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Tuesday, 21 April, 2026
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‘अनमोल’ योजना से जागरूकता बढ़ेगी, बीमारी का पता चलने से जल्दी इलाज संभव होगा: विशेषज्ञ

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नयी दिल्ली, 24 मार्च (भाषा) दिल्ली सरकार द्वारा नवजात शिशुओं में आनुवंशिक और चयापचय संबंधी विकार का पता लगाने के लिए ‘अनमोल’ योजना शुरू करने की घोषणा पर चिकित्सा विशेषज्ञों ने कहा कि इससे जागरूकता बढ़ेगी और बीमारी का जल्दी पता चलने से समय पर इलाज संभव हो पाएगा और परिणामों में काफी सुधार होगा।

दिल्ली सरकार नवजातों के लिए नवजात शिशुओं की उन्नत निगरानी और इष्टतम जीवन-देखभाल (अनमोल) योजना 25 करोड़ रुपये के साथ शुरू कर रही है। इसके तहत नवजात शिशुओं के रक्त की एक बूंद का उपयोग करके 56 प्रकार के परीक्षण सरकारी और निजी दोनों अस्पतालों में पूरी तरह से निःशुल्क किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का कहना है कि ‘अनमोल’ योजना शुरुआती जांच को बढ़ावा देगी।

श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट और एक्शन कैंसर हॉस्पिटल, दिल्ली के समूह चिकित्सा निदेशक डॉ. संजीव गुप्ता के अनुसार, “ (रोग के) पता चलने वाले मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका यह मतलब नहीं है कि बीमारी के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है, बल्कि यह शुरुआती जांच के जरिए बेहतर पहचान का संकेत है।”

मैक्योर हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड के बाल रोग एवं नवजात शिशु रोग विभाग के अध्यक्ष और चिकित्सा निदेशक डॉ. संजय के जैन ने दुर्लभ बीमारियों पर इसके प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा, ‘हमें जन्मजात चयापचय संबंधी विकारों (आईईएम) और अन्य दुर्लभ बीमारियों के पहचाने गए मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है, जो पहले ‘अज्ञात कारण से शिशु मृत्यु’ के आंकड़ों में छिपकर रह जाते थे।”

चिकित्सा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस कदम से अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ेगी।

दिल्ली के रेनबो अस्पताल में जेनेटिक और फीटल मेडिसिन की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सीमा ठाकुर ने कहा, ‘नवजात शिशुओं की व्यापक स्क्रीनिंग से निदान किए गए मामलों की संख्या बढ़ेगी, और यह एक सकारात्मक बात है क्योंकि शीघ्र निदान से समय पर उपचार संभव होता है और परिणामों में काफी सुधार होता है।’

उन्होंने कहा कि नवजात शिशुओं में आनुवंशिक विकारों के बारे में जागरूकता सीमित है, खासकर शहरी क्षेत्रों से बाहर।

डॉ. गुप्ता ने कहा कि उच्च मध्यम और उच्च आय वर्ग के लोग आमतौर पर आनुवंशिक जांच का विकल्प चुनते हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि निजी संस्थानों में निदान परीक्षणों की लागत 25,000 रुपये तक हो सकती है, जबकि उपचार का खर्च सालाना लाखों में हो सकता है, खासकर दुर्लभ बीमारियों के मामले में।

डॉ. जैन ने कहा, ‘उन्नत जांचों की लागत 15,000 रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक हो सकती है, जबकि उपचार का खर्च प्रति वर्ष 50,000 रुपये से लेकर 10 लाख रुपये से अधिक तक हो सकता है।’

विशेषज्ञों ने कहा कि आनुवंशिक बीमारियां लगभग दो-तीन प्रतिशत नवजात शिशुओं को प्रभावित करती हैं।

भाषा नोमान नोमान रंजन

रंजन

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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