चंडीगढ़: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 फरवरी को गुरु रविदास जयंती के मौके पर जालंधर के पास स्थित डेरा सचखंड बल्लां का दौरा करने वाले हैं. इसे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में दलित मतदाताओं को साधने के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राजनीतिक पहुंच का हिस्सा माना जा रहा है.
यह दौरा डेरा प्रमुख निरंजन दास को पद्म श्री सम्मान मिलने के कुछ ही दिनों बाद हो रहा है. दिसंबर में डेरा प्रमुख ने वरिष्ठ पार्टी नेताओं के साथ प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी और उन्हें 1 फरवरी को होने वाले गुरुपूरब समारोह में आने का न्योता दिया था.
डेरा प्रमुख ने प्रधानमंत्री से यह भी अनुरोध किया था कि अगले साल गुरु रविदास की 650वीं जयंती पर देशभर में केंद्र सरकार की ओर से कार्यक्रम आयोजित किए जाएं.
राज्य में विधानसभा चुनावों में अब एक साल बाकी है. विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह दौरा खास जाति समुदायों तक पहुंच बनाने की एक ज्यादा लक्षित रणनीति है, जिनकी कड़े चुनावी मुकाबलों में बड़ी भूमिका होती है. खास तौर पर रविदासिया और आद-धर्मी समुदाय, जो पंजाब के दलितों में सबसे बड़ा उपसमूह हैं.
चंडीगढ़ के सेक्टर 10 स्थित डीएवी कॉलेज के राजनीति विज्ञान विभाग की डॉ. कंवलप्रीत कौर ने कहा, “रविदासिया और अन्य दलित मतदाता किसी एक पार्टी को एकजुट होकर वोट नहीं देते. वे अक्सर स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों और गठबंधनों के आधार पर अपना रुख बदलते हैं. रविदासिया डेरा से खुलकर संपर्क करना बीजेपी के लिए रणनीतिक रूप से बहुत अहम है.”
उन्होंने आगे कहा, “रविदासिया समुदाय लंबे समय से खुद को एक स्वतंत्र समुदाय के रूप में पहचान दिलाने की मांग कर रहा है. बीजेपी इसी पहचान को आगे बढ़ाना चाहती है—समुदाय की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और उसके आध्यात्मिक नेतृत्व को सम्मान दिलाने की मांग के साथ खुद को जोड़कर.”
दिप्रिंट आपको बता रहा है कि राज्य में रविदासिया संप्रदाय की इस केंद्रीय संस्था में प्रधानमंत्री के दौरे का क्या महत्व है.
पाई में हिस्सा पाने की बीजेपी की कोशिश
कभी अकाली दल की जूनियर साझेदार रही बीजेपी, 2020 में बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा लाए गए विवादित कृषि कानूनों को लेकर शिअद-बीजेपी गठबंधन टूटने के बाद से पंजाब में अपनी स्वतंत्र चुनावी पहचान बनाने की कोशिश कर रही है.
राज्य में बीजेपी की यह रणनीति इतनी सफल रही है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में जहां उसका वोट शेयर 6.60 प्रतिशत था, वहीं 2024 के लोकसभा चुनावों में यह बढ़कर 18.56 प्रतिशत हो गया. इससे आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस के वोट शेयर में भी कटौती हुई.
पिछले एक साल में पार्टी ने सिख किसानों के वर्चस्व वाले ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने पर ध्यान दिया है.
पंजाब की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी लगभग 32 प्रतिशत है, जो देश में सबसे ज्यादा है. हालांकि, दलित सिखों, हिंदुओं और ईसाइयों में बंटे हुए हैं और इनमें से कई लोग डेराओं को भी मानते हैं.
पंजाब में जगह-जगह फैले डेरा अलग-अलग संप्रदायों और संगठनों के सामाजिक-धार्मिक केंद्र होते हैं. सिख गुरुद्वारों के विपरीत, जहां गुरु ग्रंथ साहिब को जीवित गुरु माना जाता है, डेराओं का नेतृत्व आमतौर पर किसी जीवित गुरु द्वारा किया जाता है, जिनके अपने अनुयायी होते हैं.
डेरा राधा स्वामी सत्संग ब्यास, डेरा सच्चा सौदा (जिसका मुख्यालय सिरसा में है) और डेरा सचखंड बल्लां पंजाब के तीन सबसे ज्यादा माने जाने वाले डेरा हैं, जिनके अनुयायियों की संख्या लाखों में है.
दलितों के बीच रविदासिया, रामदासिया और आद-धर्मी प्रमुख उप-समूह हैं. ये मुख्य रूप से दोआबा क्षेत्र के जालंधर, होशियारपुर, एसबीएस नगर और फगवाड़ा जिलों में केंद्रित हैं.
चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय के दलित अध्ययन विशेषज्ञ रोंकी राम के अनुसार, रविदासिया पंजाब का सबसे प्रमुख दलित समुदाय है.
