सोलन: अगर ताज़े और रसीले टमाटरों के बाद कोई चीज़ सबसे तेज़ी से गायब हो जाती है, तो वह सोलन में ICAR–डायरेक्टरेट ऑफ मशरूम रिसर्च की ट्रेनिंग सीटें हैं. यही भारत की मशरूम क्रांति का शुरुआती केंद्र है.
हिमाचल प्रदेश के सोलन में मशरूम कभी आज़ादी से पहले का एक छोटा प्रयोग हुआ करता था. आज यह शहर ICAR–डायरेक्टरेट ऑफ मशरूम रिसर्च (DMR) का घर है, जो भारत का मशरूम रिसर्च और विकास के लिए एकमात्र संस्थान है. 43 साल पुराना यह संस्थान जर्मप्लाज़्म को सुरक्षित रखता है, स्वास्थ्य से जुड़े फायदों पर अध्ययन करता है और उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों से आने वाले किसानों को बटन और ऑयस्टर मशरूम जैसी लोकप्रिय किस्मों के साथ-साथ शिटाके और मिल्की मशरूम जैसी खास किस्मों की ट्रेनिंग देता है.
संस्थान के काम की वजह से सोलन को 1997 से ‘भारत की मशरूम सिटी’ कहा जाने लगा.
महाराष्ट्र के रामनाथ शिंदे पहली बार 2006 में सोलन आए थे और उन्होंने ICAR-DMR में कुछ दिनों की ट्रेनिंग ली. इस यात्रा ने उनकी किस्मत बदल दी. महीने में 10,000 रुपये कमाने वाले एक असफल किराना दुकानदार से वह 75 करोड़ रुपये सालाना टर्नओवर वाले मशरूम साम्राज्य के मालिक बन गए. आज उनके गैराज में रेंज रोवर और ऑडी गाड़ियां खड़ी हैं और वह हर साल 3-4 करोड़ रुपये दान करते हैं.
गरीबी से अमीरी तक की उनकी कहानी महाराष्ट्र के बारामती में बने मशरूम फार्म से होकर गुज़रती है.
45 एकड़ में फैले उनके फार्म हर महीने 400-500 टन बटन मशरूम का उत्पादन करते हैं. तिरुपति बालाजी ब्रांड के तहत ये मशरूम पूरे भारत के घरों तक पहुंचते हैं.
शिंदे ने कहा, “अपने फार्म के ज़रिए मैं अपने साथ काम करने वाले मज़दूरों की ज़िंदगी में बदलाव लाने की कोशिश करता हूं. अगर किसानों को मशरूम की खेती सिखाई जाए, तो कई गांव बदल सकते हैं. देश और विदेश—दोनों जगह इसकी मांग बहुत ज़्यादा है.”
हमारे जीन बैंक में पिछले 15 साल में ही पूरे भारत से करीब 4,000 किस्म के मशरूम इकट्ठा किए गए हैं
—बीएल अत्री, कार्यकारी निदेशक, ICAR-DMR
रेस्टोरेंट के मेन्यू में मशरूम फैशन बनने से बहुत पहले ही सोलन ने मेहनत शुरू कर दी थी. यहां उत्तर प्रदेश से तमिलनाडु तक के हज़ारों किसानों में ज्ञान, क्षमता और भरोसा बनाया गया. सिर्फ पिछले पांच साल में ही करीब 4,000 किसान ऐसा बिज़नेस मॉडल सीखकर लौटे हैं, जो मुनाफा, स्थिरता और नियंत्रण देता है. ये प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम पांच दिन के लिए 7,500 रुपये और नौ दिन के लिए 15,000 रुपये में होते हैं.

