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Tuesday, 21 April, 2026
होमफीचरनोएडा में ASI का वीरान कैंपस—289 करोड़ की लागत से बनी भव्य इमारत, 15 छात्र लेकिन कोई फैकल्टी नहीं

नोएडा में ASI का वीरान कैंपस—289 करोड़ की लागत से बनी भव्य इमारत, 15 छात्र लेकिन कोई फैकल्टी नहीं

ASI के मशहूर इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी का नोएडा में फैला हुआ नया कैंपस, 'नए भारत' की एक मिसाल बनने वाला था. सात साल बीत चुके हैं लेकिन यहां के संसाधनों का ठीक ढंग से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.

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ग्रेटर नोएडा: 26 साल के कुमार के लिए उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा पल भारत के सबसे मुश्किल टेस्ट में से एक को पास करना था. पूरे देश से इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के लिए चुने गए सिर्फ 25 छात्रों में से वह एक थे. जनवरी 2024 में, वह इस मशहूर संस्थान में गर्व से दाखिल हुए, इस उम्मीद के साथ कि वह देश के कई बेहतरीन आर्कियोलॉजिस्ट के नक्शेकदम पर चलेंगे.

इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी का अब ग्रेटर नोएडा में एक शानदार नया कैंपस है. इसका नाम भी नया है — पंडित दीनदयाल उपाध्याय इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी. 25 एकड़ में फैला और 289 करोड़ रुपये की भारी लागत से बने इस चार मंज़िला भवन की बाहरी दीवारों पर हड़प्पा-शैली की विशाल मुहरें लगी हैं. इसके ऑडिटोरियम में 900 लोगों के बैठने की जगह है और इसकी लाइब्रेरी में 20,000 से ज़्यादा किताबें हैं. जब मार्च 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया, तो उन्होंने कहा था कि एक “नया भारत” बन रहा है.

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “यह संस्थान भारत और दुनिया भर के रिसर्च स्कॉलर्स और छात्रों को आधुनिक सुविधाएं देगा.”

लेकिन कुमार का उत्साह ज़्यादा दिनों तक नहीं रहा. खुलने के सात साल बाद भी, यह एक वीरान कैंपस जैसा ही है.

कुमार ने कहा, “बुनियादी ढांचा तो पूरा था — विशाल लैब, एक म्यूज़ियम, किताबों से भरी लाइब्रेरी, विरासत जैसी दिखने वाली गैलरी. फिर भी, इनमें से ज़्यादातर चीज़ें इस्तेमाल नहीं हो रही थीं. दरवाज़े अक्सर बंद रहते थे और एक बेहतरीन शैक्षणिक संस्थान से जिस तरह की ऊर्जा की उम्मीद होती है, वह यहां नदारद थी. सब कुछ मौजूद है, लेकिन उसका सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो रहा है.”

ग्रेटर नोएडा में एएसआई के इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के कैंपस तक जाने वाली सड़क, जिसका उद्घाटन 2019 में हुआ था | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

लेकिन सबसे बड़ी निराशा की बात यह थी कि उन्होंने दिसंबर 2025 में अपना कोर्स पूरा कर लिया था, लेकिन चार महीने बाद भी वह अपने नतीजों का इंतिज़ार कर रहे हैं. और यहां कैंपस प्लेसमेंट की कोई सुविधा नहीं है और नौकरी मिलने की संभावनाएं भी काफी कम है.

इतनी भव्यता के बावजूद, इस इमारत में सबसे ऊपरी मंज़िल पर सिर्फ एक क्लासरूम इस्तेमाल में है. सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ शैक्षणिक कार्यक्रमों में बढ़ोतरी होने के बजाय, उनमें कमी ही आई है. अपनी शुरुआत से ही, इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी ने सिर्फ एक कोर्स चलाया है — आर्कियोलॉजी में पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा (PGDA). अब यह कोर्स घटकर एक साल का रह गया है और फैकल्टी के पद भी अभी तक भरे नहीं गए हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक और पुरातत्वविद रामनाथ फोनिया ने कहा कि किसी भी संस्थान को सफल होने के लिए कई कोर्स और एक पूरी रिसर्च व्यवस्था की ज़रूरत होती है.

उन्होंने आगे कहा, “किसी संस्थान का मतलब सिर्फ डिप्लोमा देना नहीं होता. संस्थान में पूरी तरह से सुधार करने के लिए एक पूरी तरह से एकीकृत दृष्टिकोण की ज़रूरत है.”

ज़्यादातर भारतीय शिक्षण संस्थानों के उलट, जिन्हें बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है, इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के पास सारा इंफ्रास्ट्रक्चर तो है, लेकिन काम को आगे बढ़ाने की कोई व्यवस्था नहीं है. अब इस पर संस्थागत भटकाव का प्रतीक बनने का खतरा मंडरा रहा है, जहां बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं व्यवस्था की अनदेखी से टकराती हैं.

