सितंबर 1988 में मैं त्साका ला पर खड़ा था और रेज़ांग ला की तरफ देख रहा था. त्साका ला एक संकरा पहाड़ी दर्रा है, जो लद्दाख की पहाड़ियों को कैलाश पर्वतमाला से और चुशूल घाटी को सिंधु घाटी से जोड़ता है. यह जगह इसलिए जानी जाती है क्योंकि चीन के साथ युद्ध के दौरान 18 नवंबर 1962 को 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी ने यहां चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को कब्ज़ा करने से रोक दिया था. मैंने देखा कि वहां से करीब तीन किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व में स्थित रेचिन ला तक जीप चलने लायक सड़क बनी हुई थी.
मैं उस पहले कंबैट ग्रुप का कमांडर था, जिसे जुलाई 1988 के आखिर में लद्दाख में तैनात किया गया था. इस ग्रुप में एक मैकेनाइज्ड बटालियन और दो आर्मर्ड स्क्वाड्रन शामिल थे. पूर्वी लद्दाख में मैकेनाइज्ड सेना को तैनात करने की योजना बनाने के लिए मैं टोही मिशन पर था. मुझे रेचिन ला तक जाने वाली घुमावदार कच्ची सड़क पर जाने से मना किया गया था, लेकिन मैंने अचानक उसी सड़क पर अपना वाहन चला दिया. एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) कैलाश पर्वतमाला के ऊपरी हिस्से के साथ चलती है, जिस पर किसी भी देश ने आपत्ति नहीं की थी. दोनों देश इसे ‘नो मैंस लैंड’ यानी निर्जन क्षेत्र मानते थे.
रेचिन ला से मैंने देखा कि एक चीनी सड़क स्पांग्गुर त्सो तक जाती है और आगे रुडोक जाने वाली सड़क से जुड़ती है. मूल अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) वहां से करीब पांच किलोमीटर पूर्व में थी. मैकेनाइज्ड सेना के साथ हमले के लिए यह एक बहुत अच्छा रास्ता था.
1986-87 में सुमदोरोंग चू में हुई झड़प के बाद भारतीय सेना ने उत्तर की सीमाओं पर आगे बढ़कर मोर्चा संभालने की नीति अपनाई, जिसे ‘एक्सरसाइज चेकरबोर्ड’ से मजबूती मिली. भारतीय सेना में तेज़ी से बदलाव हो रहा था और वह चीनी सेना का मुकाबला करने की स्थिति में आ गई थी. पूर्वी लद्दाख, खासकर चूशूल और सिंधु घाटी के इलाके, हमलावर कार्रवाई के लिए उपयुक्त माने जा रहे थे.
रेज़ांग ला का मेरा दौरा
कैलाश पर्वतमाला से जुड़े पहले से मिले आदेश का उल्लंघन करते हुए मैंने अपना टोही मिशन रेज़ांग ला दर्रे तक बढ़ाया. रेज़ांग ला भी रेचिन ला जैसी बढ़त देने वाली जगह थी, जहां दक्षिण-पश्चिम दिशा से रास्ता बनाकर कम दूरी में पहुंचा जा सकता था. उस युद्ध के 26 साल बाद भी वहां लड़ाई के निशान साफ दिख रहे थे. मैंने करीब दो घंटे तक उस इलाके का निरीक्षण किया, जहां युद्ध हुआ था.
तीन प्लाटून की पोजीशन साफ दिखाई दे रही थी. 7 प्लाटून को दर्रे के उत्तर में ऊंचाई पर तैनात किया गया था, 8 प्लाटून दक्षिण में था. कंपनी हेड क्वार्टर के साथ 9 प्लाटून, 7 प्लाटून से करीब एक से डेढ़ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम और 8 प्लाटून से उतनी ही दूरी पर उत्तर-पश्चिम में था.
स्पष्ट था कि इस जगह पर कब्ज़ा बनाए रखने के लिए सेना की कम से कम दो कंपनियों की ज़रूरत थी. प्लाटूनों के बीच और खुले किनारों पर बड़ी खाली जगह थी, जहां से दुश्मन घुसपैठ कर सकता था, पीछे से या बगल से हमला कर सकता था. सबसे नज़दीकी मदद दक्षिण में पांच किलोमीटर दूर त्साका ला में थी, जहां 5 जाट रेजिमेंट की एक कंपनी तैनात थी. उत्तर में आठ किलोमीटर दूर पहाड़ी इलाके में 13 कुमाऊं रेजिमेंट की दो कंपनियां थीं.
