मावलिननॉन्ग, मेघालय: एक धूप भरी सुबह डॉ. शैलेन्द्र सिंह अपने परिवार के साथ मावलिननॉन्ग की साफ-सुथरी गलियों में घूम रहे थे. यह गांव अपनी पहचान के मुताबिक एशिया का सबसे साफ गांव तो लगा, लेकिन उस मंगलवार को सिंह पूरी तरह खुश नहीं थे. वे रविवार को आना चाहते थे, लेकिन उस दिन यहां पर्यटकों के लिए प्रवेश बंद था.
जनवरी में ईस्ट खासी हिल्स जिले के मावलिननॉन्ग ने एक ऐसा फैसला लिया जो किसी लोकप्रिय पर्यटन स्थल के लिए लगभग अनसुना है. गांव ने रविवार को पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगा दी है. यही वह दिन होता है जब यहां सबसे ज्यादा भीड़ आती है और सबसे ज्यादा कमाई होती है. गांव वालों का कहना है कि “कस्टमर ही भगवान है” वाली सोच को ठुकराने का फैसला उन्होंने इसलिए लिया ताकि उन्हें मानसिक शांति मिल सके और चर्च की प्रार्थना बिना किसी बाधा के हो सके.
इस फैसले की वजह से भारतीय वायुसेना में काम करने वाले सिंह को शिलॉन्ग से 90 किलोमीटर की यात्रा करने के लिए दो दिन की कैजुअल लीव लेनी पड़ी. उनकी हाल ही में शिलॉन्ग में पोस्टिंग हुई है.
भारतीय वायुसेना में कार्यरत डॉ. शैलेन्द्र सिंह ने कहा, “शिलॉन्ग से यहां आना बहुत लंबा सफर है. रविवार वह दिन होता है जब मैं सबसे ज्यादा आराम महसूस करता हूं. वे किसी वर्कडे को चुन सकते थे. इसके लिए मुझे छुट्टी लेनी पड़ी और एयर फोर्स में हमें बहुत ज्यादा छुट्टियां नहीं मिलतीं.”

बीस साल से ज्यादा समय तक भारत के सबसे पसंदीदा इको-टूरिज्म स्थलों में रहने के बाद अब मावलिननॉन्ग ने एक सीमा तय कर दी है. इसे पहली बार 2003 में प्रसिद्धि मिली जब डिस्कवर इंडिया मैगज़ीन ने इसे एशिया का सबसे साफ गांव बताया. स्वच्छ भारत अभियान राष्ट्रीय नारा बनने से बहुत पहले यह एक ऐसा गांव था जहां कचरे का हर टुकड़ा बांस की टोकरी में जाता था और हर निवासी, चाहे बच्चा हो या बुजुर्ग, सड़कों की सफाई और हरियाली को बनाए रखने में अपना योगदान देता था.
बीबीसी, कोंडे नास्ट और कई ट्रैवल ब्लॉग्स ने सालों तक ‘गॉड्स ओन गार्डन’ कहे जाने वाले इस गांव को कवर किया. यह अक्सर भारत के सबसे अच्छे इको-टूरिज्म स्थलों की सूची में शामिल होता रहा. 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में इसकी तारीफ की थी, वहीं 2026 में उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने एक्स पर एक पोस्ट में इसे “पूरे भारत के लिए एक रोल मॉडल” बताया.
लेकिन इस स्वर्ग जैसे गांव में पिछले कुछ सालों से परेशानियां भी बढ़ रही थीं. वीकेंड पर बसों में भरकर आने वाले पर्यटक तेज़ आवाज़ में संगीत बजाते थे. प्लास्टिक पर लगा प्रतिबंध लागू कर पाना मुश्किल होता जा रहा था. आसपास के गांवों में, जहां सफाई की परंपरा इतनी मजबूत नहीं है, वहां अब कचरा जमा होने लगा है.
कुछ महीने पहले एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक फिनलैंड का व्यक्ति, जिसकी शादी एक खासी महिला से हुई है, कुछ भारतीय पर्यटकों को ज़मीन पर प्लास्टिक की बोतलें फेंकने के लिए डांट रहा था. इंस्टाग्राम पर इस वीडियो पर 1800 से ज्यादा टिप्पणियां आईं, जिनमें कई लोगों ने कहा कि पर्यटकों में नागरिक समझ की कमी है.
यह टूरिस्ट के लिए बेहतर है क्योंकि पहले लोग रविवार को कुछ दुकानें या कैफे खुले होने पर निराश हो जाते थे. अब कम से कम उन्हें पता है कि नहीं आना है
—बाह प्रेशियस, गांव की कमेटी के फाइनेंस सेक्रेटरी
इसके कुछ ही समय बाद गांव प्रशासन ने फैसला किया कि अब बहुत हो चुका. रविवार को पर्यटकों का प्रवेश बंद रहेगा. इसकी जानकारी सोशल मीडिया, टैक्सी चालकों और टूर ऑपरेटरों के जरिए दी गई. होमस्टे चलाने वालों के पास यह विकल्प है कि वे अपने मेहमानों को सेवा दें या नहीं, लेकिन जो लोग वहां रुकते हैं उन्हें पहले ही बता दिया जाता है कि रविवार को उन्हें पूरी सुविधाएं नहीं मिल सकतीं.
गांव के प्रवेश मार्ग पर कोई बैरिकेड नहीं है, लेकिन एक छोटा सा बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है, ‘रविवार को पर्यटकों का प्रवेश वर्जित है’. जो लोग फिर भी पहुंच जाते हैं, उन्हें आमतौर पर टिकट काउंटर पर मौजूद गांव वाले वापस लौटा देते हैं.
गांव समिति के वित्त सचिव बाह प्रेशियस ने कहा, “पहले भी कई गांव वाले रविवार को अपने कारोबार बंद रखते थे. पहले सिर्फ एक-दो कैफे और दुकानें खुलती थीं, लेकिन अब इस सूचना के बाद हर दुकान और कैफे बंद रहेगा. हम कभी-कभी लोगों को अंदर आने देते हैं, लेकिन उन्हें बता देते हैं कि उन्हें ज्यादा सेवाएं नहीं मिलेंगी.”

