लखनऊ: भारतीय चीते का एक दांत — जो 1940 के दशक से विलुप्त माना जाता है लखनऊ के बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान की लैब में सुरक्षित रखा है और उसकी स्टडी होने का इंतज़ार कर रहा है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इससे उस बिग कैट प्रजाति का इतिहास फिर से समझा जा सकेगा, जो कभी पूरे भारत में पाई जाती थी, लेकिन करीब आधी सदी पहले खत्म हो गई.
दुनिया में पहली बार बिरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (BSIP) और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) मिलकर इस विलुप्त भारतीय चीते के पूरे न्यूक्लियर जीनोम को सीक्वेंस करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए सुरक्षित रखे गए पुराने सैंपल्स से डीएनए निकालकर उसकी स्टडी की जा रही है.
BSIP की प्राचीन डीएनए लैब का नेतृत्व कर रहे डॉ. नीरज राय ने कहा, “हम जानते हैं कि भारतीय चीते आधी सदी से ज्यादा पहले खत्म हो गए, लेकिन क्या हमें पता है कि क्यों? क्या कारण आनुवंशिक थे या इंसानों से जुड़े? भारतीय चीते का विकासक्रम क्या था? यह जीनोम सीक्वेंसिंग प्रोजेक्ट इन सभी सवालों के जवाब दे सकता है.”
28 फरवरी को जब अफ्रीकी चीतों का तीसरा समूह बोत्सवाना से मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क पहुंचा, उसी समय डॉ. राय की टीम और ZSI 150 से 200 साल पुराने सैंपल से भारतीय चीते के न्यूक्लियर डीएनए की सीक्वेंसिंग के अंतिम चरण में हैं. भारत में पाए जाने वाले चीतों को एशियाई चीता कहा जाता है, लेकिन ईरान और सऊदी अरब में वर्तमान में पाए जाने वाले अन्य एशियाई चीतों से उनमें कुछ आनुवंशिक अंतर भी हैं.
इन आनुवंशिक अंतरों की जानकारी भारत के बड़े ‘चीता पुनर्स्थापन परियोजना’ को समझने में मदद कर सकती है. इस परियोजना की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में की थी. इससे भारत और दुनिया को भारतीय चीते के बारे में बेहतर समझ मिल सकती है.
पूरे जीनोम की सीक्वेंसिंग किसी भी प्रजाति के आनुवंशिक इतिहास को जानने का सामान्य वैज्ञानिक तरीका है, लेकिन किसी विलुप्त जानवर के लिए यह काम अलग और ज्यादा कठिन होता है. सही डीएनए सैंपल ढूंढना, खराब और कमजोर हो चुके डीएनए को बिना नुकसान पहुंचाए निकालना, यह सब बहुत मेहनत वाला काम है. यही वह जगह है जहां ZSI और BSIP की संयुक्त क्षमता काम आई.
ZSI के स्तनपायी और अस्थि विज्ञान अनुभाग के प्रभारी वरिष्ठ वैज्ञानिक मुकेश ठाकुर ने कहा, “ZSI के पास देश में जानवरों के सैंपल का सबसे बड़ा कलेक्शन है, जिसमें विलुप्त जानवर भी शामिल हैं. म्यूजियम के सैंपल और पुराने शिकार ट्रॉफी में भी प्राचीन डीएनए होता है, जिन्हें हम वर्गीकरण और शोध दोनों के लिए सुरक्षित रखते हैं. हमने ऐसे 10 से 12 ऐतिहासिक भारतीय चीते के नमूने BSIP में विश्लेषण के लिए दिए.”
दूसरी ओर, BSIP दक्षिण एशिया की पहली संस्था है जहां प्राचीन डीएनए सीक्वेंसिंग की स्पेशल लैब है. ZSI की निदेशक डॉ. धृति बनर्जी ने BSIP के साथ इस सहयोग को भारत के समृद्ध प्राणी संग्रह को आधुनिक जीनोमिक विज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया.
उन्होंने कहा, “ZSI के पास अमूल्य ऐतिहासिक नमूने सुरक्षित हैं. BSIP की प्राचीन डीएनए लैब के साथ साझेदारी से हम इनसे महत्वपूर्ण आनुवंशिक जानकारी प्राप्त कर रहे हैं. ऐसे संयुक्त प्रयास न केवल भारतीय चीते जैसी विलुप्त प्रजातियों को समझने में मदद करते हैं, बल्कि देश में भविष्य की संरक्षण योजनाओं के लिए मजबूत वैज्ञानिक आधार भी प्रदान करते हैं.”
