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Thursday, 9 April, 2026
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भारतीय इंडस्ट्री एनर्जी सेक्टर में ताकतवर बने और भारत के निर्माण का नेतृत्व करे

LNG को अपनाने से ही भारत को एनर्जी सुरक्षा नहीं हासिल हो जाएगी. इसके साथ रसोई, औद्योगिक क्रियाओं, और परिवहन में बिजली के उपयोग को बढ़ाना भी जरूरी होगा.

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तमाम युद्धों का इतिहास यही बताता है कि जब भी किसी राष्ट्र ने अपने उद्योग जगत से राष्ट्रहित की रक्षा करने में मदद मांगी है तब वह कभी पीछे नहीं रहा है. उदाहरण के लिए, दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी उद्योग जगत ने उत्पादन बढ़ाकर मित्र-राष्ट्रों को ताकत दी थी. उपलब्ध साहित्य बताता है कि 1939 में अमेरिका में सालाना औसतन 3,000 से भी कम सैन्य विमानों का उत्पादन हो रहा था. लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के अंत तक इसने 3 लाख से ज्यादा सैन्य विमानों का उत्पादन कर दिया था. माना जाता है कि 1944 तक मित्र-राष्ट्रों ने जितने सैन्य साजोसामान का इस्तेमाल किया उसका दो तिहाई हिस्सा अमेरिकी कारखानों में बना.

उद्योग जगत का ऐसा ही जज्बा कोविड-19 महामारी के बाद भारत में देखा गया. अभूतपूर्व मेडिकल इमरजेंसी का सामना होने पर भारत सरकार ने दवा कंपनियों से ऑक्सीज़न, टीकों, और दूसरे मेडिकल उपकरणों का उत्पादन दोगुना करने के लिए कहा. महामारी के व्यापक विस्तार के कारण काफी अभाव की स्थिति भी बनी लेकिन टीकाकरण का सफल अभियान उत्पादन में वृद्धि के बूते ही चलाया जा सका.

मध्य-पूर्व में जो युद्ध चल रहा है वह भौगोलिक रूप से हालांकि भारत का युद्ध नहीं है मगर इसने भारतीय अर्थव्यवस्था पर इनर्जी (सभी तरह की ऊर्जा) और आपूर्ति को लेकर जो दबाव बनाया है उससे हमें वर्षों तक नहीं, तो कई महीनों तक तो निबटना ही पड़ेगा. भारतीय उद्योग जगत ने सरकार से राहत के कई उपायों की मांग की है लेकिन इस संकट से इस तरह निबटना होगा कि देश की इनर्जी संबंधी जरूरतों की पूर्ति होती रहे और अभी उपलब्ध संसाधन का संतुलित ढंग से इस्तेमाल भी हो.

बिजली का प्रसार बढ़ाएं

सरकार की एक महत्वपूर्ण मांग यह है कि उद्योगों में गरम करने और पकाने के काम प्राकृतिक गैस (एलएनजी) से किए जाएं, तरल पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) पर निर्भरता खत्म की जाए. सरकार इस बदलाव पर इसलिए ज़ोर दे रही है कि एलएनजी को समुद्र के रास्ते लाना एलपीजी को लाने से ज्यादा आसान है, हालांकि दोनों गैसों के लिए भारत आयात पर निर्भर है.

उद्योग जगत एलपीजी का इस्तेमाल न करने और पाइप से आने वाली प्राकृतिक गैस को अपनाने के तरीके खोज सकता है, लेकिन यह बदलाव किसी भी प्रतिष्ठान या घर के दरवाजे तक पाइप से गैस की उपलब्धता पर निर्भर होगा. शहर में गैस वितरण (सीजीडी) के इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण ईंधन के उपभोग को बदलना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. इसलिए जरूरत इस बात की है कि सीजीडी के कर्ताधर्ता संभावित गैस उपभोक्ताओं को इसे उपलब्ध कराने की व्यवस्था तेजी से बनाना शुरू करें.