मावलिननॉन्ग ने यह फैसला क्यों लिया?
रविवार को पर्यटकों के लिए गांव बंद करने का फैसला अचानक नहीं लिया गया. लगातार आने वाले पर्यटक, गाड़ियां और कैमरों की भीड़ ने गांव की उस दिनचर्या और परंपराओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया था जिन्हें गांव वाले बहुत महत्व देते हैं.
गांव वालों का कहना है कि इस मुद्दे पर कई सालों से गांव परिषद की साप्ताहिक बैठकों में चर्चा होती रही थी, लेकिन इस साल डोरबार, यानी गांव परिषद की वार्षिक सभा में एक बड़ा प्रस्ताव रखा गया. प्रस्ताव था कि रविवार को पर्यटकों का प्रवेश बंद कर दिया जाए और इस दिन को चर्च और सामुदायिक कार्यक्रमों के लिए सुरक्षित रखा जाए. नियम की घोषणा से पहले गांव के परिवारों और होमस्टे मालिकों से भी राय ली गई और बाह प्रेशियस का कहना है कि किसी ने इसका विरोध नहीं किया.

गांव समिति के वित्त सचिव बाह प्रेशियस ने कहा, “यह फैसला गांव की सांस्कृतिक पहचान को बचाने और उस अनुशासन को बनाए रखने के लिए लिया गया है जिसकी वजह से मावलिननॉन्गपहले अलग पहचान बना पाया था.”
इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जारी सूचना में इस बदलाव के तीन कारण बताए गए. पहला चर्च की प्रार्थना, दूसरा रविवार को जब गांव वाले सेवाएं नहीं देते तो उससे पर्यटकों को होने वाली असुविधा और तीसरा यह कि “ऐसी स्थितियों से गांव की ‘एशिया का सबसे साफ गांव’ वाली मेहनत से कमाई गई प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुंचे.”
गांव में सफाई को लेकर यह जुनून सौ साल से भी ज्यादा पुराना है. गांव वाले इसकी शुरुआत उन्नीसवीं सदी के आखिर में खासी हिल्स में आए ईसाई मिशनरियों से जोड़ते हैं. उस समय गांव में प्लेग जैसी गंभीर बीमारियां फैलने की बात कही जाती है. मिशनरियों ने धर्म के साथ-साथ साफ-सफाई को भी सुरक्षा के रूप में बताया. उन्होंने लोगों से आसपास का माहौल साफ रखने, कपड़े धोने और पीने के पानी को उबालने की सलाह दी. धीरे-धीरे ये आदतें रोजमर्रा के अनुशासन का हिस्सा बन गईं.
मावलिननॉन्ग आने वाले पर्यटक शैलेन्द्र सिंह ने कहा, “दूसरे गांव भी हैं, लेकिन जिसे सबसे साफ गांव कहा जाता है वह मावलिननॉन्ग ही है. अगर मुझे किसी गांव को ही देखना होता तो मैं शिलॉन्ग के आसपास ही देख सकता था.”
तब से यहां गर्व की बात कभी महंगा घर होना नहीं रहा, बल्कि बिल्कुल साफ घर होना रहा है. यहां सफाई एक तरह की पूजा बन गई है. यही गर्व पूरे गांव में दिखाई देता है. सिंगल यूज प्लास्टिक और प्लास्टिक बैग पर पूरी तरह प्रतिबंध है. गांव के अंदर जाने वाले रास्तों पर बांस के कूड़ेदान रखे गए हैं और कचरे को अलग-अलग करके फेंका जाता है.
सार्वजनिक स्थानों की देखभाल सिर्फ किसी समिति की जिम्मेदारी नहीं है. हर परिवार इसमें हिस्सा लेता है और अगर कोई कचरा फैलाता है तो गांव समिति मौके पर ही जुर्माना लगाती है.
यही सामूहिक भावना इसे भारत में एक अनोखी जगह बनाती है. मावलिननॉन्ग में औसतन रोज करीब 300 पर्यटक आते हैं. अक्टूबर से अप्रैल के बीच जब मेघालय में पर्यटन का सीजन होता है, तब यह संख्या 500 तक पहुंच जाती है.