एएसआई के इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी का एक खाली गलियारा, जहां डिप्लोमा कोर्स की अवधि दो साल से घटाकर एक साल कर दी गई है और दाखिले की संख्या 20-25 से घटाकर 15 कर दी गई है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

बिना शिक्षकों वाला एक संस्थान

1959 में एएसआई की अकादमिक शाखा के तहत अपनी स्थापना के बाद से दशकों तक, पुरातत्व संस्थान बिना किसी स्थायी ठिकाने के चलता रहा. यह जनपथ, फिर तिलक मार्ग, और उसके बाद लाल किले की औपनिवेशिक-युग की बैरकों में बने अस्थायी इंतज़ामों के सहारे भटकता रहा. इन बैरकों को अब संग्रहालयों में बदल दिया गया है.

जो चीज़ टस से मस नहीं हुई, वह थी इसकी अकादमिक व्यवस्था—भले ही एएसआई के पूर्व महानिदेशक नागराज राव ने 1985 में इसमें आमूल-चूल बदलाव करने की कोशिश की थी. मिर्धा समिति की इस सिफ़ारिश के तुरंत बाद कि पुरातत्व स्कूल एक शिक्षण और अनुसंधान संस्थान के तौर पर काम करे, उन्होंने औपचारिक मान्यता के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के ऐतिहासिक अध्ययन केंद्र से बातचीत की. लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला.

फोनिया ने कहा, “राव चीज़ों को व्यवस्थित बनाना चाहते थे, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए क्योंकि एएसआई के अधिकारी अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाहते थे.”

कभी-कभी तो एक महीने तक कोई क्लास ही नहीं होती थी… अकादमिक प्रबंधन बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं है.

-कुमार, पुरातत्व संस्थान के पूर्व छात्र

ग्रेटर नोएडा परिसर को संस्थान को एक मज़बूत आधार देने और एक नई शुरुआत करने का अहम मोड़ माना गया था.

फिर भी, भविष्य के पुरातत्वविदों को गढ़ने के लिए डिज़ाइन की गई एक अत्याधुनिक सुविधा होने के बावजूद, यह हैरानी की बात है कि यहां लोगों की भारी कमी है. पिछले कुछ सालों में, हर बैच में छात्रों के दाखिले की संख्या लगभग 25 सीटों से घटकर महज़ 15 रह गई है, और अभी भी यहां कोई स्थायी फैकल्टी (शिक्षक) नहीं है.

ASI के पुरातत्व संस्थान में बनी प्रयोगशालाओं के दरवाज़ों पर लगे ताले | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

यहां एकमात्र स्थायी अकादमिक उपस्थिति ASI के उन अधिकारियों की है, जो दोहरी भूमिका निभाते हुए शिक्षक के तौर पर भी काम करते हैं. अभी डायरेक्टर भुवन विक्रम—जो अहिच्छत्र में की गई अपनी खुदाई के लिए जाने जाते हैं और सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट गौतमी भट्टाचार्य—जिन्होंने पटना सर्किल में सेवाएं दी हैं—अपने ज़मीनी अनुभवों को क्लास में लेकर आते हैं. लेकिन उनकी मुख्य भूमिकाएं प्रशासनिक हैं, वे ज़्यादातर कोर्स समन्वयक के तौर पर काम करते हैं और कमियों को पूरा करने के लिए पूरे भारत से अतिथि विद्वानों को आमंत्रित करते हैं.

अशोका विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर नयनजोत लाहिड़ी ने कहा, “उच्च शिक्षा के किसी भी अकादमिक संस्थान के लिए स्थायी फैकल्टी का होना नितांत आवश्यक है. आप ऐसे विद्वानों के सहारे कोई शिक्षण कार्यक्रम नहीं चला सकते, जो बस कुछ दिनों के लिए आते हैं और बहुत ही संक्षिप्त रूप में व्याख्यान देकर चले जाते हैं.”

बीते दशकों में, भले ही इस संस्थान में पाठ्यक्रमों की विविधता की कमी रही हो, लेकिन यहां के क्लासरूम में दिग्गज लोग पढ़ाते थे, जैसे मशहूर म्यूज़ियोलॉजिस्ट सी. शिवराममूर्ति, जे.पी. जोशी, जिन्होंने धोलावीरा की खोज की, वी.एस. वाकणकर, जिन्होंने भीमबेटका की खोज की, एच.डी. सांकलिया, जिन्हें अक्सर आधुनिक भारतीय पुरातत्व का संस्थापक कहा जाता है, और बी.बी. लाल, जो भारतीय पुरातत्व के एक बड़े नाम थे और जिन्हें अक्सर बाबरी मस्जिद मामले से जोड़कर देखा जाता है.

ASI के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक (पूर्व) फणीकांत मिश्रा ने बताया, “क्लासरूम का माहौल ऐसा होता था, जैसे ‘हमने शिवराममूर्ति को देखा है’.”

अप्रैल में हिसार और हांसी में स्मारकों के दौरे के दौरान पुरातत्व के छात्र संस्थान के निदेशक भुवन विक्रम के साथ | विशेष व्यवस्था

संस्थान से ग्रेजुएट हुए कई एएसआई अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि 2000 के दशक की शुरुआत के बाद से पढ़ाई का स्तर गिरने लगा. एएसाई के मौजूदा महानिदेशक यदुबीर सिंह रावत ने एक पुरानी प्रथा की ओर इशारा किया, जिसमें विज़िटिंग प्रोफ़ेसर अपनी क्लासें तब रखते थे, जब वे किसी निजी काम से दिल्ली में होते थे, सिर्फ इसलिए ताकि उनके आने-जाने और रहने का खर्च संस्थान उठा ले.

