श्रीनगर: कश्मीर घाटी इस समय बादाम के गुलाबी और सफेद फूलों से रंगी हुई है, लेकिन यह खूबसूरत नज़ारा स्थानीय किसानों पर एक डर की छाया भी डाल रहा है. ये फूल इस बात का संकेत हैं कि इस साल गर्मी जल्दी और तेज़ पड़ सकती है, जिससे इस बार की बादाम की फसल बिगड़ सकती है.
पुलवामा के बादाम किसान आसिफ खान ने कहा, “देश भर से लोग बादाम के बाग देखने आते हैं, वे कहते हैं कि यह जापान जैसा लगता है, लेकिन मुझे डर है कि कुछ सालों में कश्मीर से ये थोड़े-बहुत बाग भी खत्म हो जाएंगे.” ऐसी ही चिंता घाटी के अखरोट किसानों को भी है, जो खराब उत्पादन के लिए पुराने पेड़ों और खेती के पुराने तरीकों को जिम्मेदार मानते हैं.
बादाम और अखरोट लंबे समय से कश्मीर की शान रहे हैं, लेकिन घाटी भारत के 90 फीसदी से ज्यादा बादाम और अखरोट पैदा करने के बावजूद, देश के बागान मांग का सिर्फ बहुत छोटा हिस्सा ही पूरा कर पाते हैं.
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत जितना बादाम खाता है, उसका 10 फीसदी से भी कम देश में उगाया जाता है. अखरोट का उत्पादन काफी ज्यादा है, जो मांग का 80-85 फीसदी तक पूरा करता है, लेकिन प्रीमियम क्वालिटी के लिए भारत अब भी सैकड़ों करोड़ रुपये के अखरोट आयात करता है और मांग आगे और बढ़ने वाली है, इसलिए भारत चिली, अफगानिस्तान और अमेरिका जैसे देशों के उत्पादन पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर हो रहा है.
स्वाद में हमें पता है कि हमारे बादाम और अखरोट का कोई मुकाबला नहीं है, लेकिन कैलिफोर्निया और चिली से जो सुंदर, चमकदार और बड़े ड्राई फ्रूट आते हैं—एक आम ग्राहक को वे हमारे बेढंगे उत्पादों से ज्यादा आकर्षक लगते हैं
-चडूरा के बादाम किसान मुदस्सिर
कश्मीर के ड्राई फ्रूट उत्पादक और नीति बनाने वाले लोग इस क्षेत्र को बड़ा खिलाड़ी नहीं बना पाए क्योंकि सुधार की रफ्तार धीमी रही और तरीका भी ठीक नहीं रहा. यह सेक्टर आज भी काफी हद तक एक असंगठित कुटीर उद्योग जैसा बना हुआ है, जहां केंद्रीकृत सीड बैंक, आधुनिक हार्वेस्ट तकनीक, एक जैसी क्वालिटी कंट्रोल व्यवस्था और अच्छी पैकेजिंग यूनिट्स नहीं हैं. इसकी वजह से भारतीय ट्री नट उत्पादक पीछे रह जाते हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों की बड़ी पैमाने की उत्पादन क्षमता और आकर्षक पैकेजिंग का मुकाबला नहीं कर पाते.
इस बीच, करीब एक दशक से कश्मीर के बादाम किसान धीरे-धीरे अपनी पुरानी विरासत खत्म कर रहे हैं. वे बड़े बागों को हटाकर उनकी जगह सघन सेब के पेड़ लगा रहे हैं या ज़मीन को बागवानी से हटाकर दूसरे काम में बदल रहे हैं. वहीं अखरोट के मामले में बड़ी समस्या पुराने पेड़ों की है, जिनकी पैदावार कम है.

अनियमित मौसम, संस्थागत मदद की कमी और आयात पर बढ़ती निर्भरता के बीच कश्मीरी ड्राई फ्रूट मार्केट में अपनी स्थिति खोते जा रहे हैं. अब भारत के मिडिल क्लास की मांग इतनी तेज़ी से बढ़ गई है कि कश्मीर इस उद्योग की धड़कन नहीं रहा.
