प्रयागराज, 14 अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि एक सरकारी कर्मचारी के विभिन्न शैक्षणिक रिकॉर्ड में जन्म तिथियों में विसंगति को तब तक धोखाधड़ी का आधार नहीं माना जा सकता जब तक कि उसमें धोखाधड़ी का तत्व मौजूद न हो या उसे तोड़ मरोड़ अथवा जानबूझकर न छिपाया गया हो।
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने यह टिप्पणी करते हुए मऊ जिले के एक सहायक शिक्षक के खिलाफ पारित बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया और राज्य प्राधिकारियों को उसे तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा, “धोखाधड़ी जैसा गंभीर निष्कर्ष केवल अस्पष्ट परिस्थितियों या रिकॉर्ड में साधारण विसंगतियों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता, चाहे वे कितनी ही असुविधाजनक क्यों न प्रतीत हों।”
याचिकाकर्ता विजय कुमार यादव को वर्ष 2014 में मऊ के एक जूनियर बेसिक स्कूल में सहायक शिक्षक नियुक्त किया गया था।
हालांकि, वर्ष 2018 में एक आरटीआई आवेदन के जरिए उनके शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की जानकारी मांगी गई, जिसमें यह सामने आया कि 1998 के हाईस्कूल रिकॉर्ड में उनकी जन्मतिथि दो जुलाई 1984 दर्ज थी, जबकि पूर्व माध्यमिक प्रमाण पत्र में जन्म तिथि सात जुलाई, 1987 अंकित है।
इस कथित विसंगति के आधार पर मऊ के बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 27 जून 2019 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश दिए।
इस बर्खास्तगी के आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने याचिका दायर की जिसमें उन्होंने दलील दी कि भर्ती प्रक्रिया के किसी भी चरण में हाईस्कूल के प्रमाण पत्र पर ना तो भरोसा किया गया और ना ही उसे प्रस्तुत किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि 2010 के बीटीसी प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश के लिए भी इसका उपयोग नहीं किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि चूंकि उक्त प्रमाणपत्र के आधार पर कोई लाभ नहीं लिया गया, इसलिए बर्खास्तगी का आदेश पूरी तरह अनुचित और कानूनी रूप से गैर जरूरी है।
अदालत ने 13 अप्रैल को दिए निर्णय में कहा, “किसी जानकारी को छिपाना, कदाचार कहलाने के लिए उसे जानबूझकर सोची समझी योजना के तहत और धोखा देने के स्पष्ट इरादे से प्रेरित होना चाहिए।”
अदालत ने बर्खास्ती का आदेश रद्द कर दिया और अधिकारियों को याचिकाकर्ता को तुरंत बहाल करने का निर्देश दिया।
भाषा सं राजेंद्र जोहेब
जोहेब
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