रावत ने कहा, “यह व्यवस्था ठीक नहीं थी और इसने संस्थान की साख को काफी नुकसान पहुंचाया.”

लेकिन कोई नया सुनहरा दौर नहीं आया है. छात्रों को एक ऐसे एकेडमिक कैलेंडर का सामना करना पड़ता है जो कभी भी बदल सकता है, और क्लास का कोई तय समय नहीं होता. यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा गेस्ट लेक्चरर आता है.

एक पूर्व छात्र ने कहा, जो अब एएसआई में एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, “एक ज़माना था जब इस संस्थान का अपना ही एक अलग आकर्षण था. लेकिन अब वैसी बात नहीं रही.”

दिप्रिंट ने इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के निदेशक भुवन विक्रम से फोन कॉल, टेक्स्ट मैसेज और ईमेल के ज़रिए संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला.

बड़े-बड़े हॉल और ऊंची छतों वाला यह पुरातत्व संस्थान अपने आप में काफी भव्य दिखता है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

एक ‘प्रायोगिक’ बैच

कुमार को इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी में आते ही जल्दी ही यह साफ हो गया कि वहां कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था. वह कोई नौसिखिया नहीं थे. उन्होंने आर्कियोलॉजी में एमए किया था और राजस्थान में एक खुदाई वाली जगह की धूल भरी खाइयों में काम करते हुए काफी समय बिताया था.

जैसे ही वह वहां पहुंचे, यह साफ हो गया कि इंस्टीट्यूट में सब कुछ उथल-पुथल की स्थिति में था. कोर्स को नए सिरे से गढ़ने की बातों ने वहां एक अस्थिरता का माहौल बना दिया था.

कुमार ने याद करते हुए बताया, “हमारा बैच एक तरह का प्रयोग था. प्रशासन की तरफ से बहुत ज़्यादा अनिश्चितता थी.” वह अब NET-JRF की तैयारी कर रहे हैं, जो ह्यूमैनिटीज़ और साइंस के क्षेत्र में जूनियर रिसर्च फ़ेलोशिप के लिए होने वाली एक राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा है.

लाइब्रेरी में सिक्कों के अध्ययन (Numismatics), शिलालेखों के अध्ययन (Epigraphy), जीव विज्ञान (Zoology) और संरक्षण जैसे विषयों पर 20,000 से ज़्यादा किताबें और आर्कियोलॉजी से जुड़ी पत्रिकाएं मौजूद हैं, लेकिन वहां स्टाफ की कमी है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

हालांकि उन्होंने कहा कि लाइब्रेरी में आर्कियोलॉजी की किताबों और पत्रिकाओं का अच्छा संग्रह था, लेकिन इंस्टीट्यूट में पढ़ाई-लिखाई का अनुभव बिल्कुल भी प्रेरणादायक नहीं था. कुमार के अनुसार, क्लास का शेड्यूल दो बिल्कुल अलग-अलग स्थितियों के बीच झूलता रहता था. छात्र या तो लगातार होने वाली क्लासों में पूरी तरह से डूबे रहते थे, या फिर हफ़्तों तक बिल्कुल खाली बैठे रहते थे.

कुमार ने कहा, “कभी-कभी तो एक महीने तक कोई क्लास ही नहीं होती थी.” उन्होंने आगे बताया कि जब कभी कोई विद्वान पढ़ाने आते थे, तो वे क्लासें बहुत ही थकाने वाली और लंबी होती थीं. उन्होंने जाने-माने आर्कियोलॉजिस्ट आरएस बिष्ट के उन लेक्चरों को याद किया, जो सिंधु घाटी सभ्यता पर होते थे और देर रात तक चलते रहते थे.

इस कोर्स के लिए चुने गए छात्रों के पास पहले से ही मास्टर डिग्री होती है. उन्हें दो साल के कोर्स की ज़रूरत नहीं होती. जब मैंने यहां काम शुरू किया, तो इंस्टीट्यूट की हालत और पढ़ाई-लिखाई का स्तर बिल्कुल भी अच्छा नहीं था. वे लोग बस इंस्टीट्यूट की तरफ से मिलने वाली सुविधाओं का मज़ा ले रहे थे. इसलिए मैंने तय किया कि इसे और ज़्यादा व्यवस्थित और सटीक बनाया जाए.

