नई दिल्ली: इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 ने चेतावनी दी है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा बिना शर्त कैश ट्रांसफर (UCT) के बढ़ते इस्तेमाल से जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च कम होने का खतरा है, जिससे वित्तीय स्थिरता और सार्वजनिक निवेश को नुकसान पहुंच सकता है.
गुरुवार को संसद में पेश किए गए सर्वे में बताया गया है कि UCTs ने रेवेन्यू खर्च बढ़ाने में भूमिका निभाई है. इसका राज्य स्तर पर वित्तीय स्थिति पर गंभीर असर पड़ रहा है, जबकि राजनीतिक पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए ऐसी योजनाओं का सहारा ले रही हैं.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि ये योजनाएं तुरंत आय सहायता देती हैं, लेकिन इनके बढ़ते दायरे से खर्च पर दबाव बढ़ता है और पूंजी निवेश, जिसमें मानव पूंजी भी शामिल है, के लिए संसाधनों की कमी का खतरा पैदा होता है.
रिपोर्ट के अनुसार, FY26 में UCT कार्यक्रमों पर कुल खर्च, खासकर महिलाओं के लिए, लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है.
सर्वे में बताया गया है कि FY23 से FY26 के बीच ऐसे ट्रांसफर लागू करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या पांच गुना से ज्यादा बढ़ गई है. इनमें से लगभग आधे के रेवेन्यू घाटे में होने का अनुमान है.
बिहार का उदाहरण UCTs की राजनीतिक अपील को दिखाता है. पिछले नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों से पहले नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की घोषणा की थी. इसके तहत योग्य महिलाओं को बिजनेस शुरू करने के लिए 10,000 रुपये दिए गए. इस योजना को चुनाव में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस की जीत का एक अहम कारण माना जाता है.
बिहार के अलावा, पिछले कुछ वर्षों में तमिलनाडु, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों ने महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर योजनाएं शुरू की हैं.
इकोनॉमिक सर्वे ने जोर दिया है कि UCT का विस्तार सीमित वित्तीय हालात के बीच हुआ है. राज्यों का कुल सकल राजकोषीय घाटा FY22 में GDP के 2.6 प्रतिशत से बढ़कर FY25 में 3.2 प्रतिशत हो गया. इसी अवधि में कुल रेवेन्यू घाटा GDP के 0.4 प्रतिशत से बढ़कर 0.7 प्रतिशत हो गया, जो यह दिखाता है कि रेवेन्यू खर्च पूरा करने के लिए लगातार उधार लिया जा रहा है.
FY25 में बकाया देनदारियां GDP के लगभग 28.1 प्रतिशत के बराबर थीं. वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान और सब्सिडी जैसे प्रतिबद्ध खर्च FY24 में राज्यों की कुल रेवेन्यू प्राप्तियों का लगभग 62 प्रतिशत थे, जिससे वित्तीय गुंजाइश और सीमित हो गई.
सर्वे में कहा गया है कि इस स्थिति में UCTs के लिए ज्यादा आवंटन करने का मतलब साफ तौर पर समझौते करना है. जब तक घाटा और नहीं बढ़ाया जाता, अतिरिक्त खर्च जरूरी सामाजिक और भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए उपलब्ध संसाधनों को कम करेगा.
रिपोर्ट में एकेडमिक चंद्रिका सिंह के इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में छपे एक लेख का भी जिक्र है. इसमें ऐसे ट्रांसफर का आकलन राज्यों के GSDP के 0.19 से 1.25 प्रतिशत और कुल बजटीय खर्च के 0.68 से 8.26 प्रतिशत के बीच बताया गया है.
सिंह के अनुसार, सात राज्यों में जहां विस्तृत अध्ययन किया गया, वहां कैश ट्रांसफर महिला दिहाड़ी मजदूरों की मासिक आय का 11 से 24 प्रतिशत और स्व-रोजगार श्रमिकों की आय का 11 से 87 प्रतिशत तक हिस्सा बनते हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ये ट्रांसफर ग्रामीण आबादी के कम से कम आधे हिस्से के मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च का 40 से 50 प्रतिशत तक हो सकते हैं.
कुछ समर्थकों, जिनमें कुछ राज्य सरकारें भी शामिल हैं, का कहना है कि कैश ट्रांसफर तुरंत आय सहायता देते हैं और महिलाओं को स्वास्थ्य और व्यक्तिगत जरूरतें पूरी करने में मदद करते हैं. कुछ लोग इसे GDP में महिलाओं के बिना वेतन वाले योगदान के बदले के रूप में भी देखते हैं.
हालांकि, आर्थिक सर्वे ने बिना शर्त कैश ट्रांसफर की लंबी अवधि की प्रभावशीलता पर मिले-जुले सबूतों की ओर इशारा किया है.
नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च के एक स्टडी का हवाला देते हुए सर्वे ने बताया कि 34 कम और मध्यम आय वाले देशों के 72 UCT कार्यक्रमों के विश्लेषण में यह सामने आया कि ये योजनाएं उपभोग, खाद्य सुरक्षा और अल्पकालिक आय स्थिरता में सुधार करती हैं, लेकिन बच्चों के पोषण, शिक्षा के नतीजों में लगातार सुधार नहीं कर पातीं और न ही लोगों को स्थायी रूप से गरीबी से बाहर निकाल पाती हैं.
सर्वे में कहा गया है कि ऐसे नतीजे पूरक सार्वजनिक सेवाओं और रोजगार के अवसरों पर बहुत ज्यादा निर्भर करते हैं. इससे यह साफ होता है कि UCTs स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, बाल देखभाल या विकास को बढ़ाने वाले सार्वजनिक खर्च का विकल्प नहीं हैं.
इसके बजाय, रिपोर्ट ने उन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों की ओर इशारा किया है जहां देशों ने खुले सिरे वाली आय सहायता के बजाय कैश ट्रांसफर को स्पष्ट और जांच योग्य शर्तों से जोड़ा है.
मेक्सिको के प्रोग्रेसा या ओपोर्टुनिडेड्स कार्यक्रम में परिवारों को तभी पैसे मिलते थे जब बच्चे रोज़ स्कूल जाते थे. गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चे जांच और पोषण की देखरेख के लिए क्लीनिक जाते थे. अगर ये शर्तें पूरी नहीं होती थीं तो भुगतान रोक दिया जाता था. परिवारों की समय-समय पर दोबारा जांच भी की जाती थी.
ब्राजील के बोल्सा फैमिलिया कार्यक्रम में बच्चों का स्कूल जाना जरूरी था. टीकाकरण और मां की देखभाल जैसी बुनियादी स्वास्थ्य जरूरतें भी पूरी करनी होती थीं. इन शर्तों से यह पक्का हुआ कि सरकारी पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण को बेहतर बनाने में लगे, न कि सिर्फ खर्च बढ़ाने में.
कुछ कार्यक्रमों में बाहर निकलने या समीक्षा करने की व्यवस्था भी होती है.
सर्वे में कहा गया है, “ये अनुभव दिखाते हैं कि कैश सपोर्ट को कंडीशनल, रिव्यू-बेस्ड और टाइम-बाउंड बनाया जा सकता है, जिससे लंबे समय की वित्तीय सख्ती कम होगी और ह्यूमन कैपिटल मज़बूत होगा.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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