ICAR-DMR के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सालाना मशरूम उत्पादन 1990 के दशक के आखिर में करीब 6,000 टन से बढ़कर अब 4 लाख टन हो गया है. वैश्विक स्तर पर भारत, चीन और पोलैंड के बाद तीसरे नंबर पर है, हालांकि दुनिया के कुल उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.4 प्रतिशत है.
ICAR-DMR के कार्यकारी निदेशक डॉ. बी एल अत्री ने कहा, “मौजूदा उत्पादन के साथ भी हम देश की मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं.”
अत्री ने बताया कि मौजूदा उत्पादन के हिसाब से भारत में हर व्यक्ति को साल भर में सिर्फ 220-250 ग्राम मशरूम ही मिल पाता है.
उन्होंने कहा, “आदर्श रूप से हमें हफ्ते में तीन बार मशरूम खाना चाहिए, क्योंकि यह अपने आप में एक पूरा भोजन है, लेकिन अभी हमारा प्रोडक्शन इतना नहीं है.”
मशरूम का ‘मनी बैंक’
डॉ. अत्री एक कोल्ड स्टोरेज जैसे कमरे में ले जाते हैं, जहां तापमान माइनस 4 डिग्री तक चला जाता है. हर किसी को इस जगह की पहुंच नहीं है. यह उनका छोटा-सा मनी बैंक है. यहां पैसे नहीं, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा कीमती चीज़ रखी है—जर्मप्लाज़्म.
यह जीवित आनुवंशिक ऊतक होता है, बिल्कुल पौधे के बीज की तरह, जिसमें हर मशरूम किस्म की पूरी जानकारी होती है. जंगली और उगाई जाने वाली प्रजातियों का यह बढ़ता हुआ आनुवंशिक खजाना DMR के रिसर्च का केंद्र है. इससे वैज्ञानिक अनुकूलन क्षमता, उत्पादन क्षमता और बीमारियों से लड़ने की ताकत का अध्ययन करते हैं. इसे नेशनल मशरूम जीन बैंक कहा जाता है.
अत्री ने कहा, “हमारे जीन बैंक में पिछले 15 साल में ही पूरे भारत से करीब 4,000 किस्म के मशरूम इकट्ठा किए गए हैं. यह हमारा खजाना है.”

केंद्र का लक्ष्य हर साल पूरे भारत से कम से कम 250-300 मशरूम किस्में इकट्ठा करना है. संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. श्वेत कमल ने बताया कि जर्मप्लाज़्म को सुरक्षित रखना केंद्र की सबसे अहम ज़िम्मेदारियों में से एक है.
उन्होंने कहा, “जर्मप्लाज़्म के बिना कोई रिसर्च नहीं हो सकती. यही गुणवत्ता सुधारने, बीमारियों को नियंत्रित करने और नई हाइब्रिड किस्में विकसित करने की बुनियाद है.”
अलग-अलग जर्मप्लाज़्म की खूबियों को मिलाकर वैज्ञानिक बेहतर किस्में तैयार करते हैं.
बाहर तापमान 4 डिग्री हो या 45 डिग्री, मशरूम आसानी से उगाए जा सकते हैं. तापमान, हवा, ऑक्सीजन और रोशनी को नियंत्रित किया जाता है. कम ज़मीन में, वर्टिकल तरीके से खेती होती है और मुनाफा ज़्यादा होता है
—डॉ. श्वेत कमल, प्रमुख वैज्ञानिक, ICAR-DMR
ऐसा ही एक उदाहरण है PSCH-35 (प्ल्यूरोटस साजोर-काजू, यानी ऑयस्टर मशरूम), जिसे दो ऑयस्टर किस्मों—DMRP-255 और DMRP-112—को मिलाकर तैयार किया गया है. यह हाइब्रिड हर 100 किलो सूखे सब्सट्रेट (जिस पर मशरूम उगते हैं) से 56-60 किलो ताज़े मशरूम देता है. इसके खाने योग्य हिस्से भी ज़्यादा नरम होते हैं.
जर्मप्लाज़्म संरक्षण के अलावा, संस्थान के 32 वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की टीम मशरूम की गुणवत्ता बढ़ाने, स्वास्थ्य लाभों का अध्ययन करने, बीमारियों से लड़ने वाले गुण खोजने और बैक्टीरिया, वायरस व फंगल संक्रमण से फसलों को बचाने पर काम करती है.
1994 से डायरेक्टरेट ऑफ मशरूम रिसर्च से जुड़े कमल ने कहा, “मशरूम भी इंसानों की तरह जीवित प्रणाली हैं. हमारा रोग और कीट प्रबंधन काम किसानों के नुकसान को कम करने में मदद करता है.”

