31 मार्च की ‘डेडलाइन’ समाप्त होने से चार दिन पहले, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सली के नाम से ख्यात वामपंथी उग्रवादियों के खिलाफ आतंकवाद विरोधी ओपरेशंस की सफलता की घोषणा कर दी.
नौ राज्यों—आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, और पश्चिम बंगाल—के गृह सचिवों और पुलिस महानिदेशकों (डीजीपी) को भेजे पत्र में शाह ने इस बात की पुष्टि की कि छत्तीसगढ़ के बीजपुर तथा कांकेर, और झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम को छोड़ बाकी सभी जगहों से नक्सलवाद का लगभग सफाया कर दिया गया है. वैसे, इन राज्यों के 35 ‘लिगेसी जिले’ (नक्सलवाद के पुराने इतिहास वाले) निगरानी में रहेंगे.
वामपंथी उग्रवादियों के खिलाफ भारत की जंग में इसे वास्तव में एक परिवर्तनकारी पल कहा जाएगा. 2005 में ये उग्रवादी अपने शिखर पर थे और उनसे प्रभावित करीब 180 जिलों को तथाकथित ‘लाल गलियारा’ कहा जाता था क्योंकि नौ राज्यों में स्थित ये जिले भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से सटे हुए थे.
लेखों के इस सीरीज़ में मैं कुछ नक्सलियों और उनसे जुड़ी घटनाओं के अनुभवों को साझा करूंगा. तो शुरुआत ‘प्रथम नक्सल’ कानू सान्याल से.
चार दशक पहले, 1986 में मैं पश्चिम बंगाल सरकार में असिस्टेंट मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात किया गया था. उस समय नक्सलवादी आंदोलन कमजोर पड़ने लगा था. खास तौर से इमरजेंसी वाले दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के शासन में इस आंदोलन को काफी विखंडित कर दिया गया था.
1977 में जब वहां माकपा के नेतृत्व वाली सरकार आई तो उसने ‘ऑपरेशन बर्गा’ शुरू किया. भूमि सुधार के इस ‘ऑपरेशन’ में, बटाई पर खेती करने वालों (बर्गादारों) का कानूनी पंजीकरण शुरू किया गया. इसने जोतदारों को खेती करने के स्थायी, वंशानुगत अधिकार दिए, बेदखल किए जाने से सुरक्षा प्रदान की, और उपज में 75 फीसदी की उचित हिस्सेदारी का प्रावधान किया. जाहिर है, इससे ग्रामीण आमदनी और कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई. इसने नक्सलवादी आंदोलन के पीछे जो विचार था उसे प्रभावी रूप से बेअसर कर दिया, क्योंकि 15 लाख किसानों को भूमि का अधिकार हासिल हो गया था. लेकिन कुछ इलाके ऐसे बचे रहे जहां इस आंदोलन के समर्थक सक्रिय रहे. ये इलाके थे: मिदनापुर का झाड़ग्राम क्षेत्र और सिलीगुड़ी का नक्सलबाड़ी प्रखंड.
1987 के शुरू में, मैंने स्वेच्छा से दार्जिलिंग जिले में अपनी पोस्टिंग करवा ली. उस समय यह जिला गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के आंदोलन के थपेड़े सह रहा था. सिलीगुड़ी में जिला प्रशासन का ‘बेस कैंप’ (कु)ख्यात नक्सलबाड़ी से सटे माटीगारा प्रखंड में ‘हिमालयन मिल्क यूनियन लिमिटेड’ (हिमुल) के परिसर में स्थापित था.
वैसे, GNLF के आंदोलन और नक्सल आंदोलन में कोई संबंध नहीं था बल्कि कानू सान्याल के नेतृत्व में नक्सल लोग GNLF के नेतृत्व, खासकर सुभाष घीसिंग और उनकी मंडली को ‘पेट्टी बूर्जुआ प्रतिक्रियावादी’ मानते थे. लेकिन उस समय नक्सल नहीं बल्कि जीएनएलएफ और उसका आंदोलन ही हमारी चिंता का केंद्र था.
GNLF ने 1988 में जब ‘दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल समझौते’ पर दस्तखत कर दिया उसके बाद सिलीगुड़ी के आसपास चाय बागान वाले इलाके और खासकर नक्सलबाड़ी प्रखंड में नक्सल गतिविधियां कुछ तेज हो गईं. 1992 में मुझे ‘हिमुल’ और सिलीगुड़ी जलपाईगुड़ी विकास प्राधिकरण (SJDA) का CEO नियुक्त कर दिया गया. इसके बाद मुझे अक्सर बागडोगरा हवाई अड्डे पर प्रोटोकॉल ड्यूटी करने के लिए जाना पड़ता था. यह हवाई अड्डा नक्सलबाड़ी में पड़ता था इसलिए प्रशासन को हमेशा मुस्तैद रहना पड़ता था कि नेशनल हाइवे पर वीवीआइपी लोगों की आवाजाही में कोई बाधा न पैदा हो.