आपूर्ति से संबंधित अड़चनों के बावजूद, आयात आधारित एक भिन्न ईंधन को अपनाने से ही भारत को एनर्जी सुरक्षा नहीं हासिल हो जाएगी. देश को आज 191 MMSCMD प्राकृतिक गैस की जरूरत है जबकि वह मात्र 92 MMSCMD का ही उत्पादन कर पा रहा है. यह जरूरत हाल के वर्षों में शहरों में गैस के नेटवर्क के विस्तार के कारण बढ़ी है.

प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल बढ़ाने की किसी भी कोशिश के साथ रसोई, औद्योगिक क्रियाओं, और परिवहन में बिजली के उपयोग को बढ़ाना भी जरूरी होगा. 2031-2035 के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (एनडीसी) का जो आंकड़ा हाल में जारी किया गया है और जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया गया है उसके अनुसार बिजली उत्पादन की वर्तमान सकल क्षमता का 60 फीसदी हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन पर आधारित इनर्जी संसाधन से हासिल किया जाएगा. यानी मौजूदा 50 फीसदी के स्तर में 10 प्रतिशत-अंक की वृद्धि की जाएगी, जो देश में सौर ऊर्जा और वायु ऊर्जा के विशाल संसाधन के बूते मुमकिन है.

एनर्जी की विकेंद्रित व्यवस्था बनाएं

भारत में एथानोल उसकी मौजूदा मांग से ज्यादा मात्रा में उपलब्ध है. लोगों को, और बड़ी रसोई तथा स्टाफ परिवहन चलाने वाली कंपनियों को भी एथानोल आधारित चूल्हे और उसके मिश्रण से तैयार पेट्रोल का इस्तेमाल करना ही चाहिए. उद्योग जगत को कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) और बायोमिथेन जैसे दूसरे विकल्पों को अपनाने पर भी विचार करना चाहिए.
उद्योगों को नवीकरणीय ऊर्जा पर आधारित बिजली उत्पादन और सीबीजी संयंत्रों के लिए केंद्रित एनर्जी सिस्टम को बड़े पैमाने पर अपनाना ही होगा. इससे बिजली और गैस ग्रिड पर उनकी निर्भरता कम होगी, इसके अलावा उनका उपभोग और उनकी लागत भू-राजनीति की अनिश्चितताओं से अप्रभावित रहेगी.

भारतीय उद्योगों को एक सबसे महत्वपूर्ण उपाय यह करना चाहिए कि वे प्रक्रियाओं और इस्तेमाल में ईंधन तथा एनर्जी के मामले में कार्यकुशलता लाने पर ज़ोर दें. भारत ने फिलीपींस और श्रीलंका की तरह ईंधन के मामले में राष्ट्रीय आपातकाल भले न घोषित किया हो, उसे कार्यकुशलता के मामले में स्थापित मानदंडों का पालन जरूर करना चाहिए. सरकारी एजेंसियों, खासकर ‘ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिसिएंसी’ ने जो मानदंड घोषित किए हैं उन्हें विभिन्न चरणों में अपनाया जा रहा है लेकिन उन्हें पूरी तरह अपनाने का इससे बेहतर दूसरा समय नहीं होगा. पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय की अपनी एजेंसी ‘पेट्रोलियम कंजर्वेशन रिसर्च एसोसिएशन’ ईंधन उपभोग के बारे में जागरूकता फैलाने में प्रमुख भूमिका निभा सकती है. यही समय है जब वह अपना दायरा बढ़ा सकती है और आम लोगों को भी अपने अभियान में जोड़ सकती है.

कंपनियां एनर्जी से जुड़े मौजूदा मानदंडों में सुधार कर सकती हैं और ऐसे अभियान चलाने में वर्तमान स्थिति का उपयोग कर सकती हैं, जो कार्यकुशलता को लेकर उनकी उपलब्धियों को उजागर करें. कार्यकुशलता के उच्च स्तरों को अपनाने से यह उजागर होगा कि उद्योग जगत किस तरह आगे बढ़कर नेतृत्व कर सकता है.

भारत की एनर्जी सुरक्षा का रास्ता अब सावधानी बरतते हुए नहीं बल्कि पूरे उत्साह के साथ तय करना है—जिसमें सारे उद्योग, एनर्जी सेक्टर के बाहर के उद्योग भी इनर्जी के मामले में मजबूत भारत के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएंगे.

चंद्रजीत बनर्जी भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के महानिदेशक हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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