– यदुबीर सिंह रावत, ASI के डायरेक्टर-जनरल

यहां तक कि वहां मौजूद भौतिक संसाधन भी छात्रों की पहुंच से बाहर ही लगते थे. कुमार ने बताया कि हालांकि इंस्टीट्यूट में एक बहुत ही अच्छी लैब है, लेकिन छात्रों को उसका इस्तेमाल करने के लिए काफी समय नहीं दिया जाता था. इस बीच, कैंपस में छात्रों के रहने का इंतिज़ाम भी बस कामचलाऊ ही था. छात्रों के हॉस्टल का मेस (खाना बनाने और खाने की जगह) छात्र खुद ही चलाते हैं. इंस्टीट्यूट छात्रों को मिलने वाले 8,000 रुपये के मासिक वज़ीफ़े में से 250 रुपये किराए के तौर पर काट लेता है, और बाकी बचे पैसों को छात्र आपस में मिलाकर अपना राशन खरीदते हैं. प्रशासन की तरफ से बस एक रसोइया ही उपलब्ध कराया जाता है.

पुरातत्व संस्थान के पास एक अच्छी तरह से सुसज्जित लैब है, लेकिन एएसआई अभी भी नमूनों की टेस्टिंग और विश्लेषण के लिए दूसरे संस्थानों पर निर्भर रहता है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

सबसे अच्छी बात कैंपस में नहीं, बल्कि 45 दिनों का एक अखिल भारतीय दौरा था, जिसमें गोवा, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे लगभग एक दर्जन राज्य शामिल थे.

उन्होंने कहा, “हमने प्रागैतिहासिक काल को समझने के लिए बादामी गुफाओं का दौरा किया और भीमबेटका गुफाओं को भी देखा.” उनके बैच के कुछ सदस्यों को खुदाई दौरे के लिए राखीगढ़ी भेजा गया और दूसरों को राजगीर, जहां उन्होंने खुदाई के काम में मदद की.

फील्ड वर्क के इस उत्साह पर प्रशासनिक गड़बड़ियों की वजह से लगातार पानी फिरता रहा. पहले सेमेस्टर के नतीजे डेढ़ साल बाद घोषित किए गए, जिससे छात्रों को बाकी तीन सेमेस्टर की परीक्षाएं एक साथ देनी पड़ीं. उनके बैच ने सिर्फ दो सालों में दो अलग-अलग डायरेक्टर देखे—टी अरुण राज और भुवन विक्रम.

कुमार ने कहा, “मुझे फील्ड दौरों में बहुत मज़ा आया और मैंने बहुत कुछ सीखा, लेकिन शैक्षणिक प्रबंधन का स्तर उतना अच्छा नहीं है.”

‘ज़्यादा सटीक’ 

जब 2023 में, गुजरात में दशकों बिताने के बाद, यदुबीर सिंह रावत ने 165 साल पुरानी एएसआई के डायरेक्टर जनरल का पद संभाला, तो उन्होंने उन चीज़ों को सख़्त करना शुरू कर दिया जिन्हें वे ढीला मानते थे. एक बदलाव एक नई कार्य योजना थी, जिसके तहत खुदाई के लाइसेंस सिर्फ उन आवेदकों को दिए जाएंगे जो कम से कम तीन साल की विस्तृत योजना जमा करेंगे. दूसरा बदलाव था इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी में डिप्लोमा की अवधि को दो साल से घटाकर एक साल करना.

1982 बैच के पूर्व छात्र रावत ने दिप्रिंट को बताया, “इस कोर्स के लिए चुने गए छात्रों के पास पहले से ही मास्टर डिग्री होती है. उन्हें दो साल के कोर्स की ज़रूरत नहीं है. जब मैंने पद संभाला, तो इंस्टीट्यूट की हालत और शैक्षणिक प्रदर्शन अच्छा नहीं था. वे बस इंस्टीट्यूट द्वारा दी गई सुख-सुविधाओं का आनंद ले रहे थे. इसलिए मैंने इसे और ज़्यादा सटीक बनाने का फैसला किया.”

पुरातत्वविद् यदुबीर सिंह रावत, जिन्हें 2023 में ASI का महानिदेशक नियुक्त किया गया | फ़ोटो: X/@ASIGoI

लेकिन इस “सटीकता” की पुरातत्व समुदाय ने आलोचना की है. कुछ लोगों का तर्क है कि यह प्रशिक्षण के मूल सार को ही खत्म कर देता है.

हालांकि पुरातत्व में एक साल के पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आम बात हैं — लंदन के UCL से लेकर आयरलैंड के गॉलवे तक, और अपने देश में पुणे के डेक्कन कॉलेज तक — लेकिन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी ने हमेशा एक अलग रास्ता चुना था. इसका विचार इस तरह का विस्तृत फील्ड प्रशिक्षण देना था जो मास्टर प्रोग्राम नहीं दे सकता था और फिर भी सैद्धांतिक मज़बूती बनाने के लिए समय बचा रहता था.

इंस्टीट्यूट के एक पुरातत्वविद और पूर्व छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “जिस तरह से इंस्टीट्यूट छात्रों को फ़ील्ड में सख़्ती से प्रशिक्षित करता था, देश का कोई दूसरा संस्थान उस तरीके की बराबरी नहीं कर सकता. कोर्स की अवधि कम करने से उस सख़्त प्रशिक्षण पर असर पड़ा है.”

अगर हालात ऐसे ही रहे, तो अच्छे लोग यहां आना बंद कर देंगे. पहले लोगों को नौकरियां मिल जाती थीं, लेकिन अब हालात बिल्कुल उलट हैं.