परम वीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह और उनकी कंपनी ने इन सभी कठिन हालात के बावजूद रेज़ांग ला की लड़ाई लड़ी. इस लड़ाई में एक अधिकारी, दो जूनियर कमीशंड अफसर (जेसीओ) और 104 अन्य रैंक (ओआर) सहित कुल 124 सैनिक शहीद हुए. इनमें दर्रे के नीचे स्थित प्रशासनिक अड्डे के कर्मचारी भी शामिल थे, जो सीधे लड़ाई में नहीं थे. एक जेसीओ और चार ओआर घायल होकर दुश्मन के युद्धबंदी बने, जिनमें से एक की बाद में कैद में ही मौत हो गई.
मगर हिल की डी कंपनी के दो ओआर, जो रेज़ांग ला से जुड़ने की कोशिश कर रहे गश्ती दल का हिस्सा थे, घिर गए और लड़ाई में मारे गए. उन्हें भी रेज़ांग ला की लड़ाई में शामिल माना गया. शुरू में यह माना गया कि चार युद्धबंदी भी लड़ाई में मारे गए, इसलिए ज्यादातर रिपोर्टों में 114 सैनिकों के शहीद होने की बात कही गई, लेकिन वास्तव में कुल 110 सैनिक मारे गए थे, जिनमें वह सैनिक भी शामिल था जिसकी कैद में मौत हुई, और डेल्टा कंपनी के दो सैनिक भी शामिल थे.
चार ओआर किसी तरह लड़ाई से बच निकलने में सफल रहे और वापस लौट आए. इनके अलावा चार युद्धबंदी भी बाद में लौटे. रेवाड़ी क्षेत्र के एक शोधकर्ता के पास ऐसे 17 सैनिकों की सूची है जो इस युद्ध में जीवित बचे. इसमें चार वे सैनिक हैं जो बचकर निकल आए, चार युद्धबंदी जो 1963 में लौटे और छह ओआर जो संभवतः प्रशासनिक दफ्तर में थे या लड़ाई के दौरान स्थानांतरित हो रहे थे.
फरवरी 1963 में रेज़ांग ला से 97 शव बरामद किए गए थे.
भारतीय सैन्य इतिहास में जितनी वीरता रेज़ांग ला में दिखाई गई, उतनी किसी और लड़ाई में नहीं देखी गई. 63 साल बाद आज यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी कठिन परिस्थितियों में उस कंपनी को लड़ाई के लिए क्यों मजबूर किया गया.
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चूशूल की रक्षा
चुशूल सेक्टर में कैलाश पर्वतमाला एक ऐसा इलाका है, जहां 1959 की दावा रेखा भारत को बड़ा रणनीतिक फायदा देती है. यहां से भारत का मूल अंतरराष्ट्रीय सीमा तक नियंत्रण बनता है और यह रुडोक पर हमले का आधार भी बन सकता है, जहां एक एयरफील्ड भी मौजूद है. यह इलाका चुशूल की रक्षा के लिए बेहद अहम है.
युद्ध के पहले चरण में, 20 से 27 अक्टूबर 1962 के बीच, चीन सभी सेक्टरों में अपनी 1959 की दावा रेखा तक पहुंच चुका था, लेकिन वह कैलाश पर्वतमाला पर भारत को बढ़त लेने से रोकना चाहता था. 114 इन्फैंट्री ब्रिगेड को चूशूल में तैनात किया गया. इसके साथ दो अतिरिक्त बटालियन, एक फील्ड आर्टिलरी बैटरी और बाद में एएमएक्स-13 टैंकों के दो ट्रूप भी चुशूल की रक्षा के लिए दिए गए.
13 कुमाऊं रेजिमेंट की एक-एक कंपनी मगर हिल और पाव हिल पर तैनात थी और एक कंपनी रेज़ांग ला में थी. बटालियन मुख्यालय और एक कंपनी ट्रैक जंक्शन पर तैनात थी, जो एयरफील्ड के दक्षिण में था और ब्रिगेड रिजर्व के रूप में रखी गई थी. 5 जाट रेजिमेंट की एक कंपनी त्साका ला पर तैनात थी, जबकि एक प्लाटून अलग जगह पर था.
1/8 गोरखा राइफल्स की एक कंपनी गुरुंग हिल पर, एक कंपनी इसके उत्तर में टेबल टॉप कैमल्स बैक पर और एक कंपनी स्पांगुर गैप की रक्षा के लिए तैनात थी. शुरुआती नुकसान के कारण कमज़ोर हुई एक कंपनी के साथ बटालियन मुख्यालय एयरफील्ड पर था.
1 जाट रेजिमेंट की दो कंपनियां थाकुंग हाइट्स पर तैनात थीं, जो पैंगोंग झील के पार जल और थल दोनों जगह उतर सकने वाले विमानों के लिए थीं. दो कंपनियों के साथ बटालियन मुख्यालय चुशूल गांव के पास गोम्पा हिल पर था, जिसे संभवतः ब्रिगेड रिजर्व के रूप में रखा गया था.