संस्थान मशरूम की खेती शुरू करने वाले किसानों और ब्रांड्स को सलाह और कंसल्टेंसी भी देता है.
उन्होंने कहा, “हम पूरी रोडमैप देते हैं और हमारे ट्रेनिंग प्रोग्राम खास तौर पर बहुत लोकप्रिय हैं. हमारा मानना है कि ज्ञान बांटना चाहिए, रोककर नहीं रखना चाहिए.”
कमल की मेज़ के एक कोने में ट्रेनिंग के लिए आए आवेदनों का ढेर रखा है. वह कागज़ पलटते हैं और बताते हैं कि छुट्टी पर जाने से पहले इन्हें निपटाना ज़रूरी है.
उगाने में भी अच्छा, खाने में भी अच्छा
हर साल यह संस्थान 12 ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाता है. हालांकि, हर बैच में आधिकारिक तौर पर 40–45 लोगों की सीमा होती है, लेकिन मांग इतनी ज़्यादा रहती है कि अनुरोध और सिफारिशों के चलते संख्या अक्सर 60 तक पहुंच जाती है.
इन सत्रों में थ्योरी के साथ-साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जाती है. इसमें मशरूम की खेती की बुनियादी बातें, नियंत्रित मौसम की स्थिति को संभालना और विकास के अलग-अलग चरणों को समझना शामिल है.
ट्रेनिंग और खेती—दोनों का हब है संस्थान की कमर्शियल स्पॉन प्रोडक्शन यूनिट. यही मशरूम की खेती के लिए ज़रूरी ‘बीज’ सामग्री है.
डॉ. अत्री ने कहा, “स्पॉन मशरूम का जीवित माइसीलियम होता है, जिसे गेहूं या ज्वार जैसे स्टेरिलाइज़्ड अनाज पर उगाया जाता है.”
वह एक बड़े बॉयलर का ढक्कन उठाते हैं, जिसमें टनों गेहूं उबल रहा था.

ICAR-DMR की स्पॉन यूनिट में नेशनल मशरूम जीन बैंक में सुरक्षित बेहतरीन किस्मों से शुद्ध कल्चर चुने जाते हैं.
निदेशक ने बताया, “इन कल्चर को पहले स्टेराइल लैब में बढ़ाया जाता है, जिससे मदर स्पॉन तैयार होता है. इसके बाद इसे स्टेरिलाइज़्ड अनाज वाले सब्सट्रेट में डाला जाता है.”
जब प्लास्टिक बैग में माइसीलियम से भरे अनाज पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, तो वही कमर्शियल स्पॉन बनते हैं, जिनसे किसान और उद्यमी अपनी खेती शुरू करते हैं. संस्थान हर साल करीब 60,000 टन स्पॉन तैयार करता है, जो एडवांस बुकिंग पर किसानों को दिया जाता है.

स्पॉन के बाद, ट्रेनिंग लेने वाले सब्सट्रेट के साथ काम करना सीखते हैं. यह पोषक तत्वों से भरपूर माध्यम होता है, जो भूसे और कम्पोस्ट जैसे कृषि अपशिष्ट से बनता है.
इसके बाद, तापमान और नमी नियंत्रित कमरों में माइसीलियम सब्सट्रेट में फैलता है. इस चरण को ‘स्पॉन रन’ कहा जाता है.
अत्री ने बताया, “जब पूरा सब्सट्रेट माइसीलियम से भर जाता है, तो हालात बदले जाते हैं ताकि फलन शुरू हो सके. इसी दौरान मशरूम उगते हैं और कटाई तक बढ़ते रहते हैं.”
वह एक ऐसे कमरे में गए, जहां स्पॉन बैग पर शिटाके मशरूम उग रहे थे.
बटन, ऑयस्टर, पैडी स्ट्रॉ, शिटाके और मिल्की मशरूम किसानों में सबसे लोकप्रिय पांच किस्में हैं. केंद्र कॉर्डिसेप्स और ऑरिकुलैरिया जैसे खास और औषधीय मशरूम की भी ट्रेनिंग देता है. कुल मिलाकर ट्रेनिंग प्रोग्राम में 12–15 किस्में शामिल होती हैं.

कमल ने कहा, “पहले ट्रेनिंग मुफ्त होती थी, लेकिन अब सरकार ने राजस्व जुटाने की दिशा में कदम बढ़ाया है.” अब ट्रेनिंग में सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट और रिटायर्ड अधिकारी भी शामिल हो रहे हैं. कुछ लोग इसे व्यापार के बजाय अपने घर के इस्तेमाल के लिए सीख रहे हैं.
इसकी लोकप्रियता की एक बड़ी वजह यह है कि मशरूम की खेती बाहरी मौसम पर निर्भर नहीं होती और इसके लिए बड़ी ज़मीन भी नहीं चाहिए.
कमल ने कहा, “बाहर तापमान 4 डिग्री हो या 45 डिग्री, मशरूम आसानी से उगाए जा सकते हैं. तापमान, हवा, ऑक्सीजन और रोशनी को नियंत्रित किया जाता है. वर्टिकल खेती की वजह से कम ज़मीन लगती है और मुनाफा ज़्यादा होता है.”