भारत-अमेरिका की नई ट्रेड डील, जिसका मकसद अमेरिकी बादाम और अखरोट पर आयात शुल्क कम करना है, उसने इस पहले से चल रहे संकट को और बढ़ा दिया है. कश्मीरी किसान अब एक मोड़ पर खड़े हैं—या तो पहले की तरह छोटे उत्पादक बने रहें, जो दुनिया से मुकाबला नहीं कर पाते, या फिर व्यापार में हो रहे बदलावों के हिसाब से खुद को बदलें.
लेकिन जम्मू-कश्मीर सरकार का बागवानी विभाग अभी हार मानने को तैयार नहीं है. पिछले दो साल में वह अब भी किसानों को साथ लाने, हाई-डेंसिटी बीज, बेहतर प्रोसेसिंग सुविधाएं और एक केंद्रीकृत ड्राई फ्रूट मंडी जैसी रणनीतियां सुझाता रहा है. हालांकि, इनमें से कई कदम भारतीय नौकरशाही की सामान्य सुस्ती और रुक-रुक कर चलने वाली प्रक्रिया में फंसे हुए हैं, फिर भी सरकार को भरोसा है कि अगले एक दशक में वह ड्राई फ्रूट खेती में बड़ा बदलाव लाएगी, चाहे अमेरिका-भारत ट्रेड डील हो या न हो.
जम्मू-कश्मीर के बागवानी विभाग के निदेशक विकास आनंद ने कहा, “बादाम और अखरोट कश्मीर घाटी की ऐतिहासिक प्रजातियां हैं और सदियों से यहां उगाई जाती रही हैं, लेकिन समस्या भी यहीं है—पुरानी किस्मों में. अब उस पैटर्न में बड़े बदलाव का समय है और मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के समर्थन से हम कश्मीर को ड्राई फ्रूट्स का बड़ा केंद्र बनाएंगे.”
कैलिफोर्निया से मुकाबला
कश्मीरी किसानों और व्यापारियों के पास शिकायतों की लंबी सूची है, लेकिन वे एक बात पर पूरी तरह सहमत हैं: पुराने खेती और पैकेजिंग तरीकों की वजह से सुपरमार्केट की शेल्फ पर उनके उत्पाद दिखने की लड़ाई हार रहे हैं.
बडगाम जिले के चडूरा के बादाम किसान मुदस्सिर ने कहा, “स्वाद में हमें पता है कि हमारे बादाम और अखरोट का कोई मुकाबला नहीं है, लेकिन कैलिफोर्निया और चिली से जो सुंदर, चमकदार और बड़े ड्राई फ्रूट आते हैं—एक आम ग्राहक को वे हमारे बेढंगे उत्पादों से ज्यादा आकर्षक लगते हैं.”
पिछले एक दशक में भारत में कैलिफोर्निया के बादाम और अखरोट घर-घर में पहचाने जाने लगे हैं, क्योंकि अमेरिकी राज्य से इनका निर्यात बढ़ा है. वहां के किसान ऐसी किस्में इस्तेमाल करते हैं जो कीट-रोधी हैं और ज्यादा पैदावार देती हैं, जबकि खेती की पूरी प्रक्रिया—सिंचाई से लेकर कटाई तक—मशीनों से होती है. फसल के बाद की प्रोसेसिंग से एक जैसे, आकर्षक और अच्छी पैकिंग वाले नट्स तैयार होते हैं, जो आसानी से ग्राहकों का भरोसा जीत लेते हैं.
हम पुराने, बूढ़े बागों को हाई-डेंसिटी और ज्यादा पैदावार वाली किस्मों से बदलना चाहते हैं, ताकि किसानों को हर साल अच्छी फसल का भरोसा मिल सके
-विकास आनंद, निदेशक, जम्मू-कश्मीर बागवानी विभाग
विकास आनंद और उनकी टीम अब अगले पांच साल में कई कदमों के जरिए कश्मीर के ड्राई फ्रूट सेक्टर में आई रुकावट को तोड़ने की कोशिश में तेज़ी से जुटी है. 6 मार्च को केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ओर से आयोजित ‘फ्यूचर स्ट्रैटेजीज फॉर आल्मंड्स, वॉलनट्स एंड पाइन नट्स इन इंडिया’ सेमिनार में आनंद ने जम्मू-कश्मीर के उत्पादन में लगातार सुधार लाने का रोडमैप पेश किया.