5 जाट रेजिमेंट 13 कुमाऊं रेजिमेंट के अधीन लुकुंग-फोब्रांग क्षेत्र में त्साका ला पर एक कंपनी के साथ तैनात थी.
13 फील्ड रेजिमेंट की एक बैटरी 25 पाउंडर तोपों के साथ ब्रिगेड की मदद कर रही थी. बैटरी को दो हिस्सों में बांटा गया था, जो गुरुंग हिल और मगर हिल के दक्षिण में तैनात थे.
एएमएक्स-13 टैंकों के दो ट्रूप 26 अक्टूबर को हवाई जहाज से भेजे गए और गुरुंग हिल की तलहटी में तैनात किए गए, ताकि दुश्मन के टैंक स्पांगुर गैप से न आ सकें और गुरुंग हिल की मदद की जा सके.
दुश्मन का गलत आकलन
पीएलए की ताकत और मंशा का सही आकलन नहीं किया गया. दौलत बेग ओल्डी से लेकर डेमचोक तक फैले 400 किलोमीटर लंबे पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में पीएलए की तीन रेजिमेंट हमला करने के लिए तैनात थीं. लड़ाई के दूसरे चरण में वह चुशूल पर हमले के लिए एक पूरी रेजिमेंट जुटाने में सफल रही, जिसमें कम से कम दो-तीन कंपनियों पर कब्ज़ा करने की क्षमता थी. इसके अलावा रक्षा चौकियों के लिए अलग सैनिक तैनात थे.
पीएलए के पास सिंधु घाटी या नुब्रा घाटी में ऑपरेशन करने के पर्याप्त साधन नहीं थे. इसके बावजूद भारतीय सेना के अधिकारियों को हर जगह खतरा दिख रहा था और वे 260 किलोमीटर पीछे मौजूद सड़क के साथ लेह की रक्षा में ही लगे रहे. चुशूल, सिंधु घाटी और लेह की रक्षा के लिए संसाधनों को बराबर बांट दिया गया. अगर चाहा जाता, तो लेह की रक्षा में लगे ब्रिगेड और आर्टिलरी का कुछ हिस्सा चूसुल भेजा जा सकता था.
तैनाती में चूक
114 इन्फैंट्री ब्रिगेड के पास इतनी सेना थी कि वह चुशूल की अच्छी तरह रक्षा कर सकती थी, लेकिन तैनाती में बड़ी गलती हुई. ब्रिगेड ने स्पांगुर गैप के उत्तर में कैलाश पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी ब्लैक टॉप पर कब्ज़ा करने की कोशिश नहीं की. शुरुआत में पीएलए ने भी वहां पूरी ताकत नहीं लगाई थी और भारत आसानी से उस पर कब्ज़ा कर सकता था. नतीजा यह हुआ कि चीनी सेना ने गुरुंग हिल पर बढ़त बना ली और ऊंचाई से हमला करने लगी.
इसी तरह, स्पांगुर गैप के दक्षिण में रेज़ांग ला और मगर हिल के बीच दूसरी सबसे ऊंची जगह मुखपरी पर भी कब्ज़ा नहीं किया गया. इन दोनों चौकियों के बीच करीब आठ किलोमीटर की दूरी थी, जिससे रेज़ांग ला पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया.
पीएलए ने उत्तर और दक्षिण से रेज़ांग ला को घेरकर पीछे से हमला किया. लेह जाने वाली सड़क को बचाने के लिए रेज़ांग ला पर डटे रहना रणनीतिक रूप से सही नहीं था, क्योंकि उस सड़क को उत्तर में आठ किलोमीटर के गैप या दक्षिण की खुली जगह से भी रोका जा सकता था.
अगर रेज़ांग ला पर कब्ज़ा बनाए रखना था, तो मुखपरी, रेचिन ला और उसके दक्षिण के दर्रों पर भी एक-एक कंपनी तैनात करनी ज़रूरी थी. या तो तीन कंपनियों वाले ब्रिगेड रिजर्व को जोखिम में डालकर लगाया जाता, या फिर रेज़ांग ला की जगह मुखपरी को मजबूत करके बेहतर रक्षा क्षेत्र बनाया जाता.
