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Tuesday, 3 February, 2026
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इंतज़ार करता शहर और योजना और ज़मीनी हकीकत के बीच फंसी—कोलकाता मेट्रो

कोलकाता की मेट्रो कभी भारत में सबसे पहले शुरू होने वाली थी. अब यह भारत में सबसे पीछे है. यह पुराने शहर की आधुनिकता के साथ कदम मिलाने की जद्दोजहद की मिसाल बन गई है.

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कोलकाता: पिछले साल सितंबर में, कोलकाता में तेज़ बारिश के एक दौर के दौरान, 23 साल की अद्रिजा घुटनों तक भरे पानी में खड़ी थीं. वे एक ऐसी सड़क पार करने की कोशिश कर रही थीं जिसे खोदकर अधूरा छोड़ दिया गया था. ट्रैफिक जाम था, बसें फंसी हुई थीं और जूते किसी काम के नहीं थे. जब तक वह मेट्रो स्टेशन पहुंचीं—कपड़े गीले, बैग SIR फॉर्म्स से भरा—प्लेटफॉर्म पहले से ही खचाखच भरा था. ट्रेन समय पर नहीं आई. क्यों नहीं आई, यह बताने के लिए कोई घोषणा भी नहीं हुई.

उन्होंने कहा, “पानी, कीचड़ और टूटी सड़कों को पार करने के बाद हम आखिर मेट्रो तक पहुंचते हैं और वहां बस बैठकर ट्रेन का इंतज़ार करते रहते हैं—जो आए भी या न आए.”

बूथ-लेवल अधिकारी (बीएलओ) अद्रिजा रोज़ शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक आने-जाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर हैं. कई सालों तक कोलकाता मेट्रो ही वह एक व्यवस्था थी जिस पर उन्हें भरोसा था—यह तय समय पर चलती थी, तेज़ थी और सस्ती थी. अब वह भरोसा टूट चुका है.

उन्होंने कहा, “एक वक्त था जब मुझे मेट्रो के हिसाब से अपनी ज़िंदगी की योजना बनाने के बारे में सोचना ही नहीं पड़ता था. यह मेरे दिन का सबसे आसान हिस्सा था, वह एक चीज़ जिस पर मैं पूरी तरह भरोसा कर सकती थी. अब मैं ऐसा नहीं कह सकती.”

पूरे कोलकाता में यह अनुभव अब आम हो गया है. हर जगह खुदाई हो रही है—रिहायशी इलाकों में, दफ्तरों के इलाकों में, यहां तक कि शहर की सबसे सलीके से रखी गई सार्वजनिक जगहों में भी.

सड़कें खोदी जाती हैं और अधूरी छोड़ दी जाती हैं, बैरिकेड्स इधर-उधर किए जाते हैं, लेकिन हटते नहीं और मेट्रो का काम बिना किसी साफ अंत के रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुसता चला जाता है. कई सालों से निर्माण ऐसा हाल बन गया है जिसके साथ लोग बस जी रहे हैं, क्योंकि कोलकाता मेट्रो के अधिकारी कहते हैं कि प्रगति को लेकर अभी भी कोई पक्का अपडेट नहीं है.

निर्माणाधीन कोलकाता मेट्रो साइट के पास खुदी ज़मीन और भारी मशीनें. इन रास्तों से गुज़रना खतरनाक काम है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
निर्माणाधीन कोलकाता मेट्रो साइट के पास खुदी ज़मीन और भारी मशीनें. इन रास्तों से गुज़रना खतरनाक काम है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

दिसंबर 2025 में, केंद्र सरकार ने साफ तौर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर जिम्मेदारी डाली. उसने कोलकाता की चार मेट्रो कॉरिडोरों में गायब कड़ियां, लंबित मंजूरियां और ज़मीन विवादों की सूची गिनाई.

कोलकाता की मेट्रो कभी भारत में सबसे पहले शुरू हुई थी. अब यह भारत में सबसे पीछे है. यह इस बात की मिसाल बन गई है कि समय के साथ चलने की कोशिश करता एक पुराना शहर कैसे बनाता है—कागज़ पर बड़े इरादे, ज़मीन पर हिचक और इरादे व अमल के बीच हमेशा फंसा हुआ.

द टेलीग्राफ (ऑनलाइन) के पूर्व संपादक सोमनाथ दासगुप्ता ने कहा कि देरी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जा रही है और प्रगति कहीं नज़र नहीं आ रही.