उन्होंने कहा, “पंजाब में अनुसूचित जाति की 39 जातियों में से चार प्रमुख जातियां—चमार (23.45 प्रतिशत), आद-धर्मी (11.48 प्रतिशत), वाल्मीकि (9.78 प्रतिशत) और मजहबी (29.72 प्रतिशत)—कुल एससी आबादी का 74.44 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “चमार समुदाय आगे रविदासिया (चमड़े का काम करने वाले) और रामदासिया (बुनकर) में बंटा हुआ है. कई कारणों से रविदासिया सबसे प्रमुख हैं. उन्होंने शिक्षा में आरक्षण का अच्छा उपयोग किया और वे सबसे ज्यादा आगे बढ़ने वाला समुदाय बने. कई लोग विदेश गए और दोआबा से एनआरआई आबादी का एक बड़ा हिस्सा बनते हैं.”
इसके चलते, रोंकी राम ने कहा, वे “आर्थिक रूप से संपन्न हो गए हैं.”
उन्होंने कहा, “उन्होंने गुरु रविदास डेराओं में निवेश किया है और अब उनके पास मजबूत सामाजिक पूंजी है. वे आपस में जुड़े हुए हैं और एक समुदाय के रूप में राजनीतिक प्रभाव भी रखते हैं.”
गुरु रविदास
रविदासिया पहचान की जड़ें गुरु रविदास की शिक्षाओं में हैं. गुरु रविदास 15वीं सदी के भक्ति संत और समाज सुधारक थे, जो चमार जाति से थे. उनका समानता का संदेश दलित समुदायों के बीच गहराई से जुड़ता है.
दलित अध्ययन विशेषज्ञ रोंकी राम ने अपने शोध पत्र का हवाला देते हुए कहा, “रविदास का जन्म चमार जाति में हुआ था, जिसे कुटबंधला भी कहा जाता है. यह उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जातियों (एससी) में से एक है. चमार अपनी चमड़े और खाल के काम के लिए जाने जाते हैं. उन्हें दबाया गया और ऊंची जातियों द्वारा उनका छूना और यहां तक कि देखना भी अपवित्र माना जाता था. रविदास ने इस अमानवीय छुआछूत की व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह किया. उन्होंने अपने विद्रोह को व्यक्त करने के लिए भक्ति को माध्यम बनाया.”
गुरु रविदास के काव्यात्मक भजन सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं, जिसे सिख एक जीवित गुरु मानते हैं.
रोंकी राम ने कहा, “रविदास दलितों के दिलों में खास जगह रखते हैं, क्योंकि उन्होंने जाति के आधार पर होने वाले सामाजिक बहिष्कार और उत्पीड़न की परंपरा पर सीधा हमला किया. सबसे निचली जातियों में से एक से होने के बावजूद, उनकी प्रतीकात्मक छवि पंजाब में एक अलग दलित पहचान के उभरने में आज भी प्रेरक की तरह काम करती है.”
उन्होंने आगे कहा, “रविदास एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व थे, जिन्हें ओमवेद्ट (गेल ओमवेद्ट, अमेरिकी समाजशास्त्री) ने साहस के साथ ‘भक्ति का क्रांतिकारी’ कहा था. अपने समुदाय, खासकर पंजाब के चमारों के बीच उनके अनुयायियों की संख्या बहुत बड़ी है, जो उन्हें अपना गुरु मानते हैं. पंजाब भर में उनके नाम पर मंदिर, गुरुद्वारे, भवन (स्मृति स्थल), शैक्षणिक संस्थान/पीठ, सांस्कृतिक संगठन और अस्पताल बनाए गए हैं.”
सचखंड बल्लां
रविदासिया समुदाय गुरु रविदास को केंद्र में रखकर एक साझा आध्यात्मिक परंपरा को मानता है. इसमें डेरा बल्लां और श्री गुरु रविदास जन्म अस्थान (वाराणसी) जैसे स्थानों से जुड़ी अलग धार्मिक परंपराएं शामिल हैं.
हर साल इस डेरा से बड़ी संख्या में श्रद्धालु ट्रेनों के जरिए वाराणसी जाते हैं, ताकि गुरु रविदास की जयंती मना सकें.
जालंधर के बल्लां में स्थित सचखंड डेरा पंजाब में रविदासियों का सबसे बड़ा डेरा है. यह इस परंपरा की केंद्रीय संस्था है और रविदासियों के लिए सामाजिक एकता, शिक्षा और पहचान का केंद्र भी है.
2009 में रविदासियों और कट्टरपंथी सिखों के बीच एक बड़ा तनाव सामने आया, जब ऑस्ट्रिया के वियना में एक रविदासिया सभा पर छह हथियारबंद लोगों ने हमला किया. इस हमले में उस समय डेरा के दूसरे प्रमुख संत रामानंद की मौत हो गई.
संत रामानंद के साथ मौजूद डेरा प्रमुख संत निरंजन दास भी इस हमले में घायल हो गए थे.