तोपखाने की पूरी ताकत उपलब्ध नहीं थी. केवल एक आर्टिलरी बैटरी थी. इलाके की बनावट ऐसी नहीं थी कि तोपें सही ढंग से इस्तेमाल हो सकें, इसलिए रेज़ांग ला को तोपों का समर्थन नहीं मिला. इसके लिए ऊपर के कमांडर जिम्मेदार थे. 15 नवंबर तक भारत के विमान चुशूल में उतर रहे थे और 26 अक्टूबर को छह टैंक भी उतारे गए थे. अगर इरादा मजबूत होता, तो और टैंक सड़क या हवाई मार्ग से भेजे जा सकते थे. कम से कम लेह में तैनात बैटरी तो भेजी ही जा सकती थी.
बहादुरों में भी बहादुर
मेजर शैतान सिंह जैसे अनुभवी अधिकारी के लिए हालात बहुत मुश्किल थे. उनके सामने दो विकल्प थे—या तो दर्रे के दोनों ओर ज्यादा सेना तैनात की जाए, या दर्रे के उत्तर की सबसे ऊंची जगह पर ध्यान देकर मजबूत रक्षा बनाई जाए. उन्होंने पहला विकल्प चुना और सभी रास्तों की सुरक्षा पर जोर दिया.
संसाधनों की कमी के कारण पीएलए का सीमित लक्ष्य यह था कि भारतीय सेना को कैलाश पर्वतमाला पर बढ़त न लेने दी जाए और एयरफील्ड का इस्तेमाल न हो सके. उसने रेज़ांग ला और गुरुंग हिल पर दोनों तरफ से हमला करने का फैसला किया. मगर इलाके की स्थिति ऐसी थी कि मगर हिल और पाव हिल पर कब्ज़ा करना मुश्किल था, क्योंकि वे अलग-थलग पड़ जाते और तोपखाने की मार में आ जाते.
रेज़ांग ला पर हमले के लिए कुल एक बटालियन और एक अतिरिक्त कंपनी लगाई गई. पीएलए की एक बटालियन में तीन कंपनियां होती हैं और हर कंपनी में 150 से लेकर 160 तक सैनिक होते हैं. इस तरह करीब 600–640 सैनिकों ने हमला किया, यानी रक्षा कर रही सेना के मुकाबले 5:1 की बढ़त.
हमले में बैटरी की जगह 120 मिमी मोर्टार रेजिमेंट, 76.2 मिमी तोपों की एक बैटरी और बंकर तोड़ने के लिए 57 मिमी की आरसीएल तोपों का इस्तेमाल किया गया. इसके साथ एक इंजीनियर कंपनी, एक फ्लेमथ्रोवर कंपनी और एक विमानभेदी कंपनी भी थी.
हमलावर सेना को दो हिस्सों—उत्तर और दक्षिण ग्रुप में बांटा गया. हर ग्रुप में दो कंपनियां और ज़रूरी सहायता थी. उत्तर ग्रुप का नेतृत्व 4 इन्फैन्ट्री डिवीजन के डिप्टी कमांडर ने किया और दक्षिण ग्रुप का नेतृत्व 10 इन्फैंट्री डिवीजन के कमांडर ने. योजना यह थी कि रक्षा कर रही सेना को चारों ओर से घेरकर एक साथ उत्तर, दक्षिण, पश्चिम और पूर्व से हमला किया जाए.
18 नवंबर को सुबह 9:15 बजे हमलावर सेना ने अपनी पोजीशन ले ली. इससे पहले तड़के छोटे-छोटे दस्तों ने टोह लेने के लिए हमले शुरू कर दिए थे. मुख्य हमला सुबह 9:15 बजे शुरू हुआ और अगले 13 घंटे तक भयंकर लड़ाई चली. रात 10 बजे जाकर तोपें शांत हुईं.
मेजर शैतान सिंह और उनकी टुकड़ी को पता था कि वे पूरी तरह घिर जाएंगे, फिर भी उन्होंने आखिरी सैनिक तक लड़ाई लड़ी. चीनी दस्तावेजों के अनुसार, पीएलए के 21 सैनिक मारे गए और 98 घायल हुए.
इस लड़ाई का कोई आधिकारिक विवरण आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है. अब समय आ गया है कि भारतीय सेना किसी प्रसिद्ध सैन्य इतिहासकार को यह जिम्मेदारी दे कि वह इस युद्ध का प्रामाणिक इतिहास लिखे. मेजर शैतान सिंह और 13 कुमाऊं रेजिमेंट की चार्ली कंपनी के सभी वीर सैनिकों का सर्वोच्च बलिदान हमारी सेना और पूरे देश को हमेशा प्रेरणा देता रहेगा.
लेफ्टिनेंट जनरल एच. एस. पनाग (सेवानिवृत्त), पीवीएसएम, एवीएसएम, ने 40 साल तक भारतीय सेना में सेवा की. वे उत्तरी कमान और केंद्रीय कमान के कमांडर रहे. रिटायरमेंट के बाद, उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में सदस्य के रूप में काम किया. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.
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