों को खाली करना पड़ा. हवाई हमलों का मुक़ाबला करने के लिए कोई एअर डिफेंस कभी पर्याप्त नहीं हो सकता.
भारत को भूमिगत युद्ध का सिद्धांत तुरंत बनाने और अपनाने की जरूरत है. ऐसे युद्ध के लिए पहाड़ सबसे माकूल हैं. भारत के पास विशेषज्ञता तो है ही, बस इच्छाशक्ति चाहिए.
मिसाइल व ड्रोन सेना
रणनीति और ऑपरेशन के लिहाज से मिसाइलों और ड्रोनों की तैनाती के लिए एक अलग सेना का गठन बेहद जरूरी हो गया है. मिसाइल और ड्रोन बहुपयोगी आधुनिक लड़ाकू विमान की जगह ले लेंगे इसमें तो कोई शक ही नहीं है, क्योंकि ये आज हवाई तथा जमीनी लक्ष्यों का पता लगाने, उन पर हमला करने और इलेक्ट्रोनिक/साइबर युद्ध करने के बहुद्देशीय प्लेटफॉर्म बन गए हैं. ईरान ने 2,000 किमी दूर तक मार करने वाली मिसाइलों और ड्रोनों प्रभावी इस्तेमाल कर दिखाया है. वह दिन दूर नहीं जब यह टेक्नोलॉजी पाकिस्तान को मिल जाएगी. यहां तक कि यूक्रेन ने ईरान से ‘शाहेद’ ड्रोन की टेक्नोलॉजी खरीदी है.
रणनीति तथा ऑपरेशन से जुड़े लक्ष्यों को कम लागत वाली और अंतरिक्ष आधारित ‘आइएसआर’ एवं गाइडेंस व्यवस्था से जुड़ी मिसाइलों और ड्रोनों से प्रभावी रूप से निशाना बनाने के लिए एक अलग संगठन चाहिए. सामरिक स्तर की तैनाती मौजूदा संगठनों की की जा सकती है.
मल्टी डोमेन ऑपरेशंस
मल्टी डोमेन ऑपरेशंस (एमडीओ) के तहत, दुश्मन को कई तरह से प्रभावित करने के लिए जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष, साइबर, तथा सूचना के डोमेनों में सैन्य क्षमताओं का एक साथ इस्तेमाल किया जाता है. कमांड के सभी स्तरों पर कमांड एवं कंट्रोल तथा वेपन प्लेटफॉर्मों को जवाबी कार्रवाई करने के लिए एक ही सूचना तक उनकी एक साथ पहुंच होनी चाहिए. इस क्षमता के बिना 21वीं सदी का युद्ध नहीं लड़ा जा सकता.
भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना है.
परिवर्तन जरूरी
विडंबना यह है कि एकीकृत डिफेंस स्टाफ ने ‘डिफेंस फोर्सेस विजन 2047 : अ रोडमैप फॉर फ्यूचर-रेडी इंडियन मिलिटरी’ तैयार किया है. लेकिन इसमें औपचारिक नेशनल सिक्यूरिटी विजन, नेशनल सिक्यूरिटी स्ट्रेटेजी, नेशनल डिफेंस पॉलिसी और इसके लिए अनुमानित वित्तीय व्यवस्था का कोई ख्याल नहीं रखा गया है. इसलिए सेना में चरणबद्ध परिवर्तन सुस्त गति से ही आएगा.
यूक्रेन और ईरान युद्धों ने 21वीं सदी के युद्ध का खाका पेश कर दिया है. अब समय गंवाने की कोई गुंजाइश नहीं है. सरकार को ‘सेना में परिवर्तन की इमरजेंसी’ की घोषणा कर देनी चाहिए. पाकिस्तान हमारा ईरान वाला हश्र करने को बेताब होगा. चीन हमें सेना की विषम तैनाती का मौका दिए बिना हवाई हमले करने की योजना बना रहा होगा. भारत के पास परिवर्तन करने के सिवा कोई उपाय नहीं है.
लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड के GOC इन C थे. रिटायरमेंट के बाद, वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.
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