फरवरी के एक मंगलवार की दोपहर को करीब एक घंटे में लगभग 50 पर्यटक गांव पहुंचे. इनमें सिंह का परिवार, कुछ बुजुर्गों का समूह और कई जोड़े शामिल थे जो खूबसूरत जगहों पर सेल्फी ले रहे थे. गांव वालों का कहना है कि ज्यादातर पर्यटक असम और पश्चिम बंगाल जैसे आसपास के राज्यों से आते हैं. हालांकि कोविड के बाद दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों से आने वाले पर्यटकों की संख्या भी बढ़ी है.
पर्यटकों की बढ़ती संख्या के साथ गांव को साफ रखना और मुश्किल हो गया है. पहले झाड़ू लगाना और कचरा उठाना गांव वाले अनौपचारिक तरीके से खुद ही संभाल लेते थे, लेकिन बढ़ती भीड़ के कारण यह मुश्किल होने लगा. आखिरकार प्रशासन को गांव के ही कुछ लोगों को सार्वजनिक जगहों की सफाई और कचरा इकट्ठा करने के लिए काम पर रखना पड़ा.
गांव समिति के वित्त सचिव बाह प्रेशियस ने कहा, “कुल 15-20 लोग ऐसे हैं जो कर्मचारी के तौर पर सड़कों और फुटपाथों की सफाई करते हैं. शनिवार को हम पूरे गांव में सफाई अभियान चलाते हैं जिसमें सभी लोग मिलकर सफाई करते हैं, लेकिन रविवार चर्च के लिए होता है, इसलिए वे 15-20 कर्मचारी भी उस दिन छुट्टी पर रहते हैं.”
एक दिन की छुट्टी की कीमत
आर्थिक नज़रिए से देखें तो मावलिननॉन्ग का यह फैसला थोड़ा उल्टा लगता है.
सुपारी और झाड़ू घास की पारंपरिक खेती के साथ अब यहां पर्यटन उद्योग भी तेज़ी से बढ़ा है. सिर्फ 104 घरों वाले इस गांव में सात होमस्टे हैं, लेकिन आसपास के इलाके में बुकिंग वेबसाइट्स पर करीब 96 होमस्टे सूचीबद्ध हैं. मेघालय के प्रसिद्ध लिविंग रूट ब्रिज देखने जाने वाले लगभग हर पर्यटक के रास्ते में यह गांव पड़ता है. जनवरी में भारत ने इन लिविंग रूट ब्रिज को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दिलाने के लिए नामित भी किया है.
पर्यटन से गांव को अच्छी आमदनी हुई है. सिर्फ पार्किंग के लिए हर वाहन से 200 रुपये लिए जाते हैं. वहीं स्थानीय परिवारों द्वारा चलाए जाने वाले होमस्टे और छोटे भोजनालयों में पर्यटकों की अच्छी आवाजाही रहती है. होमस्टे में एक रात रुकने का किराया संपत्ति, भोजन और कमरे के आकार के अनुसार 1,000 से 5,000 रुपये के बीच होता है. गांव वालों का कहना है कि जैसे-जैसे पर्यटन बढ़ा, वैसे-वैसे कीमतें भी धीरे-धीरे बढ़ती गईं. गांव के बाहर कई स्मृति चिन्ह बेचने वाली दुकानें खुल गई हैं और कई घरों के बाहर छोटे बोर्ड लगे हैं जिन पर कमरे या चाय की दुकान की जानकारी दी गई है.

हालांकि, बाह प्रेशियस का कहना है कि सप्ताहांत की भीड़ से होने वाली कमाई को छोड़ना लंबे समय में पर्यटन के लिए बेहतर भी हो सकता है. इससे पर्यटकों को पहले से ही साफ जानकारी मिल जाएगी.

