नयी दिल्ली, 23 फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1980 की वक्फ अधिसूचना को चुनौती देने और जहांगीरपुरी क्षेत्र की तीन मस्जिदों के सार्वजनिक भूमि पर अवैध अतिक्रमण के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका सोमवार को खारिज कर दी।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने पाया कि गैर-सरकारी संगठन ‘सेव इंडिया फाउंडेशन’ द्वारा दायर की गई यह जनहित याचिका ‘सद्भावना या जनहित’ से प्रेरित नहीं थी।
अदालत ने आदेश दिया, “हम इस याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं, इसलिए इसे लंबित अर्जियों के साथ खारिज किया जाता है।”
याचिकाकर्ता ने दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा 24 मार्च, 1980 को जारी अधिसूचना को चुनौती दी थी।
अधिसूचना में कुछ संपत्तियों को सुन्नी वक्फ संपत्ति घोषित करने का आदेश दिया गया था, विशेष रूप से जहांगीरपुरी स्थित मोती मस्जिद और जामा मस्जिद और उसी क्षेत्र की एक अन्य स्थानीय मस्जिद।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि जिस भूमि पर ये तीनों संपत्तियां स्थित हैं, उसे दिल्ली सरकार ने 1977 में उसके मालिकों को मुआवजा देकर विधिवत अधिग्रहित कर लिया था इसलिए उस भूमि पर कोई भी निर्माण सार्वजनिक भूमि पर अवैध अतिक्रमण था और उन्हें वक्फ संपत्ति के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता था।
याचिका में दावा किया गया कि यह अधिग्रहण दिल्ली के सुनियोजित विकास के लिए किया गया था और भूमि दिल्ली विकास प्राधिकरण को सौंप दी गई थी, जिसने इन भूखंडों को जहांगीरपुरी नाम की एक सुनियोजित कॉलोनी के औपचारिक लेआउट प्लान में शामिल कर लिया था।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता बार-बार याचिकाएं दायर कर उन्हें जनहित याचिकाएं बताता है और उसने ‘अनावश्यक रूप से अतीत को कुरेदने’ का प्रयास किया है इसलिए 46 साल पहले जारी किसी भी अधिसूचना को ‘मामूली आधारों’ पर चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जनहित याचिका की ‘पवित्रता’ को किसी भी कीमत पर किसी भी याचिकाकर्ता द्वारा भंग नहीं किया जाना चाहिए और यहां तक कि उच्चतम न्यायालय के अनुसार भी, यह अदालतों का कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि तुच्छ याचिकाएं या नेक इरादे से दायर न की गई याचिकाएं ‘शुरू में ही रोक दी जाएं’।
भाषा जितेंद्र रंजन
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