उन्होंने कहा, “जेनरेशन एक्स को ब्लू लाइन पर गर्व था, जो भारत की पहली मेट्रो लाइन थी. मिलेनियल्स ने एसी और विदेश से आए रेक का आनंद लिया. जेन ज़ी नई लाइनों के कुछ-कुछ हिस्सों का मज़ा ले रही है, लेकिन जेन अल्फा के पूरे नेटवर्क का आनंद लेने से पहले वे सफ़ेद बालों वाले हो जाएंगे.”

राष्ट्रीय गर्व से रोज़ की देरी तक

एक वक्त था जब कोलकाता की मेट्रो कुछ और ही चीज़ की पहचान थी. जब 1988 में ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रसारित हुआ, तो शहर से गुज़रती मेट्रो ट्रेन का एक छोटा सा दृश्य पूरे देश के लिए ईर्ष्या का कारण बन गया था — यह ज़मीन के नीचे बसे आधुनिक भारत की झलक थी. इसमें फुटबॉल के दिग्गज पीके बनर्जी को मेट्रो कोच से उतरते हुए दिखाया गया था. बाद में कई लोगों ने कहा कि यह वह पल था जिसने दिखाया कि ‘बंगाल आज क्या सोचता है’.

कोलकाता के पास सिर्फ एक मेट्रो नहीं थी; उसके पास द मेट्रो थी.

‘India’s First, Nation’s Pride’ लिखा हुआ कोलकाता मेट्रो की ब्लू लाइन का एक पुराना नक्शा, जो स्टेशन के प्रवेश द्वार पर लगा है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
‘India’s First, Nation’s Pride’ लिखा हुआ कोलकाता मेट्रो की ब्लू लाइन का एक पुराना नक्शा, जो स्टेशन के प्रवेश द्वार पर लगा है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

वह शुरुआती आत्मविश्वास इंजीनियरिंग और विचारधारा से बना था. 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में सोवियत और पूर्वी जर्मनी के विशेषज्ञों की तकनीकी मदद से बनाई गई कोलकाता मेट्रो उस दौर को दिखाती थी, जब अंडरग्राउंड रेल को शहर की सार्वजनिक वास्तुकला के रूप में देखा जाता था. स्टेशन सार्वजनिक जगहों की तरह बनाए गए थे—मोज़ेक चित्रों वाली दीवारें, भारी खंभे और हल्की रोशनी—जो सोवियत सोच ‘लोगों के लिए महल’ पर आधारित थी.

किसी न किसी तरह यह एहसास है कि कोलकाता सभी मेट्रो में सबसे कम प्राथमिकता और सबसे कम फंड पाने वाला शहर है

— जवाहर सरकार, पूर्व राज्यसभा सदस्य

वह रूप-रंग लंबे समय तक बना रहा, लेकिन सिस्टम का डेवलपमेंट नहीं हो पाया.

कई दशक बाद, कोलकाता मेट्रो में होने वाली परेशानियां खुद शहर जैसी दिखने लगी हैं—अतीत और वर्तमान के बीच फँसी हुई, विरासत और आधुनिकता के बीच, राजनीतिक सावधानी और शहरी ज़रूरतों के बीच. कोलकाता की समस्या अब सिर्फ़ देर से चलने वाली ट्रेनों या अधूरी सुरंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक पुराने और घने शहर की उस मुश्किल को दिखाती है, जो आज की आधुनिक मेट्रो की माँगों को पूरा करने में हिचक रहा है.

कोलकाता मेट्रो स्टेशनों में चमकीली मोज़ेक दीवारें सोवियत दौर के ‘लोगों के लिए महल’ के विचार की याद दिलाती हैं | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
कोलकाता मेट्रो स्टेशनों में चमकीली मोज़ेक दीवारें सोवियत दौर के ‘लोगों के लिए महल’ के विचार की याद दिलाती हैं | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

कुछ साल पहले तक, व्यस्त रूट्स पर बिना एयर-कंडीशन वाली रेक चलती थीं. आधुनिक किराया गेट, निगरानी सिस्टम और दिव्यांगों के लिए सुविधाएं जैसी बुनियादी अपग्रेड भी बहुत धीरे-धीरे आईं.