आनंद ने कहा, “हम पुराने, बूढ़े बागों को हाई-डेंसिटी और ज्यादा पैदावार वाली किस्मों से बदलना चाहते हैं, ताकि किसानों को हर साल अच्छी फसल का भरोसा मिल सके. इसके अलावा, हम उन्हें इन पौधों को लगाने, सिंचाई करने, ओलावृष्टि और बारिश जैसी जलवायु परिस्थितियों से बचाने और वर्मी-कम्पोस्ट से खाद देने में भी मदद देंगे.” और इस कार्यक्रम के लिए बनाई गई वित्तीय मदद की योजना भी बताई.

नए पेड़, वही मौसम
श्रीनगर के राजबाग में अपने दफ्तर में बैठे आनंद को हर तरह के लोगों के फोन आते हैं—घर के पीछे दो-चार पेड़ रखने वाले छोटे अखरोट किसान से लेकर उरी और कुपवाड़ा के किसान-उत्पादक संगठनों के प्रमुखों तक. वह उन्हें केंद्र शासित प्रदेश सरकार की नई ‘हाई-डेंसिटी प्लांटेशन’ योजना से जोड़ रहे हैं, जिसे 12 फसलों के लिए घोषित किया गया है. इनमें सेब, नाशपाती, चेरी, बादाम और अखरोट भी शामिल हैं. सरकार ने इस योजना में शामिल होने वाले किसानों को 50 फीसदी सब्सिडी देने की योजना बनाई है.
आनंद ने कहा, “यह केंद्र सरकार का निर्देश है—2026 के बजट में भी उन्होंने बादाम और अखरोट को हाई-वैल्यू फसलों के रूप में महत्व दिया था. हम सिर्फ सरकार की इच्छा को लागू कर रहे हैं.”
सेब के पेड़ों की देखभाल तो एक बच्चा भी कर सकता है, इतनी आसान होती है. बादाम और अखरोट के पेड़ों के लिए कई बार मेहनत का फायदा नहीं मिलता
-पुलवामा के किसान आसिफ खान
सरकार जम्मू-कश्मीर के लिए पहले ही 10,000 चैंडलर अखरोट के पौधे मंगा चुकी है. ये पतले छिलके और जल्दी फल देने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं. इन्हें एक साल तक क्वारंटीन में रखा गया है, और जल्द ही किसानों को उनके बागों में लगाने के लिए दिया जाएगा—एक ऐसा कदम, जिससे अधिकारियों को उम्मीद है कि जम्मू-कश्मीर में अखरोट की खेती का नया दौर शुरू होगा.
लेकिन जिस इलाज से बड़ी उम्मीदें हैं, वह अभी भी गांदरबल जिले के शुहामा गांव के प्लांट क्वारंटीन सेंटर में रखा है. वहीं बडगाम के 35 साल के अखरोट किसान ज़हूर अहमद जैसे किसानों के सामने इससे भी ज्यादा ज़रूरी समस्या है—इस साल की अखरोट की फसल और उनके रोजगार पर मंडरा रही तेज गर्मी की आशंका.
सेब का फैलाव
भाई आसिफ और दानिश खान के पास उत्तर-पश्चिम कश्मीर के पुलवामा जिले में करीब 40 कनाल (5 एकड़) ज़मीन है. 40 साल से ज्यादा समय तक इस ज़मीन पर बादाम की खेती होती रही, जैसे जिले के ज्यादातर दूसरे बागों में होती थी.
दानिश ने बताया, “ये पेड़ हमारे पिता और दादा ने लगाए थे और हम उनकी देखभाल करते रहे. पुलवामा देश का सबसे बड़ा बादाम उत्पादन वाला जिला भी है, इसलिए हमने अपने आसपास सभी को यही करते देखा था.”

लेकिन अब हालात बदल गए हैं. पुलवामा के करेवा, यानी उपजाऊ पठार, अब गुलाबी और सफेद रंग की लंबी कतारों से नहीं भरे दिखते. हर कुछ एकड़ पर सेब के सूने पेड़ दिखाई देने लगे हैं, जिन्हें उन किसानों ने लगाया है जो बादाम की लंबी और थकाने वाली उत्पादन प्रक्रिया और कम बाजार रिटर्न से परेशान हो चुके हैं. 2024 में दानिश और आसिफ भी सेब लगाने वालों की इस कतार में शामिल हो गए.
