नयी दिल्ली, छह मार्च (भाषा) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष का जिक्र करते हुए शुक्रवार को कहा कि बदलती भू-राजनीति के इस दौर में महासागर एक बार फिर दुनिया के शक्ति संतुलन के केंद्र में आ गए हैं और भारत की जिम्मेदारी है कि वह आत्मविश्वास एवं क्षमता के साथ नेतृत्व प्रदान करे।
सिंह ने कोलकाता में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पश्चिम एशिया में हो रहे घटनाक्रम ‘‘बेहद असामान्य’’ हैं और क्षेत्र की स्थिति का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘पश्चिम एशिया में जो हो रहा है, वह बेहद असामान्य है। इस समय इस पर कोई ठोस टिप्पणी करना कठिन है कि पश्चिम एशिया में परिस्थितियां आगे किस दिशा में जाएंगी।’’
रक्षा मंत्री ने कहा, ‘‘यदि हम होर्मुज जलडमरूमध्य या फारस की खाड़ी के पूरे क्षेत्र को देखें तो यह दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जब इस क्षेत्र में अशांति या व्यवधान होता है तो इसका सीधा असर तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘आज हम केवल ऊर्जा क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी आपूर्ति शृंखला में व्यवधान देख रहे हैं। इन अनिश्चितताओं का सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार पर पड़ता है।’’
सिंह ने कहा, “वैश्विक परिदृश्य एक असामान्य स्थिति में है। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि यह असामान्य स्थिति अब सामान्य होती जा रही है।”
ईरान द्वारा फारस की खाड़ी व ओमान की खाड़ी के बीच स्थित संकरे जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य को लगभग अवरुद्ध किए जाने के बाद वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आया है।
वैश्विक तेल और एलएनजी का लगभग 20 प्रतिशत परिवहन इसी जलमार्ग से होता है।
सिंह ने कहा कि पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थिति ने एक बार फिर महासागरों के महत्व को उजागर किया है। उन्होंने कहा, ‘‘बदलती वैश्विक भू-राजनीति के इस दौर में महासागर एक बार फिर दुनिया के शक्ति संतुलन के केंद्र में आ गए हैं। ऐसे समय में एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र के रूप में भारत की जिम्मेदारी है कि वह आत्मविश्वास, क्षमता और स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ नेतृत्व प्रदान करे।’’
रक्षा मंत्री ने हालांकि दो दिन पहले श्रीलंका के तट के पास अमेरिका द्वारा एक ईरानी युद्धपोत को डुबोए जाने की घटना का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई जिक्र नहीं किया।
ईरानी युद्धपोत ‘आईरिस देना’ भारत की मेजबानी में आयोजित ‘मिलन’ बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद स्वदेश लौट रहा था। इस हमले में कम से कम 87 ईरानी सैन्यकर्मी मारे गए। यह घटना फारस की खाड़ी से बाहर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष को दर्शाती है।
अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर सैन्य हमले किए थे जिनमें ईरान के सर्वोच्चा नेता अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए थे।
इस सैन्य हमले के बाद ईरान ने मुख्य रूप से इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन तथा सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए हमले किए।
पिछले तीन दिनों में दोनों पक्षों की ओर से हमलों और जवाबी हमलों के बीच यह संघर्ष काफी बढ़ गया है।
सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि अगर भारत समन्वित योजना, प्रौद्योगिकी अपनाने और संस्थागत तालमेल के साथ आगे बढ़ता है, तो भारत का समुद्री क्षेत्र सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत होगा।
उन्होंने कहा, “भारतीय नौसेना की तत्परता ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी सफल कार्रवाइयां और आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए कदम यह दर्शाते हैं कि भारत का रक्षा क्षेत्र सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।”
रक्षा मंत्री ने कहा, “अगर हम इस समुद्री दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए मिलकर काम करें, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपने हितों की रक्षा करेगा बल्कि वैश्विक समुद्री स्थिरता में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। हमारा लक्ष्य 2030 तक भारत को जहाज निर्माण करने वाले शीर्ष 10 देशों में शामिल करना और 2047 तक शीर्ष पांच में पहुंचना है।”
सिंह ने घरेलू रक्षा विनिर्माण में भारत की बढ़ती क्षमता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 2024-25 में घरेलू रक्षा उत्पादन 1.50 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया जबकि रक्षा निर्यात लगभग 24,000 करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया।
रक्षा मंत्री ने कहा कि अप्रैल 2026 तक रक्षा निर्यात लगभग 29,000 करोड़ रुपये होने की संभावना है। उन्होंने बताया कि सरकार ने 2029-2030 तक 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा उपकरण निर्यात करने का लक्ष्य तय किया है।
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