पूरे भारत में, वे शहर जो कभी कोलकाता को हैरानी से देखते थे—लखनऊ और कानपुर से लेकर नागपुर, इंदौर और भोपाल तक—अब अपनी-अपनी बढ़ते मेट्रो नेटवर्क का दावा कर रहे हैं, भले ही यात्रियों की संख्या या आर्थिक लाभ सीमित हों. मेट्रो रेल अब शहरी सपने का नया प्रतीक बन गई है—महत्वाकांक्षा और राजनीतिक कामयाबी का सबूत और छोटे शहरों के लिए पहचान का निशान. और फिर भी, जिस शहर ने इसे सबसे पहले बनाया, वही आज भी अपने शुरू किए काम को पूरा करने के लिए जूझ रहा है.

कोलकाता मेट्रो की रुकावटें उस शहर को दिखाती हैं जो कभी देश का नेतृत्व करता था—औपनिवेशिक राजधानी के रूप में, बौद्धिक केंद्र के रूप में, राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में, लेकिन अब इतिहास को रफ्तार में, या महत्वाकांक्षा को रोज़गार में बदलने के लिए संघर्ष कर रहा है. राजनीति, ढीलापन और सिमटती आर्थिक ताकत ने उसे बांध रखा है, जो तेज़ी से आगे बढ़ने की बहुत कम वजह देती है.

सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने कहा, “किसी न किसी तरह यह लगता है कि कोलकाता सभी मेट्रो में सबसे कम प्राथमिकता और सबसे कम फंड पाने वाला शहर है.”

टुकड़ों में बंटा नेटवर्क

अन्य शहरों के विपरीत, कोलकाता ने अपनी मेट्रो को एक पूरे नेटवर्क के रूप में नहीं बढ़ाया. इसे टुकड़ों-टुकड़ों में बढ़ाया गया.

आज दिल्ली का मेट्रो नेटवर्क करीब 400 किलोमीटर तक फैला है. कोलकाता में चार दशकों में करीब 74 किलोमीटर की मेट्रो बनी है. इसके अलावा 29 किलोमीटर का काम कई सालों से निर्माणाधीन है और 22 किलोमीटर को बहुत पहले मंज़ूरी मिल चुकी थी. फर्क सिर्फ आकार का नहीं है, बल्कि योजना और अमल का भी है.

पहली मेट्रो लाइन को छोड़ दें तो, कोलकाता में लगभग हर दूसरा कॉरिडोर टुकड़ों में बनाया जा रहा है — कहीं थोड़ा सा, कहीं थोड़ा सा, बिना अतिक्रमण या मंज़ूरी जैसी साफ-साफ दिखने वाली बाधाओं की योजना बनाए

— सोमनाथ दासगुप्ता

केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पिछले महीने संसद को बताया कि फिलहाल निर्माणाधीन 52 किलोमीटर में से करीब 20 किलोमीटर का काम अटका हुआ है, जिसकी मुख्य वजह ज़मीन सौंपने और मंज़ूरी मिलने में देरी है. बीते वर्षों में बजट आवंटन काफी बढ़े हैं, लेकिन राज्य सरकार के साथ तालमेल की कमी अब भी काम की रफ्तार धीमी कर रही है.

मूल उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर, जिसे अब ब्लू लाइन कहा जाता है, को छोड़कर कोलकाता की लगभग हर बाद की मेट्रो लाइन हिस्सों में ही बनाई गई है.

कोलकाता में एक निर्माण स्थल पर लगा बोर्ड, जिस पर लिखा है ‘Metro work in progress’ | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
कोलकाता में एक निर्माण स्थल पर लगा बोर्ड, जिस पर लिखा है ‘Metro work in progress’ | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

इन्हें “फेज़” कहा जाता है—यानी ऐसे अलग-थलग हिस्से जिन्हें पूरे कॉरिडोर के पूरा होने से पहले ही खोल दिया जाता है. अक्सर काम तब शुरू हो जाता है, जब अतिक्रमण, ट्रैफिक प्रबंधन या अलग-अलग विभागों से मंज़ूरी जैसी साफ समस्याएं हल नहीं होतीं, जिससे शुरुआत से ही देरी तय हो जाती है.

सोमनाथ दासगुप्ता ने कहा, “पहली मेट्रो लाइन को छोड़कर, कोलकाता में लगभग हर दूसरा कॉरिडोर टुकड़ों में बनाया जा रहा है — कहीं थोड़ा, कहीं थोड़ा बिना अतिक्रमण या मंज़ूरी जैसी साफ़ बाधाओं की योजना के.”