आसिफ ने कहा, “जब तक बादाम और अखरोट की खेती में मुनाफा था, तब तक सब ठीक था, लेकिन न कोई संगठित बाजार है, न राज्य का सहारा, और अब तो लगता है कि प्रकृति भी हमारे साथ नहीं है. सेब की कटाई आसान है, उसमें कम खर्च लगता है, और उससे कमाई भी बहुत जल्दी शुरू हो जाती है. उनमें निवेश करना समझदारी है.”

अब लंबे बादाम के पेड़ों से खाली हो चुकी खान परिवार की जमीन पर एक जैसी, 6 फुट ऊंची, हाई-डेंसिटी सेब की पौध लगाई गई है, जिनमें इस सर्दी तक फल आने की उम्मीद है.
स्थानीय बाजार में जहां एक किलो बादाम 300 रुपये तक बिकता है, वहीं सेब सिर्फ 100 रुपये किलो बिकता है, लेकिन किसान अब समय की लागत को भी जोड़कर देख रहे हैं. एक बादाम के पेड़ को फल देने में 8-10 साल लगते हैं, जबकि सेब की नई किस्में अगले ही साल फल देने लगती हैं.
आसिफ ने कहा, “हो सकता है पहले सिर्फ 1-2 किलो सेब मिले, लेकिन कम से कम आपकी मेहनत का कुछ फल आपको तुरंत मिल जाता है. अगले साल उससे दोगुना फल आएगा, और फिर समय के साथ यह बढ़ता जाएगा. जब इतना आसान विकल्प सामने है, तो कोई किसान सालों तक बादाम के पेड़ लगाने और संभालने में क्यों लगा रहेगा?”

पुलवामा कोई अकेला मामला नहीं है. बागवानी विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में बादाम की खेती वाला क्षेत्र पिछले दो दशकों में लगातार घटा है—2006-07 में करीब 16,000 हेक्टेयर से घटकर 2024-25 में लगभग 5,500 हेक्टेयर रह गया. उत्पादन भी घटा है, जो 2006-07 में करीब 18,500 टन था और 2024-25 में लगभग 11,000 टन रह गया.
जहां पड़ोसी ज़मीनों पर बादाम के पेड़ बेतरतीब फैले हुए थे और बीच-बीच में खाली जगहें थीं, वहीं खान परिवार के नए सेब के पेड़ सीधी, सघन और अनुशासित कतारों में खड़े थे. दानिश ने कहा कि किसान एक कनाल में करीब 100 सेब के पेड़ लगा सकते हैं, जबकि बादाम के सिर्फ 10-12 पेड़ ही लगाए जा सकते हैं.

कटाई की प्रक्रिया में भी बड़ा फर्क है. जब समय आएगा, खान परिवार सिर्फ सेब तोड़ेगा, उन्हें क्रेट में पैक करेगा और भेज देगा, लेकिन बादाम किसानों के लिए कटाई एक हफ्ते लंबी प्रक्रिया होती है—पहले लंबे डंडों से फल गिराए जाते हैं, फिर उनका छिलका उतारा जाता है, सुखाया जाता है, पैक किया जाता है और बादाम सील किए जाते हैं.
आसिफ ने कहा, “सेब के पेड़ों की देखभाल तो एक बच्चा भी कर सकता है, इतनी आसान होती है. बादाम और अखरोट के पेड़ों के लिए कई बार मेहनत का फायदा नहीं मिलता.”
फिर भी, अखरोट ने सेब के इस फैलाव के सामने ज्यादा मजबूती दिखाई है.
अखरोट से एक खास लगाव
दुनिया ने पिछले 15 साल में अखरोट को ‘सुपरफूड’ के रूप में पहचाना होगा, लेकिन कश्मीरियों का इस पेड़ से रिश्ता 500 साल से भी पुराना है. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि मुगलों ने इसे 16वीं सदी में इस क्षेत्र में लाया था; जबकि कुछ दूसरे स्रोत कहते हैं कि यह इससे भी पहले आ गया था.
अहमद ने कहा, “आप बडगाम, कुपवाड़ा, उरी के किसी भी घर में चले जाइए, हर परिवार के घर के पीछे एक अखरोट का पेड़ मिलेगा. वे इसे अपने भविष्य में निवेश की तरह देखते हैं.”