जीनोम सीक्वेंसिंग का प्रोसेस
यह सिर्फ भारतीय चीते तक सीमित नहीं है. बीएसआईपी और ज़ेडएसआई ने अन्य विलुप्त और संकटग्रस्त प्रजातियों, जैसे मालाबार सिवेट, जावन गैंडा, नामदाफा उड़न गिलहरी और सुमात्रा गैंडा के लिए भी जीनोम सीक्वेंसिंग किया है. कुछ जीनोम सीक्वेंसिंग स्टडी अभी जारी हैं, जैसे भारतीय चीते का, जबकि कुछ इंटरनेशनल जीनोमिक स्टडी मैगज़ीन में प्रकाशित होने के लिए सहकर्मी समीक्षा की प्रक्रिया में हैं.
नीरज राय ने कहा, “भारतीय चीते लंबे समय तक हमारे देश का गौरव थे, मुगलों के समय से लेकर ब्रिटिश काल तक. हमें जानने का हक है कि उनके साथ क्या हुआ और क्या हम उन्हें किसी तरह वापस ला सकते हैं.”
सफेद पीवीसी सूट पहने डॉक्टरेट शोधार्थी अपर्णा द्विवेदी प्राचीन डीएनए लैब के साफ कमरे में बैठी हैं और छोटी-छोटी कांच की शीशियों को ध्यान से देख रही हैं. इन शीशियों में चीते के दांतों का पिसा हुआ चूर्ण रखा है, जिसमें डीएनए मौजूद है. वह ईडीटीए और प्रोटीनाज़ के जैसे रासायनिक अभिकर्मक मिलाने की तैयारी कर रही हैं, ताकि हड्डी के चूर्ण में फंसा डीएनए बाहर निकाला जा सके.
द्विवेदी ने समझाया, “जीवित प्राणियों में हमें डीएनए हर जगह मिल जाता है—लार, बाल और खून में भी, लेकिन मात्रा अलग-अलग होती है. ताज़ा सैंपल में हम सिर्फ एक माइक्रोग्राम ऊतक से 10,000 नैनोग्राम तक सुरक्षित डीएनए निकाल सकते हैं, लेकिन प्राचीन नमूनों में एक ग्राम हड्डी से 100 नैनोग्राम डीएनए निकालने के लिए भी बहुत मेहनत करनी पड़ती है.”
देश के सबसे पुराने पौधों, जानवरों और चट्टानों के सैंपल को संजोए हुए भवन में स्थित बीएसआईपी की प्राचीन डीएनए लैब में द्विवेदी का काम उस शोध पर आधारित है जो पिछले तीन दशकों में शुरू हुआ. शोधकर्ताओं ने पहली बार 1986 में पाया कि दांत का गूदा डीएनए को सुरक्षित रख सकता है. हालांकि, 1998 में फ्रांस के वैज्ञानिकों की एक टीम ने 16वीं सदी के कंकाल अवशेषों से प्राचीन डीएनए सफलतापूर्वक निकाला और उसका विश्लेषण किया.

चूंकि यह प्राचीन डीएनए है, इसलिए इसके खराब होने और दूषित होने की संभावना बहुत अधिक होती है. अगर डीएनए को ठंडी और सूखी जगह पर रखा जाए तो यह लाखों साल तक सुरक्षित रह सकता है, लेकिन भारत की नम और उष्णकटिबंधीय जलवायु प्राकृतिक वातावरण में डीएनए के लंबे समय तक सुरक्षित रहने के लिए अनुकूल नहीं है—जो सैंपल मिले हैं, उन्हें ज़ेडएसआई ने सावधानी से सुरक्षित रखा है.
राय ने कहा, “प्राचीन डीएनए विश्लेषण ने हमारे डीएनए और इतिहास को देखने का तरीका बदल दिया है. ज्यादातर पुरातत्वविद अपने खोजे गए अवशेषों का आकार और बनावट देखकर अध्ययन करते हैं और कार्बन डेटिंग से समय का पता लगाते हैं, लेकिन डीएनए विश्लेषण से अतीत को समझने की एक नई दुनिया खुल गई है.”
बीएसआईपी में 2018 में शुरू हुई राय की प्राचीन डीएनए प्रयोगशाला ने इस विधि का यूज़ अन्य खुदाइयों में भी किया है. 2023 में लद्दाख से मिले याक के एक नमूने के प्राचीन डीएनए विश्लेषण से पता चला कि इस जानवर को लगभग 12,000 साल पहले ही पालतू बनाया जा चुका था.