मेट्रो की कई दरारें

उत्तर कोलकाता के भीड़भाड़ वाले बोउबाज़ार इलाके में एक आम कामकाजी दोपहर को सड़क हमेशा जैसी ही दिखती है—संकीर्ण गलियां, पुराने मकान, दुकानों के शटर खुलते-बंद होते हुए, लेकिन शहर की कुछ सबसे पुरानी इमारतों के नीचे एक पूरी हो चुकी मेट्रो सुरंग है, जो ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर का हिस्सा है और शहर की परिवहन रीढ़ बदलने के लिए बनाई गई थी. इनमें से कई इमारतें आधुनिक निर्माण नियमों से भी पहले की हैं. 2019 में निर्माण शुरू होने के बाद से, वर्षों में, लोगों ने अपने घरों में दरारें और कई जगह ढहने की घटनाएं दर्ज कराई हैं, जिससे खाली कराना और विरोध प्रदर्शन हुए.

दिसंबर में एक और सदी पुरानी इमारत गिर गई. मेट्रो इंजीनियरों ने कहा कि सुरंग बनाने का काम पूरा हो चुका है और हाल के किसी नुकसान के लिए वे ज़िम्मेदार नहीं हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए ये भरोसे ज़्यादा मायने नहीं रखते. उनका कहना है कि सालों से चल रहे निर्माण ने उनके घरों की नींव हिला दी है.

दक्षिण में, एक और अटका हुआ प्रोजेक्ट यात्रियों को मुश्किल में डाले हुए है.

ऑरेंज लाइन, जिसे न्यू गरिया को एयरपोर्ट से जोड़ना था, अब भी अधर में है. ईस्टर्न मेट्रोपॉलिटन बायपास पर चिंगरीघाटा में 366 मीटर का एक अहम गैप फरवरी 2025 से अधूरा पड़ा है, क्योंकि सिर्फ दो वीकेंड के लिए ट्रैफिक रोकने की पुलिस अनुमति नहीं मिल पाई है. इसी एक गैप की वजह से दक्षिण कोलकाता को एयरपोर्ट से जोड़ने वाली पूरी लाइन अटक गई है. करीब 30 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर का सिर्फ़ एक छोटा सा हिस्सा ही अंडरग्राउंड है.

चिंगरीघाटा चौराहे के बीच खड़े निर्माणाधीन मेट्रो पिलर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
चिंगरीघाटा चौराहे के बीच खड़े निर्माणाधीन मेट्रो पिलर | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

काम रुका हुआ है, प्रदूषण बना हुआ है और ट्रैफिक एक इंच भी आगे नहीं बढ़ता, जब तक किसी मंत्री का काफिला वहां से न गुज़र जाए.

विडंबना यह है कि एयरपोर्ट लाइन को 2010-11 में ही मंज़ूरी मिल गई थी, जब ममता बनर्जी केंद्रीय रेल मंत्री थीं, लेकिन निर्माण कई साल बाद शुरू हुआ.

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के प्रिंसिपल एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर अनुज दयाल के अनुसार, दिल्ली की सफलता सिर्फ इंजीनियरिंग की वजह से नहीं थी, बल्कि संस्थागत व्यवस्था की वजह से थी. केंद्र और राज्य सरकार—दोनों का एकजुट समर्थन था, जिससे ज़मीन, फंडिंग और मंज़ूरी से जुड़े फैसले तेज़ी से हो पाए.

कोलकाता जैसे पुराने और घने शहरों के लिए दयाल की सलाह सीधी है: “सभी हितधारकों के साथ सीधा और स्पष्ट तालमेल बेहद ज़रूरी है.”


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मेट्रो के साथ जीना

कोलकाता मेट्रो ने अद्रिजा की ज़िंदगी को ऐसे घेर लिया है, जैसा उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था. वे रोज़ सुबह कंस्ट्रक्शन के शोर के साथ उठती हैं, जो उनके घर से बस कुछ मीटर की दूरी पर महीनों से चल रहा है. लगातार आती गूंज से बचने के लिए उन्हें फोन पर बात करने के लिए अपने घर के सबसे दूर वाले कोने में जाना पड़ता है.

