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Friday, 17 April, 2026
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धार्मिक परंपराएं न्यायिक समीक्षा के दायरे में : उच्चतम न्यायालय

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नयी दिल्ली, 17 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि किसी धर्म/संप्रदाय से जुड़ीं प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है और न्यायाधीशों को धार्मिक मामलों में निर्णय देते समय अपने व्यक्तिगत धार्मिक विश्वासों से ऊपर उठकर अंतरात्मा की स्वतंत्रता एवं व्यापक संवैधानिक ढांचे को ध्यान में रखना चाहिए।

नौ-सदस्यीय की संविधान पीठ ने केरल के शबरिमला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव से संबंधित याचिकाओं और विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे व स्वरूप पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

इस संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रशांत बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

मामले में एक हस्तेक्षपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने न्यायालय में कहा कि वर्तमान संदर्भ केवल हिंदू प्रथाओं या शबरिमला मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी धर्मों, विश्वासों और अंतरात्मा से जुड़े मामलों को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक ढांचे से संबंधित है।

उन्होंने कहा, ‘‘मुद्दा यह है कि हर विश्वास और हर अंतरात्मा से जुड़े विषय पर कानून तय किया जाए।’’

धवन ने कहा कि अदालत को समाज में विभाजन की स्थिति में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति धर्म पर प्रश्न उठा सकता है, लेकिन ऐसा सम्मानजनक व सद्भावनापूर्ण होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “जब हम अंतरात्मा की स्वतंत्रता की बात करते हैं, तो उस लिहाज से यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है। मुझे राज्य और धर्म समेत किसी भी चीज को चुनौती देने की स्वतंत्रता है। यह अधिकार बहुत व्यापक है। यह हमें हर चीज पर सवाल उठाने का अधिकार देता है, लेकिन सम्मानपूर्वक और सद्भावनापूर्ण तरीके से।”

धवन ने कहा, “नफरती भाषण का प्रश्न भी माननीय न्यायाधीशों के समक्ष उठ चुका है, और मैं उसपर बात नहीं करना चाहता। लेकिन अंतरात्मा का यह अधिकार बहुत व्यापक अधिकार है। यह अधिकार हम सभी को किसी भी चीज पर प्रश्न उठाने के लिए दिया गया है, लेकिन सद्भावनापूर्ण और सम्मानजनक तरीके से।’’

इस पर न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने पूछा, “क्या आप कह रहे हैं कि अंतरात्मा धर्म से बड़ी है? क्या अंतरात्मा को धर्म की जगह ले लेनी चाहिए?”

इस दौरान न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने कहा, “आपने कहा कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता का दायरा बहुत व्यापक है। क्या आप यह संकेत दे रहे हैं कि संवैधानिक अदालत में आसीन न्यायाधीश, धर्म और अंतरात्मा को एक समान नहीं मान सकते, क्योंकि धर्म मेरे लिए बहुत निजी हो सकता है, लेकिन जब मुझे निर्णय देना होता है, तो मुझे उस धार्मिक चेतना से ऊपर उठकर उस स्तर पर जाना होता है जहां मैं उसे संवैधानिक प्रावधान के साथ संतुलित कर सकूं और फिर व्यापक दृष्टिकोण को रख सकूं।”

धवन ने उत्तर दिया कि अंतरात्मा की व्याख्या किस प्रकार की जाए, यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है और अदालत जिस रूप में उचित समझे, उसी रूप में व्याख्या कर सकती है।

उन्होंने कहा कि यदि सभी धर्मों को तर्क की कसौटी पर रखा जाए, तो वे समाप्त हो जाएंगे।

धवन ने कहा, “क्या आप यह सत्यापित कर सकते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व है? क्या आप आध्यात्मिक अनुभव को सत्यापित कर सकते हैं? आप इन चीजों को सत्यापित नहीं कर सकते। इसलिए, कुछ आस्थागत मान्यताओं को कानून का हिस्सा माना जाना चाहिए।”

धवन ने यह भी जोड़ा कि ‘संप्रदाय’ की अवधारणा को लागू करने में भारी भ्रम है।

न्यायमूर्ति कुमार ने इसपर कहा, “संप्रदायगत प्रथाएं न्यायिक समीक्षा का विषय हो सकती हैं।”

शबरिमला आचार संरक्षण समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि ने कहा कि वर्षों से चली आ रही सामूहिक परंपरा के अनुसार 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं का शबरिमला मंदिर में प्रवेश वर्जित है।

गिरि ने कहा कि प्रत्येक मंदिर की अपनी विशिष्ट पहचान होती है और उन विशेषताओं का संरक्षण पूजा का ही एक हिस्सा है।

अदालत ने दलीलें सुनने के बाद मामले की सुनवाई अगले सप्ताह तक के लिए स्थगित कर दी।

भाषा जोहेब सुरेश

सुरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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