नयी दिल्ली, 20 मार्च (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि वह आपराधिक कानून में ‘असहमति वाले अप्राकृतिक यौन संबंध’ के लिए प्रावधान किए जाने की मांग वाली जनहित याचिका पर विचार करेगा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का फैसला डेढ़ साल बाद भी “कहीं नजर नहीं आ रहा” है।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने गंतव्य गुलाटी की याचिका को बहाल कर दिया। इससे पहले अगस्त 2024 में अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह याचिका पर विचार कर छह महीने के भीतर निर्णय ले।
याचिकाकर्ता का कहना है कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों को ‘असहमति वाले अप्राकृतिक यौन संबंध’ के मामलों में कानूनी सुरक्षा की आवश्यकता है।
अदालत ने कहा, “28 अगस्त 2024 को जारी आदेश के बाद डेढ़ साल का समय किसी भी निर्णय के लिए पर्याप्त माना जा सकता है, लेकिन अब तक कोई फैसला सामने नहीं आया है। इसलिए याचिका को उसके मूल नंबर पर बहाल किया जाता है।”
पीठ ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि उसने पहले के आदेश के अनुपालन के लिए क्या कदम उठाए हैं और उसे इस संबंध में चार सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई मई में निर्धारित की गई है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि यह “संवेदनशील मुद्दा” है और इस पर विभिन्न हितधारकों से राय मांगी गई है। उन्होंने कहा कि “समग्र दृष्टिकोण” अपनाने में समय लगेगा, खासकर जब इस पर “नया नजरिया” तैयार करना हो।
गंतव्य गुलाटी की ओर से दायर याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की तरह धारा 377 जैसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके कारण खासकर एलजीबीटीक्यू समुदाय के लोगों के पास अत्याचार के खिलाफ कानून का अभाव हो गया है।
एलजीबीटीक्यू लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर/क्वेश्चनिंग व्यक्तियों के लिए एक समावेशी शब्द है, जो यौन और लैंगिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करता है।
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