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Sunday, 12 April, 2026
होमदेशजहाजरानी विभाग के डीडीजी पश्चिम एशिया संघर्ष में मारे गए दीक्षित के अवशेषों को एफएसएल भेजें: अदालत

जहाजरानी विभाग के डीडीजी पश्चिम एशिया संघर्ष में मारे गए दीक्षित के अवशेषों को एफएसएल भेजें: अदालत

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मुंबई, सात अप्रैल (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने मंगलवार को जहाजरानी विभाग के उप महानिदेशक (डीडीजी)को निर्देश दिया कि वह पश्चिम एशिया संघर्ष में मारे गए 25 वर्षीय भारतीय नाविक दीक्षित सोलंकी के अवशेषों को डीएनए परीक्षण के लिए फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) में भेजें।

मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की पीठ ने कहा कि परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में डीडीजी जहाजरानी शव को प्राप्त करेंगे।

अदालत ने कहा, ‘‘इसके बाद अवशेषों को डीएनए विश्लेषण और रिपोर्ट के लिए मुंबई स्थित एफएसएल भेजा जाएगा। रिपोर्ट की प्रति परिवार को उपलब्ध कराई जाएगी।’’

दीक्षित सोलंकी की मृत्यु चार मार्च को हुई थी। एक मार्च को ओमान तट के पास विस्फोटकों से लदे ड्रोन ने तेल टैंकर एमटी एमकेडी व्योम पर हमला किया था जिसपर सोलंकी सवार थे। बताया जाता है कि वह उस संघर्ष में जान गंवाने वाले पहले भारतीय थे जो 28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले के बाद शुरू हुआ था।

सोलंकी के पिता अमृतलाल और बहन मिताली ने पिछले सप्ताह केंद्र सरकार को उनके पार्थिव शरीर को भारत लाने का निर्देश का आग्रह करते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उन्होंने दावा किया कि इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

दीक्षित के कथित अवशेष रविवार को भारत लाए गए। लेकिन अवशेषों में महज कुछ जली हुई हड्डियां थीं, इसलिए परिवार ने पहचान के लिए डीएनए जांच कराने का अनुरोध किया, ताकि वे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी कर सके।

जहाजरानी विभाग के महानिदेशक और उप महानिदेशक का पक्ष रख रहे अधिवक्ता रुई रोड्रिग्स ने मंगलवार को अदालत को बताया कि आगे की कार्रवाई के लिए सोमवार रात को महानिदेशक ने महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक, मुंबई के पुलिस आयुक्त और एफएसएल हैदराबाद और मुंबई को पत्र भेजे हैं।

इसपर पीठ ने निर्देश दिया कि उप महानिदेशक अवशेषों को प्राप्त करें और उन्हें एफएसएल मुंबई भेजें।

मृतक के परिवार की ओर से पेश हुईं अधिवक्ता प्रज्ञा तालेकर ने उच्च न्यायालय से डीएनए विश्लेषण रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए एक समय सीमा निर्धारित करने की गुजारिश की। हालांकि अदालत ने कहा कि वह ऐसा आदेश पारित नहीं कर सकती।

परिवार की ओर से दाखिल याचिका में दावा किया गया कि गरिमा का मौलिक अधिकार मृत्यु के बाद भी व्यक्ति को प्राप्त होता है, इसलिए अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे अवशेष को समय पर परिवार को लौटा दें। इसमें समुद्री नियमों और दिशानिर्देशों के तहत कानूनी दायित्वों का भी हवाला दिया गया है, जिनके अनुसार समुद्र में मृत्यु होने पर शव को स्वदेश वापस लाना अनिवार्य है।

भाषा धीरज माधव

माधव

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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