प्रथम नक्सल
उसी दौरान मुझे एक लिखित संदेश मिला कि कानू सान्याल अपना ‘प्रतिनिधिमंडल’ मेरे पास भेजना चाहते हैं. जो लोग पश्चिम बंगाल में राजनीतिक गतिविधियों के स्वरूप से अपरिचित होंगे उन्हें यह मालूम नहीं होगा कि वहां ‘प्रतिनिधिमंडल’ का अर्थ उतना अहानिकर नहीं जितना शब्दकोश में लिखा है. यह दरअसल ‘घेराव’ का दूसरा नाम था, जिसमें अक्सर टक्कर हो जाया करती थी, क्योंकि घेराव करने वालों की मांगों में कुछ ऐसी मांगें भी शामिल रहती थीं जो उस अधिकारी के अधिकार क्षेत्र से बाहर होती थीं जिन्हें ज्ञापन सौंपा जा रहा होता था.
जिला मजिस्ट्रेट, जो ‘हिमुल’ के अध्यक्ष भी थे (दुग्ध संघ का चुनाव जीएनएलएफ के आंदोलन के कारण नहीं हो सका था), के साथ विचार-विमर्श करके बैठक की एक तारीख तय की गई और पूरी सावधानी बरतते हुए स्थानीय पुलिस थाने को भी इसकी सूचना दे दी गई तथा यह अनुरोध किया गया कि उस बैठक के दौरान सादे कपड़ों में कुछ पुलिसवालों को परिसर में तैनात किया जाए.
सान्याल से मुलाक़ात ‘एंटी-क्लाइमेक्स’ साबित हुआ. उम्मीद की जा रही थी कि अपने उग्र समर्थकों के साथ आ रहे दुबले-पतले गुस्सैल बूढ़े आदमी के साथ बेहद तीखी मुठभेड़ होगी. लेकिन जो शख्स सामने आया वह चश्मा लगाए, कमजोर काया वाला था, जिसने बिना किसी भाव से अपना आठ-सूत्री मांगपत्र पढ़ा. उन्हें वहां के श्रम क़ानूनों की जानकारी थी, ‘हिमुल’ की वित्तीय स्थिति की समझ थी, और उनका रुख समझदारी भरा था. बहुत हिचकते हुए वे ‘आल चा’ (बिना दूध-चीनी की) पीने को तब राजी हुए जब मैंने उन्हें बताया कि मैं भी जेएनयू का छात्र रहा हूं.
बाद में मुझे उनसे मिलने का दो बार मौका मिला, नक्सलबाड़ी के बीडीओ ऑफिस में. तब तक उन्हें हिंसा की निरर्थकता समझ में आ गई थी. हालांकि उनकी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता कायम थी लेकिन माओवादी सिद्धांतों को चीन में जिस तरह खारिज किया गया था उसे वे कभी स्वीकार नहीं कर पाए. उनके प्रति माकपा का रुख भी दोरंगा था, माकपा का शीर्ष नेतृत्व तो उनके प्रति सहज था (ज्योति बसु ने 1977 में उन्हें आंध्र प्रदेश की जेल से रिहा करवाने में पहल की थी) लेकिन स्थानीय नेता उनके प्रति उदासीन थे, खासकर इसलिए कि कम्युनिस्ट सिद्धांतों के बारे में सान्याल के ज्ञान की बराबरी नहीं कर सकते थे.
लेकिन जब सान्याल गुजर गए तब तमाम दलों के नेता अपनी फोटो खिंचवाने के लिए उनके अंतिम दर्शन के लिए हाजिर हो गए. और सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि ब्रिटिश फोटोग्राफी एजेंसी ‘अलामी’ उनके अंतिम संस्कार की तस्वीरें 39 डॉलर की दर से बेच रही है.