सिख कट्टरपंथियों का मानना था कि कुछ रविदासिया परंपराएं पारंपरिक सिख मर्यादा से अलग हैं. इस हमले के बाद पंजाब में विरोध प्रदर्शन हुए और जालंधर, होशियारपुर सहित कई इलाकों में सिखों और रविदासियों के बीच झड़पें हुईं.
यह घटना समुदाय की अलग पहचान को मजबूत करने में अहम साबित हुई. इसके अगले साल, रविदासियों ने सिखों या हिंदुओं, किसी के भी साथ खुद को जोड़ने से इनकार करते हुए, अपने को एक अलग धर्म का हिस्सा घोषित किया, जिसकी अलग पहचान, धार्मिक परंपराएं और अपना ग्रंथ (अमृतबाणी गुरु रविदास जी) है.
राजनीतिक महत्व
वक्त के साथ, डेरा बल्लां ने आध्यात्मिक मामलों से आगे बढ़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण तक अपना प्रभाव बढ़ाया है. इससे यह पंजाब और विदेशों में रहने वाले कई दलितों के लिए सामाजिक जीवन का एक अहम केंद्र बन गया है.
दोआबा क्षेत्र की कम से कम 19–20 विधानसभा सीटों पर इस डेरा का मजबूत सामाजिक प्रभाव माना जाता है. राजनीतिक तौर पर, रविदासिया—अन्य कई दलित उप-समूहों की तरह—एकजुट होकर एक ही पार्टी को वोट नहीं देते, लेकिन अहम सीटों पर उनका सामूहिक प्रभाव उन्हें पंजाब में सत्ता चाहने वाली किसी भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण बना देता है.
राज्य की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां—कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP), शिरोमणि अकाली दल (SAD) और अन्य—इस समुदाय को साधने की कोशिश करती रही हैं. चुनाव के समय खास तौर पर बड़े नेता डेरा में मत्था टेकने और आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते रहे हैं.
जब कांग्रेस नेता चरणजीत सिंह चन्नी, जो अब सांसद हैं, 2021 में पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री बने, तो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी पहली यात्राओं में से एक सचखंड डेरा बल्लां की थी, जहां डेरा प्रमुख ने उनका स्वागत किया था. चन्नी ने गुरु रविदास के जीवन और शिक्षाओं पर शोध के लिए एक शोध संस्थान स्थापित करने का वादा भी किया है.
दलित वोटिंग पैटर्न
अन्य राज्यों के विपरीत, जहां उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) जैसी मजबूत दलित पार्टियां एकजुट दलित वोट बैंक रखती हैं, पंजाब में कोई भी एक दलित राजनीतिक पार्टी 1990 के दशक की शुरुआती कुछ जीतों के बाद लगातार बड़ी सफलता हासिल नहीं कर पाई. 1998 के बाद से वह एक भी सीट नहीं जीत सकी है.
पंजाब से आने वाले कांशीराम द्वारा स्थापित बीएसपी को शुरुआती दौर में कुछ सफलता मिली थी, लेकिन बाद में उसका वोट शेयर लगातार घटता गया.
पंजाब में दलित कभी भी एकजुट होकर वोट नहीं देते रहे हैं. आम तौर पर उनके वोट कई पार्टियों में बंट जाते हैं.
हालांकि, 2021 की लोकनीति-सीएसडीएस रिपोर्ट के अनुसार, दलित मतदाता लगातार शिरोमणि अकाली दल और यहां तक कि 2017 में राज्य में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी की तुलना में कांग्रेस को ज्यादा पसंद करते रहे हैं.
लोकनीति-सीएसडीएस के अनुसार, 2017 के विधानसभा चुनावों में दलित सिख वोटों में से 41 प्रतिशत कांग्रेस को, 34 प्रतिशत शिअद को और 19 प्रतिशत AAP को मिले. इसी तरह, हिंदू दलित वोटों में से 43 प्रतिशत कांग्रेस को, 26 प्रतिशत शिअद को और 21 प्रतिशत AAP को मिले.
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने हिंदू दलित वोटों का 58 प्रतिशत और सिख दलित वोटों का 35 प्रतिशत हासिल किया. शिअद-बीजेपी गठबंधन को हिंदू दलित वोटों का 27 प्रतिशत और सिख दलित वोटों का 26 प्रतिशत मिला.
AAP, जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव से चुनावी राजनीति में कदम रखा, शुरुआत में बीएसपी के दलित वोट बैंक में सेंध लगाती दिखी.
हालांकि, 2022 में AAP ने लगभग पूरा दलित वोट बैंक अपने पक्ष में कर लिया. कांग्रेस केवल 34 आरक्षित सीटों (कुल 117 में से) में से पांच ही जीत पाई, और उस समय के दलित मुख्यमंत्री चन्नी अपनी दोनों सीटों पर हार गए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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