अखरोट के पेड़, या जुगलंस, 100 फीट तक ऊंचे हो सकते हैं और एक सदी तक जीवित रह सकते हैं, साथ ही फल भी देते रहते हैं. राज्य के सबसे बड़े अखरोट उत्पादक जिलों में से एक बडगाम में ज्यादातर पेड़ 50 साल से भी ज्यादा पहले लगाए गए थे और अब भी फल दे रहे हैं.
पेड़ों पर ज्यादा इनपुट इस्तेमाल करने, नई हाइब्रिड किस्में उगाने, या कटाई के समय सुरक्षा उपकरण पहनने की कोई परंपरा कभी रही ही नहीं. यही वजह है कि कश्मीर में अखरोट की औसत उत्पादकता दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है
-शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ता वहीद रहमान
लेकिन यही लंबी उम्र समस्या का हिस्सा भी है. घाटी का अखरोट उद्योग काफी हद तक पुराने पेड़ों और पारंपरिक खेती के तरीकों पर टिका हुआ है. बडगाम से लेकर कुपवाड़ा, शोपियां और अनंतनाग तक, हर जिले में यही कहानी है.
शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ता वहीद रहमान, जिन्होंने कश्मीर में अखरोट की कटाई पर अपनी पीएचडी की है, उन्होंने कहा कि ज्यादातर किसान अब भी समय लेने वाले हाथ से कटाई करने के तरीकों पर निर्भर हैं. वे एक बड़ा डंडा लेकर पेड़ की खतरनाक शाखाओं पर चढ़ते हैं, फिर पेड़ को हल्के-हल्के मारते हैं, जब तक पके हुए अखरोट नीचे जमीन पर न गिर जाएं और फिर उन्हें इकट्ठा किया जाता है.

रहमान ने कहा, “पेड़ों पर ज्यादा इनपुट इस्तेमाल करने, नई हाइब्रिड किस्में उगाने, या कटाई के समय सुरक्षा उपकरण पहनने की कोई परंपरा कभी रही ही नहीं. यही वजह है कि कश्मीर में अखरोट की औसत उत्पादकता दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है.”
कश्मीर में अखरोट का उत्पादन बादाम से कहीं ज्यादा है—2023-24 में देश के कुल 3,07,000 मीट्रिक टन अखरोट में से लगभग 3,00,000 मीट्रिक टन उत्पादन इसी राज्य में हुआ था. उस साल भारत ने 2,000 मीट्रिक टन अखरोट निर्यात किए, लेकिन साथ ही 55,000 मीट्रिक टन अखरोट आयात भी किए, जो दिखाता है कि देश में मांग बहुत ज्यादा है और कश्मीरी उत्पादन उसे पूरा नहीं कर पा रहा.

भारत को और नट्स चाहिए
डल झील के पास एक ड्राई फ्रूट की दुकान पर कैलिफोर्निया के बादाम 1,000 रुपये किलो बिक रहे हैं, जबकि कश्मीरी बादाम की कीमत 1,200 रुपये है. जब रांची से आया एक दंपती विदेशी किस्म की तरफ बढ़ता है, तो दुकानदार उन्हें स्थानीय बादाम की तरफ मोड़ने की कोशिश करता है.
अपनी बात साबित करने के लिए दुकानदार ने बादाम को दबाते हुए कहा, “देखिए, ये प्रीमियम क्वालिटी है—आप इसे उंगलियों के बीच दबाइए और देखिए कि इसमें से तेल निकलता है.”
भीगे हुए बादाम खाने की रोज की आदत से लेकर दिमाग तेज करने के लिए अखरोट खाने तक, भारत में ड्राई फ्रूट्स की मांग तेजी से बढ़ रही है. नवंबर 2025 में आई केन रिसर्च की एक रिपोर्ट ने 2023 के हाउसहोल्ड कंजम्प्शन सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि 2015 के बाद से भारतीयों का नट्स और ड्राई फ्रूट्स पर प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 62 फीसदी बढ़ा है.