वे राइटर्स बिल्डिंग के पास काम करती हैं और पहले पूरे शहर में आने-जाने के लिए पूरी तरह कोलकाता मेट्रो पर निर्भर थीं. आज हालात यह हैं कि सिर्फ दो स्टेशनों की दूरी के लिए भी उन्हें 20 से 30 मिनट की देरी मानकर चलना पड़ता है. जो डिजिटल स्क्रीन पहले ट्रेन आने का वक्त दिखाती थीं, लेकिन वो भी अब ठीक से काम नहीं करतीं. ट्रेनें देर से आती हैं, या कई बार आती ही नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “दुर्गा पूजा के एक दिन हम इंतज़ार करते रहे, जबकि स्क्रीन पर ट्रेन आने का समय दिख रहा था, लेकिन ट्रेन आई ही नहीं. उस दिन पहली बार मुझे रात में मेट्रो लेने में झिझक हुई.”

ट्रेन के समय और मंजिल दिखाने वाली एक खराब पड़ी स्क्रीन | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
ट्रेन के समय और मंजिल दिखाने वाली एक खराब पड़ी स्क्रीन | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

भीड़ अब और बढ़ गई है. ट्रेनें कम चलने से प्लेटफॉर्म भर जाते हैं. कई बार अद्रिजा स्टेशन से बाहर निकलकर बाइक टैक्सी ले लेती है, क्योंकि घायल पैर के साथ भीड़ में सुरक्षित चढ़ पाना मुश्किल होता है.

स्टेशनों के नामों को लेकर भ्रम एक और परेशानी है.

उन्होंने बताया कि “कई स्टेशनों के नाम किसी व्यक्ति के नाम पर हैं, जिनसे इलाके का कोई ज़िक्र नहीं होता. यहां रहने वाले लोग भी कन्फ्यूज़ हो जाते हैं.”

ईएम बायपास पर बरुण सेनगुप्ता मेट्रो स्टेशन साइंस सिटी और धापा इलाकों को सेवा देता है, लेकिन साइनबोर्ड पर इन इलाकों का नाम नहीं है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
ईएम बायपास पर बरुण सेनगुप्ता मेट्रो स्टेशन साइंस सिटी और धापा इलाकों को सेवा देता है, लेकिन साइनबोर्ड पर इन इलाकों का नाम नहीं है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

मूल ब्लू लाइन पर कुछ स्टेशनों के नाम व्यक्तित्वों पर थे, लेकिन बोर्ड पर इलाके का नाम भी लिखा होता था और ट्रेन के अंदर घोषणाओं में उस नाम को इलाके से जोड़ा जाता था—जैसे गरिया बाज़ार के लिए कवि नज़रुल. नए स्टेशनों में इलाके का नाम हटा दिया गया है और कोई ठीक घोषणा भी नहीं होती.

सरकार ने भी इस चिंता को दोहराया और कहा कि यात्री अब सार्वजनिक हस्तियों के नाम पर स्टेशनों के नाम रखे जाने से परेशान हो चुके हैं—शहीद खुदीराम, हेमंता मुखोपाध्याय, महानायक उत्तम कुमार.

उन्होंने कहा, “यह लोगों पर थोपा गया बोझ है, जिसे हर ऐसे स्टेशन के साथ इलाके का नाम जोड़कर तुरंत ठीक किया जाना चाहिए.”

कोलकाता के हेमंता मुखोपाध्याय मेट्रो स्टेशन के बंद गेट | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
कोलकाता के हेमंत मुखोपाध्याय मेट्रो स्टेशन के बंद गेट | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

बीआर आंबेडकर कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर मेधाश्री तलापात्रा के लिए, जो स्कूल के दिनों से कोलकाता मेट्रो का निर्माण देखती आ रही हैं, यह देरी अंतहीन लगती है.

उन्होंने कहा, “ईएम बायपास मेट्रो का काम तब शुरू हुआ था, जब मैं स्कूल में थी. वह 2009 था. अब 2026 है. अब भी लाइन अधूरी है. सोचने पर मजबूर करता है कि क्या अगले दशक में भी यह पूरी होगी या नहीं.”

गायब कड़ियां, वही पुरानी दिक्कतें

कोलकाता मेट्रो की समस्या कहीं सबसे ज़्यादा साफ दिखती है, तो उन जगहों पर जहां वह ‘लगभग’ पहुंचती है.