-शुभम केवलिया, इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के पूर्व छात्र

हालांकि, रावत इस बात को छिपाते नहीं हैं कि वे एक सुव्यवस्थित और कम ख़र्चीला संचालन चाहते हैं. जहां तक उनकी बात है, छात्रों के लिए चीज़ें बहुत ज़्यादा आसान हैं.  उन्होंने कहा, “जब हम स्टूडेंट थे, तो हमें बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता था. हमारे लिए कोई हॉस्टल नहीं थे. इस कोर्स को करने के लिए हम किराए पर रहते थे. अब, स्टूडेंट्स के पास सारी सुविधाएं हैं, लेकिन उनमें लगन की कमी है.”

2019 से 2024 के बीच, संस्कृति मंत्रालय ने इस इंस्टीट्यूट को 33.66 करोड़ रुपये का फंड दिया. स्टूडेंट्स को हर महीने 8,000 रुपये का स्टाइपेंड और एक हॉस्टल रूम मिलता है. यह रकम सीधे स्टूडेंट्स के बैंक अकाउंट में जमा की जाती है. हर साल, इंस्टीट्यूट स्टाइपेंड के तौर पर लगभग 14 लाख रुपये देता है.

स्टूडेंट्स का कहना है कि 8,000 रुपये काफी नहीं हैं, और एक दशक से ज़्यादा समय से इस रकम में कोई बदलाव नहीं किया गया है. वे यह भी कहते हैं कि इस कोर्स के सबसे बड़े फायदे—पूरे भारत का टूर और फील्ड में खुदाई का अनुभव—अब खतरे में हैं.

हरियाणा के अग्रोहा में खुदाई के दौरान 60 दिन की फील्डवर्क ट्रिप पर आर्कियोलॉजी के स्टूडेंट्स. एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि अब ऐसी ट्रिप छोटी होने की संभावना है | फोटो: खास इंतिज़ाम

इंस्टीट्यूट के प्रॉस्पेक्टस में, जिसे दिप्रिंट ने देखा है, यह बताया गया है कि PGDA को “ज़्यादा प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की ज़रूरत के हिसाब से फिर से डिज़ाइन किया गया था.” हालांकि, अब फील्ड ट्रिप छोटी की जा रही हैं.

अभी का बैच हरियाणा के अग्रोहा में 60 दिन के कैंप पर था, जहां ASI चार दशकों के बाद खुदाई कर रहा है, और इसके बाद उन्हें “पूरे भारत के टूर” पर जाना है, जिसे 10-12 राज्यों में स्मारकों और संरक्षण तकनीकों के बारे में जानकारी देने के लिए डिज़ाइन किया गया है. लेकिन एक साल के कोर्स का समय तेज़ी से बीतने के कारण, इस टूर को छोटा कर दिया गया है.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ आर्कियोलॉजी के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, “इस साल हम उन्हें सिर्फ 4-5 राज्यों में ले जाएंगे, क्योंकि हमारे पास समय कम है.”

फणीकांत मिश्रा को एक ज़्यादा गहरे अनुभव की याद आती है. उन्होंने कहा, “1980 के दशक में, स्टूडेंट्स तीन महीने तक खुदाई वाली जगहों पर ही अस्थायी इंतिज़ामात में रहते थे.”

अब कोई ‘गोल्डन टिकट’ नहीं

इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी लंबे समय से देश की सबसे मशहूर खुदाई वाली जगहों से जुड़ा रहा है — हरियाणा के राखीगढ़ी से लेकर गुजरात के धोलावीरा और उत्तर प्रदेश के सनौली तक. सनौली का मशहूर 4,000 साल पुराना रथ, पिछले साल नेशनल म्यूज़ियम में ले जाने से पहले, कई सालों तक ग्रेटर नोएडा कैंपस में रखा हुआ था.

इंस्टीट्यूट के पुराने छात्रों ने एएसआई में भी ऊंचे पदों पर काम किया है: जैसे बीएम पांडे, वाईएस रावत, संजय मंजुल. दशकों तक, इंस्टीट्यूट से मिला डिप्लोमा, असल में एएसआई में नौकरी पाने का एक ‘गोल्डन टिकट’ माना जाता था. एजेंसी के रीजनल सर्कल, इंस्टीट्यूट से सीधे असिस्टेंट आर्कियोलॉजिस्ट को नौकरी पर रखते थे, क्योंकि उन्हें फील्ड पर काम करने का बहुत अच्छा अनुभव होता था.

लेकिन, अब इंस्टीट्यूट एएसआई में नौकरी पाने का पक्का रास्ता नहीं रहा.

“पहले, इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के छात्र एएसआई में आते थे, लेकिन भर्ती के नियमों में बदलाव के बाद, उनकी संख्या कम हो गई है.”

– बीआर मणि, आर्कियोलॉजिस्ट और इंस्टीट्यूट के पूर्व डायरेक्टर

2013 में, भर्ती के नियमों में बदलाव किया गया, जिसके तहत यह ज़रूरी कर दिया गया कि असिस्टेंट आर्कियोलॉजिस्ट के पद, स्टाफ सेलेक्शन कमीशन (एसएससी) की परीक्षा के ज़रिए ही भरे जाएंगे.