एक हेक्टेयर ज़मीन में किसान सालाना 500 टन तक मशरूम उगा सकता है. अगर न्यूनतम 100 रुपये प्रति किलो के हिसाब से भी बेचा जाए, तो सालाना टर्नओवर 5 करोड़ रुपये तक हो सकता है. औसतन 30–35 प्रतिशत मुनाफे के साथ सालाना कमाई करीब 1.5 करोड़ रुपये होती है.
मार्केट रिसर्च फर्म AstuteAnalytica की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में 1.61 अरब डॉलर (करीब 14,812 करोड़ रुपये) का घरेलू मशरूम बाज़ार 2035 तक बढ़कर 3.02 अरब डॉलर (करीब 27,800 करोड़ रुपये) तक पहुंच सकता है. इसमें 73 प्रतिशत हिस्सेदारी अभी भी सफेद बटन मशरूम की है.
रिपोर्ट के मुताबिक, यह बढ़ोतरी खाने की आदतों में बदलाव की वजह से है, जो अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों के असर से आई है. इसे रिपोर्ट ने “चिली मशरूम फेनोमेनन” कहा है और मशरूम अल्फ्रेडो पास्ता जैसे व्यंजन हाल के वर्षों में लोकप्रिय हुए हैं. घरेलू खपत अब कुल बाज़ार का करीब 40 प्रतिशत है.
52 साल के ध्रुब पात्रा ने हिमाचल में छुट्टियां बिताते वक्त मशरूम ट्रेनिंग जॉइन की थी. पढ़ाने की नौकरी छोड़ने के बाद वह कोई नया शौक चाहते थे. ओडिशा के गंजाम के रहने वाले यह गणित शिक्षक अब घर पर ही बटन मशरूम की छोटी खेती करते हैं और साल में चार-पांच बार फसल लेते हैं.
इससे तोहफा देना भी आसान हो गया है.
उन्होंने कहा, “जब भी हम रिश्तेदारों के यहां जाते हैं, मैं अपने उगाए हुए मशरूम साथ ले जाता हूं.”
हिमाचल में उत्पादन घटा, सोलन अब भी चमक रहा
हिमाचल प्रदेश कभी भारत में मशरूम उत्पादन का सबसे बड़ा हब था और यहां देश का पहला पूरी तरह मशीन और ऑटोमेटेड मशरूम फार्म बना था. लेकिन अब तस्वीर बदल गई है.
आज भारत में मशरूम उत्पादन में बिहार और ओडिशा सबसे आगे हैं. इनके बाद हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र आते हैं. हिमाचल प्रदेश छठे नंबर पर खिसक गया है, जिसकी बड़ी वजहें संचालन से जुड़ी समस्याएं हैं.

कमल ने कहा, “कच्चा माल स्थानीय स्तर पर नहीं मिलता. हमें पंजाब, हरियाणा और राजस्थान तक से मंगाना पड़ता है. इससे परिवहन और उत्पादन लागत करीब 30 प्रतिशत बढ़ जाती है और हिमाचल के मशरूम मैदानी राज्यों के मुकाबले महंगे पड़ते हैं.”
इसके अलावा, हिमाचल में ज़मीन विकसित करना भी महंगा है.
उन्होंने आगे कहा, “पहाड़ी इलाका और छोटी-छोटी बंटी हुई ज़मीनों की वजह से नियंत्रित मशरूम यूनिट लगाना मुश्किल हो जाता है. खेती शुरू करने से पहले ज़मीन समतल करनी पड़ती है, जिससे लागत काफ़ी बढ़ जाती है.”
अब लोगों को सोलन तक आने की ज़रूरत नहीं है. वे अपने राज्य के केंद्रों से ट्रेनिंग और तकनीक ले सकते हैं
—बीएल अत्री
पिछले एक दशक में, जब हिमाचल पीछे गया, ओडिशा लगातार आगे बढ़ता गया. 2013 से 2022 के बीच राज्य में मशरूम उत्पादन चार गुना बढ़ा और इस दौरान सालाना औसतन 16 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई.
भले ही हिमाचल अब पहले जैसा मशरूम पावरहाउस न रहा हो, लेकिन सोलन आज भी वह स्रोत है, जहां से दूसरे राज्यों में यह विस्तार हो रहा है. इसका बड़ा श्रेय ICAR-DMR के विस्तार को जाता है. अब देश भर में करीब 32 केंद्र बन चुके हैं, लगभग हर राज्य में एक.
डॉ. अत्री ने कहा, “अब लोगों को सोलन तक आने की ज़रूरत नहीं है. वे अपने राज्य के केंद्रों से ही सारी ट्रेनिंग और तकनीक ले सकते हैं.”
फिर भी, मूल संस्थान में ट्रेनिंग की मांग कम नहीं हुई है. अत्री के इनबॉक्स में लगातार आवेदन आ रहे हैं और मशरूम खेती से जुड़े बिज़नेस प्रस्ताव भी लगातार पहुंच रहे हैं.
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