शहर के दक्षिणी छोर पर, जोका सालों के निर्माण के बावजूद अब भी कोलकाता के मुख्य हिस्से से कटा हुआ है. उत्तर में, दक्षिणेश्वर के आगे और बारासात की ओर विस्तार ज़मीन अधिग्रहण, अतिक्रमण और यूटिलिटी शिफ्टिंग की वजह से अटका हुआ है.

एस्प्लेनेड में, जो शहर के सबसे व्यस्त ट्रांज़िट केंद्रों में से एक है, जहां बसें, दफ्तर, बाज़ार और सरकारी इमारतें मिलती हैं—निर्माण 528 अवैध दुकानों की वजह से रुका हुआ है, जिन्हें डॉ. बीसी रॉय मार्केट से अस्थायी रूप से हटाना ज़रूरी है. वैकल्पिक दुकानें बना दी गई हैं, लेकिन यह शिफ्टिंग तीन साल से ज़्यादा समय से लटकी हुई है.

कोलकाता के एक मेट्रो स्टेशन से गुज़रती ट्रेन | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
कोलकाता के एक मेट्रो स्टेशन से गुज़रती ट्रेन | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

जिन लोगों की रोज़ी-रोटी निर्माण क्षेत्रों के आसपास टिकी है, उनके लिए अनिश्चितता और भी गहरी है.

एस्प्लेनेड साइट के पास नाश्ता बेचने वाले एक ठेलेवाले ने कहा, “मैं यहां 15 साल से हूं. कहते हैं हमें शिफ्ट करेंगे, फिर कुछ नहीं होता. ग्राहक नहीं पहुंच पाते, तो धंधा गिर जाता है. अगर हमें हटाया गया, तो पता नहीं कहां जाएंगे.”

2007 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने विक्टोरिया मेमोरियल की सुरक्षा के लिए बसों को एस्प्लेनेड से हटाने का आदेश दिया था—यह ईस्ट-वेस्ट और जोका लाइनों की कल्पना से भी पहले की बात है. आज उस आदेश को लागू करना एक बड़े मल्टीमोडल हब को पंगु बना देगा, बिना प्रदूषण कम किए, क्योंकि बसों को यात्रियों को लेने के लिए फिर भी एस्प्लेनेड आना पड़ेगा.

ईएम बायपास मेट्रो का काम तब शुरू हुआ था, जब मैं स्कूल में थी. वह 2009 था. अब 2026 है. अब भी लाइन अधूरी है. सोचने पर मजबूर करता है कि क्या अगले दशक में भी यह पूरी होगी या नहीं

— मेधाश्री तलापात्रा, कोलकाता निवासी

महाराजा मणिंद्र चंद्र कॉलेज के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक बिस्वजीत दास ने इन देरी को “मूल रूप से राजनीतिक” बताया और कहा कि केंद्र और राज्य के बीच तालमेल के बिना कोलकाता का दूसरे भारतीय शहरों से पीछे रह जाना तय है, जहां मेट्रो सिस्टम तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

उन्होंने कहा, “अगर शहर की रफ्तार बढ़ेगी, तो अर्थव्यवस्था बदलेगी, काम करने का ढंग बदलेगा और आपसी लेन-देन के मौके बढ़ेंगे.”

कोलकाता मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के अधिकारियों ने डेडलॉक सुलझाने की समयसीमा पर भेजे गए दिप्रिंट के सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

लगभग खाली कोलकाता मेट्रो स्टेशन, जहां रखरखाव में गिरावट दिखने लगी है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
लगभग खाली कोलकाता मेट्रो स्टेशन, जहां रखरखाव में गिरावट दिखने लगी है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

जनहित के दो विचार

अगर बोउबाज़ार ने कोलकाता मेट्रो के इंजीनियरिंग जोखिम दिखाए, तो मैदान ने इसके नैतिक सवाल सामने रखे हैं.

मैदान, जो कोलकाता के दिल में फैला है और सीधे विक्टोरिया मेमोरियल के सामने है, भीड़भाड़ वाले शहरी केंद्र के बीच एक बिना रुकी हरी खुली जगह है. दशकों से यह कोलकाता का साझा स्थान रहा है—मनोरंजन, विरोध, खेल और राहत की जगह, एक ऐसे शहर में जहां खुली जगह बहुत कम है.