कई आर्कियोलॉजिस्ट के लिए, इससे भारत में आर्कियोलॉजी की गुणवत्ता को लेकर चिंताएं खड़ी हो गई हैं, क्योंकि SSC, खास फील्ड के ज्ञान के बजाय सामान्य योग्यता (general aptitude) को ज़्यादा अहमियत देता है. अब तो, इतिहास, भूविज्ञान और मानवशास्त्र (anthropology) जैसी आर्कियोलॉजी से अलग स्ट्रीम से पोस्टग्रेजुएट डिग्री वाले उम्मीदवार भी, बिना किसी खास ट्रेनिंग के एएसआई में शामिल हो सकते हैं.

इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी की बाहरी दीवार पर हड़प्पा काल की बड़ी-बड़ी मुहरें | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

आर्कियोलॉजिस्ट और इंस्टीट्यूट के पूर्व डायरेक्टर बीआर मणि ने कहा, “पहले, इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी के छात्र एएसाई में आते थे, लेकिन भर्ती के नियमों में बदलाव के बाद, उनकी संख्या कम हो गई है.”

2013 से अब तक, एएसआई ने सर्कल लेवल पर इंस्टीट्यूट से किसी भी उम्मीदवार को नौकरी पर नहीं रखा है. जैसा कि इस महीने की शुरुआत में दिप्रिंट ने बताया था, एएसआई के 38 सर्कलों में, मंज़ूर किए गए 7,585 पदों में से, अभी 2,646 पद खाली पड़े हैं.

2013 से अब तक, ASI ने सर्कल लेवल पर इंस्टीट्यूट से किसी भी उम्मीदवार को नौकरी पर नहीं रखा है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

कुमार ने कहा, “एएसआई में अब ऐसे छात्र आ रहे हैं जिनकी आर्कियोलॉजी में कोई दिलचस्पी नहीं है.” और साथ ही यह भी जोड़ा कि यहां कैंपस प्लेसमेंट जैसी कोई चीज़ है ही नहीं.

शुभम केवलिया, जो अब दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, आर्कियोलॉजिस्ट संजय मंजुल के नेतृत्व में सनौली खुदाई पर संस्थान के काम का हिस्सा थे. उन्होंने बताया कि 2020 बैच के उनके तेरह सहपाठी अभी भी बेरोज़गार हैं और अलग-अलग सरकारी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, “अगर हालात ऐसे ही रहे, तो अच्छे लोग यहां आना बंद कर देंगे. पहले लोगों को नौकरियां मिल जाती थीं, लेकिन अब हालात बिल्कुल उलट हैं.”

एक ‘सफेद हाथी’

पुरातत्व संस्थान के ग्रेटर नोएडा कैंपस का आर्किटेक्चरल सौंदर्य भव्य है और इसमें कल्पना की कोई कमी नहीं है. यह परंपरा और आधुनिकता का बेजोड़ मेल है — चाहे वह आकार-प्रकार हो या विषय-वस्तु.

यह इमारत वास्तु शास्त्र के प्राचीन सिद्धांतों पर आधारित है. इसकी बनावट लगभग चौकोर है, और इसके लॉबी में एक ‘ब्रह्मस्थान’ है जहां सारनाथ के अशोक स्तंभ की प्रतिकृति प्रदर्शित है. गलियारे एएसआई की महत्वाकांक्षी नई खुदाई स्थलों — सनौली, बिनजोर, बरनावा के बैनरों से भरे हुए हैं. एंट्री गेट पर लगा एक पैनल यह घोषणा करता है कि इस कैंपस को ‘ग्रीन बिल्डिंग आर्किटेक्चर’ (हरित भवन वास्तुकला) के सिद्धांतों और ऊर्जा-कुशल उपायों — जैसे सौर ऊर्जा का उपयोग और जल संरक्षण पर डिज़ाइन किया गया है.

लॉबी में सारनाथ के अशोक स्तंभ की एक प्रतिकृति | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

प्रवेश द्वार पर भारतीय जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय की एक विशाल प्रतिमा भी खड़ी है, और संग्रहालय का नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा गया है. संग्रहालय की दीवार पर उनकी तस्वीर लगी है, जिसके साथ एक सूचना पट्ट भी है जिस पर लिखा है: भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दुनिया में आपका स्वागत है.

एक पुरातत्वविद् और पूर्व छात्र ने शिकायत करते हुए कहा, “दीनदयाल उपाध्याय का पुरातत्व के क्षेत्र से कोई लेना-देना नहीं है. भारतीय पुरातत्व में कई दिग्गज हुए हैं, लेकिन उन्होंने संस्थान का नाम एक राजनेता के नाम पर रखना चुना.” उन्होंने एक दशक पहले यहां से स्नातक किया था और कई बार इस कैंपस का दौरा कर चुकी हैं.

पुरातत्व संस्थान के प्रवेश द्वार पर दीनदयाल उपाध्याय की एक विशाल प्रतिमा. कुछ पुरातत्वविदों का कहना था कि उनके अपने क्षेत्र का कोई दिग्गज इस सम्मान के लिए ज़्यादा उपयुक्त विकल्प होता | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

इतनी सारी वैचारिक पृष्ठभूमि और भारी निवेश के बावजूद, यह कैंपस ज़्यादातर दिनों में वीरान ही नज़र आता है.