गांव समिति के वित्त सचिव बाह प्रेशियस ने कहा, “यह पर्यटकों के लिए भी बेहतर है, क्योंकि पहले जब रविवार को बहुत कम दुकानें या कैफे खुले होते थे तो लोग निराश हो जाते थे. अब कम से कम उन्हें पहले से पता होगा कि उस दिन नहीं आना है.”
24 साल की बारिसुख खोंगजी गांव में एक छोटा सा कैफे चलाती हैं. यहां आने वाले पर्यटकों को वह शाकाहारी और मांसाहारी थाली, मैगी, फ्राइज, चाय, कॉफी और जूस परोसती हैं. नए नियम से पहले भी वह रविवार को अपनी दुकान बंद रखती थीं. अब बाकी लोग भी ऐसा ही कर रहे हैं.
कैफे चलाने वाली बारिसुख खोंगजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह फैसला अच्छा है.”

साफ-सुथरे दायरे के बाहर
शैलेन्द्र और उनकी पत्नी गुंजन ने दिन भर फूलों से सजे रास्तों, खूबसूरत घरों और गमलों से सजे आंगनों की तस्वीरें लीं. अपने आरामदायक होमस्टे में उन्होंने ताजा खाना खाया, जिसमें जैविक मिर्च और टमाटर से बनी चटनी भी थी. उनका कहना था कि यह गांव वैसा ही है जैसा इसके बारे में बताया जाता है.
पास में और भी कई जगहें हैं. मावलिननॉन्ग मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले में बांग्लादेश सीमा के पास बसे गांवों के एक समूह का हिस्सा है. एक किलोमीटर दूर रिवाई गांव में लिविंग रूट ब्रिज है और दावकी अपने साफ और पारदर्शी उमंगोट नदी के लिए जाना जाता है, लेकिन मावलिननॉन्ग जितनी प्रसिद्धि उसके पड़ोसी गांवों को नहीं मिली है. गुजरने वाले पर्यटकों की वजह से वहां कुछ चाय की दुकानें और छोटी दुकानें जरूर चलती हैं, लेकिन आसपास के गांव खुद पर्यटन स्थल नहीं बन पाए हैं.
पर्यटक खास तौर पर मावलिननॉन्ग देखने आते हैं. अगर वे रविवार को पहुंचते हैं तो उनकी यात्रा बेकार हो जाती है, कोई दूसरा विकल्प नहीं मिलता.
मावलिननॉन्ग आने वाले पर्यटक शैलेन्द्र सिंह ने कहा, “दूसरे गांव भी हैं, लेकिन जिसे सबसे साफ गांव कहा जाता है वह मावलिननॉन्गही है. अगर मुझे किसी गांव को ही देखना होता तो मैं शिलॉन्ग के आसपास ही देख सकता था.”
मावलिननॉन्ग को भारत के लिए एक मॉडल गांव कहा जाता है, लेकिन गांव के बाहर जाने वाली सड़कों पर प्लास्टिक की बोतलें और स्नैक्स के रैपर बिखरे हुए मिलते हैं. आसपास के गांवों के लोग कहते हैं कि पर्यटकों की गाड़ियां अक्सर मावलिननॉन्ग के बाहर रुकती हैं और वहां कचरा छोड़ देती हैं. गांव की सीमा के बाहर कचरा प्रबंधन या सफाई को लेकर कोई संगठित व्यवस्था नहीं है.

रिवाई गांव के एक निवासी ने कहा, “मावलिननॉन्ग इसलिए मावलिननॉन्ग है क्योंकि यहां सफाई और कचरा प्रबंधन को लेकर सख्त सामुदायिक नियम हैं जिन्हें हर घर मानता है. हम भी कोशिश करते हैं, लेकिन उस मॉडल को दोहराने के लिए ज्यादा मेहनत और सामूहिक भागीदारी चाहिए, जो यहां नहीं है.”

लेकिन अगर दूसरे गांव भी कभी ‘मॉडल’ बन जाएं, तब भी रविवार को काम बंद रखने की परंपरा सिर्फ मावलिननॉन्ग तक सीमित नहीं है. नोंगज्रोंग गांव ने अपने लोकप्रिय सनराइज व्यू प्वाइंट को रविवार को बंद रखा है. मावलिननॉन्ग के पास स्थित स्काई व्यू बांग्लादेश व्यू प्वाइंट भी उस दिन बंद रहता है. रिवाई में भी रविवार को दुकानें और बाजार बंद रहते हैं.
दरअसल काम और पूजा को रविवार को अलग रखने की भावना अपनाने में मावलिननॉन्ग शायद थोड़ा देर से आगे आया.
मावलिननॉन्ग में अपने कैफे पर बारिसुख खोंगजी ने कहा, “बाकी छह दिन मैं अपने लिए जीती हूं और एक दिन भगवान के लिए ज़रूरी है.”
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