ड्राई फ्रूट एक्सपोर्ट कंपनी मेगांश फूड के एक्सपोर्ट मैनेजर सोहेल बुधिया ने कहा, “अब लोगों में स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा जागरूकता है और खर्च करने लायक आमदनी भी बढ़ी है, इसलिए भारतीय अब ड्राई फ्रूट्स को सिर्फ त्योहारों के खाने के रूप में नहीं बल्कि रोज की पोषण वाली चीज़ के रूप में देखते हैं. बिलकुल, हमें ज्यादा ड्राई फ्रूट चाहिए, और हम चाहते हैं कि वे सस्ते भी हों.”

बढ़ता हुआ मार्केट सिर्फ कश्मीरी किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय उद्योग के लिए एक मौका पेश करता है. केन रिसर्च की रिपोर्ट कहती है कि उपभोक्ताओं में हो रहा यह बदलाव खेती, प्रोसेसिंग और स्टोरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ा सकता है.
फिलहाल भारत अपने कुल बागवानी उत्पादन का 5 फीसदी से भी कम प्रोसेस करता है, जबकि कोल्ड-चेन इन्फ्रास्ट्रक्चर देश के सिर्फ करीब 30 फीसदी ड्राई फ्रूट उत्पादन को संभालता है. रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि प्रोसेसिंग और स्टोरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाया जाए, साथ ही इस सेक्टर में एफडीआई लाने के लिए नीतिगत सुधार किए जाएं.
रिपोर्ट में कहा गया, “घरेलू ड्राई-फ्रूट उद्योग अब भी बहुत बिखरा हुआ है, जहां शीर्ष दस खिलाड़ी अब कुल बाजार हिस्सेदारी का लगभग 33% हिस्सा रखते हैं. भारत एक अहम मोड़ पर खड़ा है: वह या तो दुनिया के उत्पादों का खरीदार बना रह सकता है या दुनिया की वैल्यू का प्रोसेसर बन सकता है.”
विरासत बनाम फसल
कश्मीर में अपनी बागवानी विरासत को बचाने और अखरोट की खेती में नई जान डालने के बीच टकराव है.
1969 का एक कानून, जम्मू एंड कश्मीर प्रिजर्वेशन ऑफ स्पेसिफाइड ट्रीज एक्ट, राजस्व विभाग की अनुमति के बिना किसी भी सार्वजनिक या निजी ज़मीन पर अखरोट का पेड़ काटने पर रोक लगाता है. इस कानून ने अखरोट के बागों को बादाम की तरह सेब के सामने खत्म होने से बचाए रखा है, क्योंकि कोई किसान पुराने पेड़ों को यूं ही उखाड़ नहीं सकता, लेकिन इससे उद्योग पुराने और कम पैदावार वाले पेड़ों के आसपास ही ठहर भी गया है.

इसका नतीजा लगभग ठहरी हुई बढ़त के रूप में सामने आया है. पिछले 20 साल में अखरोट का उत्पादन 2006-07 के 2,20,000 टन से बढ़कर 2024-25 में सिर्फ 2,90,000 टन तक पहुंचा है—यानी औसतन 1.5 फीसदी सालाना वृद्धि. जम्मू-कश्मीर बागवानी विभाग ने खुद कहा है कि वैज्ञानिक प्रबंधन और बेहतर इनपुट के बिना, बढ़ने की संभावना होने के बावजूद यह उद्योग लगभग ठहर गया है.
और बडगाम के हरे-भरे इलाके में खड़े ये बहुत ऊंचे अखरोट के पेड़ इंसानी कीमत भी वसूलते हैं. हाथ से की जाने वाली कटाई अक्सर उन युवकों की जान को खतरे में डाल देती है जो सबसे ऊंची शाखाओं से अखरोट नीचे गिराने के लिए पेड़ों पर चढ़ते हैं. पिछले साल एक स्थानीय अखबार की रिपोर्ट में कहा गया था कि सिर्फ 2025 के कटाई सीजन में ही कश्मीर भर में पांच लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा लोग फ्रैक्चर और हाथ-पैर टूटने जैसी चोटों का शिकार हुए.
अहमद ने कहा, “लोग नए अखरोट के पेड़ उगाना नहीं चाहते, क्योंकि वे अपने बच्चों के लिए वही हाल नहीं चाहते — सालों तक फल का इंतजार करो, कटाई के दौरान जान जोखिम में डालो, और फिर भी तुम्हारे अखरोट आयात किए गए माल की वजह से बाजार में महंगे पड़ जाएं.”
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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