ऊपर उद्धृत पुरातत्वविद् ने आगे कहा, “यह एक ‘सफेद हाथी’ जैसा है. इमारत पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन वहां मौजूद संसाधनों का कोई उपयोग नहीं है. यह पैसे की पूरी तरह से बर्बादी है.”

संस्थान में तैनात एक अधिकारी ने बताया कि इस विशाल इमारत में घूमना-फिरना — जहां ASI की खुदाई शाखा और ‘राष्ट्रीय स्मारक एवं पुरावशेष मिशन’ (NMMA) के कार्यालय भी स्थित हैं — एक थकाऊ काम है, क्योंकि लिफ़्टें ज़्यादातर बंद रहती हैं और आगंतुकों को सीढ़ियों का ही इस्तेमाल करना पड़ता है.

उन्होंने आगे कहा, “संस्थान के गलियारे ज़्यादातर सुनसान ही रहते हैं.”

एक दीवार पर, दीनदयाल उपाध्याय की तस्वीर के साथ ये शब्द लिखे हैं: ‘जियो-कल्चरल नेशनलिज़्म की दुनिया में आपका स्वागत है’ | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट
यह संस्थान, और साथ ही यहां की एक गैलरी, दोनों का नाम जनसंघ के नेता दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर रखा गया है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

हालांकि, अधिकारी कहते हैं कि वे खाली कमरों की इस वीरान जगह का कोई अच्छा इस्तेमाल ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

सेंट्रल एंटीक्विटी कलेक्शन (सीएसी) से मिट्टी के बर्तन (ceramics) संस्थान में लाए जा रहे हैं, और कुछ लकड़ी के दरवाज़ों पर अब स्टिकर लगे हैं जो उन्हें CAC स्टोरेज के तौर पर पहचान देते हैं.

रावत ने कहा, “हम मिट्टी के बर्तनों को संस्थान में ला रहे हैं ताकि छात्र रिसर्च के लिए उन्हें आसानी से देख सकें.”

कैंपस में एक रिसर्च सेंटर बनाने की भी योजना है और एएसआई की एक पुरानी समस्या के लिए जगह देने की भी: खुदाई की रिपोर्ट में होने वाली देरी.

रावत ने कहा, “हमारी रिपोर्ट लिखने का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, इसलिए हम पेंडिंग काम को निपटाने की योजना बना रहे हैं.” उन्होंने आगे कहा कि खुदाई से लौटने वाले लोगों को कैंपस में ही संसाधन दिए जाएंगे ताकि वे अपनी खोजों पर रिपोर्ट लिख सकें.

सबसे पहली प्राथमिकता कैंपस में एक रिसर्च सेंटर बनाना है. उम्मीद है कि इससे एएसआई की उस समस्या को सुलझाने में मदद मिलेगी जिसमें वह अपनी खुदाई की रिपोर्ट समय पर प्रकाशित नहीं कर पाता है.

शानदार अतीत

इस संस्थान का आज का संघर्षपूर्ण दौर, इसके उस शानदार अतीत से बिल्कुल अलग है, जिसकी शुरुआत 1944 में तक्षशिला (अब पाकिस्तान में) के प्राचीन खंडहरों के बीच हुई थी. वहां, एएसआई के डायरेक्टर-जनरल मॉर्टिमर व्हीलर ने एक ट्रेनिंग स्कूल शुरू किया था. यह कदम तब उठाया गया, जब 19 वाइस-चांसलरों की सालाना बैठक में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि पुरातात्विक शोध के लिए यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट युवाओं को भर्ती करने की तत्काल ज़रूरत है.

व्हीलर ने अपने संस्मरण ‘My Archaeological Mission to India and Pakistan’ में लिखा है, “इस पर मिली प्रतिक्रिया मेरे लिए हैरान करने वाली थी—चाहे वह संख्या के लिहाज़ से हो या गुणवत्ता के लिहाज़ से—और यह प्रतिक्रिया लगभग तुरंत मिली. कुछ ही हफ़्तों के भीतर, साठ से ज़्यादा युवा ग्रेजुएट हर दिशा से आकर तक्षशिला की आकर्षक सुविधाओं के बीच इकट्ठा हो गए थे.”

इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी का परिचय बोर्ड, जिसमें इसके इतिहास, नाम में हुए बदलाव और इमारत की ‘ग्रीन’ (पर्यावरण-अनुकूल) विशेषताओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है | फोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

व्हीलर के अधीन ट्रेनिंग लेने वालों में से एक थे बी.बी. लाल, जो 1959 में स्वतंत्र भारत में नव-स्थापित ‘स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी’ के पहले डायरेक्टर बने.

वरिष्ठ पुरातत्वविद बी.एम. पांडे, जो ‘स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी’ के पहले बैच का हिस्सा थे, बड़े प्यार से उन दिनों को याद करते हैं जब यह संस्थान जनपथ में स्थित था और इसका मुख्य ज़ोर ‘फ़ील्ड वर्क’ पर होता था.