ज्योति बसु के उत्तराधिकारी बने बुद्धदेव भट्टाचार्य, जो पश्चिम बंगाल को औद्योगिक युग में ले जाने को आमादा थे. लेकिन कपड़ा, हल्की इंजीनियरिंग, चमड़ा, कृषि उत्पाद संशोधन, और दवा जैसे ‘एमएसएमई’ उद्योगों को, जिनमें इस राज्य को बढ़त हासिल थी, मजबूत करने की जगह खनन और इस्पात बड़ी पूंजी खाने वाली परियोजनाओं पर ज़ोर दिया गया जिनमें बड़ी संख्या में लोगों को अपनी रिहाइश से विस्थापित होना पड़ता है. इसका एक तरफ तो महाश्वेता देवी सरीखी शहरी बुद्धिजीवियों ने जबरदस्त विरोध किया, तो दूसरी तरफ वामपंथी उग्रवादियों ने भी कड़ा विरोध किया, जो तब तक झाड़ग्राम के जनजातीय क्षेत्र में जम चुके थे.
लालगढ़ विस्फोट
यह जनजातीय क्षेत्र सुवर्णरेखा नदी के कारण झारखंड से अलग है. 2 नवंबर 2008 को लालगढ़ में सड़क पर बिछाई गई बारूदी सुरंगों के विस्फोटों से मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, केंद्रीय इस्पात मंत्री राम विलास पासवान, केंद्रीय इस्पात राज्यमंत्री जितिन प्रसाद और उद्योगपति सज्जन जिंदल का काफिला बाल-बाल बच गया. वामपंथी उग्रवादियों ने इन विस्फोटों की ज़िम्मेदारी ली. इनमें किसी की मौत तो नहीं हुई मगर राज्य के लोग दहशत में आ गए. आंतरिक इलाकों में सड़क यात्रा असुरक्षित मानी जाने लगी.
इसके तुरंत बाद सरकार ने दोतरफा जवाब दिया. एक तो पश्चिम बंगाल पुलिस और ईस्टर्न फ़्रंटियर राइफल्स (ईएफआर) की मौजूदगी ज्यादा नजर आने लगी; दूसरे, विकास से संबंधित सरकारी विभागों के वरिष्ठ सचिवों को हेलिकॉप्टर्स से इन प्रभावित गांवों में उतारा गया ताकि वे उनके हालात का जायजा लें और सभी परियोजनाओं को पटरी पर ला सकें तथा सभी खाली पड़े पदों पर नियुक्ति की जा सके. इसने यह संकेत दे दिया कि पार्टी का काडर राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाने में अक्षम हो गया है क्योंकि वे वामपंथी उग्रवादियों की हिंसक कार्रवाइयों के शिकार हो सकते थे.
इन्हीं हालात में कुछ ग्राम पंचायतों को कृषि, सहकारिता, ग्रामीण विकास, रेशम उत्पादन, मछली पालन, वन एवं पर्यावरण, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे विभागों के हम जैसे कुछ सचिवों के जिम्मे सौंपा गया था और बिनपुर 1 और बिनपुर 2 प्रखंडों के गांवों में कैंप लगाने के लिए कहा गया था. हमें पंचायतों के निर्वाचित पदाधिकारियों, स्कूल शिक्षकों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, ग्राम पंचायत सचिवों, और ‘LAMPS’ के निर्वाचित सदस्यों से विचार-विमर्श करने और उनमें भरोसा पैदा करने के लिए कहा गया.
इस तरह, ‘सरकार’ की कार्रवाई सिर्फ पुलिस एक्शन तक सीमित नहीं थी. मुख्य काम ‘नरेटिव’ को केवल ‘कानून एवं व्यवस्था’ तक सीमित न रखकर विकास से संबंधित पहल के ओर मोड़ना था. हममें से जिन लोगों ने ‘जीएनएलएफ’ से प्रभावित इलाकों में इस तरह की चुनौतियों का सामना कर लिया था उन्हें पता था कि सरकार की जवाबी कार्रवाई बहुआयामी होनी चाहिए. एक कमजोर शासन विकास नहीं ला सकता—किसी शिक्षक और हेल्थ वर्कर को, किसी डाकिये और फॉरेस्ट गार्ड को ‘जीएनएलएफ’ से या वामपंथी उग्रवादियों की ओर से कभी ‘खतरा’ या दबाव नहीं महसूस होना चाहिए. इसके लिए जरूरी है कि मजिस्ट्रेट, पुलिस, और विकास अधिकारियों अलग-अलग दिशाओं में नहीं बल्कि तालमेल के साथ काम करें.
संजीव चोपड़ा एक पूर्व IAS अधिकारी और ‘वैली ऑफ़ वर्ड्स’ के फेस्टिवल डायरेक्टर हैं. हाल तक, वे लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के डायरेक्टर थे. वे @ChopraSanjeev पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: बजट 47% बढ़ाने से सहकारी संस्थाओं की हालत नहीं सुधरेगी, इसके लिए भीतर से बदलाव करना होगा
