श्रीनगर: श्रीनगर में शादियों के दौरान एक मज़ाक अक्सर सुनने को मिलता है. कहा जाता है कि सोना या शेयर बाज़ार में निवेश करने के बजाय नए शादीशुदा जोड़े ज़मीन खरीदना पसंद करते हैं.
कश्मीर के श्रीनगर में रहने वाले सलाहकार मीर अनायत ने कहा, “इस शहर में यह सबसे सुरक्षित संपत्ति है—आज कुछ खरीदो और अगले हफ्ते उसकी कीमत दोगुनी हो सकती है. हमारे लिए ज़मीन कभी अस्थिर निवेश नहीं रही.”
लेकिन अब कुछ इलाकों में कीमत 3–4 करोड़ रुपये प्रति कनाल (एक कनाल लगभग 0.125 एकड़) तक पहुंचने के कारण यह संपत्ति आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है. श्रीनगर का हाउसिंग सेक्टर संकट की स्थिति में है. पिछले तीन दशकों में तेज़ शहरीकरण से मांग और कीमतें दोनों बढ़ी हैं, जबकि शहर में जमीन की उपलब्धता किसी भी हिल स्टेशन की तरह सीमित है.
2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की रियल एस्टेट मार्केट बाहरी लोगों के लिए खुल गई. इसके साथ ही कश्मीरियों में यह चिंता भी बढ़ी कि बाहरी लोग ज़मीन खरीदकर राज्य की जनसांख्यिकी बदल सकते हैं. हालांकि, इतनी ऊंची कीमतों के कारण खरीददार बहुत कम हैं.

जम्मू-कश्मीर सरकार के अनुसार 2019 के बाद से अब तक सिर्फ 631 गैर-निवासियों ने राज्य में ज़मीन खरीदी है. इसके अलावा पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों में भी बाहरी निवेश की रफ्तार धीमी रही है.
सरकार के मार्केट वैल्यू रेट बताते हैं कि दक्षिण श्रीनगर के गुपकर सोनवार, लाल चौक और करन नगर जैसे इलाकों में रिहायशी ज़मीन की कीमत 1.5 करोड़ रुपये प्रति कनाल से ज्यादा है, जबकि कमर्शियल प्लॉट 3.5 करोड़ रुपये प्रति कनाल तक हैं. रियल एस्टेट एजेंटों के मुताबिक असली बिक्री कीमत इससे भी ज्यादा होती है और कई बार मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों की रियल एस्टेट कीमतों के बराबर पहुंच जाती है.
श्रीनगर के वित्तीय सलाहकार इरशाद मुश्ताक ने कहा, “अभी सभी जानते हैं कि शहर में ज़मीन कम है, लेकिन मांग कम नहीं हुई है. कीमतें एक सीमा तक ही बढ़ सकती हैं, उसके बाद वे एक मोड़ पर पहुंच जाएंगी.”
ज़मीन के दाम इतने ज्यादा क्यों
श्रीनगर में ज़मीन की कमी कोई अनोखी बात नहीं है. देश के लगभग हर हिल स्टेशन में खेती, निर्माण और आवास के लिए उपलब्ध ज़मीन सीमित होती है और साथ ही पर्यावरणीय कारणों से भी ज़मीन की सुरक्षा करनी पड़ती है.
इसी वजह से शिमला, मनाली या मसूरी जैसे हिल स्टेशनों में भी ज़मीन के दाम ऊंचे रहते हैं, खासकर पर्यटन के विकास और बाहरी निवेश के कारण. मुंबई की रियल एस्टेट कंपनी हाउस ऑफ अभिनंदन लोढ़ा की एक हालिया रिपोर्ट में तो शिमला में लंबी अवधि के निवेश की भी सिफारिश की गई है.
रिपोर्ट बताती है कि शिमला, मनाली, मसूरी, नैनीताल और ऊटी में ज़मीन की कीमतें कई मामलों में श्रीनगर से ज्यादा हैं.

औसतन शिमला और मनाली में ज़मीन 7,000 से 10,000 रुपये प्रति वर्ग फुट तक बिक सकती है, जबकि श्रीनगर में यह कीमत 500 से 3,000 रुपये प्रति वर्ग फुट के बीच है, लेकिन दूसरे हिल स्टेशनों में निजी विकास और निवेश लंबे समय से हो रहा है, जबकि श्रीनगर का मामला थोड़ा अलग है.
श्रीनगर के ज़मीन दलाल रसूल मल्ला ने कहा, “पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरीकरण होने के कारण श्रीनगर में ज़मीन की कीमत बढ़ी है. कश्मीर के दूसरे हिस्सों से लोग कई सालों से शहर में आ रहे हैं, जिससे ज़मीन की मांग बढ़ी है.”