विक्टोरिया मेमोरियल के सामने मैदान, जहां प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन के लिए करीब 900 पेड़ों को काटना या स्थानांतरित करना पड़ सकता है | फोटो: कॉमन्स
विक्टोरिया मेमोरियल के सामने मैदान, जहां प्रस्तावित मेट्रो स्टेशन के लिए करीब 900 पेड़ों को काटना या स्थानांतरित करना पड़ सकता है | फोटो: कॉमन्स

यह मेट्रो से अछूता भी नहीं है. मैदान में पहले से ही एक मेट्रो स्टेशन मौजूद है, जो इलाके को नेटवर्क से जोड़ता है.

मौजूदा विवाद राज्य सरकार के मैदान से होकर एक और मेट्रो स्टेशन बनाने के प्रस्ताव को लेकर है, जिसमें करीब 900 पेड़ों को काटना या दूसरी जगह ले जाना शामिल होगा, जिनमें से कई दशकों, बल्कि सदियों पुराने हैं.

इस अलाइनमेंट को चुनौती देने वाले एक एक्टिविस्ट प्रदीप कक्कड़ ने कहा, “हम मेट्रो का विरोध नहीं कर रहे हैं. हम उस लापरवाह तरीके का विरोध कर रहे हैं, जिस तरह शहर की साझा जगहों के साथ व्यवहार किया जा रहा है. मैदान सिर्फ खुली ज़मीन नहीं है, यह सामाजिक जगह है, पर्यावरणीय जगह है, सांस्कृतिक जगह है. सिर्फ इसलिए कि यह बड़ा है, इसे बेकार समझा नहीं जा सकता.”

मैदान में पहले से ही एक मेट्रो स्टेशन है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट
मैदान में पहले से ही एक मेट्रो स्टेशन है | फोटो: स्टेला डे/दिप्रिंट

इस मामले में एक और एक्टिविस्ट बनानी कक्कर और भी साफ थीं. उन्होंने कहा, “आप सैकड़ों साल पुराने पेड़ की चोटी काटकर उसे ट्रांसप्लांटेशन नहीं कह सकते. ये पेड़ फर्नीचर नहीं हैं. आप शहर के फेफड़ों को हमेशा के लिए बदल रहे हैं.”

फिलहाल, न्यायिक हस्तक्षेप ने इस परियोजना को लगभग रोक दिया है. अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि केंद्र की सशक्त समिति की अनुमति के बिना मैदान में कोई पेड़ काटा या स्थानांतरित नहीं किया जा सकता.

इंतज़ार करता शहर

रोज़ाना सफर करने वालों के लिए, कोलकाता मेट्रो की देरी का मतलब है लगातार नई योजना बनाना. दफ्तर का वक्त बफर टाइम के हिसाब से तय होता है. ट्रेन छूटने का मतलब मीटिंग छूटना.

मेट्रो रेलवे के अधिकारी कहते हैं कि सुधार का काम चल रहा है. मुख्य जनसंपर्क अधिकारी एसएस कन्नन ने कहा कि सिस्टम में लगातार सुधार किया जा रहा है.

उन्होंने कहा, “हम यात्रियों की सुरक्षा के लिए मौजूदा ढांचे को अपग्रेड करने की योजना बना रहे हैं, जिसमें बेहतर एएफसी गेट्स और एआई-आधारित सीसीटीवी सिस्टम जैसी सेवाएं शामिल हैं.”

यात्रियों के लिए ये सुधार अभी सिर्फ कागज़ी लगते हैं. अद्रिजा अब पहले से जल्दी घर से निकलती है, फील्डवर्क के लिए सैकड़ों फॉर्म साथ लेकर, यह जाने बिना कि ट्रेन पूरी यात्रा करेगी या बीच में ही खत्म हो जाएगी.

उन्होंने कहा, “पहले मुझे पता होता था कि हर पांच मिनट में मेट्रो आएगी. अब यह अंदाज़े का खेल बन गया है.”

बैरिकेड अब भी लगे हैं. सड़कें अब भी खुदी हुई हैं. स्टेशन अब भी बंद हैं. समयसीमाएं फिर बदल जाती हैं. और शहर—जो अब तक इसका आदी हो चुका है—इंतज़ार करता रहता है.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: न लाभ और न ही सवारी: जयपुर, आगरा, लखनऊ जैसे शहरों के लिए मेट्रो कैसे है सिर्फ एक स्टेटस सिंबल


 

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