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Monday, 16 March, 2026
होमदेशउन्नाव केस में तीन पुलिस अधिकारियों को राहत, कोर्ट ने कहा–सीएम पोर्टल की शिकायत FIR के बराबर नहीं

उन्नाव केस में तीन पुलिस अधिकारियों को राहत, कोर्ट ने कहा–सीएम पोर्टल की शिकायत FIR के बराबर नहीं

अभियोजन के अनुसार पीड़िता ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के शिकायत पोर्टल (IGRS) पर शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कुलदीप सिंह सेंगर पर यौन शोषण का आरोप लगाया गया था और पुलिस की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए गए थे.

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नई दिल्ली: दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्नाव रेप केस से जुड़ी शिकायत पर एफआईआर दर्ज न करने के आरोप में सीबीआई द्वारा अभियोजित उत्तर प्रदेश पुलिस के तीन अधिकारियों को बरी कर दिया है. अदालत ने कहा कि मुख्यमंत्री पोर्टल पर दर्ज शिकायत को एफआईआर दर्ज कराने के लिए दी गई जानकारी के बराबर नहीं माना जा सकता.

14 मार्च को फैसला सुनाते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) मयंक गोयल ने कहा कि अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 166A के तहत अपराध साबित करने के लिए जरूरी तत्वों को सिद्ध करने में असफल रहा. यह धारा उन सार्वजनिक अधिकारियों पर लागू होती है जो बलात्कार जैसे संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने के कानूनी निर्देश का जानबूझकर उल्लंघन करते हैं.

यह मामला सफीपुर के तत्कालीन सर्किल ऑफिसर कुंवर बहादुर सिंह, माखी थाने के तत्कालीन स्टेशन हाउस ऑफिसर धर्म प्रकाश शुक्ला और उसी थाने के तत्कालीन सब-इंस्पेक्टर दिग्विजय सिंह के खिलाफ दर्ज किया गया था. सीबीआई का आरोप था कि 4 जून 2017 को हुए कथित रेप मामले की जानकारी मिलने के बावजूद अधिकारियों ने एफआईआर दर्ज नहीं की. यह मामला पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर से जुड़ा था.

अभियोजन के अनुसार पीड़िता ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के शिकायत पोर्टल (IGRS) पर शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कुलदीप सिंह सेंगर पर यौन शोषण का आरोप लगाया गया था और पुलिस की निष्क्रियता पर भी सवाल उठाए गए थे. यह शिकायत जिला पुलिस को भेजी गई थी और जांच व रिपोर्ट के लिए आरोपित अधिकारियों को मार्क की गई थी.

हालांकि, अदालत ने कहा कि मुख्यमंत्री पोर्टल या इसी तरह के प्रशासनिक प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज करना दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 154(1) के तहत पुलिस थाने में संज्ञेय अपराध की जानकारी दर्ज कराने के बराबर नहीं माना जा सकता.

अदालत ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने की कानूनी जिम्मेदारी तभी बनती है जब संज्ञेय अपराध की जानकारी सीधे पुलिस अधिकारी को उस तरीके से दी जाए, जैसा धारा 154 सीआरपीसी में बताया गया है. इस मामले में सबूत से केवल इतना साबित हुआ कि सीएम पोर्टल पर शिकायत दर्ज हुई थी, जिसे बाद में जांच के लिए पुलिस को भेजा गया.

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि जिरह के दौरान पीड़िता ने माना कि 17 अगस्त 2017 को IGRS पोर्टल पर शिकायत दर्ज करने से पहले उसने कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ किसी भी पुलिस थाने में यौन शोषण की शिकायत नहीं दी थी. पीड़िता की मां ने भी अपनी गवाही में यही बात स्वीकार की.

कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 166A के तहत आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए सख्त मानक लागू होते हैं. जब तक यह संदेह से परे साबित न हो जाए कि आरोपी अधिकारी को सीधे संज्ञेय अपराध की जानकारी दी गई थी और उसने जानबूझकर उसे दर्ज नहीं किया, तब तक अपराध साबित नहीं माना जा सकता.

जज ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही बाद में इस मामले में एफआईआर दर्ज हुई और मुख्य आरोपी को दोषी ठहराया गया, लेकिन बाद की इन घटनाओं के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उस समय पुलिस अधिकारियों ने जानबूझकर अपने कानूनी कर्तव्य का उल्लंघन किया था.

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आईपीसी की धारा 166A लागू करने के लिए जरूरी आधार साबित नहीं कर पाया, इसलिए तीनों पुलिस अधिकारियों को बरी किया जाता है. अदालत ने आरोपियों के जमानती बांड को सीआरपीसी की धारा 437A के तहत स्वीकार करने का निर्देश दिया और आवश्यक औपचारिकताओं के बाद मामले की फाइल रिकॉर्ड रूम में भेजने का आदेश दिया.

इस मामले में सीबीआई की ओर से वरिष्ठ लोक अभियोजक अनुराग मोदी पेश हुए, जबकि आरोपियों की ओर से अधिवक्ता सूर्यनाथ पांडेय ने पैरवी की.

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