उन्होंने कहा, “इस कोर्स को इस तरह से डिज़ाइन किया गया था कि छात्रों को वास्तुकला, प्रागैतिहासिक काल और संरक्षण जैसे विषयों की स्पष्ट समझ हो जाए.”

B.B. Lal with PM Modi | Narendra Modi/Twitter
दिवंगत बी.बी. लाल, प्रधानमंत्री मोदी के साथ. उन्हें महाभारत और रामायण से जुड़े स्थलों की खुदाई करने के लिए जाना जाता था | फोटो: X/Narendra Modi

इतिहासकार देवेंद्र हांडा ने भी याद करते हुए बताया कि अपनी 20 महीने की ट्रेनिंग के दौरान, उन्होंने पूरा एक साल कैंपस से बाहर बिताया था. उन्होंने कहा कि उस समय भी, वहां कोई स्थायी फैकल्टी नहीं थी, लेकिन वहां आने वाले गेस्ट लेक्चरर एच.डी. सांकलिया और वी.एस. वाकणकर जैसी महान हस्तियां होती थीं.

रावत ने कहा, “इस संस्थान ने एएसआई के लिए पुरातत्वविदों की एक ऐसी शानदार जमात तैयार की, जो बाद में शीर्ष पदों तक पहुंची.” उन्होंने आगे बताया कि म्यांमार, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों के विद्वान भी यहां ट्रेनिंग के लिए आते थे और बाद में जिन्होंने अपने-अपने देशों के राष्ट्रीय पुरातत्व विभागों का नेतृत्व किया. लेकिन अब, कई सालों से, इन विदेशी छात्रों का यहां आना बंद हो गया है.

पुरातत्व संस्थान की विरासत को और मज़बूत बनाने की एक नई योजना, फिलहाल अधर में लटकी हुई है. 2021 में, सरकार ने घोषणा की कि वह इस संस्थान को ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज’ (IIH) में मिला देगी. यह एक नई ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ है, जिसे देश में बिखरी हुई हेरिटेज शिक्षा को एक जगह लाने के लिए बनाया गया है.

पहले ‘नेशनल म्यूज़ियम इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिस्ट्री ऑफ़ आर्ट, कंज़र्वेशन एंड म्यूज़ियोलॉजी’ के नाम से जाने जाने वाले IIH को भी जनपथ से हटाकर नोएडा में एक नए कैंपस में शिफ़्ट कर दिया गया.

मणि ने याद करते हुए कहा, “इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी को ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज’ की एक बड़ी छतरी के नीचे लाने की बात चल रही थी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.”

इस विलय के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं है और IIH फिलहाल कथित वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ियों को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका का सामना कर रहा है. कोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में सरकार से इस मामले पर जवाब मांगा था, और इसे एक “गंभीर” मामला बताया था.

ASI के पुरातत्व संस्थान की भव्य लॉबी, जिसमें अशोक के सिंह स्तंभ की एक प्रतिकृति और बिनजोर व सनौली जैसे उत्खनन स्थलों के बैनर लगे हैं | फ़ोटो: कृष्ण मुरारी | दिप्रिंट

मेस और प्लान-B

यह गिरावट सिर्फ पढ़ाई-लिखाई तक ही सीमित नहीं है. कैंपस में कुमार के दो साल के दौरान, छात्रों ने प्रशासन को हॉस्टल मेस की चिंताजनक हालत के बारे में कई चिट्ठियां लिखीं—बर्तनों में कीड़े-मकोड़ों के घोंसले बनाने से लेकर पके हुए खाने के बर्तनों के अंदर चूहों के घूमने तक के बारे में.

दिप्रिंट को मिली एक चिट्ठी में लिखा है, “काम के घंटों के बाद किचन और स्टोर रूम का एक छोटा सा चक्कर लगाने पर पता चलता है कि चूहे खाने के सामान में उधम मचा रहे हैं, आटे और चावल की बोरियों में घुसकर उन्हें कुतर रहे हैं, और किचन के काउंटरों पर पकड़म-पकड़ाई खेल रहे हैं.”

साफ-सफाई के संकट के अलावा, छात्रों ने डायरेक्टर जनरल को अपनी मासिक छात्रवृत्ति बढ़ाने के लिए भी लिखा है, जो पिछले दस सालों से बिल्कुल भी नहीं बढ़ी है.

कुमार ने कहा, “कुछ भी नहीं हुआ.”

इंस्टीट्यूट की मौजूदा हालत का एक साफ संकेत तब मिला, जब रावत अग्रोहा खुदाई वाली जगह पर छात्रों से मिलने गए. उन्होंने छात्रों को उनके करियर के लिए एक ‘प्लान-B’ (वैकल्पिक योजना) सुझाया.

उन्होंने कहा, “मैंने निजी तौर पर छात्रों को सलाह दी कि वे सिर्फ इसी कोर्स पर निर्भर न रहें, बल्कि म्यूज़ियोलॉजी जैसे दूसरे उभरते हुए क्षेत्रों को भी आज़माएं.” उन्होंने छात्रों को यह भी बताया कि कई राज्यों में नए-नए म्यूज़ियम खुल रहे हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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