राय ने कहा, “जीनोम अनुक्रमण किसी प्रजाति के इतिहास में हुए सटीक आनुवंशिक बदलावों और गुणों को बता सकता है. जब हम किसी क्षेत्र में किसी जानवर में कुछ खास गुण बार-बार देखते हैं, तो समझ सकते हैं कि यह जानबूझकर हुआ है. इससे पता चलता है कि इंसान याक के साथ संपर्क में थे, उन्हें पालतू बना रहे थे और सोच-समझकर उनका प्रजनन कर रहे थे.”
चीते ही क्यों?
पिछले कुछ सालों में ‘चीता पुनर्स्थापन परियोजना’ की वजह से भारतीय चीतों पर ज्यादा ध्यान दिया गया है, फिर भी आनुवंशिक दृष्टि से इस प्रजाति के बारे में अभी भी बहुत कम जानकारी है. पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि भारत में इनका निवास क्षेत्र पंजाब से लेकर दक्षिण तमिलनाडु तक फैला हुआ था. इनका उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रंथों ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी मिलता है.
ठाकुर ने कहा, “लेकिन हमें एशियाई चीते और भारतीय उपप्रजाति के बीच सटीक आनुवंशिक अंतर के बारे में वैज्ञानिक जानकारी चाहिए. हमें यह जानना है कि भारतीय चीते की संख्या कब कम होने लगी, कौन-से आनुवंशिक अवरोध थे जिनकी वजह से उनकी आबादी नहीं बढ़ पाई और आखिरकार उनके विलुप्त होने का कारण क्या था.”
पूरे न्यूक्लियर जीनोम सीक्वेंसिंग को अक्सर किसी जीव के आनुवंशिक ढांचे का ‘नक्शा’ कहा जाता है. उदाहरण के लिए, 2008 में जब अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऊनी मैमथ के न्यूक्लियर डीएनए की अनुक्रमण की, तो उन्होंने पाया कि लाखों सालों के अलगाव के बावजूद उनमें और आज के हाथियों में केवल 0.6 प्रतिशत आनुवंशिक अंतर था.

राय ने कहा, “हम जानते हैं कि 1900 के दशक तक शिकार की वजह से चीतों की संख्या बहुत कम हो गई थी. इससे उनकी आबादी घटी और आपस में प्रजनन बढ़ा होगा. क्या यही आपसी प्रजनन कमजोर आनुवंशिक सामग्री का कारण बना और अंत में उनके विलुप्त होने की वजह बना—इसी का पता हम लगाना चाहते हैं.”
2020 में राय, ठाकुर और कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के अन्य वैज्ञानिकों ने विलुप्त भारतीय चीतों और अफ्रीकी चीतों के माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए की सीक्वेंसिंग की थी, ताकि उनके आनुवंशिक संबंध को समझा जा सके. उनका शोध-पत्र ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ नामक मैगज़ीन में छपा था. इसमें पाया गया कि एशियाई और अफ्रीकी चीते आनुवंशिक रूप से 50,000 साल से भी पहले अलग हो गए थे.
राय ने कहा, “लेकिन माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए की अपनी सीमाएं हैं. यह केवल मां की वंशावली के बारे में बताता है. मौजूदा न्यूक्लियर जीनोम सीक्वेंसिंग से हमें यह ज्यादा सटीक समयरेखा मिल सकेगी कि ये आबादियां कब एक-दूसरे से अलग हुईं. इससे भारतीय, ईरानी और अफ्रीकी उपप्रजातियों के बीच खास अंतर और उनकी आनुवंशिक निकटता के बारे में भी ज्यादा स्पष्ट जानकारी मिलेगी.”
दुनिया भर में विलुप्त जानवरों के पूरे जीनोम सीक्वेंसिंग से कई बड़े परिणाम सामने आए हैं. जैसे 2025 में कोलॉसल बायोसाइंसेज नामक कंपनी ने ‘डायर वुल्फ’ को फिर से बनाने का दावा किया. वैज्ञानिकों ने डायर वुल्फ के जीनोम की अनुक्रमण की, उनके आनुवंशिक बदलाव पहचाने और फिर ग्रे वुल्फ के जीन में बदलाव कर उन्हें डायर वुल्फ जैसा बनाया. एक तरह से उन्होंने डायर वुल्फ को दुनिया में “वापस” ला दिया.
हालांकि, ठाकुर ने पहले आई खबरों का खंडन करते हुए कहा कि भारतीय चीते के अनुक्रमित जीनोम का यूज़ करके ऐसा कोई प्रोजेक्ट करने की योजना नहीं है.
उन्होंने कहा, “हम ज़रूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी नहीं बनना चाहते. अभी हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि भारतीय चीतों से मिले अरबों आधार युग्म वाले डीएनए का विश्लेषण जल्दी से जल्दी कर सकें और पहले यह समझ सकें कि हमें क्या नहीं पता है.”
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