उन्होंने कहा कि शहरीकरण इतना बढ़ गया है कि अब शहर के बाहरी इलाकों की ज़मीन की कीमत भी लगभग उतनी ही हो गई है जितनी पहले केंद्रीय श्रीनगर में हुआ करती थी.
श्रीनगर के विस्तार पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार 1992 में शहर में निर्मित क्षेत्र 24 वर्ग किलोमीटर था, जो 2024 में बढ़कर 108 वर्ग किलोमीटर हो गया—यानी लगभग 4.5 गुना वृद्धि. ग्रामीण इलाकों से शहर की ओर पलायन के कारण कृषि और जंगल की ज़मीन का भी बड़े पैमाने पर निर्माण क्षेत्र में बदलना हुआ. 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि श्रीनगर के कुल क्षेत्र का 36 प्रतिशत हिस्सा अब निर्मित क्षेत्र बन चुका है.
2019 के बाद ज़मीन और डोमिसाइल कानून बदलने के बाद जब दूसरे राज्यों के लोग भी जमीन खरीद सकते थे, तब सरकार द्वारा तय की गई कमर्शियल ज़मीन की कीमतों में भी तेज़ी से बढ़ोतरी हुई. 2019 और 2020 की कीमतों की तुलना से पता चलता है कि पंथाचौक, ईदगाह, बुचपोरा और डल झील के पास बुलेवार्ड रोड जैसे इलाकों में कमर्शियल ज़मीन की कीमतें 50 से 75 प्रतिशत तक बढ़ गईं.
रसूल मल्ला ने कहा, “उम्मीद थी कि बाहर से निवेश आएगा और अच्छे बिजनेस और कमर्शियल प्लॉट की मांग बढ़ेगी, लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है.”
निवेश कम क्यों
अनुच्छेद 370 हटने के बाद कई सालों तक राजनीतिक अस्थिरता और उसके तुरंत बाद आई कोविड-19 महामारी के कारण घाटी में निवेश कम रहा. अगर बाहर के निवेशक ज़मीन खरीदना भी चाहते थे, तो उन्हें यहां की खास ज़मीन व्यवस्था का सामना करना पड़ा.
आज़ादी के बाद जम्मू-कश्मीर में देश के सबसे मजबूत भूमि सुधार कानूनों में से एक लागू किया गया था. इसके तहत जमींदारी व्यवस्था खत्म कर दी गई और ज़मीन किसानों व खेती करने वालों को बिना मुआवजे के दे दी गई. इससे ज्यादातर लोग ज़मीन के मालिक बन गए, लेकिन समय के साथ विरासत में बंटते-बंटते ये जमीनें बहुत छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गईं.
मुश्ताक ने कहा, “अभी ज्यादातर ज़मीनें बहुत छोटी हैं—अब उन्हें एकड़ में नहीं, सिर्फ कनाल में मापा जाता है. भाई-भाई के बीच ज़मीन बंट जाती है और हर कोई उस पर अपना घर बना लेता है.”
उनके मुताबिक अगर कोई निजी निवेशक अब ज़मीन खरीदना चाहे तो उसे बड़े टुकड़े के लिए कई अलग-अलग मालिकों से ज़मीन जोड़नी पड़ेगी. इसके अलावा लाल चौक या शालीमार जैसे श्रीनगर के मुख्य इलाकों में तो अब खरीदने के लिए ज़मीन बची ही नहीं है.
2019 के बाद जिन 631 गैर-निवासियों ने जम्मू-कश्मीर में ज़मीन खरीदी, उनमें से करीब 350 लोग लद्दाख क्षेत्र के हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब से भी कुछ खरीदार हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है. खरीदी गई ज्यादातर ज़मीन रिहायशी मकानों के लिए है, जबकि बहुत कम कॉर्पोरेट या रिसॉर्ट मालिकों ने श्रीनगर में ज़मीन खरीदी है.
एक और कारण यह है कि ज़मीन को बागवानी, खेती, चरागाह और जंगल जैसी श्रेणियों में बांटा गया है और ज़मीन का उपयोग बदलने की प्रक्रिया काफी जटिल है. 2020 की एक अधिसूचना में सरकार की अनुमति से कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने की अनुमति दी गई थी.
हालांकि, रसूल मल्ला का कहना है कि इसका इस्तेमाल ज्यादातर स्थानीय लोग ही अपने पुराने बागों या धान के खेतों पर घर बनाने के लिए करते हैं. वजह वही है—ज़मीन की कमी.
मुश्ताक ने कहा, “बाहरी निवेश आकर्षित करने के लिए सही माहौल होना चाहिए. अभी श्रीनगर की रियल एस्टेट मार्केट नकद लेन-देन, असंगठित सौदों और निजी डेवलपर्स की बहुत छोटी भूमिका पर चलती है. ऐसे में यहां निवेश कैसे आएगा?”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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